शनिवार, 21 जुलाई 2012

भवितव्यता (5) !



 पूर्वकथा :

सावित्री अपने मइके या ससुराल दोनों में दुलारी थी। घर में लक्ष्मी मानी  जाती। उसका पति समझदार और जिम्मेदार युवक था। छोटे भाई की संगती के बिगड़ने से चिंतित रहता और उसके इस बात के लिए रोकने पर उसके साथ कुछ ऐसा बुरा हुआ कि  कई जिन्दगी इसमें पिसने लगी । शशिधर का दोस्त गिरीश ने अंतिम समय उसे वचन दिया की वह उसकी पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय नहीं होने देगा.  बच्चों को कसबे में  के लिए ले जाने के सवाल पर गिरीश और शशि के घर वालों के बीच कहा सुनी हो गयी और उसी बीच गिरीश ने कह दिया कि  शशि को  मारने वाले उसके देवर के साथ ही थे . इसा बात से शशि के माता पिता अब अपने पोतों के विषय में चिंतित हुए और उन्हें कसबे भेजने के लिए तैयार हो गए . गिरीश उन्हें ले गया और उन्हें रखा भी लेकिन इतने छोटे बच्चे हरी बीमारी में माँ को ही बुलाते और वह परेशां होकर बच्चों के लिए सावित्री को भेजने का प्रस्ताव लेकर आया . जिसके लिए पंचायत बुलाई गयी और उसके मायके वालों से भी सलाह लेने की बात  कही गयी.........





गतांक से आगे : 
               सावित्री के मायके वालों को इस विषय में कुछ भी पता नहीं था। वे आते जरूर और अपनी बहन का हालचाल  लेकर चले जाते। कभी सावित्री ने अपने घर वालों को इस विषय में कुछ भी नहीं बताया। उसे ये बात अच्छी तरह से पता था कि अगर उसने अपने घर वालों से कोई भी शिकायत की तो उसके भाई उसको यहाँ पर नहीं रहने देंगे।  इस बात को जानकार तो बिलकुल भी नहीं कि उसके देवर ही शशि की मौत के जिम्मेदार हैं,  लेकिन वह अपने तीन बच्चों के साथ मायके में जाकर रहना नहीं चाहती थी क्योंकि उसको ये पता है कि उसके भाई तो उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहेंगे लेकिन उनके जाने के बाद बड़ी भाभी के तानों को कौन सुन  पायेगा?  उनके साथ रहने सेअच्छा  है कि अपने घर में रहा जाय। वह समझदार और गंभीर दोनों ही थी। उसने ये भी सोचा कि अगर यहाँ से चली गयी तो फिर इस घर से अपने सारे अधिकार भी खो देगी   . सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसके कारण  उसके सास ससुर को भी पता नहीं क्या क्या सहना पड़े? किस तरह से वह उनको रखे? नहीं वह अपने परिवार के साथ ही रहेगी। 
                  सावित्री के भाइयों को बुलावा भेज दिया गया और वे भी बिना किसी देर के दूसरे दिन ही वहा आ पहुँचे। शशिधर के  पिता ने उन लोगों से और अधिक छुपाना उचित नहीं समझा  क्योंकि एक तो पड़ोस के गाँव की बात है और दूसरे आज नहीं तो कल ये सब बातें उनको पता चल ही जायेंगी। लेकिन अगर ये बातें कोई और उन्हें बताये तो इससे बेहतर है कि वह खुद ही बता कर समाधान खोज लें। सावित्री और बच्चों के बारे में जितना वे सोचते हैं उससे अधिक उसके मायके वाले भी सोचते होंगे लेकिन बेटी या बहन की ससुराल के मामले में बिना सलाह लिए बोलना उनको ठीक नहीं लगता होगा।  अगर अब ये सारी  बातें उन्हें खुद न बतायीं गयी तो कल को उन पर शशि और उसके परिवार के प्रति पक्षपाती होने का आरोप भी लग सकता है। 
                 सावित्री के भाइयों ने आकर यही सलाह दी कि सावित्री को कस्बे  भेजने से पहले गिरधर का गौना करा लिया जाय ताकि माय को कोई भी परेशानी न हो और उसके बाद सावित्री बच्चों के साथ चली जाय। गल्ला पानी घर से भेजा जाएगा और शशि  की पेंशन से बाकी खर्च पूरे हो जायेंगे। संरक्षण के लिए सावित्री के भाई, ससुर और देवर वहाँ जाकर उसकी परेशानियों का ध्यान रखेंगे छुट्टियों में बच्चे गाँव में आकर रहेंगे। ताकि बाबा दादी को अपने पोतों से मिलने का और साथ रहने का मौका मिलता रहे। 
                   आखिर वह दिन भी आ गया कि  सावित्री अपना जरूरी सामान लेकर बच्चों के साथ जाने की तैयारी करने लगी। चलने से पहले सास उसे गले लगा कर खूब रोई और समझाया कि कोई भी परेशानी हो तो वह घर खबर भेज दे, उसके पास हम तुरंत पहुँच जायेंगे। कस्बे में संभाल कर रहने की हिदायत भी दी गयी। वह गाँव की रहने वाली थी और गाँव में ही रही। उसको दुनियांदारी की समझ अधिक न थी। लेकिन वक़्त इंसान को सब कुछ सिखा देता  है। 
                 गिरीश ने मकान की व्यवस्था पहले से ही कर रखी थी सो कोई परेशानी नहीं हुई।  लेकिन गिरीश घर नहीं आता था वह बच्चों से सारा हाल ले लेता था और कोई समस्या होने पर उन्हें उसके बारे में सुझाव दे देता था। उसका अपना पहले की तरह से रूटीन शुरू हो गया। वह सिर्फ स्कूल पढ़ाने  के लिए आता था और अपने गाँव वापस हो जाता।  वह अपने वचन के मुताबिक हर चीज पर नजर रखता था।
                एक दिन दोनों बच्चे स्कूल नहीं गए  , इस बात को गिरीश ने  ध्यान में रखा  और  दो अगले दिनों में भी उसे बच्चे नहीं दिखलाई दिए तो उसका माथा ठनका।  वह छुट्टी के बाद सीधे बच्चों के हालचाल लेने के लिये उनके घर गया कि कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गयी। उन लोगों का वहाँ पर कोई नहीं था। किसी से उनकी कोई जान पहचान भी नहीं थी कि मुसीबत के समय वह किसी से सहायता माँग लेती .
                 जाकर उसने  जैसे  ही दरवाजा  खटखटाया अन्दर डर  के मारे सब दुबक गए और बड़ी देर तक उन लोगों ने कोई उत्तर नहीं  दिया और न ही दरवाजा खोला।  तब गिरीश को जरूर कुछ शक हुआ कि ऐसी क्या बात है कि कोई दरवाजा ही नहीं खोल रहा है। तब उसने बाहर  से कहा कि  मैं गिरीश हूँ और बच्चों की खैरियत जानने आया हूँ। तब सावित्री ने दरवाजा खोला। चेहरे से वह सहमी सहमी लग रही थी। गिरीश का उससे अधिक वास्ता तो पड़ा नहीं था तो बोलने और बात करने में भी वह झिझक रहा था। सामने गिरीश को देख कर दोनों बच्चे उससे आकर लिपट गए और रोने लगे - "चाचा हमें अपने साथ ले चलो , हम अकेले नहीं रहेंगे नहीं तो चाचा माँ  को मार  डालेंगे।"
 
