तेरह से सात दिन !
हॉस्पिटल के आईसीयू पिछले तीन दिनों से वह आत्मा वेंटीलेटर पर छटपटा रही थी, शरीर की पीड़ा से तो यह मुक्त हो चुकी थी, लेकिन पार्थिव से मुक्ति की कामना से अंदर ही अंदर कसमसा रही थी। पिछले 76 वर्ष के कर्मों का लेखाजोखा अभी शायद चुकता नहीं हुआ था, तभी तो साँसे चलाई जा रही हैं। फिर अचानक शायद उसका काम यहाँ से ख़त्म हुआ और वह पार्थिव से मुक्त हो चल दी।जाना कहाँ था? वहाँ से चलकर उसी घर में आ गयी, जिसे उसने खून पसीना एक करके बनवाया था फिर उसका विस्तार तो दूसरी कमाई से हुआ।
हॉस्पिटल के कागजों में उसे मृत घोषित कर दिया गया और यह खबर उनके घर वालों तक पहुँचा दी गयी और वह खुद वहीं पहुँच गयी, जहाँ उसको पहुँचना था। सबसे पहले अपने ही कमरे में ही पहुँचा, जहाँ वह नीरा के साथ अब तक रह रहा था। नीरा के पास बैठ गया, मन किया कि उसके सिर पर हाथ फिरा कर सांत्वना दे, लेकिन कैसे अब उसका अस्तित्व शेष ही कहाँ है? वह बाहर निकल गया शायद घर खबर पहुँच चुकी थी। हॉल में सब इकट्ठे हो गए थे, खलबली मच गयी, अब क्या होगा? जैसे उनको आशा हो कि मैं वापस आ ही जाऊँगा। सिर्फ बड़ा बेटा निश्चिन्त था क्योंकि सत्ता उसके हाथ में पहले ही आ चुकी थी।
"ये बतलाओ कि इतनी रात में डैड बॉडी लाकर हम क्या करेंगे? कौन यहाँ सारी रात बैठ सकता है?" बड़े भाई ने अपने से छोटे से पूछा।
"ये सही है, ऐसा करते हैं कि डैड बॉडी को रात में हॉस्पिटल में रहने देते हैं और सुबह पेमेंट करते ले लेंगे।" उसकी तरफ से प्रस्ताव आया।
"ये सही ऑप्शन होगा क्योंकि यहाँ रात भर कौन बैठा रहेगा? कहते हैं न कि डैड बॉडी को अकेला नहीं छोड़ा जाता है?"
"क्या बकवास है, हॉस्पिटल में तो कितनी डैड बॉडी पड़ी रहती हैं। "
"हाँ यह ठीक है दो घंटे बाद सभी लोगों को फ़ोन कर देंगे, रात में तो कोई आने वाला नहीं और सुबह सबके आने से पहले हम डैड बॉडी लेकर आ जायेंगे।"
वह सब कुछ सुन रहा था, इन्हीं के लिए उम्र भर खटता रहा, डिग्रियाँ खरीदी और फिर बैठे बैठे खा सकें इतनी सम्पत्ति जमा कर दी थी। इसके लिए उसने क्या कुछ नहीं किया? आज क्या हुआ? जाएगा सिर्फ अपने कर्मों का बोझ लेकर।
रात बारह बजे के बाद फ़ोन पर सबको सूचना देकर अपने अपने कमरे में जाकर सो गए। वह वापस अपने कमरे में आकर नीरा के करीब बैठ गया। नीरा चुपचाप आँखें खोले करवटें बदल रही थी। शायद उसको कुछ भी बताया नहीं गया था। वह पैरालिसिस होने के बाद से खुद कुछ नहीं कर सकती थी, उसके सहारे ही पिछले तीन साल से सब कुछ कर रही थी। एक नर्स उसको देखती थी। मन भर आया और लगा कि इसके सिर पर हाथ फिरा दूँ। लेकिन हाथों में तो बेड़ियाँ पड़ी थीं। वहाँ से ऊपर छत पर चला गया। पूरे इलाके में सबसे ऊँची बिल्डिंग, चार गाड़ियाँ, इलाके में रुतबा सब बेकार है क्योंकि अब जाना तो खाली हाथ ही है।
