शनिवार, 21 जुलाई 2012

भवितव्यता (5) !



 पूर्वकथा :

सावित्री अपने मइके या ससुराल दोनों में दुलारी थी। घर में लक्ष्मी मानी  जाती। उसका पति समझदार और जिम्मेदार युवक था। छोटे भाई की संगती के बिगड़ने से चिंतित रहता और उसके इस बात के लिए रोकने पर उसके साथ कुछ ऐसा बुरा हुआ कि  कई जिन्दगी इसमें पिसने लगी । शशिधर का दोस्त गिरीश ने अंतिम समय उसे वचन दिया की वह उसकी पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय नहीं होने देगा.  बच्चों को कसबे में  के लिए ले जाने के सवाल पर गिरीश और शशि के घर वालों के बीच कहा सुनी हो गयी और उसी बीच गिरीश ने कह दिया कि  शशि को  मारने वाले उसके देवर के साथ ही थे . इसा बात से शशि के माता पिता अब अपने पोतों के विषय में चिंतित हुए और उन्हें कसबे भेजने के लिए तैयार हो गए . गिरीश उन्हें ले गया और उन्हें रखा भी लेकिन इतने छोटे बच्चे हरी बीमारी में माँ को ही बुलाते और वह परेशां होकर बच्चों के लिए सावित्री को भेजने का प्रस्ताव लेकर आया . जिसके लिए पंचायत बुलाई गयी और उसके मायके वालों से भी सलाह लेने की बात  कही गयी.........





