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रविवार, 5 सितंबर 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (6+7)

                  हम सब इलाहबाद वापस आ गए। मैं अपने मन पर एक बोझ  लिए था कि इन लोगों ने मुझसे ये सब कहने की हिम्मत कैसे की? मेरा इनसे कोई वास्ता नहीं था। मैं कभी इन लोगों के उनके जीवन में शामिल होने के बाद पापा के पास गया ही नहीं, लेकिन पापा के जीवन में नई माँ के आने के पीछे कोई बड़ी साजिश थी, जिसका खुलासा आज मेरे सामने होने लगा था। नई माँ के भाई किसी गाँव के रहने वाले और कम पढ़े लिखे ही होंगे तभी तो उन लोगों की भाषा से अपराधीपन की  बू आ रही थी। कोई शरीफ और सभ्य इंसान क्या किसी के पिता की  मौत के बाद उसके ही बेटे से इस भाषा में और अपने अपराध को क़ुबूल करने वाले वक्तव्य के साथ इस तरह से पेश आया होता। ये बातें तो तब करनी चाहिए थी जब कि मैं ऐसा कुछ उनसे चाहता।
                              लेकिन मन पर ये बोझ कि पापा का एक्सीडेंट  नहीं हुआ है बल्कि ये एक्सीडेंट  करवाने की  एक सफल साजिश  थी और उसमें साजिशकर्ता सफल भी हो गए। नई माँ को उन लोगों ने मोहरा बना लिया था।  वी आई पी  जिन्दगी के सारे सुख और अपने कारोबार के लिए पापा का  बैक-अप कोई बुरा तो नहीं था। मैंने ये बातें न नाना को और न दीदी को घर में किसी से नहीं कहीं। उनको सुनकर दुःख होता और फिर वे मुझे लेकर हर समय सशंकित रहते कि कहीं मेरे साथ भी कुछ गलत न हो जाय।
                            पापा के न रहने पर वे लोग मीना मौसी को अपने घर काम करने के लिए ले गए और मीना मौसी तो बाल विधवा थी उनको सहारा चाहिए था कि उनके लिए अपने खर्च के लिए कुछ काम बना रहे। लेकिन कुछ ही महीने के बाद मीना मौसी  वहाँ से छोड़ कर वापस अपनी माँ के घर आ गयीं। मीना मौसी का आना क्या हुआ?  नए रहस्यों का खुलना शुरू हो गया।  मीना मौसी पहले तो मम्मी के साथ ही गयीं थी लेकिन फिर उन्हें पापा के लिए वहाँ रहना पड़ा।  वह गंभीर प्रकृति की महिला हैं या कहें कि वे जो १० साल में ब्याही गयीं और १२ साल में बिना गौना हुए विधवा भी करार दे दी गयीं थी, अपनी माँ के साथ काम करने आती और फिर मम्मी और मौसी के साथ खेला करतीं थीं। उनका सारा जीवन इसी तरह से गुजरना था सो मम्मी की शादी के बाद दीदी के होने पर नानी के कहने पर वे मम्मी को सहारा देने के लिए आ गयीं थी और फिर यहीं रहीं थीं।
                  मीना मौसी ने बताया कि -- 'दीदी के न रहने पर साहब बहुत दुखी रहते, ऑफिस से आकर बस कमरे में ही रहते थे।  कुछ लोगों ने ऑफिस के काम से घर में आना शुरू कर दिया था।  कुछ फरेबी लोग होते हैं, जिन्हें हर कोई नहीं समझ पाता।  साहब भी पढ़े लिखे तो थे लेकिन चालबाजी से बहुत दूर रहते थे सो उनको भी ऐसे लोगों की पहचान न थी।'
                  एक दो साल में उन लोगों ने साहब से अच्छी दोस्ती कर ली थी, उनका कुछ काम साहब के द्वारा ही हो सकता था सो वे चापलूसी करते रहते।  कभी कभी तो रात का खाना भी मैं बना कर उनको खिलाती थी।  वे ठेका जैसे काम की बात करते थे।  फिर धीरे धीरे  उन्हें पता चला कि साहब बच्चों को बहुत चाहते हैं लेकिन बच्चे छोटे हैं इसलिए उनको अपने पास रख नहीं पाते हैं। हम लोग पापा की कमजोरी हैं इस बात का उन लोगों ने फायदा उठाया और पापा से चाल खेल कर फँसाने की साजिश रची, जिससे कि पापा पूरी तरह से उनके काम को मना न कर सकें।
       "अरे साहब , दूसरी शादी कर लीजिये बच्चों को माँ मिल जाएगी और आप को साथीजिससे  कि आपके बच्चे आपके पास रह सकेंगे. मेरी बहन बहुत अच्छी लड़की है वह सब संभाल लेगी. आपके घर में फिर से खुशियाँ लौट आएँगी।"
            "उन लोगों ने साहब को खूब सब्जबाग दिखाए और  मैं भी बहुत खुश थी कि नई मालकिन आ जाएँगी तो साहब खुश रहने लगेंगे और दीदी के बच्चे भी अपने पापा के पास आ जायेंगे।"
            फिर वे लोग रोज आने लगे और इसी विषय में बातें करते। एक दिन वह एक लड़की लेकर आ गए और साहब के आने का इन्तजार करने लगे। साहब के आने पर उस लड़की ने मेरे पास आकर पूछा कि साहब को कौन सा नाश्ता पसंद है और फिर मुझे हटा कर बनाया।  बात मुझे कुछ बनती नजर आने लगी और फिर साहब ने कोर्ट में शादी कर ली। शादी की खबर उन लोगों ने यहाँ पर भी नहीं लगने दी, बाद में बताने के लिए कहा था।"
             जैसा मैंने सोचा वैसा नहीं हुआ।" शादी के बाद तो उन लोगों ने भी घर में डेरा जमाना शुरू कर दिया और साहब को ये बिल्कुल भी पसंद नहीं था। अधिक पास आने से उनको ये पता चल गया कि ये लोग अच्छे नहीं है लेकिन वे अब उनके रिश्तेदार बन चुके थे।  कभी कभी उनका काम करवाना भी पड़ता था, जिससे साहब पर लोगों ने उंगलियाँ उठना शुरू कर दिया। साहब ने मेमसाहब से कहा कि उनके भाई यहाँ न रहा करें।  इससे घर में क्लेश शुरू हो गया।  साहब न हों तो भाई आते और बहन को कुछ न कुछ कह जाते।  फिर मालकिन खुश न रहती और साहब से बहस किया करती थीं।  अक्सर साहब अकेले नाश्ता करके चले जाते, मैम साहब बाहर नहीं आती थीं. ये ढर्रा कई कई दिन तक चलता रहता।"
                       "आखिर साहब ने एक मकान खरीदकर उन लोगों को दे दिया जिसमें जाकर वे रहने लगे।  इस घर में उनका आना जाना कम हो गया।"
             "फिर जब से बच्चा हुआ तो मैम साहब कम गुस्सा होती और भाई से भी लड़ जाती।  साहब भी उनके काम में साथ न देते तो कहा सुनी होने लगी थी।  उस दिन रात में मैम साहब के भाई किसी काम  को करवाने के लिए बहस कर रहे थे और साहब राजी न थे तो धमका कर चले गए।  कई दिनों तक कोई नहीं आया गया और घर में भी शांति रही लेकिन मैं नहीं जानती थी कि शांति तो किसी बड़ी अशांति के लिए चल रही है और फिर ये हादसा  हो गया।"
         मीना मौसी से जो पता चला और जब हम लोगों ने सारे तार जोड़े तो साफ हो गया कि नई माँ की शादी उनके भाइयों ने अपने ठेके के काम के लिए पापा को यूज करने के लिए करवाई थी।  जब काम नहीं बना तो दूसरी तरह से उनका फायदा आजीवन उठाने का रास्ता खोज लिया।  बहुत नहीं तो कुछ तो उनके रिश्तेदार होने का प्रेशर होता ही है और पापा भी इसमें फँस ही गए थे,  जिससे निकल तो नहीं पाए हाँ उन लोगों ने हमें जरूर अनाथ कर दिया। 
 
