शनिवार, 21 जनवरी 2023

ये दोस्त और दोस्ती !

 विजय बहुत दिनों के बाद अपने कस्बे वापस आया था क्योंकि अब उसके पिता या और घर वाले यहाँ पर नहीं रह गए थे। बंचपन की गलियाँ, खेल के मैदान और स्कूल भी नहीं रह गये थे।  

            बस एक दोस्त था और उसकी माँ थी , जिसने अपनी माँ के बचपन में ही चले जाने पर उसे दीपक की तरह ही प्यार दिया था। स्टेशन पर लेने के लिए विजय को दीपक ही आया था क्योंकि उसे विजय से मिले हुए बहुत वर्ष बीत गए थे।

       अब दोनों ही रिटायर्ड हो चुके हैं। विजय ने ट्रेन से उतरते ही दोनों हाथ फैला दिए गले लगाने के लिए और यह भूल गया कि दीपक का एक हाथ कटे हुए तो वर्षों बीत चुके हैं। एक पल में दीपक की कमीज की झूलती हुई आस्तीन ने उसको जमीन कर लेकर खड़ा कर दिया।

       बीस साल से पहले की बात है दीपक ट्रेन से गिरा और उसका हाथ कट गया। तब छोटी जगह में बहुत अधिक सुविधाएँ नहीं हुआ करती थीं और न ही हर आदमी में इतनी जागरूकता थी। वह कई महीने अस्पताल में पड़ा रहा और उसका इलाज चलता रहा घाव भर नहीं रहा था । फिर पता चला कि सेप्टिक हो गया है। तब जाकर डॉक्टर सचेत हुए लेकिन उस कस्बे में वह इंजेक्शन नहीं मिल रहा था बल्कि कहो पास के शहर में भी उपलब्ध नहीं था। उस समय फ़ोन अधिक नहीं होते थे। विजय दूर कहीं चीफ इंजीनियर था , खबर उसके पास ट्रंक कॉल बुक करके भेजी गयी शायद वह वहाँ से कुछ कर सके। बस वही एक आशा बची थी।

            विजय ने खबर सुनते ही अपने एक मित्र को बम्बई में फ़ोन करके उस इंजेक्शन को हवाई जहाज से भेजने को कहा। जैसे ही उसे इंजेक्शन मिला वह अपनी गाड़ी और एक ड्राइवर लेकर निकल पड़ा। सफर बहुत लम्बा था इसलिए एक ड्राइवर साथ लिया था। १४ घंटे की सफर के बाद विजय दीपक के पास पहुंचा था।

            "डॉक्टर इसको कुछ नहीं होना चाहिए। अगर आप कुछ न कर सकें तो अभी बताएं मैं इसको बाहर ले जाता हूँ।"

         "नहीं, इस इंजेक्शन से हम कंट्रोल कर लेंगे। अगर ये अभी भी न मिलता तो हम नहीं बचा पाते।"

        दीपक बेहोशी में जा चुका था। दो दिन बाद वह होश में आया तब खतरे से बाहर घोषित किया गया। होश में आने पर उसने विजय को देखा - 

"अरे तू कब आया।"

'दो दिन पहले, तू अब ठीक है न?"

"अरे मैं तो तुझे आज ही देख रहा हूँ।"

"तूने इससे पहले आँखें कब खोली थीं।"  विजय उसका हाथ पकड़ कर बैठ गया था।

         विजय को दीपक की पत्नी , बच्चे और माँ ने दिल से दुआएं दी कि अगर उसने इतना न किया होता तो शायद दीपक????????।

       एक सच घटना है और कटु सत्य कि मित्र वही है, जो अपनी मित्रता को धन और स्तर से न आँके।

बुधवार, 24 अगस्त 2022

सामंजस्य!

