एक मकान की व्यथा !
गेट के खुलने की आवाज आई तो सारे दरवाजे और खिड़कियां एकदम सतर्क हो गईं, ”शायद कोई आया है, लेकिन कौन होगा? सफाई तो सुबह हो ही चुकी है और कौन हो सकता है?”
फिर भी कान खड़े करके सब सतर्क हो गए, देखें कौन आता है? थोड़ी देर में गेट के आवाज के साथ कुछ लोग अंदर आए। सब आपस में बात भी कर रहे थे और ऊपर चढ़ते आ रहे थे। ऊपर आने पर कमरों ने, किचन ने और ड्राइंग रूम सभी ने उन्हें पहचानने की कोशिश की, लेकिन उनके लिए वह अनजान चेहरे थे। फिर यह कैसे हुआ? इनको चाबी कैसे मिली और इन्होंने हमारे एकांत को तोड़ने की जुर्रत कैसे की? सब आँखों ही आँखों में एक दूसरे से सवाल कर रहे थे।
आने वाले लोग धड़ाधड़ सारे कमरों के पंखे और लाइट खोल के अंदर घुसते चले आ रहे थे। सब कुछ साफ सुथरा पड़ा था और अंदर आकर जिसको जहाँ जगह मिली वहीं फैल गये।
उस मकान के घटक एक दूसरे से पूछने लगे -
“आखिर यह सब है कौन? घर वाला कोई भी साथ नहीं था, न तो दीदी है, न भैया, न मम्मी। फिर आखिर ये कौन है? कोई जान पहचान वाला भी तो नहीं है। इनको चाबी कहाँ से मिली और यह अंदर कैसे आ गए? लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं?”
दीवारें आपस में बात कर रही थी - “देखो कैसे यह भैया की तस्वीर देख रहे हैं? हो सकता है कि पहचानते हो और हो सकता है कि न ही जानते हों। कोई किरायेदार तो हो नहीं सकता क्योंकि इतने सारे लोग यहाँ नहीं रह सकते हैं फिर कौन होंगे?”
सूनेपन और सन्नाटे का पर्याय बना ये दो मंजिला मकान अपने आप में अलग भाग्य लेकर बना था। क्या भाग्य इमारतों का भी होता है। क्यों नहीं? जैसे इंसान का सजने सँवरने का शौक होता है, ठीक उसी तरह हर इमारत का अपना नसीब होता है, खूब सजाया संवारा गया था। एक-एक टाइल्स, एक एक दीवार पर लगी हुई पेंटिंग्स, वास्तु के अनुकूल चीजों को कितनी बार जाकर चुनकर लाया गया था। सब कुछ कितना संयोजित लग रहा था, मगर इस इमारत की किस्मत कुछ अलग ही थी। इतने पैसे खर्च होने के बाद उसके भाग्य में वीरान होना ही लिखा था। एक सजी सजाई सुंदर इमारत कुछ लोगों के जाने से ही घर से एक मकान में तब्दील हो गई।
कुछ ही महीनों में शुरू हो गया उसका अपना दुर्भाग्य - कुछ ही समय के अंतराल में एक-एक करके सारे पुरुष सदस्य चले और रह गई सिर्फ महिलाएँ। माँ पापा के जाने से टूट गई, उबर भी नहीं पाई थी कि एक महीने में बड़े भैया के जाने का वज्र उनके ऊपर टूट पड़ा और उनकी अग्नि अभी साथ में शांत भी नहीं हुई थी कि छोटे भैया भी चले गए। कौन किसको सांत्वना देता फिर भी बेटियाँ सबको सभाँल रही थीं। नियति को इतने पर ही संतुष्टि नहीं मिली थी कि इस घर के छोटे दामाद भी एक दुर्घटना में दस दिन के अंदर ही चले गए। अब कोई नहीं था, जो एक दूसरे के आँसू पौंछ पाता क्योंकि इस घर की हर महिला ने अपना जीवनसाथी खो दिया था। ऐसा नहीं था कि वे किसी पर निर्भर हो, सब आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ पति की संपत्ति और पेंशन के अधिकारिणी थी। लेकिन उनका इस घर से एकदम चित्त उचाट हो गया और सब ने एक-एक करके इस घर को छोड़कर कहीं और और जाकर बसने का निर्णय ले लिया।
एक दुर्भाग्य और था कि इस इस घर में किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी और इस घर की दीवारें, फर्श और बालकनी की रेलिंग किसी मासूम के कोमल से स्पर्श के लिए तरसती रह गयीं। वह तो वैसे भी उदास थी क्योंकि बाबूजी की चार संतानों में सब की सब निःसंतान रहीं और यही कारण था कि पति पत्नी के बीच एक सुंदर बंधन न बन पाया क्योंकि परिवार को बाँधने वाला कोई नन्हा आया ही नहीं।
