सोमवार, 2 जुलाई 2012

भवितव्यता (४)

पूर्व कथा :

                        सावित्री अपने मइके या ससुराल दोनों में दुलारी थी। घर में लक्ष्मी मानी  जाती। उसका पति समझदार और जिम्मेदार युवक था। छोटे भाई की संगती के बिगड़ने से चिंतित रहता और उसके इसा बात के लिए रोकने पर उसके साथ कुछ ऐसा बुरा हुआ की कई जिन्दगी इसमें पिसने ला। शशिधर का दोस्त गिरीश ने अंतिम समय उसे वचन दिया की वह उसकी पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय नहीं होने देगा और इसके लिए उसने स्कूल में पूरी भूमिका बना दी। चाचा बच्चों को  करने लगा और साथ ही सावित्री को भी। बच्चों को कसबे में  के लिए ले जाने के सवाल पर गिरीश और शशि के घर वालों के बीच कहा सुनी हो गयी और उसी बीच गिरीश ने कह दिया की शशि को  मारने वाले उसके देवर के साथ ही थे ...........


गतांक से आगे :

                            गिरीश की बात सुनकर उसके ससुर और सावित्री अवाक् रह गए। लेकिन उनके मुँह से कोई बात निकल ही नहीं सकती थी। उन दोनों के मन में क्या चल रहा था इसको कोई और नहीं जान सकता था। इस बात को सुनकर उसका देवर भी सन्न रह गया, लेकिन गिरीश को हर बात कहाँ तक पता है? इस बारे में उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा क्योंकि अब आगे से उसे गिरीश से पंगा नहीं लेना है, ये तो पक्का है। उसकी मंशा कि सावित्री और बच्चों को वह यहाँ से जाने ही नहीं देगा ताकि भैया के पैसे का पूरा पूरा लाभ उसी को मिले और सारा पैसा उसके हाथ में ही आये और खेती में हिस्सा तो बना ही रहेगा। अगर सावित्री और बच्चे यहाँ से निकल गए तो उसके हिस्से में क्या आने वाला है? वह ऐसा होने ही नहीं देगा? इसके लिए उसे चाहे गिरीश को भी धमकाना क्यों न पड़े ? मेरे पास तो मेरे सारे साथी हैं और गिरीश अकेला है डर ही जाएगा। 


                     *****                        ****                          *****              


          आखिर गिरीश ने घर जाकर ये निर्णय लिया कि वह इस बार बच्चों का नाम कस्बे में ही लिखायेगा। छोटा अभी छोटा है इसलिए वह बाकी दोनों बच्चों नाम ही लिखायेगा। यद्यपि उसको ये विश्वास ही नहीं कि शशि का छोटा भाई इस बात के लिए  राजी होगा और बच्चों को कस्बे  में पढ़ने देगा। कहीं ऐसा न हो कि वह  मेरे साथ साथ इन बच्चों का भी दुश्मन न बन बैठे, सावित्री क्या करेगी?
               
        शशिधर के पिता की भी जान सांसत में पड़ गयी कि ये नालायक बेटा कहीं उसकी पूरी जमीन- जायदाद कुसंगत में पड़ कर जुए और शराब की भेंट न चढ़ा दे। इन बच्चों को कहीं सड़क पर लाकर  खड़ा न कर दे,  फिर वे क्या करेंगे? जो अपने देवतुल्य भाई को मरवा सकता है ,वह कुछ भी कर सकता है। वे भी बच्चों को बचाने  और  भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उन्हें अपने से दूर करने के लिए खुद को तैयार करने लगे और इसके लिए वे अपने  दिल पर पत्थर  रखने के लिए राजी थे। उन्हें इस बात पर शर्म आने लगी थी कि कहाँ एक बेटा कितना सज्जन और चरित्रवान और  दूसरा निकम्मा और  बिगडैल।  उन्होंने पत्नी से भी इस बारे में विचार किया। एक माँ वैसे भी चोट खाए बैठी थी, उसकी  जितनी आत्मा आहत थी और वह उससे ज्यादा नहीं सोचना चाहती थी। अब वे दोनों ही बेटे को खोकर पोतों को खोने की कल्पना  से भी उनकी आत्मा काँप जाती थी। इसलिए उन लोगों ने गिरीश  के प्रस्ताव को स्वीकार कर का मन बना लिया ।
                    स्कूल खुलने का समय धीरे धीरे पास आता जा रहा था, सावित्री को इस बारे में अभी नहीं बताया गया था। गिरीश ने भी सोच लिया था कि वह बच्चों का नाम बगैर उन्हें ले जाए पहले ही  एडमीशन करवा लेगा और एक दो  महीने के बाद  वह ले जाएगा। लेकिन उसको ये नहीं मालूम था कि बच्चों को यहाँ से ले जाना तो आसान होगा लेकिन उनकी परवरिश नहीं। गिरीश बच्चों को ले तो गया लेकिन उनके लिए एक कमरा लेकर रहना भी उसको वहीं पड़ेगा लेकिन मित्र की खातिर उसको कुछ न कुछ तो कष्ट उठाना ही पड़ेगा, इस बात से वह पूरी तरह से वाकिफ था और मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार भी था। बच्चों के लिए खाने की व्यवस्था, उनके कपड़े धोना , उनके लिए सारी सुविधाएँ जुटाना आसान न था। सिर्फ कुछ ही दिनों में गिरीश को लगने लगा कि  वह ये सब नहीं कर  पायेगा। वह तो घर से आकर यहाँ पर पढ़ा कर चला जाता था। कभी घर में दाल नहीं और कभी आटा नहीं। फिर रसोई के तमाम झंझट, बच्चों को क्या खाना खिलाना है और क्या नहीं" ये सब बातें कभी पुरुष भी जान सके हैं? लेकिन वह जिस आग में कूदा था उससे पीछे नहीं हटना था।
                 फिर एक दिन बड़ा बेटा मयंक बीमार पड़ा , उसको बहुत तेज बुखार था और वह बुखार के कारण बड़बड़ा भी रहा था। वह बुखार में माँ माँ की रट लगाये था। अब गिरीश के हाथ पैर फूलने लगे कि अगर बच्चे की हालत और बिगड़ती है तो वह क्या करेगा? वह अकेला दोनों बच्चों को कैसे सँभाल पायेगा। तीन दिन तक उसके बुखार रहने के बाद वह ठीक हो पाया लेकिन इस बीच गिरीश जिस अग्निपरीक्षा से गुजरा था उसने उसे अन्दर तक हिला दिया था।
              उसने रविवार की छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर गाँव जाने की सोची , बच्चे अपने घर वालों से मिल भी आयेंगे और वह उनके बाबा से माँ को साथ भेजने के लिए बात भी करेगा। उसे इस बात का पूरा पूरा अहसास हो चुका था कि बगैर माँ के बच्चों को रखना आसान नहीं है। एक माँ तो अपने बच्चों को बाप के बिना पाल सकती है लेकिन एक बाप बिना माँ के बच्चों को नहीं पाल सकता। घर में गृहणी का रहना कितना जरूरी है इस बात को वह अच्छी तरह से जान चुका  था और इसी लिए वह शशिधर के पिता से बात करने के लिए तैयार हो चुका था।
 
                    घर पहुँच कर उसने शशिधर के पिता से बात की --

               "बाबूजी बच्चों की खातिर उनके साथ उनकी माँ का रहना बहुत ही जरूरी है, अतः आप उनकी माँ को उनके साथ रहने की अनुमति दें। 10 और 8 साल के बच्चे इतने बड़े नहीं होते कि वे अपनी माँ के बिना रह सकें।"

         "लेकिन ये तो मुश्किल है , घर में क्या होगा? शशि की माय भी अकेली रह जायेगी।"
 
        "बाबूजी बच्चों के खाने पीने की व्यवस्था करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है।"

        "बेटा तुमने कहा किबच्चों को भेज दें, मैंने वैसे ही किया लेकिन बहू को भेजना मुश्किल है।"

        "बाबूजी बच्चों के भविष्य आपको कुछ तो सोचना ही पड़ेगा।"

        "अच्छा बेटा तुम थोड़े दिन रुक जाओ मैं इस बारे में घर में बात करता हूँ ।
                      
                गाँव का मामला था, वहाँ इतना आसन नहीं होता कि कोई विधवा स्त्री अकेले कस्बे में रहने चली जाए वह भी एक गैर मर्द के कहने पर। शशिधर के पिता इस बात को महसूस कर रहे थे कि इस समय हालात ऐसे ही हैं कि  सावित्री को बच्चों के भविष्य के लिए बाहर निकलना ही पड़ेगा। इस बात को घर में उठाया गया कि छोटे अपनी पत्नी को गौना करा कर ले आये ताकि सावित्री बच्चों के साथ जा सके। जब ये बात देवर को पता चली तो वह आग बबूला हो गया और उसने गाँव के पंचायत बुलाने की सोची क्योंकि  वह इस बात के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। जिस दिन गिरीश आया छोटे पहले से ही सरपंच को बुला लाया था कि पराया मर्द उसके भाई के बच्चों को लेकर चला जायेगा फिर हम कुछ न कर पायेंगे। सावित्री भी अगर एक बार घर से बाहर निकली तो फिर घर लौट कर उसको रहना मुश्किल हो जायेगा। कस्बे की जिन्दगी सबको लुभाती है और जब पैसा उसके हाथ में होगा तो फिर वह किसी को क्यों घास डालेगी?
               
           सरपंच काफी बुजुर्ग अनुभवी और सुलझे हुए व्यक्ति थे। उन्होंने गिरीश से बात की --

         "तुम बहू को शहर ले जाओगे तो लोग क्या कहेंगे?"

