शनिवार, 20 नवंबर 2021

अहम् !

अहम् !

       शानू हमेशा गुमसुम रहता था । किसी के साथ रहना या खेलना उसको पसंद नहीं था ।उसकी टीचर और वार्डन ने बहुत कोशिश की, लेकिन शानू क्लास के बाद अकेले रहना पसंद करता ।

     

        मम्मी-पापा के बीच बढ़ती दूरियाँ कहीं उसे न छू लें क्योंकि बच्चे संवेदनशील होते हैं वह अपने आस पास की आहटों को पहचान लेते हैं । इसीलिए उसे हॉस्टल में रखा गया था। वह एक भावनात्मक चक्रव्यूह में फंसा हुआ था। 


           वार्डन ने उससे उसकी खामोशी का कारण जानना चाहा, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला ।  हॉस्टल में कभी पापा मिलने आते तो कभी मम्मी , दोनों एक साथ कभी न आये । वार्डेन इसको दोनों के कामकाजी होने को इसका कारण मानने को तैयार न थी ।


            वह हॉस्टल जरूर आ गया था लेकिन वह मम्मी पापा की लड़ाई में ख़ुद को कहीं नहीं पाता था । उनकी अपने अहं की लड़ाई थी और जब उनके कमरे से गलत शब्दों की आवाज़ें कान में पड़ती तो वह कान में अँगुली ठूँस कर लेटा रहता । उस बाल मन को कोई रास्ता न सूझ रहा था । वह इस लायक था भी नहीं।


          स्कूल की काउंसलर ने शानू के पास आकर बात की और फिर उसको बताये बिना ही उसके माता पिता को बुलाकर काउंसलिंग की और कहा - "इसके बचपन को अपने अहं की बलि न चढ़ायें । साथ रहें या न रहें लेकिन इसके जीवन सँवरने तक यहाँ साथ आयें और मिलें । उसके समझदार होने तक छुट्टियों में उसके घर होने पर साथ जरूर रहें । बस किशोर वय निकलने तक ।"


     इस बार मम्मी पापा को साथ आया देख कर उसकी आँखों में चमक दिखाई दी , जो एक नयी आशा से भरी थीं । वह अपने मन के चक्रव्यूह को भेदने से खुश था ।

रविवार, 7 नवंबर 2021

आठ हाथ !

                  नीना की लापरवाही से उसकी तबियत बिगड़ गयी और स्थानीय डॉक्टर्स ने हाथ खड़े कर दिए,  तब  ललित ने अपनी बहन को फ़ोन किया - "दीपा तेरी भाभी की तबियत कुछ समझ नहीं आ रही है , क्या करें ? भैयाजी से पूछ कर कुछ राय दे। "

- " भैया आप ऐसा करें कि भाभी तो यहाँ मेरे पास ले आइये। "

                               नीना को बहुत भयंकर पीलिया हुआ था, जिसे डॉक्टर समझ नहीं पाए और वह दवा लेते ही लेते और बढ़ गया। ललित की बाकी तीनों बहनें भी बारी बारी से देखने के लिए आ रही थीं और अपने भाई को सांत्वना देती कि भाभी ठीक हो जाएंगी।  उसे भी अपनी बहनों पर बहुत भरोसा था , कैसी भी परेशानी हो वे चारों और उनके पति कंधे से कन्धा मिला कर खड़े होते। इसी लिए वह आश्वस्त था कि  नीना यहाँ से ठीक होकर ही घर जायेगी। 

               ललित अस्पताल में नीना के सिरहाने बैठा था और उसका हाथ में हाथ लेकर बोला - " तुम्हें अपने तीन भाइयों पर फ़ख्र हो न हो लेकिन मुझे अपनी चारों बहनों पर फ़ख्र है।  कभी जिन्हें मैं जिम्मेदारी समझता था, उन्हीं के आठ हाथ आज तुम्हारे लिए दुआ कर रहे हैं। "

                  नीना आँखें नहीं मिला पा रही थी क्योंकि एक दिन उसी ने कहा था - "इन चार चार ननदों  को कहाँ तक निभाऊंगी ?"

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2021

मुर्दों का त्यौहार !

                                                     जब तक नितिन रहे नीलिमा ने श्राद्ध के दिनों में रोज ही कुछ नहीं तो दुकान के लिए निकलते हुए एक पैकेट जरूर देती और कहती इसे किसी गरीब को देते जाना।

                    नितिन को पता था कि श्राद्ध तो माँ और बाबूजी की तिथि पर ही कराती है लेकिन ये पंद्रह दिन तक रोज ही इस तरह से सीधा निकाल कर और पांच रुपये किसी न किसी गरीब को भेजती रहती है।  वह चुपचाप लेकर चला जाता।  उसको इन सब से ज्यादा मतलब नहीं था , ये काम महिलाओं के हैं कि क्या क्या करना है ?