                  गिरीश को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है? वह तो समझ रहा था कि  बच्चे माँ के साथ अच्छी तरह से होंगे।  वह वही जमीन पर बैठ गया और बच्चों को चुप कराया फिर उनसे पूछा कि क्या बात है? सावित्री उसके सामने नहीं आई वह पीठ करके एक कोने में खड़ी  रही। 
 
                गिरीश बच्चों के मुँह से नहीं बल्कि सावित्री के मुँह से सुनना चाह  रहा था कि बात क्या हो गयी? 

              "देखिये आप इस तरह से अकेली रहेंगी और फिर बात भी नहीं करेंगी तो फिर मैं आपकी सहायता कैसे कर पाऊंगा ? आपको यहाँ पर्दा करके काम नहीं चलेगा , कल को आपको बाहर  निकलना है और बच्चों केलिए सारे काम करने होंगे तो काम कैसे करेंगी?"   गिरीश ने सावित्री से कहा।

            "ये तो सही है लेकिन हम कभी इस तरह से रहे नहीं है तो हमारी हिम्मत नहीं पड़ती है।"

           "ये मैं मानता  हूँ लेकिन अब घर से बाहर निकल कर तो सब करना ही पड़ेगा। सब को बोलना और बताना भी पड़ेगा। बच्चों के स्कूल जाना पड़ेगा तब क्या करेंगी?"

"वह तो है? बात ये है कि  बच्चे बहुत डर  गए हैं ,  परसों इनके चाचा राशन डालने के लिए आये थे और वापस जाने के लिए उनने हमसे पैसे माँगे तो हमने कह दिया कि हमारे पास नहीं है। इस पर वह बिगड़ गए  और गाली - गलौज करने लगे। बच्चे उसी से डर  गए।"

"फिर वह चले गए या फिर आयेंगे?"

' हाँ कह कर गए हैं कि जल्दी ही आयेंगे और पैसे लेकर ही जायेंगे । उन्हें पेंशन से पैसे चाहिए। घर के ऊपरी खर्च के लिए पैसा कहाँ से आएगा?'

"बच्चे स्कूल क्यों नहीं जा रहे हैं"

"उसी दिन से डर गए और नहीं जा रहे हैं।"

"तुम लोगों को स्कूल आना है, यहाँ पर तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। हम हैं न, कल से स्कूल जरूर आना। पढाई का हर्ज होता है और फिर तुम लोग पीछे रह जाओगे तब कौन पूरा कराएगा?"