                                          ***
 

दीदी के आने की सूचना मुझे मिली तो लगा कि मेरे दिल से एक भारी बोझ उतरने वाला है - जैसे मैं उसे कई वर्षों से ढो रहा होऊँ , मुझसे रहा नहीं गया और मैंने शम्भू को बता दिया कि दीदी आने वाली है और किचेन में सब कुछ ढंग से होना चाहिए। सारी व्यवस्था सही होनी चाहिए। राम किशोर ने मालियों को भी बता दिया कि साहब की बहनजी आ रही हैं।  सब अच्छे से साफ सूफ करके रखना, उन्हें कोई शिकायत का मौका न मिले।
                        दीदी को सुबह ट्रेन से जल्दी पहुँचना था सो मैंने सोचा कि ड्राइवर  को परेशान करने से अच्छा है कि गाड़ी मैं ही लेकर चला जाऊँ।  यहाँ पर दीदी पहली बार आ रही हैं, ये भी नहीं हो सकता कि दीदी आयें और रास्ते में हम इस विषय में कुछ डिस्कस न करें। ड्राइवर के होने से प्राइवेसी नहीं रह जाती और हम खुल कर बात भी नहीं कर पाते और रास्ते भर चुप रहें। ये कैसे हो सकता है?
                       हम और दीदी गाड़ी में बैठे तो दीदी का पहला सवाल था - "हाँ आशु, अब बोलो प्रॉब्लम क्या और कैसी है?"
          "हाँ दीदी वह नई माँ का बेटा है और मेरे ही बंगले में माली का काम कर रहा है, वह भी मेरे यहाँ पर आने के पहले से ही है।" मैं सब कुछ एक साँस मैं कह गया। 
          "ये कैसे हो सकता है, जहाँ तक मुझे पता है कि नई माँ के बच्चे लखनऊ में सिटी मोंटेसरी स्कूल में पढ़ रहे थे।"
        "लेकिन पापा के बाद क्या हुआ? ये तो हमें नहीं पता है?"
       "हाँ, उसके बाद तो नहीं पता, हमारा कोई रिश्ता ही कहाँ रह गया था?" दीदी मेरी इस बात से सहमत थी।
       "उससे पूछा कुछ तुमने?"
      "नहीं, मुझे लगता था कि मैं उसे देखकर डिप्रेस हो जाता हूँ।  कभी पापा और कभी उसकी सूरत सामने आते ही लगता है कि मैं डिप्रेशन में चला जाऊँगा। उसके बाद मैं खुद लॉन में कम ही बैठता हूँ कि कहीं उससे सामना न हो जाए।" मैंने दिल की बात दीदी के सामने खोल  कर रख दी थी।
      "लेकिन तुम्हें क्यों ऐसा लगता है? तुम क्यों घबराते हो?" दीदी को मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा था लेकिन मैं कैसे उनको यकीन दिलाऊं कि मेरी स्थिति क्या हो जाती है?
     "पता नहीं क्यों? लगता है कि उसकी आँखों से पापा कह रहे हों - 'आशु ये तुम्हारा ही भाई है.' बस इसी लिए उसका सामना करने की हिम्मत नहीं होती।"
     "अच्छा ठीक है, कल मैं मिलती हूँ और फिर उससे सब कुछ जान लूँगी और ये भी पता नहीं लगने दूँगी कि मैं उसके बारे में कुछ भी जानती हूँ।"
    "ये ठीक रहेगा और फिर मैं तो नहीं ही रहूँगा।" मैंने अपना मत जाहिर कर दिया।
                  बातें करते करते हम घर तक पहुँच गए, घर पहुँच कर हमने यह तय किया कि इस मामले को दीदी अपने ढंग से सुलझायेंगी  और फिर इस बारे में खुद ही कुछ एक्शन लेने की बात सोची जा सकती है।  एक अनचाही और थोपी हुई समस्या का समाधान नियति को शायद हमसे ही चाहिए था।  शायद मेरे पापा की आत्मा इस तरह से अपने बच्चों की दुर्गति नहीं देख सकती थी या उनका भाग्य कुछ और ही चाहता हो। लेकिन क्या? इस बारे में तो मुझे कुछ नहीं पता लेकिन कुछ तो जरूर होगा। ये क्यारियाँ खोदते हुए हाथ और गुलाब के पौधों के काँटों की चुभन से रिसते हुए खून में मेरे खून का अंश भी था तभी तो नितिन से मिलने के दिन से एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा जब कि मैं पापा को याद न कर रहा होऊँ। मैं  पापा की तस्वीर अपने कमरे में तक नहीं रख सकता था। अगर कहीं वो तस्वीर किसी ने देख ली तो नितिन से मिलते नयन नक्श एक सवाल तो पैदा कर ही सकते हैं।  सब कुछ उजागर हो सकता था।  मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहता कि नितिन ही क्यों इस बंगले का कोई भी इस बात से वाकिफ हो।
                   

 

 दीदी ने अपने कार्यक्रम की भूमिका मुझे बता रखी थी।  सर्दियों का सुबह देर से ही होती है.सारे लोग अपने अपने काम ८ बजे के बाद ही शुरू करते हैं.दीदी भी चाय बाहर लॉन में ही लेने कि इच्छुक थी , इसलिए मैंने और दीदी ने चाय लॉन में पी और मैं ऑफिस निकाल गया.
                 दीदी ने सारे बंगले का निरीक्षण घूम घूम कर करने का प्लान बना रखा था जिससे कि वे सबसे वाकिफ भी जो जाएँ और नितिन से मिलने में कुछ अजीब सा न लगे कि सिर्फ उसी से क्यों इतना मुखातिब हो रहीं हैं. बंगले के पीछे की ओर सबके लिए अलग अलग क्वार्टर बने हुए थे. दीदी का सबसे पहले पीछे से ही शुरू करने का प्लान था और उनके घरों कि औरतों से परिचय करने के लिए वे इच्छुक भी थीं. बाहर धूप थी तो सारे घरों कि औरतें बाहर धूप में बैठ कर ही काम कर रही थी. दीदी सबके पास खड़े होकर उनके बारे में पूछने लगीं. उनके घर परिवार के बारे में और मेरे बारे में सबके विचार भी जान रही थीं. दीदी को देख कर वे भी खुश हुई कि अब साहब के घर में कुछ रौनक रहेगी.
"तुम सब लोग यहाँ कब से रहते हो?"
"हमको तो ६ साल हो गए,"
"हमें अभी २ बरस भये हैं."
"हम तो अभी साल भर पहले ही आये हैं"
सब लोगों के जवाब  अपने अनुकूल ही थे. वहाँ जितने भी लोग थे सभी कि  घर खुले हुए थे लेकिन एक घर में ताला लटक रहा था. वह घर नितिन का था. यही अंदाज दीदी का भी था.फिर भी ताला देख कर उन लोगों से पूछ ही लिया - "ये घर खाली है क्या?"
"नहीं, इसमें एक अकेला लड़का रहता है , सो वह काम पर जाते समय ताला लगा जाता है. वहीं बगीचे में काम कर रहा होगा."
"क्या उसकी अभी शादी नहीं हुई?" दीदी ने आश्चर्य से पूछा.
"अभी कहाँ? अभी लड़का ही है , काम उम्र का लगता है. ३ महीने पहले ही तो यहाँ आया है." किसी ने उसके बारे में बता दिया.  ---------
"ओह" दीदी ने उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए वह बंगले के सामने कि ओर निकाल आई जहाँ पर माली अपना अपना काम कर रहे थे.  दीदी सबसे कुछ न कुछ पूछ रही थी क्योंकि उन लोगों में मिलने के लिए उनसे उनके काम के बारे में जानकारी ली जाय तो वे बहुत खुश होंगे और किसी से अपनत्व जाहिर करने के लिए उनको अपने अनुरूप ही समझना जरूरी होता है. 
"इस पौधे का नाम क्या है?"
"इसका सीजन कब से कब तक होता है?"
"इसमें पौध लगते हैं या फिर बीज से लगते है?"
"इसे कीड़ों से बचाने के लिए क्या डालते हैं?"
                 ऐसे ही ढेर सारे प्रश्न उसने सारे  मालियों से किये ताकि किसी को नितिन से बात करते हुए ये न लगे कि उन्हें सिर्फ नितिन में ही रूचि क्यों है? उनका सोचना भी सही था. जिस जगह वह थी , वह महत्व रखती थी, उनके लिए सारे ही माली या और लोग बराबर हैं ऐसा तो उनकी सोच में होना ही चाहिए. अब दीदी कि निगाहें नितिन पर लगी थीं लेकिन वह लॉन में वही काम कर रहा था जहाँ पर टेबल चेयर  लगी थीं. दीदी वापस जाकर कुर्सी पर बैठ गयी और उनकी निगाहें नितिन के काम पर कम उसके चेहरे पर अधिक टिकी हुई थी.