                                 अचानक नितिन के चले जाने पर नीलिमा ने सब बंद कर दिया क्योंकि श्राद्ध बहू बेटे के वश की बात नहीं है और वह किसी को यहाँ जानती नहीं तो किसको देगी ? गाँव में  होती तो और बात होती।  फिर भी संस्कार कहाँ जाते हैं ? नितिन की तिथि उसको याद हमेशा रहती है और इस बार उसने सोचा कि तीसरी साल है , बेटा - बहू कुछ करने वाले नहीं है तो वह ही कुछ नितिन की पसंद की चीज बना कर बाहर निकल कर किसी गरीब को दे आएगी।
                 सुबह बहू बेटे के ऑफिस निकलने के पहले ही उसने कहा कि - "बेटा कुछ पैसे चाहिए , आज तेरे पापा की पुण्य तिथि है तो मैं किसी  गरीब को  भोजन कराना चाहती हूँ। "

"क्या माँ आप कब तक इस को मानती रहेंगी ? इंसान मरने के बाद भी खाने आता है क्या ?"

                 इससे पहले कि नीलिमा कुछ कहती बहूरानी बोल उठी - "हम दिन भर मेहनत करते इस लिए नहीं कमाते कि इसे मुर्दों के नाम पर खर्च किया जाय। सो इसे तो आप भूल ही जाइये कि जो आप अब तक पापा की कमाई से उड़ाती रही हैं , हम भी आप को उड़ाने देंगे। "

                    बहू - बेटा के जाने के बाद नीलिमा के कानों में नितिन के लिए "मुर्दा" शब्द देर तक गूंजता रहा। बेकार ही लोग पितृ, पुरखे और पूर्वज कहते हैं सोचते सोचते आखों के आगे माँ , बाबूजी की छवि घूम गयी। 

बुधवार, 27 मई 2020

जमीर जागेगा !



       गाँव में प्रवासी मजदूरों को गाँव के बाहर स्कूल में रखा गया था। वही स्कूल जहाँ वे पढ़े थे । ग्राम प्रधान अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहा था ।
  .        उस स्कूल के हैड मास्टर को पता चला तो वे दूसरे गाँव के थे लेकिन किसी की चिंता बगैर वे स्कूल आ गये । अचानक लॉकडाउन से मिड डे मील का सामान जो भी था । उन्होने रसोई चालू करवाई और बड़े बड़े घड़े निकलवा कर पानी भरवा कर रखवाया । ताकि इस भीषण गर्मी में ठंडा पानी तो मिल सके।
          शुभचिन्तकों ने कहा - " मास्साब काहे जान जोखिम में डारत हौ।  ग्राम प्रधान को करन देब।,"

"ये मेरे ही पढ़ाए बच्चे हैं और आज इनके घर वाले दूर भाग रहे हैं , लेकिन मैं नहीं भाग सकता ।"

"अरे अपनी उमर देखो , लग गवा कुरोना तो कौनो पास न जइहै। "

"कोई बात नहीं , मैं तो उम्र जी चुका , इन्हें अभी जीना है , ये कल हैं तो कोई भूख प्यास से न तड़पे ।"

   "फिर तो हम का कम हैं , मीठे कुआँ का पानी लावे का जिम्मा हमार ।" सरजू बोला।

"खाने खातिर पत्तल हम देब, पीबे को सकोरा बैनी देब।" राजू ने जिम्मेदारी ली।

"मास्साब हैंड पंप चला कर सबन के हाथ हम धुलाब।" कीरत भी साथ हो लिया ।

    अब गाँव की एक टोली मास्टर साहब के पीछे खड़ी थी, एक सार्थक पहल के लिए ...।

रविवार, 24 मई 2020

दया।

दया

        बीमारी के चलते सबने संध्या को काम पर जाने से मना कर दिया था ।  वह बाजार से सामान भी लाकर नहीं रख पाई थी ।
     .      छत के खोखे में बने घोंसले में मनु  चूजों के लिए रोज ही रोटी लेकर जाता था ।
  .          उस दिन माँ ने कहा - " मनु अब आटा खत्म होने वाला है , तो चूजों के लिए चिड़िया दाना ले ही आयेगी , तुम अपनी रोटी खा लेना।"

"ठीक है माँ ।" मनु ने सिर हिला दिया।

       खाना खाते समय मनु ने आधी रोटी जेब में रख ली।  माँ  के सोने के बाद रोटी के छोटे छोटे टुकड़े करके ऊपर चला गया । मनु को देख चूजे चूँ चूँ करने लगे । उसने आधी रोटी उनको खिला दी।रोज यही करता रहा।

           आज सिर्फ एक रोटी मनु के लिए थी । उसके लिए कुछ नहीं था । उसे नींद नहीं आई , करवट ली तो मनु को वहां न देख वह ऊपर गयी तो देखा मनु रोटी के टुकड़े  पानी में भिगो कर चूजों को खिला रहा  था।
          वह चुपचाप नीचे आ गई मनु के मन में जीवों के लिए दया देख उसकी आंखों में आंसू भर आए। 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

लॉक डाउन !

लॉक डाउन !


