सोमवार, 4 अप्रैल 2022

एक घर की तलाश !

          

                 वह किस प्यार या अपनेपन की तलाश में इधर झुकती चली गयी।  बस एक आभासी दुनिया का चरित्र ही तो था अशरफ जिसको उसने देखा नहीं था कि वह कैसा है और क्या उसकी हकीकत है। फिर भी उसको कहीं किसी अपनत्व की तलाश थी और वह उसको उसमें मिला था।  वह जीवन के इतने बड़े निर्णय को ले बैठी थी। इसके लिए उसकी बचपन से लेकर कुछ साल पहले तक की जिंदगी जिम्मेदार थी। नहीं तो कोई ऐसे बड़े निर्णय ऐसे ही तो नहीं ले लेता है।  जिद्दी तो वह बचपन से ही थी क्योंकि माँ नाम को उसने जिस रूप में जिया था वह सम्पूर्ण न था।  माँ की गोद न थी , ममत्व न था लेकिन जो भी था उसने उसे बचपन से प्यार की कमी न होने दी थी। वह फिर क्यों सोचती कि  घर ये नहीं कोई और होता है। 

                    अब सोचती है कि घर तो उसका बचपन से ही कभी हुआ ही नहीं , वह बात और है कि उसको इस बात का अहसास बहुत बाद में हुआ। ऐसा नहीं कि वह अनाथ थी , भरे पूरे परिवार की सदस्य थी -  मामा-मामी , मौसी , माता-पिता , भाई-बहन और सारे रिश्तेदार। फिर भी जहाँ रही वहाँ एक बोझ बन कर , इन सारे रिश्तों के होते हुए भी उसका कोई घर नहीं हो सका। जहाँ रही बड़ी हुई वह तो नानी के जाने के बाद से ही पराया हो गया।   उसके असली वारिस तो वो ही लोग थे। एक नानी क्या गयीं ? वह भरे संसार में बेघर हो गयी, सिर्फ बेघर ही नहीं बल्कि दूसरे शब्दों में कहें तो वह अनाथ हो गयी। उस त्रासदी को वह इतने वर्षों से ढो रही है।

                             वह बीए में पढ़ रही थी कि अचानक नानी का स्वर्गवास हो गया और जब वह स्कूल से लौटी तो सब कुछ बदल चुका था।  उसके सिर से सिर्फ नानी का साया ही नहीं गया था बल्कि उसके ऊपर की छत भी चली गयी थी। उसने तो होश सभाँलते ही नानी को मम्मी और माँ को जीजी कहते हुए पाया।  ऐसा क्यों था ? इसका उत्तर उसे बहुत बाद में बड़े होने पर मिला , जब उसे ननिहाल के लोग एक बोझ समझने लगे , उनको लगने लगा कि ये तो अपने घर जा सकती है और इस पर होने वाला खर्च हमारे काम आएगा , लेकिन नानी के रहते उसको कोई उनसे अलग नहीं कर पाया।  नानी का घर ही उसका घर था और नानी का कमरा ही उसका कमरा था।  बाकी इतने बड़े घर में मांमा - मामी , उनके बच्चे , विधवा मौसी और उनका बेटा रहते थे। सबके हिस्से में अपने अपने कमरे थे।  छोटे लोगों के लिए माँ - पापा के साथ ही रहना होता था।  वह तो पता नहीं कब से नानी के साथ नानी के कमरे में ही रहती चली आ रही थी।  उसको नानी के प्यार ने अपने से कभी अलग होने नहीं दिया और उसने भी कभी सोचा ही नहीं।
                           उसको बहुत दिनों बाद पता चला कि जिसको वह जीजी कहती है , वही उसकी माँ हैं और पापा को पापा ही कहती थी लेंकिन कभी इस बारे में सोचा ही नहीं क्योंकि उसकी दुनिया तो मम्मी में ही निहित थी।  उसको पता चला कि  जब वह पैदा हुई तो बीमार रहती थी और उसकी छोटी बहन भी बहुत जल्दी आ गयी थी।  माँ दो को एक साथ सँभाल नहीं पाती सो रेवा को नानी ने ले लिया और खुद पालने लगी।  तब ये कमरे न बँटे थे।  मामा , मौसी सब अकेले अकेले थे और माँ पापा के घर में रहती थी।  उसके शेष भाई बहन थे लेकिन न रेवा उन्हें अपना मान सकी और न वे रेवा को अपना सके।
                        अभी तक तो नानी थी और उनका ही संरक्षण था और सारे खर्च उठाने का काम वही करती थीं लेकिन अब उसको पता चला कि वह अब अकेली ही नहीं हो गयी है बल्कि अनाथ भी हो गयी है। कुछ महीने ही  बीते थे कि एक दिन कॉलेज से लौट कर आने पर उसको अपना सामान आँगन में रखा मिला और उसके कमरे में मौसी के किशोर बेटे का कब्ज़ा हो चुका था।  इससे पहले की वह कुछ कहती या पूछती मौसी ने कह दिया - " अब न अम्मा रहीं और न अम्मा का कमरा , इस लिए तुम्हें अपने घर चले जाना चाहिए और भाई - बहनों की तरह भी तुम अपने पापा के घर जाकर रहो। "
                        उसके कानों में मानो किसी ने गर्म शीशा उड़ेल दिया हो।  वह जाना तो जीजी के घर भी नहीं चाहती थी क्योंकि वे भाई बहन भी तो उसको अपनी बड़ी बहन कब स्वीकार कर पाए थे ? वह कभी उनके साथ  रही ही नहीं , कभी गयी तो मेहमानों की तरह और चली आयी।  आज तो उसको हमेशा के लिए ये अपना घर छोड़ कर वहां जाना ही था , उसके पास कोई और चारा भी नहीं था।  वह अपना सारे सामान सहित अपने जनक के घर आ गयी।  पर उसे वहाँ पर अपना सा न लग रहा था। सब अजनबी से व्यवहार कर रहे थे।  जीजी और पापा ही उसको प्यार से रखते और व्यवहार करते।  हो सकता है कि इतने दिनों बाद बेटी मिली तो उनका भीतर छिपा हुआ प्यार उमड़ने लगा था।
                    पापा ऑफिस से आते - जाते पूछ लेते - "रेवा अपने नए घर में अच्छा तो लग रहा है , धीरे धीरे मन लगने लगेगा।"