                 सर्दी का मौसम और कुनकुनी धूप में शम्भू ने ताजे अमरूद और धनियाँ कि चटनी के साथ दीदी के सामने लगा कर रख दिए. अमरुद और चटनी दीदी को बहुत ही पसंद थे. दीदी ने मगन होकर खाते हुए हाथ से इशारा करके नितिन को अपने पास बुलाया.
"तुम्हारा क्या नाम है?" उन्होंने पूछा
"नितिन , नितिन माथुर "
"अभी से तुमने ये काम क्यों करना शुरू कर दिया? अभी तो तुम्हारी पढ़ने कि उम्र है?" दीदी ने उससे सवाल किया
"हाँ, पढ़ नहीं पाया तो सोचा कुछ काम ही कर लूं?" बड़े दबे स्वर में उसने जवाब दिया .
"तुम्हारे माता पिता कहाँ है?"
"वो अब नहीं है, मैं अकेला हूँ. उनकी एक एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई ।" दीदी ने सुन तो लिया लेकिन कैसे कहती कि उनमें जो तुमने खोया था उसमें मेरा भी कोई था .
"क्या? तुम्हारा भी कोई नहीं है?" दीदी ने हैरानी से उससे पूछा
"नहीं, बस एक बहन है, उसकी शादी हो गयी." उसने रिश्ते के नाम पर अपनी शेष बहन को स्वीकार कर लिया.
"तुम्हारे पापा क्या करते थे?"
"डी  एम थे , अब नहीं हैं." उसने इस तरह से सकुचाते हुए बताया जैसे कि ये कोई गुनाह हो.
"क्या? डी एम थे और तुम यहाँ ये कैसे हो सकता है?" दीदी ने कुछ हैरत दिखाते हुए उससे पूछा.
"सच में थे, एक एक्सीडेंट में पापा मम्मी दोनों नहीं रहे."
"फिर........?"
"तब मैं ४ में पढता था और दीदी ६ में. मैं अच्छे स्कूल में पढता था लेकिन पापा के न रहने पर मामा ने नाना के पास गाँव भेज दिया."
"क्यों, तुम्हारा घर नहीं था?"
"था, लेकिन उसमें मामा रहते थे, पापा के बाद सरकारी घर चला गया तो उन्होंने गाँव नाना के पास भेज दिया."
"वहाँ नहीं पढ़े क्या?"
"पढ़ा, सिर्फ हाई स्कूल तक वहाँ था, फिर नाना बीमार हो गए तो उनकी सेवा में लग गया और फिर वे नहीं रहे."
"बहन कहाँ है?"
"नाना ने उसकी शादी जल्दी कर दी थी , उन्हें मामा पर विश्वास नहीं था."
"गाँव में घर तो होगा?"
"हाँ था, लेकिन नाना के न रहने पर मामा ने सब बेच दिया और मुझसे कहा कि अब जाओ कमाओ खाओ. तो यहाँ आकर काम मिल गया तभी से यहाँ हूँ." नितिन भरे गले से सब बता रहा था
"तुम्हारे पापा की नौकरी से पैसा मिला होगा वह कहाँ गया?"
"मुझे कुछ नहीं मालूम, क्या हुआ? कोई साथ नहीं था. नाना मामा से डरते थे,  वही  सारे कागज़ पर साइन करवा कर ले गए थे."
"तुमने कभी जानने कि कोशिश भी नहीं की, अब तुम इतने बड़े हो चुके हो कि पता तो कर सकते हो."
"नहीं, मुझे इस बारे में कुछ नहीं मालूम और फिर कौन बताएगा? मेरा साथ कौन देगा? तब कैसा पैसा और घर? लखनऊ में हमारा घर भी था उसमें मामा लोग रहते थे."
"अच्छा आगे पढ़ना चाहते हो?"
"पढ़ लूँगा."
पढ़ लूँगा का क्या मतलब?" दीदी को गुस्सा आ गया , जब इंसां कुछ खुद  ही न करना चाहे तो फिर दूसरा क्या करे?
"काम करूंगा कि पढूंगा, पढ़ने के लिए भी समय चाहिए." नितिन ने अब अपनी मजबूरी जाहिर कर दी थी.
"अगर तुम पढ़ना चाहो तो मैं आशु से बात करके  तुम्हें समय दिलवा सकती हूँ." दीदी ने उसके सामने प्रस्ताव रखा.
"अगर ऐसा हो जाए तो मैं इस काम से छुट्टी पा लूँगा." उसके चेहरे पर आशा की एक लीक दिख रही थी.
"ठीक है, तुम शाम को आना, मैं आशु से तुम्हारे लिए बात करूंगी." दीदी ने उसे शाम को आने कि बात कही.
"थैंक्स"  जब उसके मुँह से सुना तो दीदी को लगा कि ये पापा के संस्कार  हैं , जो इन लोगों के बीच रहकर दम तोड़ने लगे हैं लेकिन अगर इन्हें फिर से हवा पानी मिले तो नितिन भी फिर से जीवित हो सकता है और फिर पापा के छोड़े हुए पैसे और घर पर उसको हक भी मिल सकता है. इतना सब कुछ होते हुए भी उसके पास कुछ भी नहीं यहाँ तक कि सिर छुपाने कि जगह भी नहीं है.   
                                                                                                                                         (क्रमशः)
                                            

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (3)

