रविवार, 9 अगस्त 2026

मकड़जाल !

                  रति डाइनिंग टेबल पर खाना लगा चुकी थी और निधि और नीरव को कितनी आवाजें लगा चुकी थी लेकिन कोई सुन ही नहीं रहा था।  थक हार कर वह उनके कमरों में झाँकी , वे अपने अपने बिस्तर में पड़े हुए मोबाइल से खेल रहे थे।  बड़े हो रहे हैं तो ज्यादा रोक टोक करने की उसने कभी जरूरत नहीं समझी।  आजकल के बच्चे हैं कभी प्रोजेक्ट का काम करना है और कभी कोई मैटर खोजना है लेकिन खाने और सोने के समय तो छोड़ देना चाहिए न। 

                          रति ने बाहर से आवाज लगाई - "चलो बाहर आओ तुम लोग , खाना ठंडा होने जा रहा है और फिर अगर पापा आ गए न तो फिर मेरी ही डाँट पड़ने वाली है।"

                            "क्या मॉम अभी मेरे काम में समय लगेगा, आप खा लीजिये या फिर पापा को आने दीजिये। "

                             "पापा की मीटिंग है और उनका डिनर भी वहीं पर है। उनके आने के पहले तो ये डिनर ख़त्म हो ही जाना चाहिए।"

                             "ठीक है , फिर पापा को आने दीजिये, हम तब कर लेंगे।"

                 रति इधर उधर टहल रही थी क्योंकि इस समय उसको न टीवी देखने की आदत है और न ही बिस्तर में लेटने की।  अपने कॉलेज से लौट कर वह सारे काम ख़त्म करके ही बिस्तर पर जाती है। बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आयी तो दोनों बच्चे जल्दी से उठ कर हाथ धुलकर डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गए। 

                      पापा ने आते ही देखा कि बच्चों की  तन्मयता से डाइनिंग टेबल पर बैठे होना कुछ जरूर दाल में काला है। वह अपने कमरे में न जाकर बच्चों के कमरे में जाते हैं और उनके मोबाइल जो कि उसे समय तक चल ही रहे थे।  किसी के मोबाइल में फिल्म चल रही थी और किसी के में गेम।  वह वापस अपने कमरे में चले गए। 

                      जब रति सोने के साथ पहुंची तो रजत बस इतना ही बोला - रति हमारे तुम्हारे कामों के चलते बच्चे स्वच्छंद हो रहे हैं और अब भी समय है उनको वापस निकाल लो उस मकड़जाल से। 

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.