"जी पापा।." एक संक्षिप्त उत्तर देकर वह चुप हो जाती।  अपना दर्द किससे कहती ? मन नहीं लग रहा था।  वह कॉलेज जाती और फिर लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ती रहती।  शाम को घर आ जाती। 

                     जीजी और पापा को यह बात पता थी कि रेवा को एक न एक दिन इस घर में आना होगा , लेकिन इतने अचानक सब कुछ छूट जाएगा ये उन्हें भी पता न था। वह भी मानसिक रूप से दूसरे भाई बहनों को तैयार नहीं कर पाए थे। दूसरे  भाई बहन उसको स्वीकार नहीं कर  पा रहे थे।  उसके कानों में खुसपुस पड़ ही जाती थी। उसे मम्मी की बहुत याद आती थी तो वह चुपचाप वाशरूम में जाकर रो लेती क्योंकि उसके दर्द को कोई ही नहीं समझ सकता था।  वह माँ बाप के होते हुए भी अनाथ कैसे हो गयी ? उसके इस दर्द का अहसास तो उसकी माँ को भी नहीं था।  वह घर गृहस्थी और अपने बच्चों में लगी रहती थीं। उन्हें इस बात की समझ भी न थी कि उसको अधिक ध्यान देने की  जरूरत है। पापा  दिन भर बाद ऑफिस से आते और उसका हाल चाल पूछ कर पेपर लेकर बैठ जाते , जो कि उनका रूटीन था। 

        इतनी कभी करीब भी तो नहीं रही कि  उसने अपनी जननी के प्यार भरे अहसास को भी जिया हो। फिर मम्मी के लिए तो वह अकेली थी, जिसको उन्होंने बहुत छोटे अबोध बच्चे की उम्र से पाला था और जीजी ने तो उसको कभी जी भर कर प्यार भी न कर पाया। वह बचपन में प्यार ही तो जानती थी और वह उसे मिल ही रहा था। तब वह पूरे घर में मामा और मौसी के लिए खिलौना थी।  

                                               ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद वह घर में बैठ कर क्या करती ? जीजी और पापा अभी मानसिक रूप से तैयार भी नहीं थे कि उसके लिए क्या करना है ? छोटी जो पढ़ने में बिलकुल भी सही नहीं थी , उसकी शादी के बारे में वे सोच रहे थे कि अभी जल्दी शादी कर देंगे तो उसे कोई पढता हुआ लड़का मिल जाएगा और दहेज़ मांग भी अधिक नहीं होती और घर वर भी अच्छा मिल जाएगा। 
 
                          एक दिन वह पापा से बोली - "पापा मैं कोई कंप्यूटर कोर्स करके जॉब करना चाहती हूँ। "
 
                        "क्यों ? पोस्ट ग्रेजुएशन कर लेती हायर एजुकेशन भी बुरी नहीं होती और तुम जॉब की क्यों सोच रही हो?" पापा उसकी बात सोच कर चौंक गए।
 
                       "पापा इसका स्कोप भी अच्छा है और फिर कुछ भी पढ़ लूँ , जॉब के लिए तो आजकल कंप्यूटर ही सबसे बड़ा साधन बन चुका है तो फिर सीधे वही न किया जाय।"
 