“साब, चाय लाऊँ क्या?"  मिश्रा जी ने आकर पूछा।
"हाँ, थोड़ी देर में ले आना।"
"साब, नाश्ता कितने बजे?" 
"आज मुझे जाना नहीं है, घर पर ही रहेंगे और यहाँ  के और ऑफिस के लोगों से परिचय करूँगा।" मैंने बताया था कि मैं घर पर ही हूँ। अभी मुझे आये कुछ ही दिन हुए हैं, पहले तो गेस्ट हाउस में रह रहा था, जब बंगला खाली हो गया तो सामान सहित यहीं शिफ्ट हो गया। अभी मेरा सबसे ठीक से परिचय भी नहीं हुआ था, मिश्रा जी से जो रसोई देखते थे।  
                      आज मैं सबसे परिचित होना चाहता हूँ, जो मेरे लिए काम करते हैं, वे कैसे हैं? उनके घर परिवार के लोग क्या हैं? कम से कम उन्हें उनके नाम से तो बुला सकूँ। यहाँ सभी के परिवार भी हैं। इस बंगले में रहने वालों के बच्चे यदा कदा बाहर से नजरें डालते हैं और फिर कोई उनको अलग खींच लेता कि साहब नाराज हो जाएंगे। यही सोचा कि सबसे पहचान हो जाए और सब मुझे भी पहचान लें।
                    शुरू में बड़ा आलस आ रहा था लेकिन मिश्राजी चाय लेकर आएं उससे पहले ही नहा धोकर तैयार हो जाना था।  फिर नानी ने बचपन से आदत डाल रखी थी कि कोई भी बगैर नहाये धोये कुछ भी नहीं खायेगा-पियेगा। इसलिए सुबह जल्दी ही सारे काम से फ्री हो जाऊँ, फिर उसके बाद कुछ भी करूँ।
                वह चाय लेकर आ चुका था और मैं बाहर आ रहा था। वह कुछ देर ठिठका कि शायद साहब कुछ कहें। यह भी बताएँ कि आज का सबसे परिचित होने का दिन है।
               "गुप्ता जी, आज मैं लंच के बाद बाहर लॉन में बैठूँगा और इस हॉल में काम करने वाले सभी लोगों से मिलूँगा। सिर्फ लोगों से ही नहीं बल्कि उनके परिवार वालों से भी। मुझे यह पता लगना चाहिए कि यहाँ कौन कौन लोग हैं और कौन क्या करता है?"
“साहब कितने बजे तक?”
"मैं एक बजे तक तैयार हो जाऊँगा और आप सभी लोग एक ही समय पर आ जायें।"
"ठीक है साहब मैं नौकरों को बताता हूँ।" कह कर अर्दली चला गया।   
                                                                                                                                                                                                                              
                       1 बजे जब मैं बाहर आया तो सभी लोग वहीं थे और अपने-अपने परिवार के सदस्यों के साथ बैठे थे। उन सब को लग रहा था कि इस बंगले के परिसर में कितने लोग रहते हैं? शायद ये एक कमरे में ही रहेगा या फिर कुछ और जगह होगी और मेरे लिए इतना बड़ा बंगला और रहने वाला सिर्फ मैं हूं? ये भी तो अपनी-अपनी किस्मत होती हैं। "गुप्ता जी, आप सबसे पहले आइए।" मैंने उनको को ही बुलाया।
              "जी साब।" और वह अपने परिवार के साथ आ गए। उनकी पत्नी के साथ एक बड़ी बेटी जो करीब 15 साल की होगी और छोटीं लगभग सात  साल की थीं ।  
                  "हाँ सबसे हमारा परिचय तो कराइए।" 
                 "साब, ये हमारी घरवाली मीना, ये बड़ी बिटिया शालू, और ये दोनों जुड़वाँ हैं कम्मो और निम्मो ।" 
                 "बिटिया कहीं पढ़ रही है?" 
                 "जी साहब, नगर पालिका के स्कूल में नवीं क्लास में पढ़ रही है।"  
                 "ये तो अच्छी बात है, ये छोटी वालीं?" 
        "इनका अभी इनके दाखिला नहीं कराये हैं, बड़ी बहन ही घर में पढ़ाती है।" 
        "इन्हें भी जाना चाहिए, अब बड़ी हो गई, इसलिए इन्हें भी स्कूल भेजिए।"





               ठीक है, अब और लोगों को भेज दीजिये। फिर अगला व्यक्ति आया उसके साथ उसकी पत्नी भर थी.
"साब मैं राम किशोर बंगले में माली का काम करता हूँ और ये मेरी पत्नी किशोरी।"
"अरे वाह राम किशोर जी की पत्नी किशोरी क्या संयोग मिला है।" मैं ये चाहता था कि इन सब के मन मैं मेरे प्रति कोई डर न रहे अपनी बात और तकलीफें ये मुझे खुल कर बता सकें। मुझे अपना अफसर समझने के साथ साथ एक हमदर्द भी समझें।
"साब मैं शम्भू और ये हमार घरवाली परबतिया. इ हमार बिटवा चैन और बिटिया राहत."
"अरे वाह शम्भू  जी यहाँ तो बड़े अच्छे लोग हैं। शम्भू को मिली हैं पारवती जी और बेटे बेटी चैन और राहत।" मैंने सबके लिए कुछ न कुछ सोच रहा था और यहाँ अजीब संयोग भी देख रहा था।
                   फिर और भी कई लोगों से मेरा परिचय हुआ और अंत में आया एक सबसे काम उम्र का लड़का, उम्र उसकी होगी कोई बीस साल और उसका चेहरा देख कर तो मैं चौंक ही गया - वह माली का काम करता था। इस उम्र में माली का काम कुछ समझ भी नहीं आ रहा था और फिर ये उम्र तो पढ़ने लिखने कि होती है। क्या ये सारा जीवन इसी तरह से माली ही बना रहेगा।
        वह अपना काम कर रहा था , जब सब लोग चले गए तो दयाल ने उसको ही बुलाया - "अरे नितिन , अब तुम भी आ जाओ, सब परिवार वाले तो मिल लिए साहब से अब तुम अकेले तो अकेले में ही मिलो. " दयाल जी अपने काम में लग गए।
         वह मेरे सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया , वह देखने में किसी संभ्रांत परिवार का लग रहा था। उसका रहन सहन और पहनावा सबसे अलग किन्तु माली का काम कुछ मेरे समझ नहीं आया और सबसे अधिक समझ नहीं  आया यह कि उसकी सूरत बिल्कुल पापा जैसे थी। पता नहीं मन में कितनी उथल पुथल मच गयी उसको देख कर।
"हाँ, बताओ अपने बारे में।" वह चुप खड़ा था तो मुझे ही उससे पूछना पड़ा।
"जी, मेरा नाम नितिन है और मैं यहाँ माली का काम करता हूँ।" यह कह कर वह चुप हो गया।
"पढ़ाई नहीं की, इस  काम में क्यों लग गए?" 
"पढ़ाई शुरू तो की थी , लेकिन फिर नहीं पढ़ सका।"
"कहाँ के रहने वाले हो?
"पहले लखनऊ में रहता था और पापा के न रहने पर पुरवा चला गया था नाना नानी के पास।"
"तुम्हारे पापा क्या करते थे?"
"जी, आई ए एस अफसर थे।" मुझे किसी ने ऊपर से नीचे लगा कर पटक दिया था. ये लड़का क्या कह रहा है? किसी आई ए एस का बच्चा माली का काम करेगा।
"क्या नाम था तुम्हारे पापा का नाम."
"स्व. प्रदीप कुमार माथुर." उसके मुँह से ये नाम निकला और मेरे पसीना छूट  गया क्या ये नई माँ का बेटा है, लेकिन यहाँ कैसे ? क्या हुई सारी जायदाद , पापा की सारी प्रॉपर्टी कि ये माली का काम कर रहा है।
"तुम्हारे घर में और कौन है? तुम्हारी माँ भाई बहन?"
"माँ भी नहीं है, बहन है उसकी शादी हो गयी है।"
"अच्छा अब तुम जाओ।" यह कर कर मैं इलेक्ट्रॉनिक्स इलेक्ट्रॉनिक्स चला आया। मैं अपने को संयत नहीं कर पा रहा था। ये नई माँ का बेटा ऐसे कैसे हो सकता है? लेकिन मैं अभी भी उन्हें कुछ भी नहीं जानना चाहता था और पापा का नाम सुना था मेरे दिमाग की सारी नसें ग्लासगोड था। इतना अधिक तनाव हो रहा था कि कल से मैं कुछ सुखद और नमूना से खुद को मिला हुआ देख रहा था और उनके साथ सामंजस्य स्थापित कर खुद को सामान्य करने की कोशिश में लगा था कि फिर एक और विस्फोट हो गया। इस आवाज में किसी ने नहीं देखा और उसकी त्रासदी पर किसी ने गौर नहीं किया लेकिन ये मैंने जो देखा और सहा उसके लिए मैं क्या करूँ? 
        मैं यहां पर पापा के बेटे के साथ चैट पर हूं और दूसरे बेटे माली के साथ भी बात कर रही हूं, लेकिन मैंने उनके साथ एक दिन तो क्या एक पल भी नहीं गुज़ारा था तब हमें क्या लेना चाहिए। नई माँ ने जिस तरह से हमें पापा से अलग करके पापा को हमसे छीन लिया था फिर ईश्वर ने कुछ बुरा तो नहीं किया। हम कैसे रोये थे और कितने तड़पे थे उस दिन तो पापा भी बहुत रोये थे जब हमें वहाँ से भेज रहे थे। नई मां तो बाहर तक निकल कर नहीं आई थी।
'पर इससे क्या?' इन बच्चों का क्या दोष?'