देर रात खबर मिली तो गाँव से वृहत परिवार के लोग सुबह जल्दी गाड़ी करके चल दिए, आस- पास के लोग भी सुबह से आना शुरू हो गए थे। छोटे बेटे को बाहर से आना था तो रुक कर इन्तजार तो करना ही पड़ेगा। गेट खोल दिया गया था और कुर्सियाँ डाल दी गयीं थीं। लोग आते जाते और बैठते फिर आपस में इशारे से पूछते कि मिट्टी अभी तक ऊपर ही रखे हैं क्या? इशारे से ही बात हो रही थी कि गेट के बाहर एम्बुलेंस आकर रुकी, बड़ा बेटा आगे से उतरा और पीछे हॉस्पिटल के कर्मियों ने पार्थिव लाकर अंदर रख दिया।
सबकी आँखें आश्चर्य से फैल गयीं -
-- क्या मिट्टी रात भर हॉस्पिटल में ही रखी रही।
-- बड़े लोगों की बड़ी बातें होती हैं।
-- आखिरी समय भी कोई साथ न था शायद।
-- साथ तो उनका तभी छोड़ दिया था, जिस दिन वह कोमा में गए थे।
एक साथ महिलाओं का रुदन सुनाई देने लगा और कुछ मिनट बाद गुणगान और अवगुणगान शुरू हो गया। सब आ गए और फिर पार्थिव को सजा कर ले जाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी, बस छोटे बेटे की फ्लाइट आने वाली थी, उसी का इन्तजार था, तब निकलें अंतिम सफर पर। साथ साथ वह भी हो लिया क्योंकि अभी मुक्ति बाकी है।
उसके कोमा में जाते ही सारी सत्ता बड़े बेटे के हाथ में पहले ही आ चुकी थी और उसी के अनुसार सारा काम हो रहा था। गाँव से पंडित जी आए थे और जानते थे कि मैं सारा काम विधिवत् करवाता था।
वह बीच-बीच में अपनी राय देते जा रहे थे और बेटे उनकी राय को अनसुना करते चले जा रहे थे। उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं था, वास्तव में दुखी तो एक नीरा ही होगी। उनकी लंबी बीमारी ने उसको बिल्कुल तोड़ दिया था। उसको लाकर व्हील चेयर पर बैठ दिया गया था।
शाम तक सब वापस लौटे तो फिर संवाद शुरू हो गया। घर के कामों के बारे में क्या करना है? हवन करवाना है या हिंदू रीति से तेरहवीं वगैरह की जाएगी।
"सोच लें, माँ से पूछ लीजिए क्या करना है?" बेटी ने अपनी सलाह दी।
"माँ को तो कुछ करना नहीं है और इतने दिन नियम में बँधकर कौन बैठेगा? नहीं करेंगे तब भी उनकी आत्मा कोसेगी, इसलिए ऐसा काम करो कि किसी का काम भी हर्ज ना हो और सारे अंतिम कार्य भी संपन्न हो जाए।"
सबने उसकी अहमियत को भुला दिया लेकिन वह छटपटा तो रहा ही था। कोई नियम में नहीं बँधना चाहता है। कौन फीका खाना खाएगा? कौन जमीन पर सोएगा? नाती पोतों से भरा परिवार था। इतने लोग न भूखे रहेंगे, न हीं सूतक वाले नियम मानेंगे।
"नमिता जी चाय बना दीजिए आप तो कर ही सकती हैं।"। बड़ी भाभी ने ननद को आदेश दिया।
"जी भाभी।" बेमन से उसने कहा, नहीं तो अभी तो पापा को यहाँ से गए हुए कुछ ही घंटे हुए हैं।
"अरे सुनिए खाना ऑर्डर कर दीजिए, बच्चे सब भूखे हैं और बड़े भी।" बड़ी बहू ने राय दी।
"अरे भाभी खाना तो आज परिचितों के यहाँ से आ ही जाता है, चाचा के यहाँ तो कितने लोग थे, इतना खाना लोग लाए थे कि कम न पड़ा था।" नमिता ने कहा।
" यहाँ ये नहीं चलता, सब अपना-अपना देखते हैं।" बड़ी बहू चिढ़कर बोली।
वह भी सुन रहा था, यह सब यहाँ नहीं होता, सही कहा न, गाँव से भी भाई आते थे तो उन्हें होटल में जाकर खाना खिलाया करता था। घर में नहीं बन सकता था। कभी किसी के दुःख-सुख में शामिल हुए हों तो जानें, फिर कौन देने आएगा?