       पापा का जमाना और था और आज का और, इसलिए उन्होंने सोचा कि इसकी बात भी सही है , उसके ज़माने में थोड़ा पढ़ लिख कर टाइपिंग सीख कर कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाती थी और अब यह खाली बैठ कर भी क्या करेगी? जो इसका मन है करने दिया जाय। 
 
                       उसने भी मन में नौकरी ही करने की ठानी और उसने जब खोजना शुरू तो उसको एक संस्थान में प्रोजेक्ट में नौकरी मिल गयी और उसको सारे दिन की मानसिक यंत्रणा से छुट्टी मिल गयी।  अब वह ऑफिस जाने लगी तो उसको कुछ भी सोचने का वक़्त ही  नहीं मिलता था। सारे दिन काम करके वह थक जाती थी और आकर खाना खाकर थोड़ी देर पापा और जीजी को ऑफिस के बारे में बात करके वह सोने चली जाती। उससे अपनी बहन के साथ बेड शेयर करना पड़ता था लेकिन वह खुश थी। अपनी व्यस्तता के कारण भी वह कुछ सोच नहीं पाती थी। 
 
                       एक दिन वह ऑफिस से कुछ जल्दी आ गयी सीढ़ियाँ चढ़ ही रही थी कि तेज तेज आवाजें सुनाई दीं -  "मम्मी हमें कब तक रेवा के साथ बेड शेयर करना पड़ेगा ?"
 
   " क्योंकि वह तुम्हारी बड़ी बहन है और तुम्हारी तरह वह भी इस घर की बेटी है और जितना घर और उसकी चीजें तुम्हारी हैं उतनी ही उसकी भी हैं।" जीजी उसको सही समझा रही थीं।
 
    "नहीं , उन्हें ड्राइंग रूम में फोल्डिंग डाल कर सुलाइये , मुझे फैल कर सोने की आदत है , ठीक से रात में नींद भी नहीं आती है। "
 
     "तुम सोओगी फोल्डिंग पर ?"
 
     "मैं क्यों? वह मेरा बेड पहले से ही है , वह बाहर से आकर सोने लगी है।"
 
     "चुप रहो , आगे से ये बात बोलना भी मत, वह मेरी ही बेटी है और इतने साल तक वह जिस प्यार की हक़दार थी , उससे वंचित रही है और जो तुम्हें हमेशा मिला है।"
 
     "मैं कुछ नहीं जानती , नहीं सो सकती , वो मुझे मनहूस सी लगती है ? पैर पटकते हुए सीमा उठकर चली गयी। 
 
                   रेवा के पैर दरवाजे के बाहर मनों भारी हो चुके थे और तो और उसका न अंदर आने का मन था और वापस जाती भी तो कहाँ ? बुत बनी वहीं खड़ी रही। खुद को संयत करने के बाद वह अंदर आयी।  उसका मन जार जार रो रहा था लेकिन कर भी क्या सकती थी ? उसकी पहली सेलरी मिले थी तो वह सबके लिए कुछ न कुछ लेकर आयी थी और वह पापा के आने पर ही देना चाहती थी।
 
                 पापा के आने का वह बेसब्री से  इन्तजार कर रही थी ताकि घर का माहौल कुछ ठीक हो।  पापा के आते ही वह जाकर जल्दी से चाय बना लाई और सबने  बैठ कर चाय पी।  उसके बाद - " सब लोग यही रहेंगे , मैं कुछ दिखाना चाहती हूँ।"  वह अंदर जाकर  सबके लिए हुआ सामान उठा लायी। 
 
                  पापा के लिए कुर्ता पायजामा , जीजी के लिए चूड़ियाँ , पर्स , सीमा, रीना और रोहित के लिए वह कुछ न कुछ लेकर आयी थी।
  
                  "आज मेरी पहली सेलरी मिली थी तो मैंने सोचा कि सबके लिए कुछ न कुछ ले चलूँ , इस पर सबका हक़ है। कहकर रेवा चुप हो गयी। 
 
           " अरे वाह हमारी बेटी तो बड़ी सयानी हो गयी।" पापा गर्व भरे लहजे में बोले।
 
          " मैं भी सोच रही थी कि  कुछ ऐसी कॉमन चूड़ियाँ ले लूँ , जिन्हें मैं किसी भी साड़ी के साथ पहन सकूँ।" जीजी ने भी उसकी पसंद को सराहा। 
 
           भाई बहनों  लिए जो चीजें लाई थी, उन्हें छोटे भाई बहन लेकर  बगैर किसी  उत्साह के उठ कर चले गए और सीमा तो बिना उठाये ही चली गयी। उसे बड़ी निराशा हुई। 
 