'लेकिन वो मां तो नहीं है और इन बच्चों का क्या कुसूर है? '
' कुसूर हैं न कि ये ही वो हैं जिनसे मिलने पर पापा का प्यार हमसे कम हो गया था। और वह प्यार जिसपर हमारा भी थोड़ा सा हक था वह भी खाली हो गया था'
'सिर्फ ये बच्चे हैं, पापा भी नहीं थे तो अपने बड़े बच्चों के प्रति अपनी फर्ज को भूलाना नहीं चाहिए था।'
. फिर मैं क्या करूँ? किससे पूंछूं ? नाना नानी से, माँ मामी से या मौसी से? किसी से भी नहीं किसी का भी मन लोगों के लिए सहानुभूति नहीं है और मेरा मन - मुझे नहीं, इस लड़के का चेहरा देखा तो पापा का चेहरा ही सामने आ गया, बिल्कुल पापा की तरह से इसकी शक्ल है।
                     फिर मैं किससे पूंछूँ कि मैं क्या करूँ? इस तनाव से कैसे छुटकारा पाएं और कैसे इस लड़के को यहां देखें। हां दोस्त से बात कर सकते हैं, वह ही मुझे सही सलाह दे सकता है। पर दोस्त भी अभी घर पर ही होगी और वह खूबसूरत सारी बातें पूँछ लूँगा। दोस्तों को फोन मिलाने की कोशिश की जा रही है और फोन नहीं उठ रहा है। हो सकता है कि कहीं काम में लग जाए या फिर नौकर में।थोड़ी देर बाद फिर जाएगा। आज छुट्टी तो उसकी भी होगी। 
                                                                                                                                   (क्रमशः)

रविवार, 22 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (२)