"अच्छा अब कल से ये लोग स्कूल आयेंगे।" सावित्री ने कहा।

"और हाँ अगर घर में कोई बात हो तो इनसे कहला दिया करो मैं देख लूँगा। मैं रोज घर चला जाता हूँ इसलिए आ नहीं सकता। आगे से इस बात का ध्यान रखना।"  ये कह कर गिरीश चला गया।
 

                                                                                                                                          (क्रमशः)
 

सोमवार, 2 जुलाई 2012

भवितव्यता (४)

पूर्व कथा :

                        सावित्री अपने मइके या ससुराल दोनों में दुलारी थी। घर में लक्ष्मी मानी  जाती। उसका पति समझदार और जिम्मेदार युवक था। छोटे भाई की संगती के बिगड़ने से चिंतित रहता और उसके इसा बात के लिए रोकने पर उसके साथ कुछ ऐसा बुरा हुआ की कई जिन्दगी इसमें पिसने ला। शशिधर का दोस्त गिरीश ने अंतिम समय उसे वचन दिया की वह उसकी पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय नहीं होने देगा और इसके लिए उसने स्कूल में पूरी भूमिका बना दी। चाचा बच्चों को  करने लगा और साथ ही सावित्री को भी। बच्चों को कसबे में  के लिए ले जाने के सवाल पर गिरीश और शशि के घर वालों के बीच कहा सुनी हो गयी और उसी बीच गिरीश ने कह दिया की शशि को  मारने वाले उसके देवर के साथ ही थे ...........


गतांक से आगे :

                            गिरीश की बात सुनकर उसके ससुर और सावित्री अवाक् रह गए। लेकिन उनके मुंह से कोई बात निकल ही नहीं सकती थी। उन दोनों के मन में क्या चल रहा था इसको कोई और नहीं जान सकता था। इस बात को सुनकर उसका देवर भी सन्न रह गया लेकिन गिरीश को हर बात कहाँ तक पता है? इस बारे में उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा क्योंकि अब आगे से उसे गिरीश से पंगा नहीं लेना है ये तो पक्का है लेकिन फिर क्या इसके लिए वह सावित्री और बच्चों को घर से जाने देगा फिर तो भैया का सारा पैसा यही लोग हड़प कर जायेंगे और खेती में हिस्सा तो बना ही रहेगा। उसके हिस्से में क्या आने वाला है? वह ऐसा होने ही नहीं देगा? इसके लिए उसे चाहे गिरीश को भी धमकाना क्यों न पड़े ? मेरे पास तो मेरे सारे साथी हैं और गिरीश अकेला है डर ही जाएगा। 


                     *****                        ****                          *****              


          आखिर गिरीश ने घर जाकर ये निर्णय लिया कि वह इस बार बच्चों का नाम कस्बे में ही लिखायेगा। छोटा अभी छोटा है इसलिए वह बाकी दोनों बच्चों नाम ही लिखायेगा। यद्यपि उसको ये विश्वास ही नहीं कि शशि का छोटा भाई इस बात के लिए  राजी होगा और बच्चों को कस्बे  में पढ़ने देगा। कहीं ऐसा न हो कि वह  मेरे साथ साथ इन बच्चों का  भी दुश्मन न बन बैठे, सावित्री क्या करेगी?
               