          "कुछ भी कहें, वह अपने बच्चों के साथ रहेंगी, नहीं तो बच्चों का वहाँ पढ़ पाना मुश्किल हो जायेगा। वहाँ  अभी बच्चों को रखने के लिए हॉस्टल भी नहीं है कि उनको वहाँ डाला जा सके।"

           "वहाँ किसी आदमी की भी जरूरत होगी, एक गाँव की औरत कस्बे में सब कुछ कैसे कर पाएगी?"

          "इस बारे में इनके भाइयों को बुला कर बात कर लीजिए , शायद वे कुछ व्यवस्था कर सकें।"

        "इस बात को आप लोगों ने क्यों नहीं सोचा कि बच्चों और बहू के बारे में कुछ निर्णय लेने के पहले उसके मायके वालों की राय लेना भी तो उतना ही जरूरी है।" सरपंच को गिरीश की बात जँच गयी। 

                                                                                                                       (क्रमशः)


रविवार, 10 जून 2012

भवितव्यता !

                              पूरे मोहल्ले में यह खबर बिजली की तरह से फैल गयी कि बनारस में नीतू के फूफाजी का अचानक निधन हो गया। मोहल्ले के बड़े बुजुर्गों ने तो उनका बचपन भी देखा था और फिर व्याह, बच्चे सभी कुछ तो सबके सामने हुआ, किन्तु सावित्री जैसा भाग्य किसी ने किसी का नहीं देखा और न सुना था। 
               एक विधवा  के लिए कितना कठिन होता है वैधव्य ढोना और सावित्री फिर एक बार विधवा हो गयी। विपत्तियों के पहाड़ तो उसने जीवन भर टूटते देखे और उनके तले दब कर जीवन जिया। कभी रोई, सिसकी, घुटी और फिर कभी चेहरे के मुस्कराहट से भरी भी नजर आई लेकिन इतने उतार -चढाव शायद किसी ने अपनी जिन्दगी में देखे होंगे। एक सीधी-सादी सात भाइयों की दुलारी बहन। कोई उससे जोर से बोला तक नहीं था और वैसी ही वह भोली भाली भी थी।         
               गाँव के हिसाब से बचपन में उसकी पास के ही गाँव में भरे पूरे परिवार में शादी कर दी गयी थी। इकलौती बेटी और सात भाइयों की इकलौती बहन, बड़ी दुलारी प्यारी - कौन सी सुविधा थी जो उसे नहीं मिली। हर कोई इसी फिराक में रहता कि कौन सी खुशियाँ अपनी बहन और बेटी के आँचल में डाल दें। वह पाँचवे में पढ़ रही थी तभी उसकी शादी कर दी गयी थी। ससुराल में भी उसको खूब सम्मान मिला। खूब सारा दहेज़ लेकर जो आई थी और फिर सबकी आँख का तारा बन कर रही। पति तब पढ़ ही रहा था - घर में अच्छी खेती बाड़ी थी। धन धान्य की कमी न थी। घर में सम्पन्न परिवारों की निशानी ट्रैक्टर और जीप दोनों ही थे। उसका पति पढ़ने में होशियार था तो उससे पिता को भी बहुत उम्मीदें थी कि वह घर में पढ़ लिख जाएगा तो फिर बाकी भाई भी पढ़ लिख जायेंगे और खेती के बारे में भी वह सब देख सकेंगे।
                 पढ़ने के बाद शशिधर की नौकरी पास के कस्बे में लग गयी, यद्यपि पिता की इच्छा न थी कि वह नौकरी करे लेकिन उसका कहना था कि घर से अधिक दूर नहीं है , घर से रोज आया और जाया जा सकता है तो फिर कोई बुराई नहीं है। इस शर्त पर कि वह घर से ही आया जाया करेगा उसके पिता मान गए।
                सावित्री के एक एक करके तीन बेटे हुए। एक तो बड़ी बहू फिर घर में बेटे ही बेटे पलकों पर बिठाया जाता। वह अधिक दिन ससुराल में न रहती कभी मायके और कभी ससुराल में बनी रहती । मन से एकदम भोली और साफ थी। पति की कमाई से कोई मतलब न था। जो पैसे दे देता बहुत था। फिर उसे पिता के घर से इतना मिलता रहता था कि खाली हाथ तो उसका कभी रहता ही न था। सास तो उसे साक्षात लक्ष्मी ही मानती थी। उसकी तरह से देवरों की शादी भी जल्दी ही कर दी गयी लेकिन अभी सास गौना लेने को तैयार न थी क्योंकि सावित्री तो बड़ी बहू थी सो शौक के मारे जल्दी ही गौना ले लिया था। उसके देवर शशिधर की तरह से पढ़ने लिखने वाले न थे। उनकी संगति बिगड़ चुकी थी। वे न तो बड़े भाई की तरह से कर्मठ और व्यवहारकुशल थे और न ही जिम्मेदार । सभी खेती के काम में लगे रहते और जो हाथ में आता उससे उनकी संगति बिगड़ने लगी। घर का पैसा जुएँ और शराब में उड़ाना शुरू कर दिया। चापलूस दोस्तों की कमी न थी । उसको घर के खिलाफ भड़का कर पैसे खर्च करवाने में किसी को बुरा न लगता था। मौज मस्ती उसके दम पर ही चल रही थी। बाकी बड़े भैया तो बने ही थे, छोटे भाइयों की फरमाइश पूरी करने के लिए।              
                   शशिधर ने एक दिन भाइयों को ट्यूबबेल पर आवारा लड़के के साथ मस्ती करते देखा तो उसके कानखड़े हो गए कि ये तो बर्बादी के ओर बढ़ रहे हैं । उसने उनको वही जाकर लताड़ा -- "यहाँ क्या तमाशा मचा रखा है।"
 
"कुछ नहीं - ये लोग आ गए तो ताश खेल रहे थे।"  जुएँ के ताश समेट रहे दोस्तों को उसने कसकर थप्पड़ लगाये और भाई को तो घसीटते हुए घर लाकर पिता के सामने खड़ा कर दिया । पिता ने भी उसको दो चार तमाचे जड़ दिए। शशिधर का ये कदम घर को बर्बादी से बचाने के लिए था लेकिन उसकी अपनी जिन्दगी और परिवार के लिए आगे मँहगा पड़ेगा ये किसी ने नहीं सोचा था।
         
             घर में ही महाभारत होने लगी। बड़े भाई की कमाई पर ऐश करना बंद हो गया। पिता ने भी अब पैसे देने के बारे में सोचना शुरू कर दिया। शायद भाई सुधर भी जाते लेकिन उनके आवारा यार दोस्तों ने तो अपनी मौज मस्ती में खलल पड़ते हुए देखी तो वे उसको भड़काने लगे -

                "तुम भी तो इस खेती के बराबर के हिस्सेदार हो और अभी तुम्हारा खर्चा ही क्या है? सारी गृहस्थी तो तुम्हारे भाई की है। सारा हिस्सा तो उसके बीबी बच्चों पर खर्च होता है। तुम अपनी खेती बंटवा लो , फिर कोई रोकने टोकने वाला नहीं होगा।"

             उन मूढ़ मगज को बरगलाना आसान था क्योंकि पढ़ाई लिखाई से उनको कोई मतलब नहीं था और फिर घर से भी अधिक उन्हें अपने दोस्तों पर भरोसा जो था कि वे सही राय देंगे। उनकी समझ आने लगा कि दोस्त सही कह रहे हैं। उसने घर में बंटवारे की बात की तो और भी धुनाई हुई। अब घर वालों को समझ आ गया था कि इसके मक्कार दोस्त ही इसको भड़का रहे हैं। मुफ्त में खाना पीना किसे बुरा लगता है? सब के सब ऐसे ही छोटे घरों के थे, चापलूसी करने में कोई पैसे खर्च तो होते नहीं है।

         शशिधर को अब पूरे घर की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही थी। उसने अपने बचपन के दोस्त जो उसके साथ ही स्कूल में टीचर था,  उसके गाँव से होकर रास्ता जाता था, वह रोज मोटर साइकिल से आता-जाता था.  अब शशिधर ने उसके साथ घर लौटना शुरू कर दिया।  इससे वह घर जल्दी आने लगा क्योंकि साइकिल से जाते आते देर जो जाती थी। दोस्त भी उसका बचपन का दोस्त ही नहीं बल्कि अन्तरंग भी था। अंतरंगता के चलते वे आपस में अपने सारे सुख दुःख बाँट लिया करते थे।

          छोटे भाइयों को हथियार बनाकर उसके कंधे पर बन्दूक रख कर चलाने वाले और भी पैदा होने लगे क्योंकि गाँव में उनकी समृद्धि और खुशहाली से जलने वालों की कमी न थी। किसके मन में क्या पल रहा है ये सब कुछ तो जाना नहीं जा सकता है। वैसे भी ऐसे में घर और कुनबे के लोग भी दुश्मन बन जाते हैं। घर में कुछ न कहने वाले शशिधर को इस बात का अहसास होने लगा था।   कई बार उसने अपने मित्र से कहा भी - "मुझे अपने और अपने परिवार के लिए डर लगने लगा है।"

"ऐसा क्यों?"

"पता नहीं क्यों ये मेरी आत्मा को लगने लगा है, कि कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए ?"