 बेटा बहू विदेश से आ रहे थे तो मीनू ने पूरी व्यवस्था कर ली कि यहाँ परेशानी हुई तो पास के होटल में कमरा बुक भी रहेगा, आराम से रहेंगे।

             रचित और रचना के आने से रौनक आ जाती है। मीनू को भी बहुत इंतज़ार रहता है। बच्चे आ गये तो रचना ने अपना सामान अपने पुराने कमरे में जमा लिया। जब सब लोग नाश्ते के लिए बैठे तो मीनू ने ही कहा -

       "तुम लोगों को यहाँ जरा सी भी तकलीफ हो तो मैंने दूसरी व्यवस्था भी कर रखी है, पास के होटल में कमरा बुक है, वहाँ जाकर सो सकते हो।"

    "क्यों ऐसा क्यों?" बहू-बेटा एक साथ बोले।

"वैसे ही कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए।"

"माँ हम यहीं वर्षों रहे हैं, कुछ भी बदला नहीं है।"

"ठीक ठीक है।"

            "माँ दीदी को भी बुला लें, कुछ दिन सब साथ रह लेंगे।"

"बुला ले, खुश हो जायेगी।"     

     एक हफ्ते सब साथ रहेंगे और पुराने दिन याद करते हुए मस्ती करेंगे।

"एक ही हफ्ते क्यों? तुम्हें एक महीने रहना है न इंडिया में।" माँ कुछ तीखे स्वर में बोली।

         रचना ने चौंक कर माँ को देखा और फिर रचित को।

    "एक हफ्ते बाद रचना अपनी मम्मी के पास जायेगी और अपने भाई, बहनों के साथ एंजॉय करेगी।" रचित ने स्पष्ट किया

" और तू ?"

"मैं यहीं आपके साथ रहने वाला हूँ और चाचा बुआ से भी मिल लूगाँ।"

"ये कब आने वाली है?"

"दो वीक वहाँ रह लेगी और मै एक वीक वहाँ जाकर रहूँगा फिर इसको लेकर वापस आ जाऊँगा।"

"ये मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।"

"सीधी सी बात है, रचना दो वीक आपके साथ और दो वीक अपनी मम्मी के साथ रहेगी। मैं एक वीक रचना के घर और तीन वीक आपके साथ रहूँगा।"

"ये क्या बात हुई? ये बराबर दोनों जगह रहेगी , अपने घर में रहना चाहिए, मैं कितनी बेसब्री से इंतजार कर रही थी तुम लोगों के आने की और साथ कितना मिल रहा है।" माँ की आवाज़ के तीखेपन से उनकी गुस्सा समझ आ रही थी।

"बराबर मिल रहा है, उसे भी अपनी माँ के साथ रहने का समय चाहिए। मै तो तीन वीक आपके साथ रहूँगा न।"

  "नहीं ये एक वीक रहकर वापस आ जायेगी, बुआ वगैरह भी आ जायेंगी तो रह लेंगी।" मम्मी ने सुझाव रखा।

     "सारे रिश्ते उसके भी है और वह भी सबके साथ रहना चाहेगी, इसलिये यही सही है, जो मैंने कहा है।"

       रचित उठकर चला गया।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

इंतजार!

 रचित छुट्टियाँ खत्म करके अपनी सेना की सेवा में वापस जा रहा था और रीमा उसको दरवाजे तक छोड़ने आई तो --

    "तुम अब अंदर जाओ रीमा, मेरे पैरों में हमारा अंश बेड़ियाँ बन रहा है।"   रचित तिरछी नजर से देखता हुआ मन ही मन सोच रहा था।

      रीमा मन ही मन आश्वासन दे रही थी - "जाओ रचित मैं तुम्हारी आने वाली पीढ़ी को सहेज कर रखूँगी और आने पर तुम्हें सौंप दूँगी।"

       "तुम नहीं जानती रीमा, सीमा पर जाना मेरे वश में है, लेकिन वहाँ से वापस आना तुम्हारे भाग्य से होगा।" मन में एक द्वन्द्व लिए रचित भारी कदमों से आगे बढ़ रहा था।

      "तुम बेफिक्र होकर जाओ, मेरी साधना और तुम्हारा राष्ट्र समर्पण सदैव कवच बन कर रहेगा।"

         एक मूक संवाद करते दोनों आपस में दूर विपरीत दिशाओं में बढ़ गये।


रेखा श्रीवास्तव

सावन के झूले!