गतांक से आगे : 
               सावित्री के मायके वालों को इस विषय में कुछ भी पता नहीं था। वे आते जरूर और अपनी बहन का हालचाल  लेकर चले जाते। कभी सावित्री ने अपने घर वालों को इस विषय में कुछ भी नहीं बताया। उसे ये बात अच्छी तरह से पता था कि अगर उसने अपने घर वालों से कोई भी शिकायत की तो उसके भाई उसको यहाँ पर नहीं रहने देंगे।  इस बात को जानकार तो बिलकुल भी नहीं कि उसके देवर ही शशि की मौत के जिम्मेदार हैं,  लेकिन वह अपने तीन बच्चों के साथ मायके में जाकर रहना नहीं चाहती थी क्योंकि उसको ये पता है कि उसके भाई तो उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहेंगे लेकिन उनके जाने के बाद बड़ी भाभी के तानों को कौन सुन  पायेगा?  उनके साथ रहने सेअच्छा  है कि अपने घर में रहा जाय। वह समझदार और गंभीर दोनों ही थी। उसने ये भी सोचा कि अगर यहाँ से चली गयी तो फिर इस घर से अपने सारे अधिकार भी खो देगी   . सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसके कारण  उसके सास ससुर को भी पता नहीं क्या क्या सहना पड़े? किस तरह से वह उनको रखे? नहीं वह अपने परिवार के साथ ही रहेगी। 
                  सावित्री के भाइयों को बुलावा भेज दिया गया और वे भी बिना किसी देर के दूसरे दिन ही वहा आ पहुँचे। शशिधर के  पिता ने उन लोगों से और अधिक छुपाना उचित नहीं समझा  क्योंकि एक तो पड़ोस के गाँव की बात है और दूसरे आज नहीं तो कल ये सब बातें उनको पता चल ही जायेंगी। लेकिन अगर ये बातें कोई और उन्हें बताये तो इससे बेहतर है कि वह खुद ही बता कर समाधान खोज लें। सावित्री और बच्चों के बारे में जितना वे सोचते हैं उससे अधिक उसके मायके वाले भी सोचते होंगे लेकिन बेटी या बहन की ससुराल के मामले में बिना सलाह लिए बोलना उनको ठीक नहीं लगता होगा।  अगर अब ये सारी  बातें उन्हें खुद न बतायीं गयी तो कल को उन पर शशि और उसके परिवार के प्रति पक्षपाती होने का आरोप भी लग सकता है। 
                 सावित्री के भाइयों ने आकर यही सलाह दी कि सावित्री को कस्बे  भेजने से पहले गिरधर का गौना करा लिया जाय ताकि माय को कोई भी परेशानी न हो और उसके बाद सावित्री बच्चों के साथ चली जाय। गल्ला पानी घर से भेजा जाएगा और शशि  की पेंशन से बाकी खर्च पूरे हो जायेंगे। संरक्षण के लिए सावित्री के भाई, ससुर और देवर वहाँ जाकर उसकी परेशानियों का ध्यान रखेंगे छुट्टियों में बच्चे गाँव में आकर रहेंगे। ताकि बाबा दादी को अपने पोतों से मिलने का और साथ रहने का मौका मिलता रहे। 
                   आखिर वह दिन भी आ गया कि  सावित्री अपना जरूरी सामान लेकर बच्चों के साथ जाने की तैयारी करने लगी। चलने से पहले सास उसे गले लगा कर खूब रोई और समझाया कि कोई भी परेशानी हो तो वह घर खबर भेज दे, उसके पास हम तुरंत पहुँच जायेंगे। कस्बे में संभाल कर रहने की हिदायत भी दी गयी। वह गाँव की रहने वाली थी और गाँव में ही रही। उसको दुनियांदारी की समझ अधिक न थी। लेकिन वक़्त इंसान को सब कुछ सिखा देता  है। 
                 गिरीश ने मकान की व्यवस्था पहले से ही कर रखी थी सो कोई परेशानी नहीं हुई।  लेकिन गिरीश घर नहीं आता था वह बच्चों से सारा हाल ले लेता था और कोई समस्या होने पर उन्हें उसके बारे में सुझाव दे देता था। उसका अपना पहले की तरह से रूटीन शुरू हो गया। वह सिर्फ स्कूल पढ़ाने  के लिए आता था और अपने गाँव वापस हो जाता।  वह अपने वचन के मुताबिक हर चीज पर नजर रखता था।
                एक दिन दोनों बच्चे स्कूल नहीं गए  , इस बात को गिरीश ने  ध्यान में रखा  और  दो अगले दिनों में भी उसे बच्चे नहीं दिखलाई दिए तो उसका माथा ठनका।  वह छुट्टी के बाद सीधे बच्चों के हालचाल लेने के लिये उनके घर गया कि कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गयी। उन लोगों का वहाँ पर कोई नहीं था। किसी से उनकी कोई जान पहचान भी नहीं थी कि मुसीबत के समय वह किसी से सहायता माँग लेती .
                 जाकर उसने  जैसे  ही दरवाजा  खटखटाया अन्दर डर  के मारे सब दुबक गए और बड़ी देर तक उन लोगों ने कोई उत्तर नहीं  दिया और न ही दरवाजा खोला।  तब गिरीश को जरूर कुछ शक हुआ कि ऐसी क्या बात है कि कोई दरवाजा ही नहीं खोल रहा है। तब उसने बाहर  से कहा कि  मैं गिरीश हूँ और बच्चों की खैरियत जानने आया हूँ। तब सावित्री ने दरवाजा खोला। चेहरे से वह सहमी सहमी लग रही थी। गिरीश का उससे अधिक वास्ता तो पड़ा नहीं था तो बोलने और बात करने में भी वह झिझक रहा था। सामने गिरीश को देख कर दोनों बच्चे उससे आकर लिपट गए और रोने लगे - "चाचा हमें अपने साथ ले चलो , हम अकेले नहीं रहेंगे नहीं तो चाचा माँ  को मार  डालेंगे।"
 
                  गिरीश को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है? वह तो समझ रहा था कि  बच्चे माँ के साथ अच्छी तरह से होंगे।  वह वही जमीन पर बैठ गया और बच्चों को चुप कराया फिर उनसे पूछा कि क्या बात है? सावित्री उसके सामने नहीं आई वह पीठ करके एक कोने में खड़ी  रही। 
 
                गिरीश बच्चों के मुँह से नहीं बल्कि सावित्री के मुँह से सुनना चाह  रहा था कि बात क्या हो गयी? 