"ऐसा विचार मन में मत लाया करो, उस ईश्वर पर भरोसा रखो।"  मित्र उसको दिलासा दिया करता था।
 
"उसका सहारा तो रह ही जाता है, हम कर भी क्या सकते हैं?"  वह हताश स्वर में कभी कभी बोल जाता था।

  1.            कोई नहीं जानता था की शशिधर की ये शंका इतनी जल्दी ही सत्य सिद्ध हो जाएगी और सब कुछ ऐसे बिखर जाएगा जैसे कि कभी कुछ था ही नहीं। वह सावित्री जो अभी भी एकदम भोली थी , अपने बच्चों और पति के अलावा उसकी कोई दुनियाँ थी ही नहीं।
(क्रमशः )

सोमवार, 23 मई 2011

अग्नि-परीक्षा !whole

           कुछ ही दिन पहले वह मुझे नर्सिंग होम कि लिफ्ट में टकरा गयी। एक लम्बे अरसे बाद मिली । सारी चीजें वही लेकिन बस चेहरे से उम्र झलकने लगी थी और हो भी क्यों न करीब १९ वर्ष के लम्बे अंतराल के बाद वह मुझे मिली थी।
इस बीच कभी उसकी कोई सहेली मिल गयी और जिक्र हुआ तो कुछ समाचार उसका मिलता रहा , बस इतना जानती थी कि निमिषा बेंगलोरे में किसी संस्थान में प्रोफेसर है।
"निमिषा" मैं तो उसको देख कर चीख ही पडी थी।
"हाय दीदी, आप यहाँ कहाँ?"
"यहाँ मेरा भांजा एडमिट है - उन्हीं के साथ हूँ और तुम?"
"सासू माँ एडमिट है - उनसे पास हूँ।" उसकी मंजिल आ गयी और वह रूम नं बता कर आगे बढ़ गयी और मैं ऊपरचली गयी।
लिफ्ट तो ऊपर जा रही थी और मैं अतीत के सागर में गोते लगाने लगी। हम भूल जाते हैं कभी कभी ऐसे लोगों को जिनको कुछ कहा जा सकता है और ऐसी ही निमिषा थी। ३ वर्षों तक वह मुझसे बराबर मिलती रही थी जिसमें से एक साल तो हम साथ ही बैठते थे और हर बात भी शेयर करते थे लेकिन तब वह सिर्फ एक पढ़ने वाली लड़की ही थी।
          आज से २४ साल पहले कि बात है तब मैंने अपनी नौकरी नई नई ज्वाइन की थी। आई आई टी के मानविकी विभाग में मेरी पहली नियुक्ति हुई थी। निमिषा वहीं पर मनोविज्ञान  में पी एच डी कर रही थी । उसके गाइड का कमरा मेरे कमरे के ठीक सामने था और वह अक्सर आती और वहाँ से निकल कर हमारे कमरे में बैठ जाती और कभी अपना काम करती और कभी बातें करने लगती।
              इस दुनियाँ में उपहास करने वाले बहुत होते हैं और उसकी फिजिक कुछ ऐसी थी कि अक्सर लड़के कम लड़कियाँ यहाँ तक की उसके साथ ही पढ़ने वाली उसकी हंसी उड़ाया करती थीं। मैं सुनती सब रहती लेकिन मेरी बोलने की आदत कम ही है तो उनके प्रति मेरे भाव कभी अच्छे न रहे। वह सामान्य से कुछ अलग थी । चेहरा में उसके भोलापन और छोटा सा चेहरा लेकिन कंधे से लेकर नीचे तक उसका शरीर काफी बेडौल और मोटा था। कंधे पर बैग टांग कर वह अक्सर आकर बैठ जाती। धीरे धीरे वह कब इतनी करीब आ गयी पता नहीं लगा। फिर उसने ही बताया कि बचपन में एक बार उसे रीढ़ की हड्डी में कोई समस्या हुई थी और डॉक्टर ने आपरेशन किया जिसमें कोई गड़बड़ी आ गयी और फिर उसका शरीर इस तरह से बेडौल हो गया। वह अच्छे सम्पन्न घर की लड़की तीन बहनों में सबसे छोटी थी और भाई उससे भी छोटा। सोच और व्यवहार से बड़ी समझदार और सहृदय थी। भगवान ने उसे सोने सा दिल दिया था , तभी उसे किसी से कोई शिकायत नहीं होती और अगर किसी ने कह दिया तो उसने कभी उसका काम करने से इनकार नहीं किया। संस्थान के नियमानुसार उसने हॉस्टल में ही कमरा लिया था और छुट्टी में वह घर चली जाती ।
              मैं घर से लंच बना कर ले जाती और गर्मियों में वह इतनी धूप में पैदल हॉस्टल जाने के डर से अपना खाना पैक करवाकर वहीं मंगवा लेती थी। फिर हम लोग साथ बैठ कर खाना खाते। अपनी कमी पर विजय पाने के लिए ही उसने आईआईटी से पीएचडी करने का संकल्प लिया और उसमें सफल भी हुई। आलोचना करने वालों कि कहीं भी कमी नहीं होती है और ऐसे ही मेरे ही साथ काम करने वाली और भी लड़कियाँ और महिलायें थी। जिनकी चर्चा का विषय कभी कभी निमिषा ही होती थी।
"कौन करेगा इससे शादी? अच्छे अच्छों का तो ठिकाना नहीं है।"
"कोई दुहाजू या फिर तलाकशुदा मिल जायेगा। कुंवारा तो मिलने से रहा और न कोई करेगा। "
"इसकी शादी हो ही नहीं सकती है।"
"बाकी बहनों की हो जायेगी और ये उनके घर में बच्चे सँभालेगी।"
           इस तरह से जुमले मेरे ही कमरे में उछाले जाते थे और जब वह न होती तो हमारे कमरे में बैठने वाली लड़कियाँ ही ऐसा करती । मेरी सोच शुरू से ही ऐसी ही रही , किसी की आलोचना या फिर उसकी कमी पर कमेन्ट करना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा। प्रपंच और गाशिप भी मुझे कभी पसंद नहीं रही। मैं सोचती कि भगवान ने उसके लिए भी तो कुछ सोचा होगा , ईश्वर करे इसको भी मनचाहा वर मिले आख़िर उसके भी तो सपने होंगे। फिर ये ईश्वर के दिए यह  दंड उसके जीवन का अभिशाप क्यों बने?
              सारे लोग लंच में घर या फिर हॉस्टल चले जाते मैं ही कमरे में अकेली रहती थी और निमिषा आ जाती क्योंकि वह साइकिल नहीं चला पाती और हॉस्टल विभाग से बहुत दूर था। वह अकेले में बैठ कर बातें करने लगती।
        "मम्मी पापा को मेरी ही चिंता है, दीदी की शादी हो गयी , दूसरी की भी हो जाएगी। मुझसे कौन करेगा?"
"ऐसा नहीं होता है, कोई तो वर तेरे लिए भी रचा गया होगा।"
"हाँ है न, पर मम्मी पापा पता नहीं माने या न माने?"
"क्यों?"
"वह हमारे दूर का रिश्ते का है, उसकी एक्सीडेंट में एक हाथ कट गया था और उसने नकली लगवाया हुआ है। वैसे सब अच्छा है।
"फिर"
":नहीं लगता कि घर वाले राजी होंगे, घर आता जाता है, एक दिन उसने ही प्रस्ताव रखा - "निमिषा, हम लोगों को कोई सामान्य तो समझता नहीं है , फिर क्यों न हम लोग एक दूसरे का हाथ थाम लें।" मैंने उससे सोचने का समय माँगा और उससे अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कहा है।
"फिर परेशानी क्या है?"
"मेरे और उसके घर वाले कभी राजी नहीं होंगे। मेरी शादी न हो ये तो घर वालों को मंजूर है लेकिन कुमार से नहीं।"
"कभी पूछा तुमने इस बारे में?"
"पूछना क्या है? मैं जानती हूँ न, अभी तो अपनी डिग्री पर ध्यान देना है फिर कुछ और सोचूंगी।"
ये बात आई गयी हो गयी। उसने एक बार कुमार से मुझे मिलवाया भी था। उसके हॉस्टल की  कुछ लड़कियों ने बताया भी कि इसके पास कोई इसका रिश्तेदार आता है, शायद दोनों में कुछ चल रहा है। एक साल तक मैं उस विभाग में रही और फिर मशीन अनुवाद में कंप्यूटर साइंस में आ गयी। रोज का मिलना बंद हो गया और फिर वह कभी कभी आ जाती। उसकी पढ़ाई पूरी हो गयी तो फिर कभी बहुत  दिनों तक उससे मुलाकात नहीं हुई।
                   वह यहाँ रही समय मिलने पर मिलने के लिए  जाती थी लेकिन मेरा विभाग दूसरा और साथ के लोग भी दूसरे तो वह उतने खुल कर बात नहीं कर पाती थी। फिर एक दिन वह अपनी थीसिस जमा करके चली गयी । महीनों के बाद जब उसका डिफेंस हुआ तब आई थी । उसमें उसने लंच पर मुझे भी बुलाया था। लंच में कुमार भी था किन्तु आगे के विषय में  मैंने कुछ पूछना ठीक समझा और  इतने लोगों के बीच कुछ बताना उसने सही समझा होगा उसके बाद बहुत लम्बे समय तक उससे मुलाकात नहीं हुई और  कोई समाचार ही मिला। उन दिनों मोबाइल भी  थे कि एक दूसरे से संपर्क कर पाते और नहीं नेट कि सुविधा इतनी अच्छी थी। सफर के मुसाफिर की तरह से हम बिछुड़ चुके थे         
                         कई वर्ष के बाद मुझे उसकी एक सहेली मिली तो उसने बताया कि निमिषा और कुमार ने कोर्ट मैरिज कर ली और दोनों घरों के दरवाजे दोनों के लिए बंद हो गए। शादी करके वह सीधे मेरे ही घर आई थी और फिर मेरी मम्मी ने उसका बेटी कि तरह से स्वागत किया और विदाई की। सुनकर बहुत अच्छा लगा कि उसको मंजिल तो मिली लेकिन वह मन्जिल थी या फिर अग्नि परीक्षा देना अभी बाकी था ये तो मुझे पता ही नहीं था।
        फिर एक लम्बा अंतराल और कोई खोज खबर नहीं। उसकी अपनी व्यक्तिगत बातों को तो उसके अलावा और कोई नहीं बता सकता था और मैं उससे बिल्कुल ही अनभिज्ञ थी। फिर एक बार दुबारा उसकी मित्र से मुलाकात हुई क्योंकि वह कैम्पस की ही रहने वाली थी तो कभी जब भी आती तो आ जाती थी। उससे ही पता चला कि निमिषा की जॉब लग गयी बेंगलोरे में और उसके एक बेटी भी है। कुमार ने भी वही पर जॉब कर ली है। उसका फ़ोन नंबर तो मैंने लिए लेकिन फिर भूल गयी ।
इधर कुछ महीने पहले ही फेसबुक पर
 उसका कमेन्ट देखा - हाय दी मैंने आपको खोज ही लिया। उसमें ही उसके परिवार के फोटो भी देखे और एक दो बातें हुई लेकिन फिर सब अपने अपने में।