 सावन के झूले!


        बगीचे में पड़ा झूला भी सावन का इंतजार करता है कि कब उस पर झूलने बच्चे आयेंगे पार्क खिलखिलाहटों से गूँजने लगेगा। 

      हरियाली तीज को तो झूला खाली नहीं रहता है। 

       पर ये क्या सारा दिन गुजरा जा रहा है, बच्चियाँ न आईं झूलने। सारे पेड़ प्रश्नवाचक दृष्टि से एक दूसरे को देख रहे थे।

   "क्यों भाई सावन आधा निकल गया और झूले खाली पड़े है।" शीशम का पेड़ बोला।

    "क्यों भाई जमाने से बेखबर हो क्या?" नीम के पेड़ ने समझाया।

     झूला झूलने की ललक ललक ही रह जाती हैं, लेकिन माँ-बाप डर के मारे न भेजते है। समाज के वहशी दरिंदों का डर समाया है।"

    "बात तो सही है, पता नहीं क्यों भटक गया इंसान, न उम्र, न रिश्ते और न ही पास पड़ोस का लिहाज रह गया है।"

  "अब तो ऐसा ही होना है कि मेले, झूले सब सूने ही रहेंगे और वे जंगली कुत्ते ही मंडराया करेंगे।"

   "बस कर भाई अब सुना नहीं जाता है।"

   "देख और सुन सब रहे हैं, बस बच्चों का नैसर्गिक विकास छीन कर उन्हें नेट से बाँध दिया है।"

           अब इन झूलों के दिन गये, कहो कल म्यूजियम में दिखलाये जायें ।


-- रेखा श्रीवास्तव

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

कलम का ईमान !

                                                       कलम का ईमान !

                             अख़बारों में निकल रहे लेखों और शोध रिपोर्टों के चलते वह कई सम्पादकों की निगाह में चढ़ गया था। अपनी कलम की बेबाक गति के चलते  लोगों में लोकप्रिय भी हो रहा था। 

                             एक दिन उसके पास फ़ोन आया , एक अखबार के संपादक की तरफ से था - 

"जी मयंक जी बोल रहे हैं। "

"जी, बोल रहा हूँ, कहिये आप कौन?"

"मैं युवाजंग पत्र का ओनर बोल रहा हूँ।"

"कहिए मैं आपके किस काम आ सकता हूँ?"

"कल आप मेरे ऑफिस आने का कष्ट करेंगे? गाड़ी मैं भेज दूँगा, बस आप लोकेशन बता दें।"

"आप बतलाइये, मैं खुद आता हूँ।"

"जी धन्यवाद!"

                    मयंक पत्र के कार्यालय पहुँचा तो उसका बड़ा स्वागत हुआ।  फिर वह मुद्दे की बात पर आये तो कहा गया कि आप पत्र का संपादन सँभाल लें।  वर्तमान संपादक की कलम उतनी दमदार नहीं है कि...। 

"लेकिन मैं किसी की जगह कैसे ले सकता हूँ?"

"मैं आपको दुगुना वेतन दे सकता हूँ।"

"सोच कर बताऊँगा। "

          यह कहकर मयंक घर आ गया।  पत्र के वर्तमान संपादक को ये बात पता चल गयी, लेकिन वह विवश था फिर भी उसने एक बार मयंक से बात करने की हिम्मत की - "भाई मेरे पेट पर लात मत मारिएगा। जीवन भर उनकी सेवा की और अब चंद सालों के लिए न शहर छोड़ सकता हूँ और न परिवार।"

"भाई बेफिक्र रहो मैं वहाँ नहीं जा रहा हूँ।"

         एक हफ़्ते बाद मालिक का फ़ोन आया कि आपने क्या सोचा ?

"सर आपको मेरी कलम पसंद है और वह सच्चाई और बेबाकी मेरी अपने कलम का ईमान है, लेकिन वो किसी और की रोटी नहीं छीन सकती।"

शनिवार, 20 नवंबर 2021

अहम् !