           "ये सीमा को क्या हुआ ? बिलकुल भी तमीज नहीं है कि रेवा को बगैर थैंक्स बोले  उठ कर चली गयी।  आखिर ये चाहती क्या है ?" रेवा के जाने के बाद पापा ने जीजी से कहा। 
 
             आवाज रेवा के कानों में पड़ रही थी और इससे ज्यादा तो वह घर में घुसने से पहले ही सुन चुकी थी। आज ही उसने अपने  में वर्किंग हॉस्टल में रूम के लिए अप्लाई  कर दिया था। एक हफ़्ते में उसको हॉस्टल मिल गया।  उसका शेयरिंग रूम मिला था लेकिन बेड अलग अलग थे। टेबल, चेयर और अलमारी दोनों की अलग अलग थी।
 
             वह बहुत खुश थी कि अब कम से कम  सीमा को शेयरिंग की उस मानसिक यंत्रणा से मुक्त कर देगी।  अपना क्या! जीवन तो मम्मी के साथ शेयरिंग से ही शुरू हुआ था, उसको किसी की जरूरत ही नहीं पड़ी और उसके बाद वह अकेली हो गयी प्यार वो भी मम्मी जैसा न मिला और न उनकी तरह सिर पर हाथ फिरने जैसा सुख मिला। 
              एक दो दिन मैं वह यहाँ शिफ्ट हो जायेगी।  उस दिन भी वही हुआ , वह ऑफिस से आयी तो सीमा जीजी से लड़ रही थी कि क्या इन्हें जिंदगी भर यहीं रखना होगा। 
 
              बात कहाँ से और क्यों पैदा हुई उसको पता थी लेकिन उसमें एक नया आत्मविश्वास आ गया था।  उसको हॉस्टल मिल जाने से वह किसी पर बोझ नहीं रही अब। 
 
             "सीमा चिंता मत करो , अब ढोने की किसी को जरूरत नहीं है।  जीजी मैंने ऑफिस के हॉस्टल में रूम के लिए अप्लाई किया था , वह मुझे मिल गया है और कल ही  सामान ले कर वहाँ शिफ्ट हो जाऊँगी और बाकी फिर बाद में ले जाऊँगी।"
 
             ऑफिस में आकर उसको मोबाइल और बाकी चीजों की जरूरत होने लगी और धीरे धीरे उसने सब खरीद लिए। कैंपस में फ्री वाई फाई की सुविधा थी और ऑफिस में तो मिलती ही थी अब घर में भी मिलने लगी थी। 
 
           अकेली हॉस्टल में वह समय सोशल मीडिया पर गुजारने लगी।  उसने कई मित्र बनाये , लड़कियां और लड़के भी।  बहुत खुले विचार के परिवार की लड़की वह न थी लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों उसका सऊदी अरब के अशरफ से कुछ अधिक आत्मीयता बढ़ने लगी , इसका कारण उसे भी पता नहीं था और वे एक  दूसरे के सुख दुःख बाँटने लगे।  वह कम पढ़ा लिखा मेहनतकश व्यक्ति था।  पता नहीं क्या और कौन सा जूनून था कि वह दिल हार गयी और सब कुछ जानने के बाद भी कि हो सकता है उसके घर वाले इसके लिए राजी न हों या फिर अशरफ के घर वाले राजी न हों और उनके रिश्ते को स्वीकार न करें।  लेकिन इसी को तो कहते हैं कि कुछ रिश्ते ऊपर से निश्चित होकर आते हैं और कौन कब इसका साक्षी होगा ये भी। 
 
                 अशरफ से उसको कुछ तो ऐसा मिला कि मीलों दूर की दूरी ने उसके अकेलेपन और मम्मी की कमी को पाटना शुरू कर दिया था और उसको जीवन में एक संतुष्टि दी , जो उसको कभी मिली ही नहीं थी। ये उसका साथ कितनी दूर तक चलेगा ये उसको मालूम नहीं था।  अशरफ पैसे कमा कमा कर घर भेजता और घर वाले अपने जीवन को बेहतर और बेहतर बना रहे थे।  उसको ये चिंता न थी कि कल उसके पास क्या होगा ? उसके लिए घर ही सब कुछ था और हो भी क्यों नहीं ! वही तो सबके जीने का सहारा होता है और प्रगति का भी।
 
               अशरफ एक महीने की छुट्टी लेकर आया और उसी में  वह रेवा से मिलने के लिए आया।  वे अलग अलग शहरों में रहते थे।  पहली बार मिलने पर भी नहीं लगा कि वे पहली बार मिल रहे हैं। रेवा ने अशरफ से मिलने से पहले ही अपना रहन सहन उसी के अनुसार बना लिया था।  पूरी आस्तीन का कुरता , मुंह पर चुन्नी का हिज़ाब और शांत चेहरा।  इस बार उसने निर्णय लिया था कि वह अपने घर में इस बारे में बात करेगी। और अशरफ ने भी सोचा कि पहले रेवा बात कर ले फिर वह करेगा या फिर जरूरत पड़ी तो वह खुद रेवा के घर जाकर बात करेगा। 
 