             हम लोगों को कई दिन तक नर्सिंग होम में रहना पड़ा लेकिन अधिक मुलाकात नहीं हो सकी। एक दिन वह आ गयी कि चलिए कहीं बैठते हैं। उसे शायद कहने के लिए बहुत कुछ था और मुझे उससे सुनने के लिए भी। नहीं तो शायद ये कहानी भी न लिखी जाती। हम सामने एक कैफेटेरिया में जाकर बैठ गए।
"और सुनाओ कैसे कट रही है? "
"अब तो सब ठीक हो चुका है, लेकिन बहुत झेला है मैंने।"
"वही तो सुनने कि इच्छा है, कहाँ तो दोनों के परिवार इतने खिलाफ थे और कहाँ सब ठीक ।"
"आप सुनेंगी तो कहेंगी कि तुमने इतना सारा किया कैसे?"
"ये तो मैं जानती थी कि निमिषा तेरे में बहुत सहनशक्ति है और तू विपरीत धाराओं को भी मोड कर ला सकती है। "
"वो कैसे?"
"बस इंसान को परखने की समझ होनी चाहिए।"
"अब छोड़ ये सब बस मुझे शॉर्ट में बता दे कि कैसे ये सब हुआ?"
"दी , मैंने अपनी पीएचडी पूरे होते ही, सबसे पहले अपने घर में कहा, लेकिन घर में तो कोई सवाल ही नहीं था। मैंने घर छोड़ कर कुछ महीने हॉस्टल में ही बिताये। मैं इस चक्कर में थी कि यहीं कोई प्रोजेक्ट में मुझे जॉब मिल जाय तो मैं फिर अपनी बात के लिए इन्तजार कर सकती हूँ लेकिन जॉब नहीं मिली और फिर एक दिन मैंने कुमार से कहा कि अब हमें निर्णय लेना ही पड़ेगा नहीं तो कब तक हम सबके मुँह को देख कर बैठे रहेंगे।
           कुमार ने भी खुद को तैयार कर रखा था , उसने अपनी माँ से पहले ही बात कर ली थी और वे कतई राजी नहीं थीं। वे नौकरी करती थी और बहुत ही तेज तर्रार थीं। हम दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली और शादी करके मैं  शुभ्रा के घर सीधे आई थी। आंटी ने मुझे सपोर्ट दिया था और उन्होंने मुझे माँ की तरह से ही लिया। उन्होंने कहा भी कि तुम कुछ दिन यहाँ रह सकती हो लेकिन मैंने इसके लिए मना कर दिया ।
हम यहाँ से बाहर जाकर रह नहीं सकते थे क्योंकि कुमार की जॉब यही पर थी लेकिन हमने अपने घरों से दूर एक घर लेकर रहना शुरू कर दिया। कुमार की माँ का कहना था कि वह रोज वहाँ आएगा। कुमार अपने घर दिन में एक बार जरूर जाते। कुछ महीने के बाद उनकी माँ ने कहा कि तुम उसको ला  सकते हो लेकिन मैं उससे कुछ भी कहूं या करूँ तुम बोलोगे नहीं। कुमार को ये मंजूर नहीं था। उन्होंने मना कर दिया और मेरे पास आकर ये बात बतलाई। मैंने कुमार से कहा कि क्यों नहीं मान लेते उनकी बात।
"इस लिए कि मैं जानता हूँ कि मेरी माँ कितनी जिद्दी और कड़क स्वभाव की है। उसने अगर दुर्व्यवहार किया तो मैं सहन नहीं कर पाऊंगा और फिर जो लिहाज के पर्दा बना हुआ था वह उठ जाएगा। "
"ऐसा कुछ भी नहीं होगा, मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूँ कि मैं सब कुछ सह लूंगी।"
"तुम सह लोगी ये मैं जानता हूँ लेकिन शायद मैं सहन नहीं कर पाऊँगा। हमने शादी की है कोई गुनाह नहीं किया, जिसकी सजा तुमको मिले। मैं भी तो बराबर का हकदार हूँ। फिर वही मेरे लिए होना चाहिए।"
             "कुमार, एक बार उन्हें मौका दो, घर छोड़ कर हम भी तो सुख से नहीं रह पा रहे हैं, उनकी आत्मा भी मुझे कोसती होंगी कि मेरे बेटे को छीन लिया।"
"अगर मुझसे सहन नहीं हुआ तो फिर मैं उस घर को जीवन भर के लिए त्याग दूँगा। अगर इस बात पर तुम राजी होतो मैं तुम्हें वहाँ ले जा सकता हूँ। "
"ठीक है, मुझे मंजूर है."
"दी हम लोग उस घर में चले गए लेकिन लगता ऐसा था कि वे मुझसे कोई बदला लेने की सोच रखी थी। उन्होंने सारे काम वाले निकाल कर बाहर कर दिए। मैं अपने शरीर के कारण नीचे बैठ कर कोई काम नहीं कर पाती थी. फिर मैंने अपने को इसके लिए तैयार किया। वह जल्दी अपने ऑफिस चली जाती थी और फिर कुमार भी मेरे साथ काम करवा लेते । इस जंग में कुमार ने जिस तरह से मेरा साथ दिया है तभी मैं उनकी माँ की परीक्षा में सफल हो पाई नहीं तो शायद मैं कब की टूट जाती?"
                 " मैंने दो साल उस घर में नौकरानी से भी बदतर स्थिति में गुजारे और मैं अकेले मैं खूब रोती कि क्या मैं इतनी पढ़ाई करके यही करती रहूंगी। मेरे पास जो डिग्री थी उसकी बहुत कीमत थी लेकिन जब तक कुछ नहीं तो बेकार ही थी। फिर शायद ईश्वर को मेरे ऊपर तरस आ गया और मुझे बेंगलोर से इंटरव्यू के लिए कॉल आ गयी। घर में मचा बवंडर कि इतनी दूर क्यों जाएगी यही कहीं कॉलेज में मिले तो कर लेना। लेकिन नहीं मुझे यहाँ से निकलने का मौका मिल रहा था और मैं उसको छोड़ना नहीं चाहती थी। ईश्वर ने भी साथ दिया और मुझे वहाँ जॉब मिल गयी। मैं वहाँ से वापस ही नहीं लौटी , पहले वहीं पर गेस्ट हाउस में रहने की जगह मिल गयी। कुमार ने यहाँ आकर सबको बता दिया। घर में कुहराम मच गया कि क्या जरूरत थी इतनी दूर जाने की। मैं तुमको तो वहाँ जाने नहीं दूँगी। कुमार तुरंत ही आने को तैयार थे कि वहीं कोई जॉब देख लूँगा लेकिन मैंने उसको मना किया कि मुझे कन्फर्म हो जाने दो फिर कोई कदम उठना । मैं कन्फर्म हो गयी और फिर कुमार भी यहीं आ गए। यही क्षिति का जन्म हुआ। लोगों को ये था कि मेरे शरीर के वजह से मैं कभी माँ नहीं बन पाऊँगी लेकिन ईश्वर ने वह भी रास्ता खोल दिया।
         
              क्षिति के जन्म के बाद सासु माँ ने वहाँ बुलाना चाहा लेकिन मैं ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया - "वे यहाँ आकर रह सकती हैं लेकिन मैं वापस नहीं आऊँगी।"
"तेरे मम्मी पापा का क्या रूख रहा।"
"मेरे मम्मी पापा भी सालों तक माफ नहीं कर सके लेकिन जब पापा को कैंसर हुआ तो भाई तो बाहर जाकर बस गया था। दीदी लोग भी बाहर ही थी लेकिन उनको भरोसा था अपनी बच्ची पर सो मेरे पास खबर भेजी - "क्या आखिरी समय भी नहीं आएगी?"  
         
                 "मैं वहाँ रहती थी तो छुट्टी नहीं लेती थी इसलिए मैं लम्बी छुट्टी लेकर आई और फिर पापा की बहुत सेवा की किन्तु वह उनका आखिरी समय था और वे भी चले गए । "
         
             "बहनें  मेरी पहले भी मेरी बहुत विरोधी न थी , सबके साथ औपचारिक सम्बन्ध बने हुए थे और आज भी बने हुए हैं।"

         फिर हम लोग उठ कर जब नर्सिंग होम आये तो मैंने सोचा कि निमिषा की सासू माँ से मिलती ही चलूँ। और मैं उसके साथ उसकी सास के पास चली गई। उनसे मेरा परिचय करवाया - "मम्मी जी, ये कीर्ति दी है, आईआईटी में ही काम करती थी, ये तो अभी भी वहीं है। ऊपर इनका कोई घर वाला भर्ती है तो मिल गयी औरआपसे मिलने के लिए आयीं है।"

           उनसे नमस्ते करके मैं वहीं बैठ गयी। चेहरे से बड़ी ही खुर्राट लग रही थी, इस उम्र में भी उनके चेहरे पर चमक थी। मैं इतना कुछ इनके बारे में सुन चुकी थी कि मुझे लग रहा था कि निमिषा कैसे इनके साथ रह रही है?