              "देखिये आप इस तरह से अकेली रहेंगी और फिर बात भी नहीं करेंगी तो फिर मैं आपकी सहायता कैसे कर पाऊंगा ? आपको यहाँ पर्दा करके काम नहीं चलेगा , कल को आपको बाहर  निकलना है और बच्चों केलिए सारे काम करने होंगे तो काम कैसे करेंगी?"   गिरीश ने सावित्री से कहा।

            "ये तो सही है लेकिन हम कभी इस तरह से रहे नहीं है तो हमारी हिम्मत नहीं पड़ती है।"

           "ये मैं मानता  हूँ लेकिन अब घर से बाहर निकल कर तो सब करना ही पड़ेगा। सब को बोलना और बताना भी पड़ेगा। बच्चों के स्कूल जाना पड़ेगा तब क्या करेंगी?"

"वह तो है? बात ये है कि  बच्चे बहुत डर  गए हैं ,  परसों इनके चाचा राशन डालने के लिए आये थे और वापस जाने के लिए उनने हमसे पैसे माँगे तो हमने कह दिया कि हमारे पास नहीं है। इस पर वह बिगड़ गए  और गाली - गलौज करने लगे। बच्चे उसी से डर  गए।"

"फिर वह चले गए या फिर आयेंगे?"

' हाँ कह कर गए हैं कि जल्दी ही आयेंगे और पैसे लेकर ही जायेंगे । उन्हें पेंशन से पैसे चाहिए। घर के ऊपरी खर्च के लिए पैसा कहाँ से आएगा?'

"बच्चे स्कूल क्यों नहीं जा रहे हैं"

"उसी दिन से डर गए और नहीं जा रहे हैं।"

"तुम लोगों को स्कूल आना है, यहाँ पर तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। हम हैं न, कल से स्कूल जरूर आना। पढाई का हर्ज होता है और फिर तुम लोग पीछे रह जाओगे तब कौन पूरा कराएगा?"

"अच्छा अब कल से ये लोग स्कूल आयेंगे।" सावित्री ने कहा।

"और हाँ अगर घर में कोई बात हो तो इनसे कहला दिया करो मैं देख लूँगा। मैं रोज घर चला जाता हूँ इसलिए आ नहीं सकता। आगे से इस बात का ध्यान रखना।"  ये कह कर गिरीश चला गया।
 

                                                                                                                                          (क्रमशः)
 

सोमवार, 2 जुलाई 2012

भवितव्यता (४)

पूर्व कथा :

                        सावित्री अपने मइके या ससुराल दोनों में दुलारी थी। घर में लक्ष्मी मानी  जाती। उसका पति समझदार और जिम्मेदार युवक था। छोटे भाई की संगती के बिगड़ने से चिंतित रहता और उसके इसा बात के लिए रोकने पर उसके साथ कुछ ऐसा बुरा हुआ की कई जिन्दगी इसमें पिसने ला। शशिधर का दोस्त गिरीश ने अंतिम समय उसे वचन दिया की वह उसकी पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय नहीं होने देगा और इसके लिए उसने स्कूल में पूरी भूमिका बना दी। चाचा बच्चों को  करने लगा और साथ ही सावित्री को भी। बच्चों को कसबे में  के लिए ले जाने के सवाल पर गिरीश और शशि के घर वालों के बीच कहा सुनी हो गयी और उसी बीच गिरीश ने कह दिया की शशि को  मारने वाले उसके देवर के साथ ही थे ...........


गतांक से आगे :

                            गिरीश की बात सुनकर उसके ससुर और सावित्री अवाक् रह गए। लेकिन उनके मुंह से कोई बात निकल ही नहीं सकती थी। उन दोनों के मन में क्या चल रहा था इसको कोई और नहीं जान सकता था। इस बात को सुनकर उसका देवर भी सन्न रह गया लेकिन गिरीश को हर बात कहाँ तक पता है? इस बारे में उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा क्योंकि अब आगे से उसे गिरीश से पंगा नहीं लेना है ये तो पक्का है लेकिन फिर क्या इसके लिए वह सावित्री और बच्चों को घर से जाने देगा फिर तो भैया का सारा पैसा यही लोग हड़प कर जायेंगे और खेती में हिस्सा तो बना ही रहेगा। उसके हिस्से में क्या आने वाला है? वह ऐसा होने ही नहीं देगा? इसके लिए उसे चाहे गिरीश को भी धमकाना क्यों न पड़े ? मेरे पास तो मेरे सारे साथी हैं और गिरीश अकेला है डर ही जाएगा। 


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          आखिर गिरीश ने घर जाकर ये निर्णय लिया कि वह इस बार बच्चों का नाम कस्बे में ही लिखायेगा। छोटा अभी छोटा है इसलिए वह बाकी दोनों बच्चों नाम ही लिखायेगा। यद्यपि उसको ये विश्वास ही नहीं कि शशि का छोटा भाई इस बात के लिए  राजी होगा और बच्चों को कस्बे  में पढ़ने देगा। कहीं ऐसा न हो कि वह  मेरे साथ साथ इन बच्चों का  भी दुश्मन न बन बैठे, सावित्री क्या करेगी?
               