           आखिर हाथ माँगने तो उसको ही जाना पड़ेगा। अंजाम कुछ भी हो अब ये हाथ और साथ तो मरने पर ही छूटेगा। अशरफ रेवा के घर गया , बहुत ही शालीनता के साथ उसने बात की और रेवा के पिता के सामने शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन नाम से धर्म को जानते ही भड़क गए और उन्होंने फटकारा  - " निकल जाओ तुमने हिम्मत कैसी की ? कहाँ हम ब्राह्मण लोग और वह भी कान्यकुब्ज ब्राह्मण। चले जाओ नहीं तो धक्के मार कर निकल दूँगा।"  अशरफ वहाँ से चुपचाप चला गया क्योंकि अब उसके सामने अपने घर वालों के सामने  प्रस्ताव रखने के अलावा और कोई चारा न था। उसको पता था कि उसका कम पढ़ा लिखा दकियानूसी परिवार और कहाँ रेवा पढ़ी लिखी नौकरी पेशा लड़की , उनको कभी न स्वीकार होगी , लेकिन अपनी जंग तो उसको लड़नी ही थी।  घर वालों ने एकदम नकार दिया कि वह तो साथ दे ही नहीं सकते हैं।  उसको यहाँ लाना भी नहीं , नहीं  तो तुम्हें भी जायदाद से बेदखल कर देंगे। 
 
            जब घर वालों जायदाद की  बात की तो उसका माथा ठनका क्योंकि जो आज घर की हालत थी वह तो उसकी कमाई से ही थी।  न भाई कुछ करता और न अब्बा।  उसको कमाने के लिए भेज दिया था और सारी जायदाद बनायी अपने नाम।  अब उसके पास कोई प्रमाण तो था नहीं और आज वह अपने जीवन में सड़क पर ठगा से खड़ा था। अम्मी के शब्द उसको भूल नहीं रहे थे।  
 
           "जब करना ही है तो फुफ्फी की बेटी क्या बुरी है ? तुझे तो अरब में ही  रहना है. वह घर के चार काम करेगी और भाभी का हाथ भी बंटाएगी। ये नौकरी वाली न इज्जत करेगी और न काम।" 
 
            सबके चेहरों से मुखौटे हट चुके थे। उसके पास रेवा से कहने को कुछ भी न था लेकिन कुछ तो कहना पड़ेगा। वह अकेला खड़ा था और रेवा से बात करने की  हिम्मत भी नहीं हो रही थी। लेकिन दोनों जगह से दरवाजे बंद होने पर उन्होंने कोर्ट मैरिज के लिए अर्जी दे दी।  वह एक बंधन में बँध जाएंगे और कोई उनको शादी के लिए बाध्य करेगा तो ये सर्टिफिकेट दिखने के लिए काफी रहेगा।  वह वापस चला जाएगा और रेवा यहाँ नौकरी कर ही रही है।  वह अच्छा से कमा कर यहाँ वापस आ जाएगा।  उसको किसी के सहारे की दरकार नहीं रहेगी।
 
              अशरफ और रेवा कोर्ट में शादी करने के बाद अपने अपने ठिकानों पर चले गए।  बस एक डोर ने उनको बाँध दिया , जो कि बहुत ही मजबूत थी और  वह थी उनकी चाहत और इरादों की डोर। जीवन कब साथ गुजरेंगे ये प्रश्न अभी भी अनुत्तरित था लेकिन उनके इरादों और हौसले पर कोई भी प्रश्न चिह्न नहीं था। किसी ने अपना नाम नहीं बदला और न ही धर्म।  क्यों अपनी पहचान खोई जाय।  नाते तो सिर्फ दिल से होते हैं बाकी सब तो दिखावा है।
 
                 फिर अशरफ वापस लौट गया और रेवा तो हॉस्टल में रहती ही थी , वह अपने हॉस्टल में  आ गयी। जिस दिन वह अपने घर पहुँची तो घर में बवाल मच गया - "मुसलमान से शादी करेगी, अपने घर , कुल का ध्यान नहीं आया तुझे।  अभी मुझे और भी बच्चे ब्याहने हैं।"  
       