"आप की तबियत कैसी है?"

"हाँ अब तो ठीक हूँ, काफी आराम हो रहा है।"

"ये आपकी सेवा करती है या फिर ऐसे ही।"

"नहीं, ये मेरी बेटी है तो और बहू है तो इसने मेरी बहुत सेवा की है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि ये मेरी इतनी सेवा करेगी।"
                  
          उनके इन्हीं शब्दों के साथ मुझे लगा कि निमिषा ने वाकई अग्नि परीक्षा पास ही नहीं की बल्कि उसमें तपकर खरा सोना बन कर निकली। 

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

कौन कहाँ से कहाँ (१६)

पूर्वकथा: आशु एक डी एम का बेटा , जो अपनी माँ के निधन के बाद नाना नानी के यहाँ रहा। अपनी पहली पोस्टिंग वाली जगह पर सौतेले भाई से मिला , खून के रिश्ते ने उसको मजबूर कर दिया कि वह उसके लिए कुछ करे , नितिन का भविष्य बनने के लिए अपनी ओर से प्रयास किये और अपनी दूसरी पोस्टिंग वाली जगह पर सौतेली बहन के दुर्भाग्य से भी अवगत हो गया। एक डी एम के बच्चों की इस छोटी उम्र में होती हुई दुर्गति और अपने पापा से जुड़े भावों एन उसको मजबूर कर दिया कि पापा की सभी चीजें वह उन दोनों के लिए वापस दिलवाए । और फिर उसी के लिए नितिन को पापा के ऑफिस में नौकरी और शामली को उस नरक से वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध आशु की आगे की कहानी.............।

सोचा तो ये है कि नितिन और शामली के जीवन को इस काबिल बना दूं कि वे फिर से एक नया जीवन जीसकें. उन्हें भाग्य ने धोखा तो दिया लेकिन उनके लिए इतना कुछ शेष है कि वे उसके सहारे ही एक बहुत अच्छाजीवन जी सकते हैं. इसके लिए मैं कहाँ से शुरू करूँ ये मुझको सोचना था. अभी एक महीने का समय था कि नितिनको नौकरी मिल जाएगी और मैं इतनी जल्दी सब कुछ करना चाह रहा हूँ कि वे अब और इस दल दल में जियें.
मेरा पहला पड़ाव पापा के घर पर ही हुआ, मुझे सबसे पहले उसको खाली करवा कर उसके हक़ कोदिलवाना था. यद्यपि यह काम इतना आसान था. जो लोग इस घर में वर्षों से रह रहे हों वे उसको छोड़ेंगे तो नहींबल्कि उसके लिए साम दाम दंड भेद सब अपना लेंगे. मैंने भी ठान लिया था कि इन लोगों ने जैसे पापा के रहने परमुझे डराया था उसका मजा तो उनको मिलना ही चाहिए. मुझे वहाँ से निकाल दिया था लेकिन कम से कम इन बच्चोंको तो वहाँ रहने दिया होता. लेकिन उनके लिए रिश्ते थे ही कहाँ? जो अपनी बहन को विधवा बना कर संपत्ति कोकब्ज़ा करने केलिए तैयार थे उससे अधिक नीचता और संवेदनहीनता और क्या हो सकती है? उन लोगों को बहन याउसके बच्चों के प्रति कोई भाव हो ही नहीं सकता है.
मैंने पापा के मकान के सारे कागजों के डुप्लीकेट लाने के लिए अपने सारे स्रोत प्रयोग किये क्योंकि मैंसारे प्रमाण के साथ सिर्फ और सिर्फ एक बार उनके सामने जाकर उस मकान को खाली करवाना चाहता था. 'भगवती ' नाम था उसका जिसने मुझे उस दिन फ़ोन किया था.
मैंने पुलिस का सहारा लेकर मकान खाली करने का नोटिस उस तक भेजा लेकिन वो लोग उनमें से तोथे नहीं कि इतनी आसानी से खाली कर देते और फिर कोर्ट का आदेश लेकर उस मकान पर कब्ज़ा करके ताला लगवादिया. लेकिन वे यह पता नहीं लगा सके कि ये काम किसने किया है? मुझे तो अब तक भूल भी चुके होंगे. नितिन केबारे में उनको कोई सूचना थी ही नहीं. शामली जिन्दा है या मुर्दा इससे उनको कोई मतलब नहीं था. मकान में तालालगाने साथ ही उसको तोड़ने पर कानूनी कार्यवाही का नोटिस भी वहाँ चस्पा करवा दिया था.
मेरे दिल में उस घर में रहकर पापा के अहसास को जीने का मन कर रहा था लेकिन उस घर में कैसे औरकब रह सकता हूँ. सारे अधिकार मेरे कब्जे में थे फिर भी मुझे लगा रहा था कि उस पर नितिन का ही हक़ है उसमें मैंकैसे रहूँगा.?
उस घर के हर कमरे में जाकर पापा पापा कह कर चिल्लाने का मन भी कर रहा था. एक बचपने जैसे ख्वाहिशपता नहीं क्यों मन में उमड़ने लगी थी. वो मेरे पापा का घर था शायद इसी लिए. मैं अपने आपको काबू नहीं रख सकाऔर फिर अगले ही सन्डे को मैं वहाँ जा पहुंचा. चाबी मेरे पास थी. माली को मैंने वहाँ से नहीं हटाया था. जैसे ही मैं वहाँपहुंचा और गाड़ी से उतरा तो माली दौड़ कर आया.
'साब , नमस्ते.' उसने पूरी तरह से झुक कर नमस्ते किया.
'कहो कैसे हो?' तुम्हारे मालिक कहाँ गए?'
'साब , एक दिन पुलिस आई थी तो सब को बाहर करके ताला डाल कर चली गयी.'
'फिर वो लोग नहीं आये क्या?'
'आए थे , लेकिन ये कागज पढ़ कर लौट गए , कह गए थे कि फिर आयेंगे.'
'अच्छा इस मकान की अच्छी तरह से सफाई करनी होगी तुम्हें, मैं शाम को फिर से आता हूँ. ' और मैंने उसको मकानकी चाबी पकड़ा दी.
दिन में मुझे और भी काम करने थे, मुझे पापा के बैंक के अकाउंट भी देखने थे. उनके लिए जरूरी कागजभी जुटाने थे. शामली का भविष्य शायद इससे सुरक्षित किया जा सके. शाम तक घर साफ हो चुका था और मैं उसकोबंद करके फिर से वापस फतेहपुर गया .

* * * * *
एक महीने के बाद नितिन को मैंने नौकरी दिलवा दी और अभी उसकी सुरक्षा की दृष्टि से उसको मकानकहीं और लेकर लेने के लिए बोला था. क्योंकि उसके मामा लोगों को उसके लखनऊ आने और नौकरी ले लेने के बारेमें प़ता चल चुका था . उस घर में रहने पर वे उसके लिए कुछ बुरा कर और करवा भी सकते थे. इस लिए मुझे उसकोफिलहाल उस घर से दूर ही रखना था. पापा के एकाउंट का काम होना इतना आसान नहीं था लेकिन मुझे करवाना तोथा ही और फिर वो सारा पैसा शामली के नाम भी कर देना था . जब मैं बैंक मेनेजर के सामने अधिकार के दावे कोलेकर पहुंचा तो उसने मुझे जलील करते हुए यही कहा - मि. माथुर की इस संपत्ति के कितने और दावेदार सामनेआयेंगे. अब तक मैंने दो दावेदारों से मिल चुका हूँ और उनमें से कोई भी दावेदारी के पुख्ता सबूत पेश नहीं कर सकाहै. अब आप एक नए दावेदार बन कर रहे हैं."
"मि. शुक्ल, मैं उन दावेदारों से नहीं हूँ और इसका दावेदार होते हुए भी मुझे इसमें से कुछ भी नहीं चाहिए है लेकिनइसके हक़दार होने के नाते आखिरी बार ये दावा आपके सामने आया है." मुझे कुछ गुस्सा तो आया लेकिन फिर यादआया कि वे भी गलत नहीं है . पहले नितिन के मामा आये होंगे और उसके बाद शामली का पति संदीप. मैंने अपनाविजिटिंग कार्ड मैनेजर को दिया तो वह मेरा चेहरा देखता रह गयाउसके बाद उसने मुझे इज्जत से बिठाया औरमेरी पूरी बात भी सुनीमैंने उसको स्पष्ट कर दिया की मुझे पापा की संपत्ति का क्या करना है? वह संतुष्ट हो गया औरउसने आगे की कार्यवाही देखने के लिए आश्वासन दिया
मुझे शामली के बारे में भी कुछ सोचना था लेकिन उससे पहले उसको उस विवाह से कानूनी रूप से मुक्त भीकरवाने कि प्रक्रिया शुरू करनी थी और उससे पहले उसको उस घर से भी निकलना था. उसको पुख्ता कानूनी तरीकेसे ही उस घर से निकलना होगा और फिर उस विवाह से मुक्ति
अब उसके लिए वह घर सिर्फ यातना घर बन चुका था. चारों तरफ से बंद मकान में वह कैसे रहती होगी? लेकिन उस घर के लिए एक बेपैसे कि नौकरानी भी तो बहुत जरूरी थी. अपने नाना के गैर जिम्मेदाराना निर्णय काखामियाजा वह भुगत रही थी या क्या कहा जा सकता है कि नाना ने अपने जीते जी उस लड़की को ये सोच कर शादीकी होगी कि वह एक एक दिन अपना अधिकार पा लेगी तो सुखी रहेगी क्या प़ता उसके बेटे उसके साथ कैसासलूक करें ? ऐसे लोगों का कोई भी ठिकाना नहीं होता है. जिनके लिए रिश्ते की कोई कीमत होती है और ही खूनका मोल.