        शशिधर के पिता की भी जान सांसत में पड़ गयी कि ये नालायक बेटा कहीं उसकी पूरी जमीन- जायदाद कुसंगत में पड़ कर जुए और शराब की भेंट न चढ़ा दे। इन बच्चों को कहीं सड़क पर लाकर  खड़ा न कर दे,  फिर वे क्या करेंगे? जो अपने देवतुल्य भाई को मरवा सकता है ,वह कुछ भी कर सकता है। वे भी बच्चों को बचाने  और  भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उन्हें अपने से  दूर  करने के लिए खुद को तैयार करने लगे और इसके लिए वे अपने  दिल पर पत्थर  रखने के लिए राजी थे। उन्हें इस बात पर शर्म आने लगी थी कि कहाँ एक बेटा कितना सज्जन और चरित्रवान और  दूसरा निकम्मा और  बिगडैल।  उन्होंने पत्नी से भी विचार इस बारे में  किया। एक माँ वैसे भी चोट खाए बैठी थी, उसकी  जितनी आत्मा आहत थी और कुछ वह नहीं सोचना  चाहती थी। अब वे दोनों ही बेटे को खोकर पोतों को खोने की कल्पना  से भी उनकी आत्मा काँप जाती थी। इसलिए उन लोगों ने गिरीश  के प्रस्ताव को स्वीकार  कर  का मन  बना लिया ।
                    स्कूल खुलने का समय धीरे धीरे पास आता जा रहा था , सावित्री को इस बारे में अभी नहीं बताया गया था। गिरीश ने भी सोच लिया था कि वह बच्चों का नाम बगैर उन्हें ले जाए पहले ही  एडमीशन करवा लेगा और एक दो  महीने के बाद  वह ले जाएगा। लेकिन उसको ये नहीं मालूम था कि बच्चों को यहाँ से ले जाना तो आसान होगा लेकिन उनकी परवरिश नहीं। गिरीश बच्चों को ले तो गया लेकिन उनके लिए एक कमरा लेकर रहना भी उसको वहीं पड़ेगा लेकिन मित्र की खातिर उसको कुछ न कुछ तो कष्ट उठाना ही पड़ेगा, इस बात से वह पूरी तरह से वाकिफ था और मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार भी था। बच्चों के लिए खाने की व्यवस्था, उनके कपड़े धोना , उनके लिए सारी सुविधाएँ जुटाना आसान  न था। सिर्फ कुछ ही दिनों में गिरीश को लगने लगा कि  वह ये सब नहीं कर  पायेगा। वह तो घर से आकर यहाँ पर पढ़ा कर चला  जाता था।  कभी घर में दाल नहीं और कभी आटा नहीं। फिर रसोई के तमाम झंझट , बच्चों को क्या खाना खिलाना है और क्या नहीं ये सब बातें कभी पुरुष भी जान सके हैं ? लेकिन वह जिस आग में कूदा  था उससे पीछे नहीं हटना था।
                 फिर एक दिन बड़ा बेटा समर बीमार पड़ा , उसको बहुत तेज बुखार था और वह बुखार के कारण बड़बड़ा  भी रहा था। वह बुखार में माँ माँ की रट लगाये था। अब गिरीश के हाथ पैर फूलने लगे कि अगर बच्चे की हालत और बिगड़ती है तो वह क्या करेगा? वह अकेला दोनों बच्चों को कैसे संभाल  सकता है? तीन दिन तक उसके बुखार रहने के बाद वह ठीक हो पाया लेकिन इस बीच गिरीश जिस अग्निपरीक्षा से गुजरा था उसने उसे अन्दर तक हिला दिया था।
              उसने रविवार की छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर गाँव जाने की सोची , बच्चे अपने घर वालों से मिल भी आयेंगे और वह उनके बाबा से माँ  को साथ भेजने के लिए बात भी करेगा. उसे इस बात का पूरा पूरा अहसास हो चुका था कि बगैर माँ के बच्चों को रखना आसान नहीं था। एक माँ तो अपने बच्चों को बाप के बिना पाल सकती है लेकिन एक बाप बिना माँ के बच्चों  को नहीं पाल .सकता। घर में गृहणी का रहना कितना जरूरी है इस बात को वह अच्छी तरह से जान चुका  था और इसी लिए वह शशिधर के पिता से बात करने के लिए तैयार हो चुका था।
 
                    घर पहुँच कर उसने शशिधर के पिता से बात की --


"बाबूजी बच्चों की खातिर उनके साथ उनकी माँ का रहना बहुत ही जरूरी है, अतः आप उनकी माँ को उनके साथ रहने की अनुमति दें। 10 और 8 साल के बच्चे इतने बड़े नहीं होते कि वे अपनी माँ के बिना रह सकें।"


"लेकिन ये तो मुश्किल है , घर में क्या होगा? शशि की माय  भी अकेली रह जायेगी।"


  "बाबूजी बच्चों के खाने पीने की व्यवस्था करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है।"


"बेटा तुमने कहा कि  बच्चों को भेज दें, मैंने वैसे ही किया लेकिन बहू को भेजना मुश्किल है।"


"बाबूजी बच्चों के भविष्य आपको कुछ तो सोचना ही पड़ेगा।"



"अच्छा बेटा तुम थोड़े दिन रुक जाओ मैं इस बारे में घर में बात करता हूँ ।
                      
                गाँव का मामला था , वहाँ इतना आसन नहीं होता कि कोई विधवा स्त्री अकेले कस्बे में रहने चली जाए वह भी एक गैर मर्द के कहने पर। शशिधर के पिता इस बात को महसूस कर रहे थे कि  इस समय हालत ऐसे ही हैं कि  सावित्री को बच्चों के भविष्य के लिए बाहर निकलना ही पड़ेगा। इस बात को घर में उठाया गया कि छोटे अपनी पत्नी को गौना करा कर ले आये ताकि सावित्री बच्चों के साथ जा सके। जब ये बात देवर को पता चली तो वह आग बबूला हो गया और उसने गाँव के सरपंच को बुलाने की सोची और वह इस बात के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। जिस दिन गिरीश आया छोटे पहले से ही सरपंच को बुला लाया था कि पराया मर्द उसके भाई के बच्चों को लेकर चला जायेगा फिर हम कुछ न कर पायेगे। सावित्री भी अगर एक बार घर से बाहर निकली तो फिर घर लौट कर उसको रहना मुश्किल हो जायेगा। कस्बे की जिन्दगी सबको लुभाती है और जब पैसा उसके हाथ में होगा तो फिर वह किसी को क्यों घास डालेगी?
               
सरपंच काफी बुजुर्ग अनुभवी और सुलझे हुए व्यक्ति थे। उन्होंने गिरीश से बात की --

"तुम बहू को शहर ले जाओगे तो लोग क्या कहेंगे?"