        शशिधर के पिता की भी जान सांसत में पड़ गयी कि ये नालायक बेटा कहीं उसकी पूरी जमीन- जायदाद कुसंगत में पड़ कर जुए और शराब की भेंट न चढ़ा दे। इन बच्चों को कहीं सड़क पर लाकर  खड़ा न कर दे,  फिर वे क्या करेंगे? जो अपने देवतुल्य भाई को मरवा सकता है ,वह कुछ भी कर सकता है। वे भी बच्चों को बचाने  और  भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उन्हें अपने से  दूर  करने के लिए खुद को तैयार करने लगे और इसके लिए वे अपने  दिल पर पत्थर  रखने के लिए राजी थे। उन्हें इस बात पर शर्म आने लगी थी कि कहाँ एक बेटा कितना सज्जन और चरित्रवान और  दूसरा निकम्मा और  बिगडैल।  उन्होंने पत्नी से भी विचार इस बारे में  किया। एक माँ वैसे भी चोट खाए बैठी थी, उसकी  जितनी आत्मा आहत थी और कुछ वह नहीं सोचना  चाहती थी। अब वे दोनों ही बेटे को खोकर पोतों को खोने की कल्पना  से भी उनकी आत्मा काँप जाती थी। इसलिए उन लोगों ने गिरीश  के प्रस्ताव को स्वीकार  कर  का मन  बना लिया ।
                    स्कूल खुलने का समय धीरे धीरे पास आता जा रहा था , सावित्री को इस बारे में अभी नहीं बताया गया था। गिरीश ने भी सोच लिया था कि वह बच्चों का नाम बगैर उन्हें ले जाए पहले ही  एडमीशन करवा लेगा और एक दो  महीने के बाद  वह ले जाएगा। लेकिन उसको ये नहीं मालूम था कि बच्चों को यहाँ से ले जाना तो आसान होगा लेकिन उनकी परवरिश नहीं। गिरीश बच्चों को ले तो गया लेकिन उनके लिए एक कमरा लेकर रहना भी उसको वहीं पड़ेगा लेकिन मित्र की खातिर उसको कुछ न कुछ तो कष्ट उठाना ही पड़ेगा, इस बात से वह पूरी तरह से वाकिफ था और मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार भी था। बच्चों के लिए खाने की व्यवस्था, उनके कपड़े धोना , उनके लिए सारी सुविधाएँ जुटाना आसान  न था। सिर्फ कुछ ही दिनों में गिरीश को लगने लगा कि  वह ये सब नहीं कर  पायेगा। वह तो घर से आकर यहाँ पर पढ़ा कर चला  जाता था।  कभी घर में दाल नहीं और कभी आटा नहीं। फिर रसोई के तमाम झंझट , बच्चों को क्या खाना खिलाना है और क्या नहीं ये सब बातें कभी पुरुष भी जान सके हैं ? लेकिन वह जिस आग में कूदा  था उससे पीछे नहीं हटना था।
                 फिर एक दिन बड़ा बेटा समर बीमार पड़ा , उसको बहुत तेज बुखार था और वह बुखार के कारण बड़बड़ा  भी रहा था। वह बुखार में माँ माँ की रट लगाये था। अब गिरीश के हाथ पैर फूलने लगे कि अगर बच्चे की हालत और बिगड़ती है तो वह क्या करेगा? वह अकेला दोनों बच्चों को कैसे संभाल  सकता है? तीन दिन तक उसके बुखार रहने के बाद वह ठीक हो पाया लेकिन इस बीच गिरीश जिस अग्निपरीक्षा से गुजरा था उसने उसे अन्दर तक हिला दिया था।
              उसने रविवार की छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर गाँव जाने की सोची , बच्चे अपने घर वालों से मिल भी आयेंगे और वह उनके बाबा से माँ  को साथ भेजने के लिए बात भी करेगा. उसे इस बात का पूरा पूरा अहसास हो चुका था कि बगैर माँ के बच्चों को रखना आसान नहीं था। एक माँ तो अपने बच्चों को बाप के बिना पाल सकती है लेकिन एक बाप बिना माँ के बच्चों  को नहीं पाल .सकता। घर में गृहणी का रहना कितना जरूरी है इस बात को वह अच्छी तरह से जान चुका  था और इसी लिए वह शशिधर के पिता से बात करने के लिए तैयार हो चुका था।
 