सोमवार, 31 जनवरी 2011

कौन कहाँ से कहाँ (१५)

                          पूर्वकथा :                आशु एक डी एम का बेटा जो अपनी माँ की मौत के बाद नाना नानी के घर पला . पिता और सौतेली माँ के एक्सीडेंट में निधन के बाद उसने खुद पापा की तरह आई ए एस बनने का संकल्प लिया   पहली पोस्टिंग वाले बंगले में मिला उसे अपना सौतेला भाई,  ट्रान्सफर होने के बाद वह वहाँ आ पहुंचा जहाँ के पास के गाँव में उसकी सौतेली बहन की शादी हुई थी. ये शादी उसके ससुराल वालों ने पापा की संपत्ति के लालच में आकर की थी और फिर पापा की संपत्ति पर कब्जे के लिए उसके वैरिफिकेशन का दायित्व उस पर आया. आशु ने नितिन को शामली के वैरिफिकेशन के लिए उन्नाव से बुलवा लिया था.  आशु ने बातों हइ बातों में ये जान लिया कि क्या शामली वह घर छोड़ सकती है.. उसके बाद आशु ने अपने , अपनी दीदी और नितिन के नाम से आब्जेक्शन लगा कर सारे कागज़ भेज दिए , जिससे की शामली के पति को कुछ मिल न सके लेकिन वह संदीप के तरफ से किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार था. उसकी पत्नी से आकर धमकाया और बताया की शामली से शादी उसकी सहमति से और जायदाद के लिए ही की गयी है. इसके बाद आशु ने पापा के मकान के लिए कोशिश शुरू की की उस मकान को नई माँ के भाइयों के हाथों से लेकर उसका कब्ज़ा नितिन और शामली को दिलवा दिया जाय.  ..............
गतांक से आगे... 





           अब मेरी समझ में ये बात पूरी तरह से आ चुकी थी कि ये जंग लम्बी तो है लेकिन अजेय नहीं है. इसके कई मुकाबले होने थे. इसमें लखनऊ से नितिन को मकान दिलाने की मुहिम, शामली को उस घर से निकालने की मुहिम और फिर नितिन को पापा के स्थान पर कोई नौकरी दिलाने की मुहिम. इन सब में कितना समय लगने वाला है ये तो मैं नहीं जानता था लेकिन अब जब जंग शुरू कर दी है तो पीछे हटाने का कोई सवाल नहीं था. मैं अब इस काबिल था कि  इन सब जंगों को एक साथ लड़ सकता हूँ.
                        मेरी पहली लड़ाई नितिन को पापा के बदले में कोई नौकरी दिलानी थी. उसको स्थापित करके ही तो शामली को बाहर ला सकता हूँ ताकि वह आगे की जिन्दगी के लिए एक मजबूत सहारे के साथ कुछ अलग सोच सके. इसके लिए मुझे बार बार लखनऊ  के चक्कर लगाने पड़ेंगे. नितिन की ग्रेजुएशन  की  आखिरी साल है . अब सही   मौका है जब  कि  उसको  नौकरी  के  लिए   आगे  बढ़ाना  होगा . पापा  की  मौत  के  इतने  साल  बाद  यह  काम आसान नहीं था  फिर  भी  असंभव  तो  कुछ  भी  नहीं  है 
                            *                          *                            *                             *
                  नितिन के सारे कागजों के साथ पापा के उत्तराधिकारी होने का दवा मैंने पापा के नौकरी से सम्बंधित ऑफिस में जमा कर दिए. ये बात मैंने नितिन और दीदी को भी बता दी थी. इस प्रक्रिया में कई महीने लग गए. इस काम में मुझे पापा के कई समकालीन अफसरों का पूरा सहयोग मिला. मुझे उनको अपना असली परिचय भी देना पड़ा कि मैं भी उनका ही बेटा हूँ लेकिन ये नौकरी मैं अपने छोटे भाई के लिए चाहता हूँ. वैसे तो इस पर बड़े बेटे का हक़ होता है लेकिन मैं स्वयं समर्थ था और मुझे इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी. मेरी बात से सभी सहमत हो गए और इस विषय में जो भी सहायता वे कर सकते थे उसके लिए उन्होंने मुझे आश्वासन दिया. नितिन के सारे काम के लिए मैंने अपने द्वारा ही सारा पत्र व्यवहार किया था और इससे सम्बंधित सारी कार्यवाही मेरे द्वारा ही हो रही थी इसलिए मैंने हर जगह पर उसके समुचित प्रमाण और कागज़ उपलब्ध करा रहा था. 
                               दस महीने तक मेरी मेहनत के बाद नितिन को लखनऊ में डी एम ऑफिस में क्लर्क की पोस्ट मिलने  की सूचना मेरे पास आई. उस कागज को पढ़ कर मेरी आँखों में आँसू आ गए कि कभी मेरे बंगले में मैंने अपने उस भाई को मिट्टी में सने हाथ देख कर ऐसा कुछ नहीं सोचा था कि मुझे ऐसा कुछ करना है लेकिन आज जो परिणाम मेरे सामने है . वह मेरी सबसे बड़ी सफलता है. मैंने नितिन को फ़ोन करके बुलाया. नितिन दूसरे दिन सुबह मेरे पास तक पहुँच गया. 
"जी, आपने मुझे बुलाया था."
"हाँ, नितिन अब तुमको वहाँ नौकरी करने कि जरूरत नहीं है.." 
"क्या मुझे यहाँ पर नौकरी मिल जायेगी?" उसने उत्सुकता से मुझसे सवाल किया.
"नहीं."
"फिर ?" 
"तुम्हें नई नौकरी लखनऊ में मिल रही है और वह भी तुम्हारे पापा के ऑफिस में. वहाँ पर तुम्हें उनके वारिस होने के नाते नौकरी दी जा रही है."
"पर ये हुआ कैसे?" उसके चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित भाव उभर आये थे. 
".क्या कैसे हुआ? इसको मत जानो. बस इतना है कि तुमको अगले महीने की १७ तरीक से लखनऊ आकर अपनी नौकरी ज्वाइन करनी है." 
"फिर उन्नाव से कैसे आऊंगा?" 
"वो मैं देख लूँगा, तुम १६ को मेरे पास आओगे और मैं तुमको लेकर लखनऊ चलूँगा. वहाँ पर तुम्हारी जोइनिंग करवा कर मैं वापस आ जाऊँगा." मैंने संक्षेप में उसको सब कुछ बता दिया.
"मैं अब वापस उन्नाव जाऊं क्या?"
"नहीं , तुम शामली के घर जाकर उससे मिल कर आओ और उसको अपनी नौकरी की खबर भी सुना कर आना." मेरा ये विचार था कि शामली नितिन की नौकरी के बारे में सुनकर खुश होगी और उसको अपने अँधेरे जीवन में एक मजबूत सहारे के आशा का दीपक जलता हुआ दिखाई देगा. 
"और हाँ , वहाँ से लौटकर तुम यहाँ मेरे पास आओगे और उसके बाद ही उन्नाव जाओगे. "
"जी ठीक है." 
                         दूसरे दिन जब नितिन मेरे पास आया तो उसका चेहरा उतारा हुआ था. उसके चेहरे पर निराशा झलक रही थी. 
"क्या हुआ नितिन, शामली से मुलाकात हुई कि नहीं.? " 
"नहीं?"
"क्यों?"
"उनके घर में बाहर से ताला लगा हुआ था, जो कई महीनों से लगा हुआ है"
"क्या ? वे लोग वहाँ से कहाँ गए?"
"वे कहीं नहीं गए? उन्होंने किन्ही कारणों से बाहर ताला डाल दिया और पीछे के दरवाजे से ही निकलते है और बाहर भी कम ही निकलते हैं. "
ये तुम्हें पता कैसे चला?" 
"जब मैंने ताला देखा तो आस पास लोगों से पूछा तो सबने यही बताया और मैं पीछे कि ओर वाले दरवाले से अन्दर गया , उस हिस्से में सिर्फ जानवर रहते हैं और उसमें उन लोगों ने एक खिड़की जैसे बना कर उस रास्ते से निकलने लगे हैं."
"फिर शामली से मुलाकात क्यों नहीं हुई?"
"उसके ससुर ने मुझे मिलने ही नहीं दिया कि वह तो अपने पति के साथ चली गयी है और मुझे बाहर गाँव वालों से पता चला कि वो घर में ही रहती है." 
"ओह तो ये बात है, छोडो फिर कोई दूसरा रास्ता निकालते हैं उससे मिलने का. अभी तुम उन्नाव जाओ, मुझे कुछ इसी बात का अंदेशा था और इसी लिए मैंने तुम्हें वहाँ भेजा था."
"फिर दीदी कैसे मिलेगी हम लोगों को?" 
"मिलेगी , तुम परेशान मत हो. "
                        इसके बाद नितिन वापस उन्नाव चला गया और मुझे आगे के बारे में सोचने का समय मिल गया.