"कुछ भी कहें, वह अपने बच्चों के साथ रहेंगी, नहीं तो बच्चों का वहाँ पढ़ पाना मुश्किल हो जायेगा। वहाँ  अभी बच्चों को रखने के लिए हॉस्टल भी नहीं है कि उनको वहाँ डाला जा सके।"

"वहाँ किसी आदमी की भी जरूरत होगी, एक गाँव की औरत कस्बे में सब कुछ कैसे कर पाएगी?"


"इस बारे में इनके भाइयों को बुला कर बात कर लीजिए , शायद वे कुछ व्यवस्था कर सकें।"


"इस बात को आप लोगों ने क्यों नहीं सोचा कि बच्चों और बहू के बारे में कुछ निर्णय लेने के पहले उसके मायके वालों की राय लेना भी तो उतना ही जरूरी है।" सरपंच  को गिरीश की बात जँच गयी। 

                                                                                                               (क्रमशः)


मंगलवार, 19 जून 2012

भवितव्यता (3)

पूर्व कथा :
                  सावित्री अपने मइके या ससुराल दोनों में दुलारी थी। घर में लक्ष्मी मानी  जाती। उसका पति समझदार और जिम्मेदार युवक था। छोटे भाई की संगती के बिगड़ने से चिंतित रहता और उसके इसा बात के लिए रोकने पर उसके साथ कुछ ऐसा बुरा हुआ की कई जिन्दगी इसमें पिसने ला। शशिधर का दोस्त गिरीश ने अंतिम समय उसे वचन दिया की वह उसकी पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय नहीं होने देगा और इसके लिए उसने स्कूल में पूरी भूमिका बना दी।..........


गतांक से आगे :


                                      गिरीश को अपना शशिधर को दिया गया वचन पूरी तरह याद था और वह उसके लिए प्रतिबद्ध था। स्कूल की तरफ से सावित्री को बुलाया गया ताकि शशिधर के पैसे और उसकी पेंशन के बारे में काम शुरू किया जा सके। सावित्री को लेकर उसका देवर आया और साथ में स्टाम्प  पेपर लेकर गया था कि सावित्री से सबके सामने लिखवा लेगा कि आगे सभी काम के लिए उसको वह 'पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी ' देती है।  
       
              वह पढ़ी लिखी कम थी लेकिन चतुर तो थी ही। उसने इस विषय में स्कूल के क्लर्क से कह कर गिरीश को बुलवाने के लिए कहा। गिरीश ने ये निर्देश पहले ही दे रखा था कि जब भी शशिधर के काम के लिए कोई आये उसको बुला लिया जाए। सावित्री के कहने पर उसके देवर ने उसको डाँट दिया। शशिधर के स्वभाव से सभी परिचित थे और गिरीश के निर्देश के अनुसार क्लर्क ने गिरीश को बुला लिया। जब गिरीश ने वह पेपर देखा तो सावित्री से उस पर  हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और यही से शुरू हो गयी घर में महाभारत। देवर ने उसको कहीं भी ले जाने से मना  कर दिया। ससुर उसको कहाँ ले जाय? साथ ही अपनी बहू को किसी और के साथ कैसे भेज सकते थे?
                            
                स्कूल से कागजों  पर हस्ताक्षर करने के लिए फिर से उसको बुलवाया गया लेकिन सावित्री नहीं पहुंची तो गिरीश का माथा ठनका कि जरूर घर में कोई साजिश चल रही होगी। वह दूसरे गाँव का था और शशिधर के साथ सिर्फ पढ़ाता ही तो था, उसको कोई अधिकार नहीं बनता था कि वह किसी के परिवार के बारे में बीच में बोले लेकिन शशिधर को दिया अपना वचन जरूर उसको बार बार बाध्य कर रहा था कि वह उससे बंधा हुआ है। उसने सारे कागज स्कूल से लेकर सावित्री के घर जाकर उस पर हस्ताक्षर करवा लिए और लाकर स्कूल में जमा भी कर दिया ताकि आगे की कार्यवाही शुरू हो सके।


                         गिरीश को समझ आने लगा कि  सावित्री को कुछ आगे पढ़ना  लिखना चाहिए , नहीं तो आगे बच्चों की पढाई और रुपये पैसे के मामले में बहुत कुछ खोना पड़ सकता है। उसके चालाक  देवर उसका पैसा हड़प सकते हैं और इससे तो बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। लेकिन सावित्री कैसे कर सकती है? उसके देवर के विवाह को दो साल हुए हैं, उसका गौना भी अभी नहीं हुआ है, घर में क्या कैसे होगा? ये सारी  बाते गिरीश के दिमाग में चलती रहती थी लेकिन फिर भी वह ये नहीं समझ पा  रहा था  कि  वह क्यों इतना परेशां रहता है? उस परिवार और उसके बच्चों से लगता था कि  उसका कोई रिश्ता जरूर रहा होगा नहीं तो शशिधर के बच्चों की उसको इतनी फिक्र क्यों लगी रहती है?
                       गिरीश उसके घर जाने में संकोच करता था क्योंकि न तो वह सावित्री से मिला जुला था और न ही बच्चों को अधिक जानता था। लेकिन शशिधर की बातों से ही वह सब कुछ  था और लगता था कि  वह अच्छी तरह से सबसे परिचित है। एक दिन वह हिम्मत करके शशिधर के घर गया और उसके पिता से मिलकर उसने उन्हें सलाह दी कि शशि के बच्चों को पढाई के लिए कस्बे में रहना पड़ेगा क्योंकि गाँव में ऐसे कोई स्कूल भी नहीं है और इसके लिए सावित्री को भी वहाँ रहना पड़ेगा। ससुर तो राजी हो गए लेकिन देवर ने सिरे से मना कर दिया -- "बच्चे यहीं गाँव में पढेंगे , ये वहां जाकर क्या करेगी ? पढ़ी लिखी है नहीं - कौन इसके साथ रहेगा?"
 