अहम् !

       शानू हमेशा गुमसुम रहता था । किसी के साथ रहना या खेलना उसको पसंद नहीं था ।उसकी टीचर और वार्डन ने बहुत कोशिश की, लेकिन शानू क्लास के बाद अकेले रहना पसंद करता ।  

        मम्मी-पापा के बीच बढ़ती दूरियाँ कहीं उसे न छू लें क्योंकि बच्चे संवेदनशील होते हैं वह अपने आस पास की आहटों को पहचान लेते हैं । इसीलिए उसे हॉस्टल में रखा गया था। वह एक भावनात्मक चक्रव्यूह में फंसा हुआ था।

           वार्डन ने उससे उसकी खामोशी का कारण जानना चाहा, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला ।  हॉस्टल में कभी पापा मिलने आते तो कभी मम्मी , दोनों एक साथ कभी न आये । वार्डेन इसको दोनों के कामकाजी होने को इसका कारण मानने को तैयार न थी ।

            वह हॉस्टल जरूर आ गया था लेकिन वह मम्मी पापा की लड़ाई में ख़ुद को कहीं नहीं पाता था । उनकी अपने अहं की लड़ाई थी और जब उनके कमरे से गलत शब्दों की आवाज़ें कान में पड़ती तो वह कान में अँगुली ठूँस कर लेटा रहता । उस बाल मन को कोई रास्ता न सूझ रहा था । वह इस लायक था भी नहीं।

          स्कूल की काउंसलर ने शानू के पास आकर बात की और फिर उसको बताये बिना ही उसके माता पिता को बुलाकर काउंसलिंग की और कहा - "इसके बचपन को अपने अहं की बलि न चढ़ायें । साथ रहें या न रहें लेकिन इसके जीवन सँवरने तक यहाँ साथ आयें और मिलें । उसके समझदार होने तक छुट्टियों में उसके घर होने पर साथ जरूर रहें । बस किशोर वय निकलने तक ।"

     इस बार मम्मी पापा को साथ आया देख कर उसकी आँखों में चमक दिखाई दी , जो एक नयी आशा से भरी थीं । वह अपने मन के चक्रव्यूह को भेदने से खुश था.

रविवार, 7 नवंबर 2021

आठ हाथ !

                  नीना की लापरवाही से उसकी तबियत बिगड़ गयी और स्थानीय डॉक्टर्स ने हाथ खड़े कर दिए,  तब  ललित ने अपनी बहन को फ़ोन किया - "दीपा तेरी भाभी की तबियत कुछ समझ नहीं आ रही है , क्या करें ? भैयाजी से पूछ कर कुछ राय दे। "

- " भैया आप ऐसा करें कि भाभी तो यहाँ मेरे पास ले आइये। "

                               नीना को बहुत भयंकर पीलिया हुआ था, जिसे डॉक्टर समझ नहीं पाए और वह दवा लेते ही लेते और बढ़ गया। ललित की बाकी तीनों बहनें भी बारी बारी से देखने के लिए आ रही थीं और अपने भाई को सांत्वना देती कि भाभी ठीक हो जाएंगी।  उसे भी अपनी बहनों पर बहुत भरोसा था , कैसी भी परेशानी हो वे चारों और उनके पति कंधे से कन्धा मिला कर खड़े होते। इसी लिए वह आश्वस्त था कि  नीना यहाँ से ठीक होकर ही घर जायेगी। 

               ललित अस्पताल में नीना के सिरहाने बैठा था और उसका हाथ में हाथ लेकर बोला - " तुम्हें अपने तीन भाइयों पर फ़ख्र हो न हो लेकिन मुझे अपनी चारों बहनों पर फ़ख्र है।  कभी जिन्हें मैं जिम्मेदारी समझता था, उन्हीं के आठ हाथ आज तुम्हारे लिए दुआ कर रहे हैं। "

                  नीना आँखें नहीं मिला पा रही थी क्योंकि एक दिन उसी ने कहा था - "इन चार चार ननदों  को कहाँ तक निभाऊंगी ?"