                  भोजन कक्ष से उत्सव बहुत देर तक हो गया। बॅक्स टाइम का दोस्त उसके परिवार को चुकाया गया था फिर भी ऐसा नहीं लगा कि मैं उनसे कई दिनों के बाद मिला हूं। पुरानी पुरानी बातें याद करके हम सब हँस रहे थे। उनकी पत्नी भी बहुत अच्छी थी. बहुत जल्दी ही हमें अपने परिवार के सदस्य की तरह स्वीकार कर लें।
"यार मलय जब भी समय खाली हो तो चला आया कर।" नीतीश ने कहा.
"हां भाई साहब हम भी तो अकेले ही रहते हैं, आप आ गए तो हमारा भी समय शानदार कट जाएगा।" अब बारी उनकी पत्नी की थी. 
"हां, सोच तो मैं भी यही रह रहा हूं, क्योंकि यहां मेरा कोई और तो पसंद नहीं है। ऑफिस से फ्री हुआ तो बस यार दोस्तों का ही सहारा रहेगा।" मैं उन लोगों से इस बात को रेखांकित करते हुए रात 12 बजे घर पहुंचा।
                सभी नौकर सोए थे सिर्फ मोटरसाइकिल जाग रहे थे. निर्मित उत्पाद देखा तो बैडरूम सही ढंग से तैयार किया गया था और मैं हाथ धोकर में लेट गया। नज़र में लेट जाने से ही तो आदमी सो नहीं जाता. मुझे नींद नहीं आ रही थी. पहले दिन हर किसी जगह तो अच्छा नहीं लगता और जगह से नींद भी तो नहीं आती। मेरा दिमाग फिर अकेले सब बातों में भटकने लगा ---- मैं और बहन नाना नानी के पास चेन से रहने लगे थे। जब पापा किसी काम से आएं तो हम लोग पास जरूर आएं और एक दो दिन रुक कर वापस चले जाएं। हमारे खर्च के लिए पापा पैसे हर महीने बैंक में डाल देते हैं। हम लोगों को किसी भी बात की कमी नहीं थी. वैसे ही हमारे नाना और नानी ने भी बहुत कुछ लिखा था, फिर भी पापा को बच्चों के जन्मदिन पर कुछ देना था , इसलिए उन्होंने अपने बच्चों के लिए कुछ पैसे महीने बैंक में डालते रहते थे।
                  अचानक एक दिन पापा का फोन आया कि वे शादी कर रहे हैं - नानी ने तब बहुत बड़ी सहमति जताई थी। माँ के न रहने के बाद पापा तीन साल तक अकेले रह कर जीवन जिया इसके बाद मेरी दादी का भी निधन हो गया और पापा बिल्कुल अकेले रह गये। हाँ मीना मौसी अब भी अपने घर में खाना आदि के लिए रहती हैं। नानाजी के झगड़े मचाने से कुछ नहीं हुआ, पापा का फैसला तो अपना फैसला था और उन्होंने अपना फैसला सुना दिया था। नाना-नानी को हम लोगों का भविष्य खतरे में नजर आने लगा तो उन्होंने पापा के सामने ये शर्त रखी कि वे हम लोगों के नाम पर कुछ लाख रुपये फिक्स कर दें। पापा ने उन्हें बताया कि ये हमारे बच्चे और मेरी जिम्मेदारी हैं। सब अच्छे तरह से सेट होते ही मैं अपने बच्चों को अपने साथ ही रखूँगा। लेकिन नाना-नानी नहीं माने , उन्होंने हम दोनों के नाम पर पैसे मंगवा ही लिया। 
                   पापा ने अपनी शादी में किसी को नहीं बुलाया. उन्होंने सिर्फ कोर्ट में शादी की थी. शाही शादी हुई उनके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी। शादी के बाद पापा नई मां को लेकर नाना के घर आए थे और नानी से कहा था कि अब मंजूरी की जगह ये ही आपकी बेटी और बच्चों की मां है। नानी ने तो उन्हें अपनी बेटी स्वीकार कर लिया था। उनके जाने का समय एक ही तरह से विदाई की जैसी बेटी होती है। पर नई माँ को शायद ये अच्छा नहीं लगा क्योंकि उनका कुछ अच्छा फीडबैक नहीं मिला और इसके बाद ही नानी ने सोचा कि बच्चों को वह पापा के पास कभी शेयर नहीं करेगी।
                    पापा के फोन ऐसे ही आते रहते थे. उनका प्यार हम लोगों के लिए यही था. लेकिन वह नई मां को तो स्टार नहीं बना सकती थीं। ये जरूरी नहीं था कि वे पापा के साथ अपने बच्चों को भी स्वीकार कर लें। पापा की शादी के दो साल बाद उस साल गर्मियों की छुट्टियों में पापा हमको अपने साथ ले गए। नई माँ को कुछ अच्छा नहीं लगा. पापा हम लोगों को चूमने ले जा रहे थे। नई माँ एक दो बार हमारे साथ चली गई लेकिन फिर से सूखा कर गई। ऐसा नहीं है कि पापा उनकी इस बेरुखी को पहचान नहीं पा रहे थे लेकिन उन्होंने हमें इस बात का पता नहीं लगाया इसलिए हम लोगों पर पूरा ध्यान दिया था। कभी पिकनिक तो कभी हिल स्टेशन और कभी क्लब ले जाते हैं। हमें सिर्फ पापा की वजह से वहां अच्छा लग रहा था और अगर पापा के अलावा मैं और दोस्त अकेले होते तो शायद नहीं रह पाते। पापा ने सोचा था कि पहले नई मां बच्चों के साथ हिल मिल जाएं तो फिर वे आखिरी बार आएंगे। आदर्श से नहीं लाना चाहते थे इसलिए नई मां और हम लोगों के बीच पठने वाले अंतराल की गहराई भी तो मापनी थी। 
           और फिर एक रात वह भी आई जब वह और पापा डिनर करने के बाद सोने चले गए। हम लोगों को नींद नहीं आ रही थी तो हम लोग लूडो खेलने लगे। काफी रात हो गई होगी कि पापा के बेडरूम से तेज़ तेज़ आवाज़ें आओगे -
"मुझे यहाँ बच्चों का बिल्कुल पसंद नहीं है।"
"क्यों वे गर्मियों में ही तो आ जाते हैं, तूफान क्या परेशानी है?" पापा का स्वर बड़ा ही संयत था. 
"मुझे परेशानी ही परेशानी है - मैं बारिश से परेशान नहीं हूं।" नई माँ खिज रुकी थी.
"उनको मैं मनोरंजन करता हूँ, पासपोर्ट यात्री प्रवेश की आवश्यकता नहीं है।" 
"तुम कहो तो मैं खुद यहां से चला जाऊं, फिर तुम रहो और ये बच्चा।"
"हां, हो सकता है लेकिन ये नामकरण कभी भी इस घर में नहीं हो पाएगा।" पापा का स्वर खराब हो रहा था।
"हाँ, हाँ, मुझे तो अंधेरी शादी करनी ही नहीं थी, वो तो मेरे घर वालों ने अपने हुक्स के लिए छेद कर दिया था, मेरी बलि चढ़ा दी।" 
                       और फिर पापा चिप्स हो गए और आवाज आनी बंद हो गई। मैं और दीदी बहुत बड़े नहीं थे लेकिन दीदी सयानी हो गई थी। हम लोग इस के लिए अपनी बुद्धि के अनुसार हल रेंक में लग गए। हम लोगों ने सोचा कि अगर रुकावट न हो तो मां पापा को छोड़ कर चली जाएंगी तो पापा फिर अकेले हो जाएंगे। हम लोगों को तो नाना नानी का घर है और फिर हमको यहां कितने दिन रहना होगा। इससे तो अच्छा यही होगा कि हम लोग अभी ही नाना के यहाँ लौटें और फिर कभी यहाँ न आयें। पापा तो हम लोगों से मिलते ही रहेंगे। 
                     सुबह नाश्ते पर सिर्फ पापा और हम थे, मीना मौसी ने सब कुछ लोग तैयार करके दिया था। नई माँ के लिए नहीं आई थी. पापा का आकर्षक चेहरा बता रहा था कि पापा बहुत तनाव में हैं।
       बात दीदी ने शुरू की - "पापा, हमें रमेश अंकल के साथ वापस भेज दो।"
"क्यों? अभी तो काफी छुट्टियाँ बाकी हैं" पापा-बहन की बात सुनकर चौंक गए थे। एक कहावत से पता चला कि उनकी सारी बातें हम लोगों ने सुनी हैं। हमें भी पापा से यही प्यार है पापा को हम लोगों से।
"अभी तो तुम लोग आये हो,अभी हम ठीक से साथ घूम और घूम भी नहीं पाए हैं कि तुम लोग जाने की बात कर रहे हो। पापा को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था.
"इस बार हम लोग अपना होम वर्कशॉप करके नहीं आए हैं और न ही साथ लाए हैं - अभी कंप्लीट भी नहीं हुआ था। फिर हम पूरा भी नहीं कर पाएंगे।" दोस्त ने बात को बड़ी चतुराई से घुमाने के लिए वजनदार कारण पापा के सामने पेश कर दिया।
"हां, आशु भारतीय क्या कहते हैं?" पापा ने मेरी ओर से मुझसे एक सवाल पूछा।
"हां पापा दीदी ठीक कह रही है, इस बार हम लोग पूजा की जगह पर हैं।" मैंने भी तो दोस्त की बात की पुष्टि कर दी थी.
                 फिर पापा तैयार हो गये. मीना मौसी ने हमारी तैयारी कर दी और हमें गले लगा कर विदा किया। पापा ने राकेश अंकल के साथ हमारे जाने की तैयारी पर मुहर लगा दी। जब हम लोग चलते हैं तो पापा के चेहरे पर वह उदासी और पसंद करते हैं हम दोनों से दोस्ती नहीं रहती और अंत में पापा गाड़ी में बैठकर हम लोगों को गले से लगा कर रो पड़े। पापा के उस दिन का दर्द हम दोनों को भी सहा था। नई माँ कमरे से बाहर निकल कर नहीं आई थी। ये तो हमने नाना नानी को नहीं बताया था लेकिन मीना मौसी ने फोन पर मेरी मौसी को बताया।
                      फिर हम पापा के पास रहने के लिए कभी नहीं गए। पापा जब भी समय हमसे मिलने आते थे। कई सांद्र तक ये शैलियां चलीं और फिर उसके बाद पापा को भी नई मां से एक बेटा और एक बेटी मिल गईं और पापा का प्यार भी दो की जगह चार में बंट गया। फिर वे दोनों चौबीस घंटे उनके साथ रहे, स्वभाव यह है कि उनके पापा का प्यार सबसे ज्यादा होगा। फिर पापा का ट्रांसफर एलखानू हो गया और वहीं पर एक मकान भी खरीद लिया। जब घर में प्रवेश किया तो हम लोगों को यानि नाना नानी, मामी और मौसी को बुलाया गया। वे बहुत खुश थे लेकिन नई मां के घर वाले मुझे जरा से भी अच्छे न लगे, सब लोग गुंडे मावली लग रहे थे फिर भी हमें कुछ लेना पड़ा तो नहीं तो हम लोग गृह प्रवेश के बाद अपने घर वापस आ गए। 
                   पापा हम लोगों का खर्च बराबर डालते थे लेकिन अब उनका आना कम हो गया था। हो सकता है कि कोई माँ के कारण न आ सके। मीना मौसी से ही पता चला था कि उनके घर में वही रखा गया था जिसके लिए पापा ने गृह प्रवेश किया था और बाद में भी अपना सरकारी बंगला खाली नहीं किया था। वे परिवार के साथ वही रहते थे और इस नए घर में नई माँ के भाईसाहब थे।
                नींद का पता कब चला, ये पता ही नहीं चला। सुबह जब दुकान के लिए खराब टी के लिए नौकर आया तो लगा कि सवेरा हो गया है।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

नियति के थपेड़े! (अंतिम कड़ी)