"नहीं शशि के बच्चे कस्बे में ही पढेंगे चाहे फिर मैं उन्हें अपने पास ही रखकर क्यों न पढ़ाऊं?" गिरीश में दृढ स्वर में कहा। 
 
              "हमारे घर के बच्चे तेरे साथ क्यों रहेंगे? क्या हम सब घर वाले मर गए हैं ? हमें भी उनकी चिंता है। तू बड़ा शुभचिंतक न बन।" जैसे शशिधर ने बताया था, ठीक उसी स्वर में वह बात करने लगा था।
    
             "नहीं तुम तो बिल्कुल नहीं, तुम अपनी चिंता ही कर लो वही बहुत है।" गिरीश को गुस्सा आ गया था।
"किस हक से रखोगे बच्चों को? कल को कहोगे कि उसकी घरवाली को भी वही रख लोगे। तुम्हारा तो ब्याह  हुआ नहीं है, सो बनी रहेगी तुम्हारे लिए।" देवर अपनी हद पार करने लगा था।
               
            गिरीश खून के घूँट पीकर रह गया और वापस आ गया। कई दिन तक उसने कोई खबर नहीं ली, उसने सोचा कि दूसरे के घर के मामले में बोलने का परिणाम यही होना था। अब जो शशि के पत्नी और बच्चों के भाग्य में बदा  होगा वह तो होकर ही रहेगा। वह बेकार अपने सिर झूठी बदनामी का कलंक क्यों ले? 
              गिरीश कई दिन तक अपने कामों में इतना व्यस्त रहा कि उसको कुछ भी सोचने की फुरसत नहीं मिली और कई दिनों तक स्कूल ही नहीं गया। वह जब 4 दिन के  बाद स्कूल से गाँव के लिए जा रहा था तो शशिधर का बड़ा  बेटा उसे रास्ते में खड़ा मिला।  गिरीश को देख कर वह रोने लगा - "चाचा आप अपने साथ ले चलिए। "
  
 "लेकिन क्यों? हुआ क्या है?"
 
"हम यहाँ   नहीं रहेंगे छोटे चाचा हमें बहुत  मारते और अम्मा को गाली देते हैं।"
 
"ठीक है हम कल आयेंगे।"
 
              गिरीश जानबूझ कर वहाँ  नहीं गया क्योंकि वह हालत को अच्छे से समझना चाहता था। तभी सावित्री के नाम का चेक आ गया और उस चेक को लेकर जाने का उसको बहाना मिल गया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके जाने पर सवाल उठे और कोई कहे कि उसको यहाँ आने की जरूरत क्या है? चेक उसने सावित्री के नाम ही बनवाया था। उसे इस बात का पूरा ज्ञान था कि  सावित्री का कोई भी बैंक खाता  नहीं है और शशि के साथ उसका नाम भी नहीं पड़ा है। उसने चेक सावित्री को देने के लिए उसके ससुर से कहा और बताया कि इसको जमा करने के लिए सावित्री का बैंक में खाता  खुलवाना पड़ेगा .उसके ससुर या देवर  सावित्री का कोई भी खाता  नहीं खुलवाना चाहते थे क्योंकि पैसा अगर उसके नाम पर जमा होगा तो इसके लिए हर बार उसकी जरूरत पड़ेगी और कितना पैसा निकला गया इस बात से वह वाकिफ रहेगी। वह चेक देकर चला आया। उसने उसके घर वालों की गतिविधि जानने की कोशिश नहीं की और सोचा कि अगर जरूरत होती तो सावित्री जरूर उसको बुलावा लेगी । फिर एक दिन सावित्री ने बेटे को भेज कर उसको आने के लिए कहलाया। 
 
                   उसके घर पहुँचने पर घर में बवाल मच गया कि उसको क्यों और किससे बुलवाया गया? 
 
"हमें बैंक में खाता खुलवाना है, पैसे कैसे मिलेंगे?' सावित्री ने पहली बार आकर अपना मुंह खोला था। 
 
"क्या लगता है ये तेरा? जो बैंक में खाता खुलवाएगा।"
 
"पैसा कैसे मिलेगा?"
 