                    घर पहुँच कर उसने शशिधर के पिता से बात की --


"बाबूजी बच्चों की खातिर उनके साथ उनकी माँ का रहना बहुत ही जरूरी है, अतः आप उनकी माँ को उनके साथ रहने की अनुमति दें। 10 और 8 साल के बच्चे इतने बड़े नहीं होते कि वे अपनी माँ के बिना रह सकें।"


"लेकिन ये तो मुश्किल है , घर में क्या होगा? शशि की माय  भी अकेली रह जायेगी।"


  "बाबूजी बच्चों के खाने पीने की व्यवस्था करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है।"


"बेटा तुमने कहा कि  बच्चों को भेज दें, मैंने वैसे ही किया लेकिन बहू को भेजना मुश्किल है।"


"बाबूजी बच्चों के भविष्य आपको कुछ तो सोचना ही पड़ेगा।"



"अच्छा बेटा तुम थोड़े दिन रुक जाओ मैं इस बारे में घर में बात करता हूँ ।
                      
                गाँव का मामला था , वहाँ इतना आसन नहीं होता कि कोई विधवा स्त्री अकेले कस्बे में रहने चली जाए वह भी एक गैर मर्द के कहने पर। शशिधर के पिता इस बात को महसूस कर रहे थे कि  इस समय हालत ऐसे ही हैं कि  सावित्री को बच्चों के भविष्य के लिए बाहर निकलना ही पड़ेगा। इस बात को घर में उठाया गया कि छोटे अपनी पत्नी को गौना करा कर ले आये ताकि सावित्री बच्चों के साथ जा सके। जब ये बात देवर को पता चली तो वह आग बबूला हो गया और उसने गाँव के सरपंच को बुलाने की सोची और वह इस बात के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। जिस दिन गिरीश आया छोटे पहले से ही सरपंच को बुला लाया था कि पराया मर्द उसके भाई के बच्चों को लेकर चला जायेगा फिर हम कुछ न कर पायेगे। सावित्री भी अगर एक बार घर से बाहर निकली तो फिर घर लौट कर उसको रहना मुश्किल हो जायेगा। कस्बे की जिन्दगी सबको लुभाती है और जब पैसा उसके हाथ में होगा तो फिर वह किसी को क्यों घास डालेगी?
               
सरपंच काफी बुजुर्ग अनुभवी और सुलझे हुए व्यक्ति थे। उन्होंने गिरीश से बात की --

"तुम बहू को शहर ले जाओगे तो लोग क्या कहेंगे?"

"कुछ भी कहें, वह अपने बच्चों के साथ रहेंगी, नहीं तो बच्चों का वहाँ पढ़ पाना मुश्किल हो जायेगा। वहाँ  अभी बच्चों को रखने के लिए हॉस्टल भी नहीं है कि उनको वहाँ डाला जा सके।"

"वहाँ किसी आदमी की भी जरूरत होगी, एक गाँव की औरत कस्बे में सब कुछ कैसे कर पाएगी?"


"इस बारे में इनके भाइयों को बुला कर बात कर लीजिए , शायद वे कुछ व्यवस्था कर सकें।"


"इस बात को आप लोगों ने क्यों नहीं सोचा कि बच्चों और बहू के बारे में कुछ निर्णय लेने के पहले उसके मायके वालों की राय लेना भी तो उतना ही जरूरी है।" सरपंच  को गिरीश की बात जँच गयी। 

                                                                                                               (क्रमशः)