"माँ इस लॉक डाउन ने तो लोगों के जीवन को पंगु बना दिया है । ये निर्णय पूर्णतया गलत है , जहाँ पर कोई कोरोना वाला नहीं है , वहाँ पर तो ये जनता पर अत्याचार हो गया।"  किशोर बोला ।
   "नहीं बेटा ऐसा नहीं है, अगर इटली,चीन और अमेरिका जैसे विकसित देशों में इसकी जरूरत समय पर समझी होती तो इस मानव  क्षति पर अंकुश लगाया जा सकता था।" सुधा ने उसको समझाया।

         "पर माँ देश की इकॉनमी कहाँ जायेगी? हम बहुत पीछे चले जायेंगे, पढाई लिखाई बंद , काम बंद , बाजार बंद , उत्पादन बंद , कल हम एक एक चीज को तरस जाएंगे ।" किशोर अपनी उम्र के अनुसार सोच रहा था ।

     " किशोर अगर  देशवासी सुरक्षित और ठीक रहेंगे तो हम फिर सँभल जायेंगे । ये प्रकृति का एक कहर ही है और वह क्रोधित होती है तो सारी सृष्टि को तहस नहस कर देती है। लातूर का भूकंप , बद्रीनाथ की त्रासदी , सुनामी जैसे कहर हम भूल कैसे सकते हैं ? "

  "लेकिन माँ कितनी बोरिंग लाइफ हो गई है । पढ़ा भी कितना जाय ? न कहीं बाहर जा सकते हैं और न कोई मनोरंजन। "

 " ये सोचो संक्रमण फैलने से कितना बच रहा है। नहीं तो हमारे देश का ग्राफ भी इटली की तरह बढ़ गया होता देश की सरकार एक एक कदम फूँक फूँक कर रख रही है।"

" ये तो है माँ ।" किशोर समझने लगा था ।

    "और सबसे बड़ी बात उस वर्ग को अपने हाथ से काम करना आ गया , जो सिर्फ व्यक्तिगत कार्यों के लिए ही हाथ चलाता था।" माँ ने तिरछी निगाह से पापा की ओर देखा। किशोर मुस्कराने लगा ।

         "लेकिन लोग तब भी फॉलो नहीं कर रहे हैं और दूरी भी नहीं बना कर रख रहे हैं । विदेश से आने वाले भी क्वारंटाइन का पालन नहीं कर रहे हैं।" अब पापा की बारी थी ।

        "लॉक डाउन इसी लिए लागू किया गया है कि कोरोना के फैलने की आशंका कम हो । जिस त्रासदी को विश्व के अन्य देश झेल रहे है , हम समय से पहले सतर्क हो सकें । "

           "आज हमारे देश में अगर अन्य देशों से बीमारी का औसत कम है तो सिर्फ इसी लॉक डाउन के कारण । वायु प्रदूषण कितना कम हो गया है ? अंधाधुंध गाड़ियों की रफ़्तार से बढ़ता ध्वनि प्रदूषण भी अब नहीं रहा है। हाँ कुछ असुविधाओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन जीवन की कीमत के लिए वह कुछ भी नहीं है ।"

  "हम कब मना कर रहे हैं कि लॉक डाउन गलत है बल्कि एक बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय है ।" किशोर और पापा एक साथ बोल पड़े । अब सुधा के मुस्कराने की बारी थी।


बुधवार, 28 अगस्त 2019

इंतजार !

             मिश्रा जी की माताजी का सुबह निधन हो गया । बिजली की तरह खबर फैल गई । लोगों का आना जाना शुरू हो गया । अभी मिश्रा की बहनें नहीं आईं थीं , इसलिए उनका इंतजार हो रहा था ।
घर का बरामदा औरतों से भरा था । पार्थिव शरीर भी वहीं रखा था । औरतें यहाँ भी पंचायत कर रहीं थी -
" देखना अब मिश्रा जी भी यहाँ नहीं रहेंगे । दोनों आदमी बीमार रहते हैं , बेटे के पास चले जायेंगे ।" सामने घर वाली तिवारिन बोली ।
" और ये इत्ता बड़ा मकान , इसका क्या करेंगे ?" बगल वाली गुप्ताइन ने.पूछा ।
" अब तो बिकेगा ही , अभी तक तो माताजी के कारण यहाँ थे । अब तो बेटे के पास जायेंगे न । "
" सुना है बेटे ने वहाँ फ्लैट खरीद लिया है ।"
" हम बात करेंगे भाभी से हमें दे दें तो दोनों बेटों का आमने सामने हो जायेगा ।" तिवारिन ने अपना दाँव फेंका ।
" तुम क्यों हम न ले लेंगे , अगल बगल बने रहेंगे हमारे देवर और हम बीच से दरवाजा फोड़ लेंगे ।" गुप्ताइन ने जरा तेज आवाज में कहा ।
मिश्राजी के मित्र की पत्नी ये सब सुन रहीं थी , उनसे रहा न गया तो दबी आवाज में बोली - " इस मिट्टी का तो लिहाज करो , माँ अभी गईं भी नहीं और आप लोग तो मकान भी खरीदने के लिए लड़े जा रहे हैं । क्या इसी दिन का इंतजार कर रहीं थी ?"
सन्नाटे के साथ दोनों के मुँह पर हवाइयाँ उड़ने लगीं ।