"यही पोस्ट ऑफिस में खुलवा देंगे।"
 
"नहीं कसबे में कल बच्चे बढ़ेंगे तो यहाँ से पैसा नहीं निकालने आयेंगे। वहां पर होगा तो वही से वही ले लेंगे।" गिरीश को बीच में बोलना पड़ा। 
 
"तू कौन है बोलने वाला?" देवर के तेवर तीखे दिख रहे थे। 
 
"मैं शशि का दोस्त हूँ और मैंने उसको अंतिम समय वचन दिया था कि उसके बच्चों के भविष्य के लिए जो बन पड़ेगा करूँगा और उन्हें पढाऊँगा।  उनका भविष्य बरबाद नहीं होने दूँगा।"
 
"इसका मतलब है कि  तुम इन बच्चों को कसबे ले जाओगे।"
 
"हाँ, अगर ये करना पड़ा तो ये भी करूंगा , लेकिन इन्हें तुम्हारी संगत  में बर्बाद नहीं होने दूंगा।"
 
"अगर इन्हें मैं  न भेजूं तो?"
 
"ये जायेंगे और मैं ले जाऊँगा।"
 
"इनका खर्च कौन उठाएगा?" 
 
"इनके बाप का इतना पैसा मिलेगा कि ये किसी के मुंहताज नहीं होंगे . मेरी भी नहीं और तुम्हारे भी नहीं।"
 
"उस पैसे पर माय बाबू का अधिकार होगा - इनका नहीं।' देवर कुछ अधिक ही बोल रहाथा .
'सारे  क़ानून तुम्हारी जेब में नहीं पड़े हैं, जैसे चाहोगे वैसे ही होगा।"
 
"हम देख लेंगे तुम्हें , क्या कर लोगे तुम?"
 
"ये धमकी तुम किसी और को देना , नहीं तो अन्दर  करवा दूंगा। उस दिन शशि को मारने में किसका हाथ था? ये तुम्हारे साथियों को मैंने पहचान लिया है।"  गिरीश इस बात को बोलना नहीं चाह  रहा था,  लेकिन उसके देवर की जो बात करने अंदाज और धमकाने वाली बात सुनी तो अपने को काबू नहीं कर पाया ।
                                                                                                                             (क्रमशः)

मंगलवार, 12 जून 2012

भवितव्यता (२)

पूर्वकथा : नीतू की बुआ सावित्री बचपन में ही शादी कर दी सात भाइयों की इकलौती बहन और ससुराल में भी लक्ष्मी मानी जाती थी पति शशिधर समझदार युवक मिला एक एक करके बेटों की माँ बनी लेकिन शायद की नजर लग गयी और उसके वारा हो गए और वही की बर्बादी का कारण बनने लगे साथ सावित्री के भाग्य पर ग्रहण बन गए


गतांक   से आगे:


                                  इस तरह से तनाव में ही कुछ दिन बीते और फिर सब कुछ सामान्य होते हुए दिखाई देने लगा लेकिन किसी को क्या पता था कि ये तूफान से पहले की शाँति है सर्दियों के दिन गए शाम जल्दी ढलने लगी थी और शशिधर को स्कूल से आते आते अँधेरा होने लगता लेकिन अपने मित्र के साथ होने के कारण कोई परेशानी होती उसका मित्र घर के दरवाजे पर आकर  उतार देता और फिर अपने घर चला जाता जल्दी शाम होने के कारण लोग शाम से ही जल्दी घरों में दुबक जाते  
                 एक शाम वह दोनों घर लौट रहे थे कि रास्ते में कटे पेड़ का तना पड़ा था, जिसे हटाने के लिए शशिधर ही उतरा।  सी बीच कुछ लोगों ने शशिधर के सिर पर किसी चीज से वार किया और वह चीख कर वहीं गिर पड़ा उसके सिर  से खून की धार फूट निकली, उसको गिरता देख उसको मारने वाले भाग चुके थे गिरीश ने मोटरसाइकिल वहीं पटकी और शशिधर के पास पहुंचा खून देख कर वह भी घबरा गया, जो रुकने का नाम नहीं ले रहा था उसको कुछ भी नहीं सूझा उसने अपना मफलर उतार कर उसके सिर पर बाँध दिया और मोटरसाइकिल ले कर गाँव की तरफ भागा कि शायद कोई मिल जाए और उसको वहाँ से अस्पताल ले जाया जा सके  
         
                शशिधर बहुत अच्छा लड़का था गाँव में खबर लगते ही लोग टैक्टर लेकर भागे और शशिधर को उसमें लिटाकर उसे कस्बे के अस्पताल ले आये चोट बहुत गहरी थी, अतः डॉक्टर ने उसको इंजेक्शन दे कर सुला दिया गाँव कोई वापस गया और उसके पिता रात में नहीं आ सके थे इसलिए वे उसकी पत्नी को लेकर सुबह ही सके बूढ़े कँधे और झुक गए क्योंकि उसके बूढ़े पैरों की ताकत तो लहूलुहान पडी थी पिता का निस्तेज चेहरा किसी पारिवारिक संकट की आशंका से भयभीत दिखाई दे रहा था। वह बहू की आँँखों में जो शून्यता देख रहे थे, उसकी चिंता भी उनको खाए जा रही थी।

