अर्श से फर्श तक !
वनिता अपने कॉलेज से निकल कर जल्दी जल्दी बस पकड़ने के लिए चली जा रही थी कि पीछे से आवाज आयी - "वनिता, वनिता।"
उसने मुड़ कर देखा तो पीछे से नीलिमा आ रही थी और उसको देखकर वनिता एकदम आसमान से नीचे आ गिरी। एक साधारण सी साड़ी में लिपटी स्लीपर पहने हाथ में सब्जी का बैग लिये नीलिमा को देखा तो अपनी ही आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। कई वर्षों बाद वह दिखलाई दी।
"हाय वनिता तुम यहाँ कहाँ?" उसने उसी गर्मजोशी से उससे बात की जिससे कि आज से बीस साल पहले वह साथ में काम करते हुए करती थी।
"मैं यहीं पास वाली लेन में रहती हूँ, जरा सब्जी लेने के लिए आई थी। तुम यहाँ कहाँ? तुम्हारा कॉलेज तो तुम्हारे घर के आगे था न।" नीलिमा भूल भी कैसे सकती है, क्योंकि वनिता ने ही उसको अपने स्कूल में प्राइमरी सेक्शन में उसको जॉब दिलवाई थी। ऋतिक जोशी यही नाम था उसके पति का, वनिता के पति के मित्र थे क्योकि वे एक ही जॉब में थे।
"देख आज मेरे साथ मेरे घर चल, कितनी मुद्दत बाद हम मिले हैं ।" नीलिमा बच्चों की तरह से हठ करने लगी थी।
"फिर मिलते हैं न, अभी तो मैं अपनी ननद के घर जा रही हूँ, ये वहीं से मुझे लेने वाले हैं।"
"बिलकुल नहीं, ननद से तो खूब मिलती रहती होगी, मेरे साथ कुछ देर रह ले। फ़ोन कर देना, भाई साहब यही से आकर ले लेंगे।"
"अरे उनको तुम्हारा घर कहाँ पता होगा?"
"अच्छा मैं उनको रोड से ले लूँगी। "
नहीं मानी तो वनिता को मजबूरन उसके साथ जाना पड़ा क्योंकि समय के साथ न संवाद, न मिलने जुलने से कुछ तो दूरियाँ आ ही जाती हैं। वह समय भी भूला नहीं जा सकता है, जो उन लोगों ने साथ साथ बिताया था। पड़ोस के नाते और स्कूल में भी।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए वह दूसरी मंजिल पर पहुँच गयी। एक कमरा और उसी में सारा कुछ सिमटा देख कर वह आसमान से नीचे गिरी। उसको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि जब वो उससे दूर घर लेकर रहने लगी थी तो नीलिमा का परिवार उच्च वर्ग वाला था। पति भी काम करते थे और बाकी ठाट-बाट तो माताजी की पेंशन पर ही होता था। वह एक कर्नल की पत्नी थी और उनका जीवन पति के अनुरूप ही अनुशासित था। उस घर में जहाँ वह रहती थी - आलीशान बंगला था, खिड़की और दरवालों पर रेशमी और डिजायनर परदे, बढ़िया मेन्टेन ड्राइंगरूम, सबके अलग अलग बैडरूम। मॉडुलर किचन। लगता था कि किसी रईस का घर है। उस समय के घर की बराबरी तो वह खुद आज भी नहीं कर सकती है।
यहाँ पर सिर्फ एक कमरा, एक लोहे की मेज पर स्टोव रखा था, लोहे के बक्शों के ऊपर चादर डालकर बैठने के लिए बनाया हुआ था। एक लकड़ी का तख़्त जिस पर एक दरी बिछी हुई थी। एक लोहे की कुर्सी और स्टूल बस, इतना ही था उस कमरे में। वनिता को देख कर विश्वास नहीं हुआ लेकिन आज न सही आज से वर्षों पहले उसने ही समय बिताने के लिए नीलिमा को अपने स्कूल में प्ले ग्रुप के बच्चों के लिए चुना था। वह एक्टिव भी थी और जानकारी भी रखती थी। उसके बच्चे कान्वेंट में पढ़ते थे तो उसको वहाँ के तौर तरीके और पढाई के ढंग की पूरी जानकारी थी। बच्चों को अच्छा सिखा रही थी। स्कूल में मिलना कम ही हो पता था लेकिन स्कूल बस से वे दोनों घर साथ साथ ही आती थीं और रास्ते भर बातें करते हुए ही आती थीं।
"नीलिमा ये क्या है?" वनिता ने अचरज से उससे पूछा।
"वनिता ये मेरा भाग्य है।"
"भाग्य ये कैसा भाग्य? सब कुछ अच्छा बल्कि कितना अच्छा चल रहा था फिर इतने सालों में इस हाल में कैसे? भाई साहब और बच्चे कहाँ हैं?" वनिता सहसा विश्वास नहीं कर पा रही थी।
"बहुत लम्बी कहानी है वनिता, सुनोगी ?" नीलिमा ने गहरी साँस लेते हुए कहा।
"क्यों नहीं ?"