"कौन क्या खाएगा? उसी हिसाब से मंगवा लेता हूं।" बड़ा बेटा बोला।
मेरे अंदर तक छू गया। सारी संपत्ति तो अब तुम्हारे पास है, अब मेरे लिए शोक करने के लिए कोई जरूरत नहीं है। अपने रोज के रूटीन में कोई परिवर्तन नहीं करना चाहता, आज तो पहला ही दिन है। यहाँ सिर्फ 13 दिन ही तो रुक सकता हूँ, फिर हवन के साथ जाना होगा। अब न तो मेरा कोई है और न मैं किसी का। फिर क्यों मैं उदास हूँ ? हाँ रहना तो यहीं होगा न। इससे पहले कहीं और जा भी नहीं सकता।
पोता और पतोहू भी पहुँच रहे हैं। आते ही घर में हँसी मजाक का माहौल हो गया। वहाँ के अनुभव शेयर किए जाने लगे।
"मॉम मुझे बहुत सारी शॉपिंग करनी है।" पतोहू ने आते ही कहा।
"हाँ, हाँ मुझे पता है, आज के दिन रुक जाओ, लोग क्या कहेंगे?"
"क्योंकि इन्हें ज्यादा छुट्टी नहीं है। ना हीं यहाँ वाली सारी चीजें वहाँ मिलती है और मुझे अपनी वहाँ की फ्रेंड्स को गिफ्ट देने हैं, उन सबके लिए कुछ न कुछ यहाँ से खरीद के ले जाना है।"
अपनी हालत पर रोना आ रहा था, क्या मेरी जड़ों के आगे की शाखाएंँ ऐसी बिखर जायेंगी। कोई संस्कार सभ्यता और परम्पराएँ अब शेष नहीं रहेंगी।
"सुनो ऐसा करते हैं, अब 7 दिन हवन करवा लेते हैं, पुरानी सोच का भी 'दि एंड' कर ही देते हैं। अब हमारे बाद की पीढ़ी से ये भी न हो पायेगा।" सर्वेसर्वा बन चुकी बड़ी बहू ने अपना सुझाव दिया।
"पंडित जी से भी पूछ लेते हैं, आखिर अपने कुलपुरोहित हैं वह।"
"पंडित जी तो वही करेंगे न जो हम कहेंगे, ये हमारे घर का काम है।"
"आप लोग इसके लिए इतना क्यों सोच रहे हो? पंडित जी ने पूछा।
"बात ये है पंडित जी कि बच्चों के पास समय नहीं है, बड़ी मुश्किल से छुट्टी लेकर आये हैं, उन्हें वापस जाना भी है। उनकी टिकट बुक है।" दलील पेश कर दी गयी।
"जैसी आपकी श्रद्धा, हम तो जो आप कहेंगे कर देंगे।" पंडित जी बुझे स्वर में बोले।
ठीक है मेरे बच्चों, सब काम शॉर्टकट में होने लगा है, तो तेरह से सात दिन में समेट दो मुझे और फिर मुझे कभी नहीं आना है।
---
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.