"विनोद के साथ शादी होने के नवें महीने ही मैंने निधि को जन्म दिया था. उसकी सूरत एकदम सुरेश पर गयी थी. दोनों शादियों में अंतर ही कितना था? विनोद ने इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन मैं इस बात को समझ गयी थी कि ये सुरेश की ही निशानी है. जब निधि कुछ बड़ी हुई तो विनोद ने एक दिन मजाक में कहा - 'यार निधि कि सूरत न तो मेरे जैसी है और न ही तुम्हारी जैसी ऐसा तो नहीं कि ये किसी और की बेटी हो.'  मैं उस समय क्या कहती? न सफाई में और न ही गुनाह में. मैं शादी के बाद फिर कभी मायके गयी ही नहीं थी. न ही और भाई बहनों की  शादी में उन लोगों ने बुलाने की  जरूरत समझी. कभी कभी भाई साहब  जरूर ले जाते ताकि विनोद को शक न हो और मेरे लिए जाना भी जरूरी हो जाता था. "
"तुम्हें कभी इस बात का अपराध बोध नहीं हुआ?" मैं उसके मन की बात जानना चाहती थी.
"अपराध बोध किस बात का? मैंने अपनी मर्जी से ये शादी नहीं की थी. सुरेश और हमने शादी की थी तो निधि का होना मैं तो कोई गुनाह नहीं समझती थी. हाँ यह बात और थी कि वह विनोद की बेटी कहला रही थी. लेकिन ये सच भी बहुत जल्दी ही सामने आ गया. तब निधि ४ साल की थी. मेरे एक कालेज फ्रेंड भी उसी जगह पहुँच गयी थी. कभी कभी  आ जाती थी. लेकिन दिन में न विनोद होते और न ही निधि. और जो हुआ उसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था. वैसे इसमें मैं किसको दोष दूं? ये तो मेरे भाग्य के लेख थे जो मेरे लिए भुगतने जरूरी थे. एक दिन  वह  छुट्टी वाले दिन आ गयी , मैं  और  वह   ड्राइंग रूम  में बैठे  बात कर रहे थे. विनोद   निधि के साथ बेडरूम में  खेल रहे थे. निधि अचानक दौड़ती हुई मेरे पास आ गयी और निधि को देखती ही मेरी सहेली मुझसे बोली -- 'रीना , यह तो बिल्कुल सुरेश की तरह है, कहीं ये उसकी ही बेटी तो नहीं है?'  स्वीकार करने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था लेकिन मुझे ये पता नहीं था कि निधि के साथ विनोद भी दरवाजे तक आ गया था. "
                  "उसके बाद विनोद गुमसुम रहने लगा, महीनों बीत गए मैं सब कुछ समझ चुकी थी लेकिन मैं विवश थी. मैंने अपने ४ साल के वैवाहिक जीवन में विनोद को पहली बार शराब पीते हुए देखा. इसके लिए मैं अपने को दोषी मान रही थी लेकिन मैं इसमें कहाँ तक दोषी थी? इसका निर्णय कोई दूसरा ही कर सकता है. मैंने उससे कारण जानना चाहा - 'तुम्हें आख़िर  हुआ क्या है? क्यों पीने लगे हो? कौन सा गम है?'
'ये तुम मुझसे पूछ रही हो, यही तो गम है कि तुमने मुझे धोखा क्यों दिया?' वह कम आहत नहीं था.
'मैंने कोई धोखा नहीं दिया है?' इससे अधिक कहने के लिए मेरे पास कुछ था ही कहाँ?
'निधि उसकी बेटी है, जिसे मैं जानता नहीं लेकिन जरूर किसी पाप का फल है."
"नहीं, मैंने उससे कोर्ट मैरिज की थी, निधि उसकी ही बेटी है." मेरे सामने सच बयान करके खुद को अपराध बोध से मुक्त करने का अब अवसर आ ही गया था.
"पहले क्यों नहीं बताया? मैं तुम्हें खुद ही मुक्त कर देता."
"लेकिन मैं कहीं नहीं जाना चाहती, इतने वर्षों से मैं तुम्हारी हूँ और अब तुम्हारी ही रहना चाहती हूँ."
"लेकिन मैं कैसे अपने को समझाऊं  कि तुम मुझसे नहीं किसी और से भी प्यार करती रही हो.तुम मेरी तरफ से स्वतन्त्र हो और कहीं भी जा सकती हो, यहाँ रहना चाहो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन अब हमारा कोई भी सम्बन्ध नहीं रहेगा. " विनोद ने अपना निर्णय सुना दिया था लेकिन मैं सोच रही थी कि हम इतने सालों साथ रहे हैं और एक दिन विनोद जरूर मुझे माफ कर देगा. लेकिन ये मेरा भ्रम निकला, विनोद पत्थर कि तरह से कठोर हो चुका था. उसकी पीने की सीमा बढ़ने लगी थी. और जो निधि पर अपनी जान छिड़कता था उसने निधि से बात करना बंद कर दिया.अगर कभी वह बच्ची अपनी ओर से जाकर उससे लिपट जाती तो वह बुरी तरह से झिड़क कर उसको अपने से अलग कर देता था.  उस बच्चीके अभी अर्धविकसित मष्तिष्क  पर क्या असर पड़ेगा ये सोच कर मैंने उसे देहरादून हॉस्टल में डाल दिया. "
                "इसके बाद मैंने भी उस घर को छोड़ने का फैसला कर लिया, मैं न माँ बाप के पास गयी और न ही भाई के पास - इतना अवश्य किया कि उनको एक पत्र   लिखा कि मुझे कहीं नौकरी दिलवा दीजिये. उन्होंने मुझसे ये नहीं पूछा कि मुझे नौकरी की जरूरत क्यों है? और न ही मैंने उनको बताने कि जरूरत समझी. भाग्य ने साथ दिया और मैं यहाँ आ गयी हूँ और अब कहीं नहीं जाना चाहती."
         "लोगों के बीच एक पहेली बन कर रह गयी हूँ. . कौन मेरा विश्वास करेगा? सिवा उपहास के कुछ न मिलेगा. निधि के लिए जिन्दा रहना होगा. विनोद से मुझे कोई शिकायत नहीं, ईश्वर करे कि वह किसी और से शादी करके सुखी रहे. मेरे भाग्य में तो सुख लिखा ही नहीं था. सोचती हूँ कि अगर मैं किसी गरीब घर में पैदा हुई होती तो शायद इस तरह बेघर न हुई होती क्योंकि  तब मुझे कोई सुरेश से अलग न करता. एक बड़े परिवार में जन्म लेने की सजा मैं भुगत रही हूँ - यही सौगात है एक बड़े और प्रतिष्ठित परिवार की. एक बसता हुआ आशियाँ उजाड़ कर दूसरा बसाया था और वह भी उजड़ गया."
                                इतना कह कर रीना ने कुर्सी से सिर टिका कर  आँखें बंद  कर लीं. बहुत थक गयी थी, इतना सब झेलते हुए या अपनी कहानी दुहराते हुए , कह नहीं सकती.    

सोमवार, 9 अगस्त 2010

नियति के थपेड़े !( दूसरी कड़ी )

                      हमने कॉलेज में कई साल एक साथ गुजारे थे. बी ए  के बाद मैंने एम ए और सुरेश ने एल एल बी करने की राह पकड़ी थी और हमारा यही इरादा था कि हम अपनी पढ़ाई पूरी करके ही शादी की सोचेंगे. मुझे और सुरेश दोनों को ही पूरा विश्वास था कि एकदम तो नहीं लेकिन हमारे घर वाले मनाने पर राजी हो जायेंगे और हमारे विवाह के रास्ते में ऐसी कोई बड़ी अड़चन नहीं आने वाली है. मैं अपने परिवार की सबसे दुलारी बेटी जो थी. मेरी प्रतिभा और मेरे रंग रूप पर पूरे घर को नाज था.
                    सुरेश भी अपने परिवार में सबसे बड़ा बेटा था और सबकी आशाओं का केंद्रबिंदु भी था. उसे तो पूरा भरोसा था कि अगर हम लोग शादी कर लेते हैं तो उसके घर वाले मुझे अवश्य ही अपना लेंगे. फिर भी हमें इस बात को शादी के बाद ही खुलासा करना था क्योंकि उससे पहले बताने का मतलब था कि घर में तूफान आ जाता और शादी के बाद कुछ दिन बाद सही सब लोग मान ही जाते हैं. हमें सब कुछ योजनाबद्ध  तरीके से करना था. इसी लिए एक दिन हम लोग बिना किसी सूचना के दिल्ली के लिए रवाना हो गए. सुरेश ने कोर्ट मैरिज के लिए वहाँ पहले से अर्जी दे रखी थी. हमने दिल्ली पहुँच कर सबसे पहले शादी की और फिर हम एक होटल में रुक गए. हमारा कहीं बाहर जाने का इरादा भी नहीं था. क्योंकि ये तो पता था कि घर से चले आने के बाद घर में हडकंप मच गया होगा और हमारी खोज भी हो रही होगी. फिर भी हम बेफिक्र थे कि अब हम बालिग़ हैं और हमारी शादी भी हो चुकी है. वहाँ हम लोगों ने एक हफ्ता गुजारा और फिर एक दिन पुलिस ने हमें अपने कब्जे में ले लिया और हमें हमारे शहर लाया गया. मैं और सुरेश अलग अलग कर दिए गए. मैंने लाख कहा कि हमने शादी कर ली है और वे हमारी शादी को गैर कानूनी घोषित नहीं कर सकते हैं. मेरे घर वाले बुरी तरह से बौखला गए थे, उन्हें शायद मुझसे ऐसी आशा न थी  और हमारी बातों से उनको और अधिक गुस्सा  आ  रही थी. मैं तो जैसे सुरेश के लिए पागल हो रही थी."