                          शशिधर की हालात में सुधार बहुत धीरे धीरे हो रहा था और उसको किसी अनहोनी की आहट मिल चुकी थी गिरीश उसको छोड़ कर अपने घर गया था साए की तरह से उसके साथ में था शशिधर को जो आभास हो रहा था वह किसी से नहीं कह सकता था क्योंकि उसके तीन छोटे छोटे बच्चे और भोली भाली पत्नी जिसने पति और सास ससुर की सेवा के सिवा कुछ जाना ही नहीं था आखिर शशिधर को गिरीश के अतिरिक्त कोई दिखाई भी तो नहीं दे रहा था उसने गिरीश का हाथ पकड़ कर वचन लिया - "दोस्त अगर मैं नहीं बचता तो तू सावित्री के साथ अन्याय मत होने देना मेरा पैसा और पेंशन उसके नाम करवा देना बच्चे अभी बहुत छोटे हैं पिताजी की  उम्र हो चली है और छोटे के हाल तुमसे छिपे नहीं हैं ."

"ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है, तू क्यों चिंता करता है?"  गिरीश ने उसको सांत्वना दी

"नहीं गिरीश तू मुझे वचन दे , तभी मैं चैन से मर सकूंगाशशिधर का गला भर आया था और गिरीश तो कुछ समझ भी नहीं रहा था कि वह इस समय उसको क्या वचन दे?

"दोस्त मैं तुझे वचन देता हूँ, लेकिन तू फिक्र क्यों करता है? तू बिल्कुल ठीक हो जायेगा" गिरीश ने कांपते हुए स्वर में उसके हाथ को पकड़ वचन दिया।

                             शशिधर ने एक हफ्ते तक जिन्दगी और मौत के बीच संघर्ष किया , कभी लगता कि  वह ठीक हो जाएगा और कभी लगता कि आज की रात भारी  है। वह मनहूस  दिन भी आ गया , शशिधर अपनी दोस्ती का नाता तोड़ कर गिरीश को एक धर्मसंकट में छोड़ कर  चला गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा?  उसने अपने दोस्त को जो वचन दिया है, उसको तो वह हर हाल में निभाएगा भले ही  इसके लिए उसे घर परिवार और समाज से टक्कर ही क्यों न लेनी पड़े?  उसको इस बात की पूरी संभावना थी कि अब शशि के परिवार वाले उसकी पत्नी और बच्चों को एक तरफ करके खुद ही उसके पैसे पर काबिज होना चाहेंगे। इस बात के लिए  गिरीश पहले से ही तैयार था 

                            शशिधर के पार्थिव शरीर को लेकर वह ही घर भी पहुँचा। पूरे गाँव में इस बात की खबर पहले ही हो चुकी थी। इसलिए उसके दरवाजे पर काफी लोग जमा थे। सावित्री के घर वालों को भी खबर लग चुकी थी और उसके भाई और पिता भी आकर बैठे हुए थे। अपने दोस्त के उस पार्थिव को उठा कर लाने  का साहस उसमें न था , शव वाहन जाने के लिए तैयार था , उसके घर वालों ने वाहन से शव  कर चबूतरे पर रखा। 
 
               पिता बेहोश  पड़े थे , घर की औरतें बाहर नहीं आ सकती थी तो वे सब ओसारे में बैठी रो रही थी। सावित्री कहाँ थी और किस हाल में थी? इस बात के लिए बाहर  का कोई भी नहीं बता सकता था।
                           शाम तक उसकी अंतिम क्रिया पूरी हुई तो गिरीश अपने घर पहुंचा।  वह तो अपने घर सिर्फ इतने दिन अपनी माँ के हालचाल लेने के लिए कभी कभी ही गया। शेष वह स्कूल में छुट्टी लगाये शशिधर के पास ही रहता था। शशि के भाइयों पर उसको अब बिलकुल भी भरोसा नहीं रह गया था। इसलिए उसने स्कूल में ऑफिस में और वहां के कर्मियों को ये निर्देश दे दिए थे कि शशिधर के पैसे के मामले में कोई भी बात उठे तो उसे जरूर बुला लिया जाए। पूरे स्कूल की सहानुभूति शशिधर के परिवार के साथ थी। 
  
                           इस तरह से हफ्तों बीत गए कहीं से भी शशि के परिवार का कोई समाचार गिरीश को नहीं मिल रहा था और अब उसका उसके घर जाने का कोई औचित्य भी नहीं था। उसकी दोस्ती सिर्फ शशिधर से थी और वह उसके घर तो कभी होली या दीवाली ही जाता था। बच्चों से वह परिचित था और सावित्री से गाँव के माहौल के नाते कभी मिलना हुआ ही नहीं था। वह सावित्री को नहीं पहचान सकता था। धीरे धीरे वह भी शशि के सदमे से बाहर आने की कोशिश कर रहा था और उसको लग रहा था की शशि के जाने के बाद घर में सब कुछ ठीक ही चल रहा होगा।


                                                                                        (क्रमशः )