उसके कोमा में जाते ही सारी सत्ता बड़े बेटे के हाथ में पहले ही आ चुकी थी और उसी के अनुसार सारा काम हो रहा था। गाँव से पंडित जी आए थे और जानते थे कि मैं सारा काम विधिवत् करवाता था। 
         वह बीच-बीच में अपनी राय देते जा रहे थे और बेटे उनकी राय को अनसुना करते चले जा रहे थे। उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं था, वास्तव में दुखी तो एक नीरा ही होगी।  उनकी लंबी बीमारी ने उसको बिल्कुल तोड़ दिया था। उसको लाकर व्हील चेयर पर बैठ दिया गया था।  
           शाम तक सब वापस लौटे तो फिर संवाद शुरू हो गया। घर के कामों के बारे में क्या करना है? हवन करवाना है या हिंदू रीति से तेरहवीं वगैरह की जाएगी। 
      "सोच लें, माँ से पूछ लीजिए क्या करना है?"  बेटी ने अपनी सलाह दी।
      "माँ को तो कुछ करना नहीं है और इतने दिन नियम में बँधकर कौन बैठेगा? नहीं करेंगे तब भी उनकी आत्मा कोसेगी,  इसलिए ऐसा काम करो कि किसी का काम भी हर्ज ना हो और सारे अंतिम कार्य भी  संपन्न हो जाए।"
      सबने उसकी अहमियत को भुला दिया लेकिन वह छटपटा तो रहा ही था। कोई नियम में नहीं बँधना चाहता है। कौन फीका खाना खाएगा?  कौन जमीन पर सोएगा? नाती पोतों से भरा परिवार था। इतने लोग न भूखे रहेंगे, न हीं सूतक वाले नियम मानेंगे।
      "नमिता जी चाय बना दीजिए आप तो कर ही सकती हैं।"।  बड़ी भाभी ने ननद को आदेश दिया।
      "जी भाभी।" बेमन से उसने कहा, नहीं तो अभी तो पापा को यहाँ से गए हुए कुछ ही घंटे हुए हैं।  
      "अरे सुनिए खाना ऑर्डर कर दीजिए, बच्चे सब भूखे हैं और बड़े भी।" बड़ी बहू ने राय दी। 
      "अरे भाभी खाना तो आज परिचितों के यहाँ से आ ही जाता है, चाचा के यहाँ तो कितने लोग थे, इतना खाना लोग लाए थे कि कम न पड़ा था।" नमिता ने कहा। 
      " यहाँ ये नहीं चलता, सब अपना-अपना देखते हैं।" बड़ी बहू चिढ़कर बोली।
          वह भी सुन रहा था, यह सब यहाँ नहीं होता, सही कहा न, गाँव से भी भाई आते थे तो उन्हें होटल में जाकर खाना खिलाया करता था। घर में नहीं बन सकता था। कभी किसी के दुःख-सुख में शामिल हुए हों तो जानें, फिर कौन देने आएगा?
      "कौन क्या खाएगा?  उसी हिसाब से मंगवा लेता हूं।"  बड़ा बेटा बोला।
       मेरे अंदर तक छू गया। सारी संपत्ति तो अब तुम्हारे पास है, अब मेरे लिए शोक करने के लिए कोई जरूरत नहीं है। अपने रोज के रूटीन में कोई परिवर्तन नहीं करना चाहता, आज तो पहला ही दिन है।  यहाँ  सिर्फ 13 दिन ही तो रुक सकता हूँ, फिर हवन के साथ जाना होगा। अब न तो मेरा कोई है और न मैं किसी का।  फिर क्यों मैं उदास हूँ ? हाँ रहना तो यहीं होगा न। इससे पहले कहीं और जा भी नहीं सकता। 
            पोता और पतोहू भी पहुँच रहे हैं। आते ही घर में हँसी मजाक का माहौल हो गया। वहाँ के अनुभव शेयर किए जाने लगे। 
    "मॉम मुझे बहुत सारी शॉपिंग करनी है।" पतोहू ने आते ही कहा। 
    "हाँ, हाँ मुझे पता है, आज के दिन रुक जाओ, लोग क्या कहेंगे?"  
    "क्योंकि इन्हें ज्यादा छुट्टी नहीं है। ना हीं यहाँ वाली सारी चीजें वहाँ मिलती है और मुझे अपनी वहाँ की फ्रेंड्स को गिफ्ट देने हैं,  उन सबके लिए कुछ न कुछ यहाँ से खरीद के ले जाना है।"  
    अपनी हालत पर रोना आ रहा था,  क्या मेरी जड़ों के आगे की शाखाएंँ ऐसी बिखर जायेंगी। कोई संस्कार सभ्यता और परम्पराएँ अब शेष नहीं रहेंगी।
              "सुनो ऐसा करते हैं, अब 7 दिन हवन करवा लेते हैं, पुरानी सोच का भी 'दि एंड' कर ही देते हैं। अब हमारे बाद की पीढ़ी से ये भी न हो पायेगा।" सर्वेसर्वा बन चुकी बड़ी बहू ने अपना सुझाव दिया।
       "पंडित जी से भी पूछ लेते हैं, आखिर अपने कुलपुरोहित हैं वह।" 
       "पंडित जी तो वही करेंगे न जो हम कहेंगे, ये हमारे घर का काम है।"  
       "आप लोग  इसके लिए इतना क्यों सोच रहे हो? पंडित जी ने पूछा। 
       "बात ये है पंडित जी कि बच्चों के पास समय नहीं है, बड़ी मुश्किल से छुट्टी लेकर आये हैं, उन्हें वापस जाना भी है। उनकी टिकट बुक है।" दलील पेश कर दी गयी। 
        "जैसी आपकी श्रद्धा, हम तो जो आप कहेंगे कर देंगे।" पंडित जी बुझे स्वर में बोले।
       ठीक है मेरे बच्चों,  सब काम शॉर्टकट में होने लगा है, तो तेरह से सात दिन में समेट दो मुझे और फिर मुझे कभी नहीं आना है।                                                    
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