इस घर के हर कमरे, बरामदे, खिड़कियाँ या बालकनी को अगर सबसे ज्यादा रश्क था तो वह था इस घर में बनाए गए उस छोटे से पूजाघर से। जाने से पहले उन लोगों ने उसमें छोटे-छोटे बल्बों की झालर, एक छोटा सा बल्ब और एक बैटरी से चलने वाला दीपक, जो उसमें बराबर जला करता था, हर समय पूजाघर रोशन रहता था और उसमें लगाई हुई घड़ी जिससे हर घंटे के बजने पर 'ओम' की ध्वनि निकलती थी। उस खामोश घर में 'ओम' की ध्वनि दिन और रात के बीच चौबीस बार प्रतिध्वनित होती थी, ताकि इस बंद घर में भी नकारात्मक ऊर्जा का संचार न हो। लेकिन इस बंद मकान में सिर्फ इतना कुछ भी न था कि वह दीवारें और फर्श खुश हो सकें और उनका होना सार्थक हो। जिसमें इंसान की आवाज और उसके कदमों की आहट न हो। इतने बड़े किचन के होने पर भी न कभी बंद रखी गैस जलाई जाती है, जहांँ ढेर सारे बर्तन होने के बावजूद उनमें खनक़ न हो, इससे बड़ा दुख किसी किचन का क्या हो सकता है? हर एक कमरे में नकली फूलों की चढ़ी हुई एक तस्वीर थी। मौजूद लोग ये चाहते थे कि किसी भी चीज पर पर धूल नहीं होनी चाहिए खासतौर पर फूल चढ़ी हुई तस्वीरों पर, इसलिए उन्होंने एक सफाई वाली को नियुक्त कर रखा था, जो रोज आकर ऊपर से नीचे तक हर कमरे फर्नीचर और सामान की धूल हटाकर सफाई करती रहे। बस इतना ही सौभाग्य था इन दीवारों, खिड़कियों और दरवाजों का, जो इसमें रखे गए सुरुचि पूर्ण चुने हुए फर्नीचर तस्वीर और शो पीस का कि मानव स्पर्श से वंचित नहीं थे।
इन दीवारों में भी जान होती है और एहसास करने का माद्दा भी, फिर क्यों वह किसी के स्पर्श से वंचित रहे? क्या इसलिए मानव भी जीवन होते हुए भी निर्जीव है क्योंकि उसके अंदर संवेदनाएं नहीं है, एक संवेदनहीन मानव भी एक प्रस्तर प्रतिमा से ज्यादा कुछ भी नहीं, सिर्फ खा पी लेने से कोई सजीव नहीं हो जाता।
अपने जीवन का हिसाब सदा ही दूसरों से किए गए व्यवहार से होता है लेकिन एक-एक कमरा इस बात का गवाह है कि भैया ने कमरा बनवाया भाभी को रास नहीं आया था। माँ का कमरा तो सिर्फ माँ के लिए था, उसमें जाने के लिए सिर्फ सफाई वाली थी। माँ अपनी माला लिए बैठी रहती थी और पापा की तस्वीर निहारा करती थी क्योंकि वह खो चुकी थी अपनी जिंदगी का सहारा और वह संजीवनी शक्ति जो उन्होंने अपने जीवन में 60 साल के साथ को पूरी निष्ठा और प्रेम से जिया था। कहीं से भी वह अपनी आयु के असर से प्रभावित नहीं थी। ऐसा नहीं है कि उन्हें अपने बेटों की चीजों से कोई मतलब नहीं था या उन,के जीवन से कोई मतलब नहीं था,, लेकिन उस कमरे में होने वाली गतिविधियों ने कुछ ही दिनों के अंतराल में अपना सब कुछ खो दिया था। भाभी भैया को छोड़कर मायके जाकर बैठ गई थी क्योंकि उनको नहीं पसंद था कि सासु माँ अपनी नातिन को अपने पास रखें और उसको कुछ भी दें, जबकि माँ के पास सब कुछ था लेकिन इसके पीछे कौन सी भावना थी यह आज तक पता नहीं लग पाई थी। इसी मतभेद के कारण बड़े भैया और भाभी अलग-अलग रहने लगे थे और शायद यही अहंकार छोटे भैया का था कि उनकी पत्नी को भी टिनी का रहना पसंद नहीं था जबकि दोनों ही निःसंतान थे। घर में किसी एक बच्चे होना ही उस घर को घर बनाती थी, लेकिन मम्मी टिनी को अपने से दूर करके भी उस घर में शांति नहीं ला पाई। वह कौन से कारण थे जो दोनों के जीवन में विष बो रहे थे।
वह मनहूस रात जब बड़े भैया को अचानक हार्टअटैक पड़ा, बड़ी भाभी को खबर भी दी गई लेकिन उन्होंने मायके से आने में इतनी देर कर दी कि भैया सबैको को छोड़कर जा चुके थे और ये कमरा वीरान हो गया। हाँ उन्होंने इतना अवश्य किया कि भैया की फोटो पर एक बगैर खुशबू के फूलों की माला चढ़ा दी और वापस अपने मायके चली गई।