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

कौन कहाँ से कहाँ (१४)

   पूर्वकथा :                आशु एक डी एम का बेटा जो अपनी माँ की मौत के बाद नाना नानी के घर पला . पिता और सौतेली माँ के एक्सीडेंट में निधन के बाद उसने खुद पापा की तरह आई ए एस बनने का संकल्प लिया   पहली पोस्टिंग वाले बंगले में मिला उसे अपना सौतेला भाई,  ट्रान्सफर होने के बाद वह वहाँ आ पहुंचा जहाँ के पास के गाँव में उसकी सौतेली बहन की शादी हुई थी. ये शादी उसके ससुराल वालों ने पापा की संपत्ति के लालच में आकर की थी और फिर पापा की संपत्ति पर कब्जे के लिए उसके वैरिफिकेशन का दायित्व उस पर आया. उसने शामली के पति से उसको लाने के लिए कहा लेकिन वह आनाकानी करता रहा . आशु ने नितिन को शामली के वैरिफिकेशन के लिए उन्नाव से बुलवा लिया था. उसने शामली से सारी स्थिति जान ली. भाई को देखकर शामली बहुत खुश हुई. आशु ने बातों हइ बातों में ये जान लिया कि क्या शामली वह घर छोड़ सकती है.. उसके बाद आशु ने अपने , अपनी दीदी और नितिन के नाम से आब्जेक्शन लगा कर सारे कागज़ भेज दिए , जिससे की शामली के पति को कुछ मिल न सके ..............
गतांक से आगे...                                
 
                            मैंने सबके ऑब्जेक्शन लगा कर भेज दिए. इसके बाद मेरा काम ख़त्म हो चुका था. आगे के लिए जो भी करना था वह बैंक और बाकी लोगों के काम थे. संदीप का क्या होगा? इसकी मुझे कोई परवाह न थी. फिर भी वह आकर इस विषय में मुझसे सवाल जरूर करेगा इसके लिए मैं तैयार था.
                   फिर वही हुआ जिसकी मुझे आशंका थी. संदीप तो नहीं आया उसकी पत्नी आई मेरे पास.
"कहिये मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?" उस अनजान महिला को देख कर मैंने कहा.
"आप ये बतलाइये की आपने मेरे पति को फंसाने के लिए गलत पेपर कैसे भेजे हैं? " उसका स्वर मेरे प्रति कटु और आक्रामक था.
"आप कौन है? मैं आपको नहीं जानता फिर कैसे बता दूं कि मैंने कौन से पेपर और कहाँ भेजे हैं?
"आपने शामली के पेपर पर ऑब्जेक्शन लगाया है, वह मेरे पति से सम्बंधित पेपर थे. उसके बाद मेरे पति का वारंट कटा हुआ है और हम परेशान हैं." उसके तेवर आक्रामक लग रहे थे लेकिन मैं इस बात से पहले से ही वाकिफ था इसलिए मुझे कुछ अजीब नहीं लगा.
"आपको पता है कि आपके पति शामली से शादी कर चुके हैं." मैंने उससे प्रश्न किया.
"हाँ , पता है, उससे क्या होता है? मेरा पति मेरे साथ रहता है , ये मेरे लिए काफी है. घर में कौन रहता है इससे मुझे कुछ लेना देना नहीं." यह सच जानते हुए भी उसमें कोई अपराधबोध नहीं था.
"उस संपत्ति से भी नहीं  जो उसको शामली के पिता से मिलने वाली है."
"उससे क्यों नहीं होगा? मुझसे पूछ कर उसने शादी की थी और इस लिए ही की थी. "
"आपको पता है कि ये अपराध है, दूसरी शादी करना और उससे बड़ा कि किसी की जायदाद के लिए शादी करने का ढोंग करना."
"सब पता है, मेरे घर वाले ऊँची पहुँच वाले है. फिर मुझे गाँव में रहना नहीं है, वह बनी रहेगी , उसके घर वालों की सेवा करने के लिए."
"आप एक औरत होकर ऐसी बात कर रही हैं, क्या ये उसके साथ अन्याय नहीं कर रही हैं."
"ये उसके घर वालों को सोचना चाहिए था, जो बिना पता किये शादी कर दी."
"ठीक है आप जाइए, आगे की कार्यवाही मेरी नहीं है, मैंने वेरीफाई करके भेज दिया. जो सच था वही लिख कर भेजा है. अब आप जाने या फिर वह संस्था जिसको इससे मतलब है या फिर जिसने वैरिफिकेशन माँगा था."
"आप ऐसे कैसे बच सकते हैं, सब आपका ही किया धरा है. मैं आपको यहाँ रहने नहीं दूँगी." वह गुस्से से पैर पटकती हुई चली गयी.
                 अब समझ आया कि कैसे संदीप ने दूसरी शादी कर ली है. संपत्ति का लालच ही उसको ही नहीं उसके पूरे परिवार के लिए इसका कारण बना और शामली का जीवन इसके बीच में बर्बाद हो गया. न नई माँ और पापा के साथ ये हादसा होता और न ही ये बच्चे इस तरह से अनाथ होकर भटक रहे होते. ये भी भाग्य का विधान है. अगला विधान क्या रचा गया है, ये तो नहीं जानता लेकिन ये जानता हूँ कि ये बच्चे इस नारकीय जीवन से मुक्त जरूर होंगे. लेकिन इसके लिए नितिन को पहले वहाँ से निकल कर कुछ और करना होगा तभी वह बहन को सहारा देकर वहाँ से निकल पायेगा. उसके लिए कुछ न कुछ तो जरूर ही करना पड़ेगा.
                           *                 *                 *                    *                     *
               लखनऊ  में जाकर मुझे ही सक्रिय भूमिका निभानी पड़े तो वह भी मैं करने के लिए तैयार था. इसी सिलसिले में मैं पापा के घर पहुंचा तो वहाँ पर एक नौकर था . उस घर में रहने वाले लोग कहीं और गए हुए थे. मेरी गाड़ी देख कर नौकर ने दरवाजा को खोल दिया लेकिन कुछ बताने से इनकार करने लगा.
"साहब , यहाँ जो साहब रहते हैं , वे अक्सर बाहर ही रहते हैं. यहाँ जब होते हैं तो हमें खाना बनाना पड़ता है और हम तो पीछे नौकरों के घर में रहते हैं."
"घर खोलो मुझे अन्दर देखना है." हम सरकार की तरफ से आये हैं ये जानकर उसने घर खोल दिया. जब मैं अन्दर गया तो घर का सारा समान बेतरतीब पड़ा था. मानों यहाँ पर सफाई न होती हो. पापा की तस्वीर तो अलमारी में रखी थी लेकिन उस पर ढेरों धूल चढ़ी हुई थी. अन्दर के कमरों में जाकर देखा तो लगा कि ये सारा सामान लगता था कि महीनों से इसकी सफाई न की गयी हो. कीमती टेबल पर गिलास लुढके  हुए थे . मुझे ये पता है कि इस घर में नई माँ के भाई ही काबिज होंगे और इस घर को उनसे आसानी से नहीं लिया जा सकता है. 
                    यह सब देख कर मन को बड़ी कोफ्त हुई अगर पापा न रहते सिर्फ नई माँ ही बच जाती तो इस घर और इस घर वालों का ये हाल न होता . उस कमरे में मेरे लिए खड़ा होना मुश्किल हो रहा था और मैं निकल कर बाहर आ गया तो सांस ले सका . 
"अपने साहब से कह देना कि ये घर जिनका है वो लोग आये थे. उन्हें ये नंबर  दे देना और कहना कि हम जल्दी फिर आयेंगे." मैंने उस नौकर को अपना नंबर दे दिया . जिससे कि वे लोग हमसे बात तो करें, और उन्हें ये पता चले कि इस मकान और धन के लिए रची गयी साजिश से उन्हें क्या मिला और क्या आगे मिलने वाला है. 
                     लखनऊ आकर मैंने नितिन के सारे प्रमाण के साथ पापा के बदले उसे कहीं नौकरी मिलने के सम्बन्ध में लिखापढ़ी भी की , इससे सिर्फ जायदाद ही नहीं बल्कि उसको नौकरी मिल जाएगी तो वह शामली को वहाँ से निकालने के बाद रख कर अपनी जिन्दगी ठीक से गुजर तो सके . उसके बाद क्या होगा? इसके बारे में मुझे खुद नहीं पता था लेकिन ये जरूर था कि मैं उन बच्चों को ऐसे हालात देना चाहता था कि वे किसी के मुहताज न रहें और एक सामान्य जिन्दगी तो जी सकें.
                                             *                  *                  *                        *
फिर एक दिन शाम को मेरे फ़ोन कि घंटी बजी , दूसरी तरफ से आवाज आई  - "आप कौन साहब है?"
"ये बात मुझे पूछनी चाहिए, क्योंकि आप फ़ोन कर रहे हैं." मेरी अभी तक समझ नहीं आया था कि ये बोल कौन रहा है?
"मैं भगवती बोल रहा हूँ, आप लखनऊ में मेरे घर आये थे और मेरे नौकर को अपना नंबर दे कर कह गए हैं कि इस घर के मालिक हैं. आख़िर आप हैं कौन?"
"मैं कौन हूँ? ये तो बाद में बताऊंगा. पहले आप मुझे ये बताएं कि जिस मकान में आप रह रहे हैं वो किसका है? 
"मेरा है और किसका है?"
"वो मकान प्रदीप कुमार माथुर के नाम है, वही उसके मालिक हुए फिर आप कौन है?"
"मैं उनका साला हूँ, मेरे जीजाजी और दीदी दोनों एक दुर्घटना में नहीं रहे तो तब से इस मकान का मालिक मैं ही हूँ."
"तब तो उस मकान के मालिक प्रदीप कुमार माथुर जी के बच्चे होंगे, आप कैसे हो सकते हैं?"
"उनके कोई बच्चा नहीं है, जो हैं उनका कोई अता पता नहीं है." 
"फिर ठीक है, उनके बच्चों का पता चल गया है और वही उस मकान के मालिक हैं. आप अपना ठिकाना बदल लें कुछ ही दिनों में मैं फिर आऊंगा." 
"इसकी मुझे परवाह नहीं , आप कभी भी आयें न आपको मकान खाली मिलेगा और न ही इसका कोई वारिस है." 
"इसका जवाब तो आपको कुछ दिन बाद मिलेगा." कहकर मैंने फ़ोन बंद कर दिया.
                 