"तब सुनो।"
*** ***
तुम्हें तो शायद न पता हो लेकिन जब तुमने स्कूल छोड़ दिया और वहाँ से शिफ्ट हो गयी। इन्होंने स्कूल के मैनेजर के साथ मिलकर कोई बिज़नेस शुरू किया। इन्होंने उसमें न जाने क्या देखा कि अपनी जॉब छोड़ दी और उसी में लग गए। मैनेजर की अपनी नौकरी थी तो वह खुद कुछ नहीं कर सकता था, इसलिए उसने इनको पार्टनरशिप में रख लिया और काम सारा यही करते थे। ये पहले से अधिक कमा रहे थे क्योंकि मुझे तो आप जानती हैं कि बच्चों और मम्मी के अलावा कुछ और करने की फुरसत ही नहीं थी। फिर जब इनको लगा कि ये इतना अच्छा काम कर रहे हैं तो फिर मैं स्कूल छोड़ दूँ। मैंने भी स्कूल छोड़ दिया और घर को और अच्छे से संभालने लगी थी। अब तो मम्मीजी को मेरी ज्यादा जरूरत होने लगी थी।
मुझे नहीं मालूम था कि काम क्या था? कभी बताया ही नहीं। घर तो पहले की तरह से ही मम्मीजी चला रही थीं। उसमें क्या हुआ मुझे नहीं मालूम। एक दिन पुलिस घर आ गयी और सर्च वारंट उनके पास था। उसे तलाशी में इनके ऑफिसियल बैग में नकली नोटों की गड्डियां मिली और पुलिस इनको ले गयी।
"पूछोगी नहीं कैसे?"
"बताओ न मैं सुन रही हूँ।"
खुले आम हाथ में हथकड़ी डालकर पैदल चलते हुए सड़क से गाड़ी तक ले गयी। हम कॉलोनी में मुंह दिखाने काबिल भी नहीं रह गए थे। वैसे भी अपने स्तर को देखते हुए इन्होने किसी से ज्यादा मिलना जुलना तो रखा नहीं था और तुम लोग तो पहले ही दूर निकल गए थे।
मैंने अपने भाइयों को इस बारे में सहायता करने के लिए बुलाया लेकिन इस मामले में किसी ने सामने आने से मना कर दिया। इसी बीच देवर जी को भी खबर की लेकिन उन्होंने बहुत व्यस्त होने की बात कह कर फ़ोन बंद कर दिया। जैसे कि आप जानती हैं कि मम्मी को इनसे सबसे ज्यादा प्यार था और जब उन्हें सारी बात पता चली तो वे हार्ट की मरीज वैसे भी थीं लेकिन इस सदमे को अधिक दिनों तक झेल नहीं पायी और एक महीने के अंदर ही वह चली गयीं।
"फिर तो बड़ी मुसीबत आ गयी होगी क्योंकि सारा पैसा तो मम्मी जी की पेंशन से ही आता था।"
"हाँ वही तो, उनके अकाउंट को ये ही चलाते थे, सारा पैसा ब्लॉक हो गया। देवर को फिर खबर दी कि मम्मी नहीं रहीं, तब तो वह आ गए और सारे काम भी करने के लिए आगे रहे। मुझे नहीं मालूम किसने कैसे क्या किया? लेकिन इनको कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया गया और मम्मी के सारे काम करके फिर से इनको जेल जाना पड़ गया। ये मम्मी का अकाउंट नहीं चला सकते थे क्योंकि अब तो उसको देवर की सहमति की जरूरत भी थी। उसके लिए भी बैंक के साथ एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना था और कुछ काम करवा कर देवर जी वापस चले गए।