इसी तरह छोटी भाभी भी अपने आइएएस रहते हुए छोटे भैया के साथ तालमेल बिठाने में कुछ ज्यादा ही अकड़ में बैठी रही, उनकी पोस्टिंग अक्सर शहर से बाहर थी और भैया यही मम्मी जी के पास पोस्टिंग लेकर रहते थे, इसके लिए उन्होंने अपने कई प्रमोशन तक छोड़ दिये थे। भाभी कभी त्यौहार में आ जाती। मतभेद और मनभेद दोनों ही उनके बीच रहे लेकिन किसी ने अलग होने की पहल नहीं की थी, जबकि उनको जोड़ने वाली कड़ी संतान उनके पास भी न थी।
सब अपने-अपने में गुमसुम शिकायतों को मन में लिए घूमते रहे। कुछ न कुछ सोचा ही करते थे कि एक दिन ऑफिस से आते समय छोटे भैया एक हादसे का शिकार हो गए और हमेशा के लिए उसे कमरे को खाली कर गए। उनकी पत्नी को तो वैसे भी नहीं आना था। खबर दी गयी और छोटे भैया बार बार उनको पूछते हुए चले गए। वह बहुत देर से आई और आकर उन्होंने भी वही किया - उस कमरे में एक तस्वीर लगाकर बिना खुशबू वाले फूलों की माला चढ़ा कर वह वापस अपनी ड्यूटी पर चली गई।
बहुत बड़ा था उनका दायरा, उनके पास समय भी न था और न ही उन्हें किसी की जरूरत थी। एक और कमरा खाली हो गया। सभी कमरे, दीवारें और दरवाजे उसी तरह से बने रहे, बहुत मजबूत हैं न, लेकिन अगर कुछ टूटा था तो माँ और बहन का दिल। छोटी दीदी कुछ दिनों के लिए मम्मी को लेकर वहीं रहने लगीं।
लेकिन इसी दौर में कोरोना का साम्राज्य फैलने लगा और उनके पति इसके शिकार हो गए, जब तक वह पहुंच पातीं, उन्होंने साथ छोड़ दिया। उनके भी बच्चे पहले ही नहीं थे लेकिन दो लोग चैन से जीवन बिता रहे थे फिर इतने सारे सदमों के साथ ये वज्रपात उनके लिए असहनीय हो गया। इसके साथ ही जीवन का कोई लक्ष्य नहीं रह गया था क्यों और किसके लिए जिया जाये? यह सोच ही रही थी कि पता नहीं क्यों किसी ने कह दिया कि यह मकान तो मनहूस है, एक तो इतने भाई बहनों में कोई वारिस नहीं था, साथ ही सारे जोड़े टूट गए। एक टिनी थी जो सबका एक सहारा थी, वह भी इतनी घबरा गई क्योंकि अपने पिता को तो उसने बचपन में ही खो दिया था और रात में सिसक सिसक कर रोने लगती है। बहुत छोटी बच्ची नहीं थी लेकिन फिर भी अपने सामने इतने लोगों को जाता हुआ देखकर बड़ों की आत्मा रो देती है, वह तो फिर भी अभी बच्ची थी। रात में जब सोती तो चौक के उठ जाती कभी उसे बड़े मामा कभी छोटे मामा कभी पापा और कभी मौसा जी की याद आती है फिर वह नानी और मौसी से चिपक के लेट जाती आखिर एक निर्णय लिया गया कि इस मकान को एक केयर टेकर को सौंप कर दूसरी जगह चला जाया जाए और छोटी बहन ने अपनी ससुराल में अपने घर में शिफ्ट होने का निर्णय ले लिया और वह मम्मी को लेकर वहीं चली गई। घर में ताला डाल दिया गया।
अरे घर कहाँ अब तो वह है कि मकान भर रह गया था और एक मकान जो बचा था, जिसमें सिर्फ और सिर्फ एक पूजा घर जीवित था, जिसमें आवाजें आती थीं, जिसमें रोशनी होती थी और जिसमें शायद वह सारी आत्माएं भी बसती होगी जो चली गई पर इस इमारत की एक-एक चीज तो अकेली थी यहाँ कोई आवाज नहीं थी कोई साँस नहीं थी कोई एहसास नहीं था और कोई भी उन निर्जीव दीवारों को सजीव बनाने वाला इंसान नहीं था। चंद घंटों या फिर दिनों के लिए ही सही इस मकान में इंसानी साँसों, आवाजों और कदमों को महसूस तो कर लेंगी। अपने होने के अहसास को जी लेना चाह रही थी कुछ समय के लिए ही सही। सब भरे भरे मन से खुश हो रहीं थी।
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