                   वह छोटे भाई बहन जिन्हें साथ रहना पसंद न था, उनकी जबान भी लम्बी लम्बी चलने लगी थी।  रेवा सब सुनकर खामोश थी क्योंकि उसको जो करना था वह कर चुकी थी।  वह चुप रही और  दूसरे दिन ही हॉस्टल वापस आ गयी। इन सब चीजों से उसको अपने भविष्य का अहसास हो  चुका था कि जिंदगी उसको कहाँ ले जाने वाली है ? लेकिन अब कदम आगे बढ़ा ही दिए हैं पीछे लेने के लिए नहीं। उसने माँ-बाप का मोह  छोड़ना भी शुरू कर दिया और पैसे की कद्र कैसे की जाती है , ये सीख लिया।  अब अपना भविष्य खुद  बनाना होगा और अकेले जीने की आदत भी डालनी होगी।  ऑफिस के बाद उसने एक प्रोफ़ेसर के यहाँ थीसिस टाइप करने का काम भी शुरू कर दिया।  सब कुछ पास पास था तो कोई परेशानी न थी।  बेकार के तनाव से बची रहती और पैसे भी मिल रहे थे।  आज नहीं तो कल उसे घर बनाना ही है , अशरफ के भरोसे वह बैठ नहीं सकती और अपने बलबूते वह  सब कर सकती है।  उसके माँ-बाप तो उसको विदा भी न  करने वाले और अशरफ के घर वाले उसको घर में कदम भी न रखने देंगे।
 
                               अशरफ के ऊपर शादी का दबाव बढ़ने लगा तो उसने रेवा को बताया।  रेवा ने बिल्कुल निष्पृह होकर कहा - "अब भी समय है अशरफ सोच लो।  उस कागज़ के टुकड़े की कोई  कीमत नहीं है।  खून के रिश्तों को तोड़कर रहने का साहस तुममें  हो तो उत्तर दो, अन्यथा मुझे छोड़ सकते हो।"
 
   "नहीं रेवा अब जो कदम आगे बढे हैं , वो वापस नहीं जायेंगे और अब मैं यहाँ रहकर तुम्हें अकेले अपने से लड़ने भी नहीं दूँगा। मैं वापस आ रहा हूँ। वहीँ रहकर कुछ करूँगा तुम्हारे साथ रहूँगा।"
 
                अशरफ ने घर में  इंकार कर दिया और कहा कि मैं वहीं आकर रहूँगा।   बहुत कमा चुका और घर में  लगा चुका। उसने दस साल कमा कर घर में भेजा था और संपत्ति भी बहुत बन चुकी थी। उसके वापस आने के निर्णय से घर वाले भी कुछ  समझ गए और उसके अब्बा ने उसको सारी संपत्ति से बेदखल कर दिया।  जैसे ही अशरफ आया उसके सामने अख़बार रख दिया गया कि अगर उस लड़की से शादी का सपना लेकर यहाँ आया है तो इस घर से कुछ भी मिलेगा भूल जाओ।अशरफ सकते में आ गया - उसने तो अम्मी-अब्बा , भाई भाभी , घर के अलावा कुछ सोचा ही नहीं था। 
 
         "अगर उसे लड़की से शादी की जिद छोड़ दो तो यह घर तुम्हारा है और यहाँ की सारी चीजें भी तुम्हारी ही है लेकिन अगर जिद नहीं छोड़ी तो उसे तो क्या तुम्हें भी इसमें सिर छुपाने की जगह नहीं मिलेगी।" अब्बा ने यह  फरमान उसको सुना दिया और वह तो सकते में आ गया। लेकिन उसने कुछ भी प्रदर्शित न किया और वह दूसरे काम की तलाश में लग गया। 
 
                रेवा भी इस बात से चिंतित थी कि अब क्या होगा? उसकी नौकरी भी स्थायी नहीं थी प्रोजेक्ट की नौकरी - चले तो वर्षों चलती रहे और नहीं तो कभी भी ख़त्म हो जाए।  अशरफ ने फिर एक बार कोशिश की कि वह रेवा के घर जाकर बात कर ले।  इस बार तो उसके पिता ने और भी बुरा व्यवहार किया।  उनके तेवर बिगड़े हुए थे।  उन्होंने भी कह दिया - "अगर तुमने मेरी बेटी का पीछा न छोड़ा और उसको शादी के लिए भड़काया तो मैं तुझे लव जिहाद में फंसा कर तुझे बरबाद कर दूंगा। सारी जिंदगी जेल में चक्की पीसते रहना।"
 
               अशरफ के लिए सारे रास्ते बंद हो चुके थे और उसने रेवा से कहा कि अब हम लोगों को ही कोई निर्णय लेना पड़ेगा।  रेवा ने सोच लिया कि वह अपनी जॉब छोड़ देगी और अशरफ के शहर में ही जाकर नौकरी खोजेगी और अब वे साथ साथ ही रहेंगे।  कुछ महीने उसने इन्तजार किया और उसके बाद अपने घर में कह दिया कि  वह दूसरी नौकरी  लिए यहाँ से शिफ्ट होकर गाज़ियाबाद जा रही है।  वह जल्दी ही वहाँ ज्वाइन कर लेगी।  यहाँ पर प्रोग्रेस की उम्मीद कम ही है और कुछ मिलने वाला नहीं है , जिस समय प्रोजेक्ट ख़त्म हो जाएगा उसे निकाल दिया जाएगा। वह अब वापस घर में तो बैठ नहीं सकती है , हाँ वहाँ से वह वीकेंड पर आती रहूँगी। 
 