                   "इसके साथ ही मेरे दुर्भाग्य की कहानी शुरू हो गयी. मेरे घर वालों ने सुरेश को बहुत समझाया और धमकाया कि वह मुझे छोड़ कर कहीं और चला जाये , उसको बढ़िया नौकरी दिलवा दी जायेगी बस शर्त यही थी कि मुझे भूल जाए. लेकिन सुरेश किसी भी कीमत पर मुझे छोड़ने के लिए तैयार न था और यही मेरे अडिग विश्वास का सबसे मजबूत स्तम्भ था. पर इन पैसे वालों का कोई जमीर नहीं होता और कब किस के विश्वास के स्तम्भ को ढहा कर ये खंडहर में बदल दें, इस के लिए कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. सुरेश के खिलाफ मुकदमा कर दिया गया कि उसने मुझको फुसला कर शादी की है और वह इसके  लिए दोषी है. शहर के सारे वकील मेरे डैडी के साथ थे - कुछ जलने  वाले लोग खुश हो रहे थे कि इनकी इज्जत कैसे सड़क पर उछाली जा रही है.  सुरेश ने अपनी पैरवी खुद ही की. "
"घर में तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा था, क्या वे तुमसे इस विषय में कुछ भी नहीं कहते थे?" 
                    "घर में मुझे हर तरीके से समझाया जा रहा था -- प्यार से , धमाका कर, परिवार की इज्जत का हवाला देकर कि मैं अपना बयान कोर्ट में ये दूं कि सुरेश ने मुझे नशे की हालत में कोर्ट में ले जाकर शादी की थी. मुझे यह मंजूर नहीं था. फिर ये भी नौबत आई कि घर की दुलारी प्यारी बेटी को यातनाएं भी दीं गयीं. बाकी बहनों के जीवन का हवाला भी दिया गया. मेरे सोचने और समझने की शक्ति खो चुकी थी. सुरेश से मिल पाने का तो कोई सवाल ही नहीं था. मेरे डैडी घर बाहर कम ही निकलते थे और मम्मी जब भी मेरे सामने पड़ती मुझे कोसती हुईं - मैं पैदा होते ही मर क्यों न गयी? हमें पता होता कि तू ये दिन दिखलाएगी तो पैदा होते ही तेरा गला घोंट देते? तुझने हम लोगों को कहीं मुँह दिखाने काबिल नहीं छोड़ा है.
ये सब तो आम बातें थी. उनका बस एक ही उद्देश्य था कि मैंने कोर्ट में वही बयान दूं जो वे चाहते हैं  जिससे हमारी शादी गैरकानूनी साबित हो और सुरेश को सजा हो जाए. "
                   "मैंने ये नहीं सोचा था कि मेरा ये कदम इतना बड़ा बवंडर  मचा देगा अन्यथा इस कदम को उठाने से पहले एक बार सोच जरूर लेती. मेरा ये इरादा बिल्कुल भी नहीं था और अपने घर वालों से ऐसी आशा भी नहीं थी. उनकी यातनाएं बढ़ती ही चली गयी और कुछ दिनों  में मैं टूट गयी क्योंकि उन लोगों को सुरेश को ख़त्म करने की साजिश  रचते हुए मैंने सुना था और मैं ऐसा कभी नहीं चाह सकती थी. आखिर मैंने कोर्ट में वह बयान दे दिया जो वो लोग चाहते थे और जज ने हमारी शादी को गैरकानूनी घोषित कर दिया. मैं बयान देकर वही बेहोश हो गयी थी और फिर सुरेश को आखिरी बार भी नहीं देख सकी. वह उस शहर में मेरा आखिरी दिन था."
                         "मुझे कार में डालकर वहाँ से भाई साहब के घर लाया गया. इस बीच में उन लोगों ने मेरी शादी भी कहीं तय कर दी थी और फिर क्या था मेरी शादी रातों रात कर दी गयी. ये सब उन लोगों ने पहले से ही तय कर रखा था. और एक महीने के अन्दर मेरी दुबारा शादी भी कर दी गयी."
                        "दूसरी शादी के वक्त मेरी मनोदशा को कोई दूसरा व्यक्ति नहीं समझ सकता था और मैं तो जैसे यंत्रचालित  सी हो गयी थी. जो भी हो रहा है दूसरे की मर्जी से दूसरों की ख़ुशी के लिए हो रहा है. मेरा उससे क्या सरोकार था? सिर्फ मेरा जीवन था जो की मोहरा बना कर चला जा रहा था.  मेरे पति विनोद जूनियर इंजीनियर थे और उनके परिवार में उनकी माँ  के अतिरिक्त कोई और न था. मेरे घर वालों ने शायद ऐसा लड़का इसी लिए चुना था. मैं विनोद को पति के रूप में बहुत दिनों तक स्वीकार नहीं कर पायी और जब किया तो विनोद ने परित्यक्ता बना दिया. उनका भी इसमें कोई दोष नहीं था और फिर मैं भी कहाँ दोषी थी? ये शतरंज की बाजी तो अपनी इज्जत के लिए बिछाई गयी थी और फिर उसमें शह और मात का कोई प्रश्न ही नहीं था. वे हर हाल  में सिकंदर थे."
                       "विनोद के साथ रहते हुए भी मैं अपने मन से सुरेश को भुला नहीं पाई थी. वह कोई भूलने वाला रिश्ता था. हमने अपने प्यार में कितने साल साथ गुजारे थे? फिर भी मैंने अपने दायित्वों को विनोद के प्रति पूरी तरह से निभाया था. उसको किसी प्रकार की शिकायत या फिर उपेक्षा मेरे मन में कभी नहीं रही. वह तो बस बड़े लोगों की साजिश का शिकार हुआ था. मेरे गले में पड़ी हुई ये जंजीर सुरेश के दी हुई है, जिसे पता नहीं घर वालों ने कैसे नहीं देखा? बस यही आखिरी निशानी है उसकी. अब तो बस यही कामना है की वह जहाँ भी हो खुश हो."
"क्या तुम फिर अपने घर नहीं गयीं?" मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था की कैसे एक लड़की कभी मायके गयी ही नहीं.
"नहीं, जब मन होता तो भाई साहब  लोक लज्जा के लिए अपने घर बुला लेते और फिर वही से वापस हो जाती. कभी डैडी और माँ आते तो बुला लेते लेकिन क्या मेरा उन सब लोगों से मिलने का मन होता था. नहीं वे अब मुझे अपने जन्मदाता नहीं बल्कि किसी जन्म के बैरी लगते थे."
                                                                                                                                      (क्रमशः)