मकान मालिक ने भी मकान खाली करने का नोटिस भेज दिया। मम्मी का ढेर सारा सामान लेकर मैं कहाँ जाती? मैंने मायके में जाकर रहने की सोची क्योंकि पांच भाइयों की इकलौती बहन जो थी मैं , लेकिन बहन थी लेकिन दूसरा रिश्ता जो बन चुका था कि उनके साथ पाँच भाभियाँ भी जुडी थीं। वैसे तो सभी बहुत अच्छे थे, जब तक हम मम्मी के साथ सबसे संपन्न थे लेकिन अब हम सड़क पर आ गए थे। अलग कोई फंड मेरे पास था ही नहीं क्योंकि मुझे अपनी जरूरत का पैसा मम्मी से मिलता रहता था और हम तो जैसे मम्मी हमेशा से जीती रही थीं वैसे ही जी रहे थे। एक कर्नल के स्तर से।
मायके में मुझे कोई एक फ्लैट नहीं मिलने वाला था। हमें दो कमरे दे दिए गए क्योंकि पापाजी ने एक अपना और मेरा कमरा भी उस घर में सुरक्षित रखा था। अब तक घर छोड़ने तक काफी किराया बाकी हो चुका था। सिर्फ उतना सामान लेकर, जो हम उन कमरों में रख मैंने बाकी सामान मकान मालिक को देकर वहाँ से चले आये।
झूठ नहीं कहूँगी कुछ महीनों तक सभी भाइयों ने मेरे खाने पीने का बहुत ख्याल रखा और फिर जैसे ही इनकी जमानत होकर आयी, उन लोगों ने हमसे दूरियाँ बना लीं। देवर के आने पर मम्मी का अकाउंट खुल गया और उससे कुछ पैसे मिले जो उन्होंने मेरे अकाउंट में डाल दिए लेकिन कितने दिन चलते? बच्चों की उस साल की पढाई पूरी करवानी थी और फिर आगे की पढाई के बारे में सोच ही नहीं सकते थे।
जब ये जेल से जमानत पर आये तो सबसे पहले उस मैनेजर के पास गए कि कुछ सहायता कर दें क्योंकि काम तो उन्हीं का कर रहे थे लेकिन उनका व्यवहार ऐसा था कि वह जानते ही न हों। कहीं और काम की कोई उम्मीद ही नहीं थी। बच्चों की पढाई बंद हो गयी, इतना पैसा था ही नहीं कि कहीं भी पढ़ा पाते। सब कुछ भुला कर रचित ने एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली और छोटे विदित को आईटीआई करने के लिए एडमीशन करवा दिया। आगे निकल कर कुछ तो कर ही लेगा।
"तुमने कुछ करने की कोशिश क्यों नहीं की?"
"क्या करती और कब?" अब मेरी प्राथमिकता मेरे बच्चे रह गए थे। किराये देने के भी तो पैसे नहीं थे, उस समय एक लड़का था जो कभी कभी घर आता था और इनके कुछ काम करता रहता था और ये उसको पैसे दे दिया करते थे। उसको पता चला कि हम इस हाल में है तो उसके किसी रिश्तेदार का एक ये कमरा खाली पड़ा था। सिर छुपाने के लिए जगह मिल गयी थी और हम उसके अहसानमंद हैं।"
"भाईसाहब कहाँ हैं?"
"वह यहाँ से निकल कर दिल्ली चले गए कि वहाँ कुछ भी करेंगे कोई जानता तो नहीं है और मैं बच्चों के लिए यहीं पर हूँ। आज सोती हूँ तो कल के लिए सोचते हैं कि कोई नई मुसीबत मुंह ढके तो नहीं खड़ी है।"
इनका फ़ोन आ गया कि कहाँ पर आना है ? उसने जाकर मेन रोड से ले लिया। रास्ते में क्या बात हुई नहीं जानती लेकिन मैंने इनके आते ही आँखों से इशारा करके कुछ भी जानने के लिए प्रश्न न करने का संकेत किया।
वहाँ से निकलते हुए दिमाग में ढेर सारे प्रश्न तैर रहे थे, जिनका कोई उत्तर नहीं मिला।

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.