                 रेवा ने अपना सारा सामान अशरफ को बुलाकर धीरे धीरे गाज़ियाबाद भेज दिया। वहां पर अशरफ ने एक छोटा सा घर किराये पर ले लिया ताकि सिर्फ उस सामान को सुरक्षित रख सके क्योंकि रेवा ने अभी नौकरी भी नहीं छोड़ी थी और न ही अशरफ ने अपना घर। वह अब भी इस जुगत में था कि किसी तरह से अम्मी मान जाएँ लेकिन अम्मी से ज्यादा उसकी भाभी, बहन को इस बात की चिंता थी कि वह पढ़ी लिखी नौकरी वाली लड़की से अपने को ऊँचा  साबित तो नहीं ही कर पायेंगी और फिर कहीं नौकरी करने लगी तो उसकी सेवा अलग करनी पड़ेगी।  उसके बारे में बगैर जाने और मिले ही कयास लगाए जा रहे थे। 
 
                   रेवा को बुद्धि से काम  लेना था कि उसके बारे में कोई शक न करे और अशरफ पर भी किसी भी तरह की आंच न आये।  रेवा ने नौकरी छोड़ कर कुछ दिनों जीजी और पापा के साथ रहने की सोची ताकि उसके प्रति किसी  के मन में कोई दुर्भाव न आये। शेष भाई बहनों का वही रवैया था और अब पापा का भी वह प्यार न छलकता था , जो उसके लिए कुछ महीने पहले था।  फिर एक दिन अशरफ का फ़ोन आया कि वह यहाँ आ जाए तभी तो वह नौकरी खोज पाएगी।  जितने वर्ष वे  अलग गुजार चुके हैं , उतने दिन भी अब भारी पड़ रहे हैं। रेवा इस बात को शिद्दत से महसूस कर रही थी कि वे दो साल से शादीशुदा हैं और फिर भी आज तक कभी एक पूरा दिन और रात साथ नहीं गुजारी है।  सब कुछ सहमति से चाहते थे और लगता है कि वह अब संभव नहीं हैं।  फिर क्यों न अब खुद ही निर्णय लेकर शेष जीवन गुजारने की योजना बनायीं जाए। 

                           अभी रेवा के पास इतना पैसा जमा था कि वह  बगैर नौकरी के  एक साल तक अपना घर चला सकती थी उसने दिल कड़ा किया और  जीजी बोल दिया कि वह इतवार को गाज़ियाबाद  के लिए निकल रही है। जीजी ने सवाल किया - "क्या यहाँ कोई नौकरी नहीं मिल सकती है , वहाँ  इतनी दूर अकेली रहोगी , मेरा मन लगा रहेगा। " माँ का मन आखिर माँ का होता है।
 
        "जीजी आती रहूंगी कुछ ही घंटों का रास्ता है फिर जब भी लम्बा वीकेंड होगा आकर रह जाऊँगी। बाकी तो जानती ही हैं कि अब किसी  मेरा यहाँ रहना पसंद नहीं है।  फिर क्यों बोझ बनी रहूँ।" बहुत संयत स्वर में रेवा ने कहा था लेकिन गले का भारीपन उसके दिल के हाल को बयान कर रहा था। ये बात उन्हें पता थी और वे जानबूझ कर अनजान बने रहना चाहते थे कि रेवा का गाज़ियाबाद जाकर नौकरी करने का फैसला क्या हो सकता है ?  जब रेवा घर से चली तो उसके साथ सिर्फ पहने वाले कपड़ों का एक बैग था।  घर छोड़ कर जब लड़की जाती है तो उसको पराया नहीं समझा जाता है लेकिन यहाँ तो बात ही कुछ और थी।  आँसूं भरी आँखों से निकली तो उसने पलट कर नहीं देखा।  न माँ ने गले से लगाया और न भाई बहन से मिली।  जैसे अवांछित कोई घर से जा रहा हो, और वे सब इसी इन्तजार में थे।  उसके प्रति कोई भी संवेदनशीन नहीं था।  उसके मन की व्यथा कोई नहीं समझ  सकता था और न ही कभी समझी। भारी कदमों से रेवा घर की सीढ़ियां उतर कर नीचे आ गयी। पलट कर देखा तो सिर्फ माँ ही बालकनी से उसे सूनी सूनी आँखों से देख रही थी और उसने मुस्कराते हुए हाथ हिलाया और तेज कदमों से गली से बाहर की तरह निकल ली।उसका मन फूट फूट कर रोने का कर रहा था लेकिन कहाँ ? वह विदा होकर ही तो जा रही है , अपनी ससुराल -  घर में।
 