                                 

बुधवार, 17 नवंबर 2010

कौन कहाँ से कहाँ! (१३)

      पूर्वकथा :                आशु एक डी एम का बेटा जो अपनी माँ की मौत के बाद नाना नानी के घर पला . पिता और सौतेली माँ के एक्सीडेंट में निधन के बाद उसने खुद पापा की तरह आई ए एस बनने का संकल्प लिया   पहली पोस्टिंग वाले बंगले में मिला उसे अपना सौतेला भाई,  ट्रान्सफर होने के बाद वह वहाँ आ पहुंचा जहाँ के पास के गाँव में उसकी सौतेली बहन की शादी हुई थी. ये शादी उसके ससुराल वालों ने पापा की संपत्ति के लालच में आकर की थी और फिर पापा की संपत्ति पर कब्जे के लिए उसके वैरिफिकेशन का दायित्व उस पर आया. उसने शामली के पति से उसको लाने के लिए कहा लेकिन वह आनाकानी करता रहा . आशु ने नितिन को शामली के वैरिफिकेशन के लिए उन्नाव से बुलवा लिया था. उसने शामली से सारी स्थिति जान ली. भाई को देखकर शामली बहुत खुश हुई. आशु ने बातों हइ बातों में ये जान लिया कि क्या शामली वह घर छोड़ सकती है................
गतांक से आगे...                   

                      शामली और संदीप के जाने के बाद नितिन ने भी जाना चाहा तो मैंने उसको अपने पास रुकने के लिए कहा. मुझे उससे कुछ बात करनी थी क्योंकि अब तो बाजी जब ईश्वर ने मेरे हाथ में दे ही दी है तो फिर उसके निर्णय के साथ मैं अन्याय क्यों होने दूं? ये बच्चे अभी जिन्दगी के अर्थ को नहीं समझते हैं और दोनों उस नाव की तरह बहे जा रहे  हैं जिसके कोई मांझी है ही नहीं. जिसके लिए जीना इस लिए जरूरी है क्योंकि ये जिन्दगी है , बाकी उन लोगों ने जीवन जिया कहाँ है? इस जीवन का भविष्य भी क्या है? इसका भी उनको नहीं पता है.
"नितिन, मुझे इस बारे में कुछ सोचना पड़ेगा, शामली की हालत तुमने देख ली है."
"पर क्या हो सकता है? मैं तो कुछ भी नहीं कर सकता हूँ." नितिन जो उम्र से छोटा तो था ही और उसका बचपन से इस उम्र तक इस तरह से बीता कि  शेष दुनियाँ क्या है इसके बारे में उसको कुछ भी पता नहीं है. सिर्फ सिर पर एक छत और खाने के लिए रोटी मुहैय्या हो ऐसा ही वह कर पा रहा है. अपने हक़ और शेष चीजो से वह वाकिफ ही कहाँ है?
"हो सकता है, तुम्हारे पापा का पैसा और उनके बदले कोई भी नौकरी तुमको मिल सकती हो ."
"अब इतने दिन बाद कौन देगा मुझे? फिर इसके बारे में कुछ भी नहीं जानता हूँ? कहाँ जाना होगा? कैसे क्या होता है? " उसने अपनी मजबूरी बता दी थी.
"ये मुझे पता है, लेकिन जब देख रहा हूँ कि तुम्हारे और तुम्हारी बहन के अधिकारों को कोई और छीनने के लिए तैयार है तो मैं जो भी कर सकता हूँ करूंगा." मैं उसको आश्वस्त कर देना चाहता था कि वह अकेला नहीं है.
"इसमें मुझे क्या करना है?" उसको लगा कि मेरा हाथ उसके भविष्य के प्रति कुछ कर सकता है.
"तुम्हें अपने हाई स्कूल के सर्टिफिकेट को लाना होगा."
"वह तो मैंने लिया ही नहीं, उसी स्कूल में पड़ा होगा."
"मार्कशीट तो होगी, वह ही लगा दो."
"हाँ , वह जरूर है. वह तो उन्नाव में है."
"ठीक है, तुम अगले सन्डे उसको लाकर मुझे दे दो , मैं कुछ करना चाहता हूँ."
"इससे दीदी के ऊपर कुछ तो नहीं होगा? वे लोग पैसे के लिए ही तो दीदी को घर में रखे हुए हैं." उसे इससे पहले अपनी बहन का ख्याल आया कि उसका क्या होगा?
"देखो, दीदी वहीं रहेगी, अगर पैसा उन लोगों ने ले लिया तब भी दीदी कि हालत में कोई सुधार नहीं होने वाला है. संदीप बहुत चालाक इंसान है."
"फिर?"
"फिर कुछ नहीं, आगे देखते हैं कि क्या हो सकता है? शामली को वहाँ से निकाला भी जा सकता है."
"फिर कहाँ जाएगी वह? मैं तो अपना ही गुजारा   नहीं कर पाता हूँ."
"इसकी चिंता मत करो, जब मैं शामली को वहाँ से निकालूँगा तो उसके लिए शेष चिंताएं भी कर लूँगा. पापा का पैसा उसके नाम करवा दूंगा तब तुम भाई बहन किसी के मुहताज नहीं रहोगे." मैंने अपने सोचे हुए का संक्षिप्त उसको बता दिया.
"और उसकी ससुराल वाले?"
"तुम उसको ससुराल कहते हो, पति शहर में दूसरी पत्नी के साथ रहता है और वह घर में नौकरानी बनी  हुई है और वह भी पैसे की मालिक है इसलिए रखा हुआ है उसको."
                    अच्छा अब तुम गेस्ट रूम में जाकर सो जाओ. कल सुबह निकल जाना.
             नितिन को सोने के लिए भेज दिया. मैंने भी सोने के लिए चला किन्तु आँखों में नीद कोसों दूर थी. ये नितिन और शामली दोनों ही मेरे सामने दया के पात्र  बने हुए थे. वे बिना माँ बाप के बच्चे जिनके सिर पर कोई भी हाथ नहीं है. बस जिए जा रहे हैं क्योंकि उनको ईश्वर ने इस हालत में जीने के लिए छोड़ दिया है. उनके अधिकारों पर कितने लोग ऐश कर रहे हैं. उनका अपने पापा का घर कोई और कब्ज़ा करके बैठा है और उनके पैसे पर किसी और की गिद्ध निगाह लगी हुई है. उनके भाग्य में तो कुछ भी नहीं है. फिर मुझे लगा कि इनका हक़ मैं दिलवा सकता हूँ और जो कष्ट उनके भाग्य में लिखा है उसको कम किया जा सकता है. अगर जरूरत पड़ी तो कभी उनको अपने होने का आश्वासन भी देना पड़ा तो दूंगा. मगर वह वक्त आने पर.
                    मैंने सोचा कि  दी से इस बारे में अब चर्चा की जा सकती है. और मैं दी को कॉल करने लगा.
"दी, मैंने नितिन और शामली के बारे में एक फैसला किया है."
"कैसा फैसला?"
"ये कि अब पापा के पैसों और संपत्ति के लिए शामली के पति ने अपना हक़ पेश किया है और वह भी नितिन को इग्नोर करके."
"फिर अब क्या करना है?"
"अब करना क्या है? इस पर एनओसी देने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है. बल्कि इस पर नितिन , मैं और आप सभी के ऑब्जेक्शन मैं भेजने वाला हूँ. "
"मेरा और अपना क्यों?"
"इस लिए कि हम भी इसके हक़दार हैं."
"क्या बात कर रहे हो आशु?"
"मैं ठीक कह रहा हूँ, मुझे और आपको कुछ चाहिए नहीं लेकिन शामली के पति को सबक देना जरूरी है."
"तुम शामली से मिले?"
"हाँ मिला और उसके हालात  भी देखे, उसको घर में नौकरानी बना कर रखा है और खुद पहली पत्नी के साथ शहर में रहता है."
"क्या?"
"हाँ , यही उसने सिर्फ संपत्ति के लालच में शादी की और उसको गाँव में अपने माँ बाप कि सेवा के लिए नौकरानी बना दिया."
"ये कैसे हो सकता है?"
"ऐसा ही है."
"फिर कैसे क्या करोगे?"
"आप एक पेपर पर साइन करके मुझे भेजिए मैं आपका और अपना ओब्जेक्शन एक साथ लगा दूंगा ."
"इससे क्या फायदा?"
"ये कि पापा के चार वारिस हैं और हम शामली और नितिन के हक़ में नो ऑब्जेक्शन दाखिल करेंगे."
"शामली के घर वाले ?"
"उनसे हमें और तरीके से निपटाना होगा. लेकिन ये काम अब मेरा नहीं बल्कि सरकारी कार्यवाही हो जाएगी कि बाकी वारिसों के होते हुए उन्होंने अकेले वारिस होने का दावा किया ये एक अपराध है."
"तब तो शामली पर मुसीबात आ सकती है."
"वो मैं देख लूँगा , मैंने सब सोच रखा है."
"अच्छा , अब आशु इतना बड़ा हो गया."
"जी, मैं ऐसे ही नहीं अपना काम संभाल रहा हूँ."
"अब समझी कि अब मेरा भाई सयाना हो गया है."
"दी, आप उतना काम करके मुझे भेजिए  क्योंकि मुझे इन कागजों के साथ ही सारे ऑब्जेक्शन भी लगाने हैं."
"ठीक है, मैं भेजती हूँ."
                  दी को बता कर दिल कुछ हल्का भी हुआ और यह भी तय कर लिया कि आगे क्या करना है? बगैर सामने आये हुए कुछ भी नहीं होगा और इन सब चीजों को सिर्फ ओफ्फिसिअल स्तर पर ही रखना है और नितिन या शामली को कुछ भी नहीं बताने का इरादा था. फिर पता नहीं कब सोचते सोचते सो गया.