                   वह चली गयी लेकिन रिश्ते तोड़कर नहीं बल्कि एक पतली सी डोर शेष रखी थी कि कभी अपने घर के अलावा कोई दर खुला रहे और मन ऊबे तो आ सके।  अभी कुछ पेपर भी बाकी थे , वह जब पेपर देने आएगी तो कहाँ रुकेगी ? कहाँ रहेगी? सरे पेपर में तो इसी घर का पता दिया था। भले ही अब हमेशा के लिए बदल रहा हो। ये भी उसको पता था कि वह अशरफ के साथ रहेगी और अपनी संस्कृति के अनुसार सिन्दूर , चूड़ियां और मंगलसूत्र भी बराबर पहनेगी।
 
                    अशरफ ने वहाँ पर 1 बीएचके किराये पर ले लिया था और उसमें  सारा सामान भी लगा  लिया था। बहुत बड़ी नौकरी  तो नहीं लेकिन उसने एक नौकरी कर ली थी ताकि रेवा को ये  न लगे कि अब खाली हाथ हो चुके हैं। एक औरत के लिए ये सबसे बड़ा सदमा हो सकता है, जो वह नहीं चाहता था। वो उससे ज्यादा पढ़ी लिखी थी और काबिल भी, लेकिन वह उसको यह महसूस नहीं होने देना चाहता था कि वह उससे शादी करके अपने को ठगा सा महसूस करे। अब जब जीवन साथ ही बिताना है तो क्यों न हाथ इतनी मजबूती से पकड़ा जाय कि इसके बीच में जाति , धर्म , पढ़ाई -लिखाई या कमाई का कोई भी रोड़ा रह ही न जाय। वह सिर्फ वह ही एक दूसरे के सहारा बनने वाले हैं। सही अर्थों में जीवनसाथी।
                     
                        अशरफ बार बार घड़ी देख रहा था लेकिन फ़ोन नहीं कर रहा था क्योंकि वह तो उसको सरप्राइज़ देने के लिए बहुत कुछ किये बैठा था।  किसी तरह खुद को संयत किये था।  तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और उसने जल्दी से उठ कर दरवाजा खोला।  सामने रेवा खड़ी थी , बिलकुल एक मुस्लिम लिबास में और असरफ ने भी उसका इस्तक़बाल करते हुए झुका  और उसने अंदर आने की और इशारा किया।  एक घर छोड़ने और दूसरे में इस तरह से स्वागत ने उसके दु:ख को कम कर दिया था। एक घर जिसके लिए वह कितने मकानों में रही और फिर बेगानों की तरह छोड़ कर चल दी। चाहे मम्मी का घर हो, संस्थान का हॉस्टल या जीजी का घर।
 
         रेवा ने अपने उस घर में कदम रखा तो स्वागत करने वाला सिर्फ उसका पति अशरफ था। वह इस घर  की मालकिन थी और अशरफ की पत्नी थी, उसको कुछ पता न था कि जो पंथ वह जी रही है उसका नाम क्या है? बस उसके इस घर में लाल कपड़े में लिपटी रामचरितमानस और हरे कपड़े में लिपटी कुरान थी। वह एक मकान में आ गई थी । लेकिन इसको वह घर बना पायेगी उसे खुद पता नहीं था । वह इसको ही घर बनाएगी क्योंकि घर एक संकल्पना होती है , ईंट गारे से बने मकान नहीं। ये भावना दिल में पनपती है और जो घरवालों का सही साथ ही घर की नीव होती है।
 
                  " अरे इसकी क्या जरूरत थी ? अब तो मैं सब कुछ पीछे छोड़ कर आगे बढ़ चुकी हूँ। " रेवा ने दुर्गासप्तशती , नारियल और पूजा का सामान भी देख लिया था और इस बार नवरात्रि और रमजान साथ साथ शुरू होने जा रहे थे।
 
                  "हाँ , लेकिन जिस्म में बहते हुए लहू में जो तहजीब  बसी है , उनको मैं छोड़ने नहीं देना चाहता।  तुम रोजे रहो तुम्हारी मर्जी , लेकिन तुम नवरात्रि रहोगी तो मैं अपनी जीत समझूंगा।" 
 
                    रेवा पूरे घर में घूम घूम कर देख आयी और इतने सलीके से लगा और किसी बहुत अपने को पाकर उसे लगा की उसके एक घर की तलाश आज पूरी हुई है।
 

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