मंगलवार, 10 अगस्त 2010

नियति के थपेड़े! (अंतिम कड़ी)

"विनोद के साथ शादी होने के नवें महीने ही मैंने निधि को जन्म दिया था. उसकी सूरत एकदम सुरेश पर गयी थी. दोनों शादियों में अंतर ही कितना था? विनोद ने इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन मैं इस बात को समझ गयी थी कि ये सुरेश की ही निशानी है. जब निधि कुछ बड़ी हुई तो विनोद ने एक दिन मजाक में कहा - 'यार निधि कि सूरत न तो मेरे जैसी है और न ही तुम्हारी जैसी ऐसा तो नहीं कि ये किसी और की बेटी हो.'  मैं उस समय क्या कहती? न सफाई में और न ही गुनाह में. मैं शादी के बाद फिर कभी मायके गयी ही नहीं थी. न ही और भाई बहनों की  शादी में उन लोगों ने बुलाने की  जरूरत समझी. कभी कभी भाई साहब  जरूर ले जाते ताकि विनोद को शक न हो और मेरे लिए जाना भी जरूरी हो जाता था. "
"तुम्हें कभी इस बात का अपराध बोध नहीं हुआ?" मैं उसके मन की बात जानना चाहती थी.
"अपराध बोध किस बात का? मैंने अपनी मर्जी से ये शादी नहीं की थी. सुरेश और हमने शादी की थी तो निधि का होना मैं तो कोई गुनाह नहीं समझती थी. हाँ यह बात और थी कि वह विनोद की बेटी कहला रही थी. लेकिन ये सच भी बहुत जल्दी ही सामने आ गया. तब निधि ४ साल की थी. मेरे एक कालेज फ्रेंड भी उसी जगह पहुँच गयी थी. कभी कभी  आ जाती थी. लेकिन दिन में न विनोद होते और न ही निधि. और जो हुआ उसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था. वैसे इसमें मैं किसको दोष दूं? ये तो मेरे भाग्य के लेख थे जो मेरे लिए भुगतने जरूरी थे. एक दिन  वह  छुट्टी वाले दिन आ गयी , मैं  और  वह   ड्राइंग रूम  में बैठे  बात कर रहे थे. विनोद   निधि के साथ बेडरूम में  खेल रहे थे. निधि अचानक दौड़ती हुई मेरे पास आ गयी और निधि को देखती ही मेरी सहेली मुझसे बोली -- 'रीना , यह तो बिल्कुल सुरेश ki तरह है, कहीं ये उसकी ही बेटी तो नहीं है?'  स्वीकार करने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था लेकिन मुझे ये पता नहीं था कि निधि के साथ विनोद भी दरवाजे तक आ गया था. "
                  "उसके बाद विनोद गुमसुम रहने लगा, महीनों बीत गए मैं सब कुछ समझ चुकी थी लेकिन मैं विवश थी. मैंने अपने ४ साल के वैवाहिक जीवन में विनोद को पहली बार शराब पीते हुए देखा. इसके लिए मैं अपने को दोषी मान रही थी लेकिन मैं इसमें कहाँ तक दोषी थी? इसका निर्णय कोई दूसरा ही कर सकता है. मैंने उससे कारण जानना चाहा - 'तुम्हें आख़िर  हुआ क्या है? क्यों पीने लगे हो? कौन सा गम है?'
'ये तुम मुझसे पूछ रही हो, यही तो गम है कि तुमने मुझे धोखा क्यों दिया?' वह कम आहत नहीं था.
'मैंने कोई धोखा नहीं दिया है?' इससे अधिक कहने के लिए मेरे पास कुछ था ही कहाँ?
'निधि उसकी बेटी है, जिसे मैं जानता नहीं लेकिन जरूर किसी पाप का फल है."
"नहीं, मैंने उससे कोर्ट मैरिज की थी, निधि उसकी ही बेटी है." मेरे सामने सच बयान करके खुद को अपराध बोध से मुक्त करने का अब अवसर आ ही गया था.
"पहले क्यों नहीं बताया? मैं तुम्हें खुद ही मुक्त कर देता."
"लेकिन मैं कहीं नहीं जाना चाहती, इतने वर्षों से मैं तुम्हारी हूँ और अब तुम्हारी ही रहना चाहती हूँ."
"लेकिन मैं कैसे अपने को समझाऊं  कि तुम मुझसे नहीं किसी और से भी प्यार करती रही हो.तुम मेरी तरफ से स्वतन्त्र हो और कहीं भी जा सकती हो, यहाँ रहना चाहो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन अब हमारा कोई भी सम्बन्ध नहीं रहेगा. " विनोद ने अपना निर्णय सुना दिया था लेकिन मैं सोच रही थी कि हम इतने सालों साथ रहे हैं और एक दिन विनोद जरूर मुझे माफ कर देगा. लेकिन ये मेरा भ्रम निकला, विनोद पत्थर कि तरह से कठोर हो चुका था. उसकी पीने की सीमा बढ़ने लगी थी. और जो निधि पर अपनी जान छिड़कता था उसने निधि से बात करना बंद कर दिया.अगर कभी वह बच्ची अपनी ओर से जाकर उससे लिपट जाती तो वह बुरी तरह से झिड़क कर उसको अपने से अलग कर देता था.  उस बच्चीके अभी अर्धविकसित मष्तिष्क  पर क्या असर पड़ेगा ये सोच कर मैंने उसे देहरादून हॉस्टल में डाल दिया. "
                "इसके बाद मैंने भी उस घर को छोड़ने का फैसला कर लिया, मैं न माँ बाप के पास गयी और न ही भाई के पास - इतना अवश्य किया कि उनको एक पत्र   लिखा कि मुझे कहीं नौकरी दिलवा दीजिये. उन्होंने मुझसे ये नहीं पूछा कि मुझे नौकरी की जरूरत क्यों है? और न ही मैंने उनको बताने कि जरूरत समझी. भाग्य ने साथ दिया और मैं यहाँ आ गयी हूँ और अब कहीं नहीं जाना चाहती."
         "लोगों के बीच एक पहेली बन कर रह गयी हूँ. . कौन मेरा विश्वास करेगा? सिवा उपहास के कुछ न मिलेगा. निधि के लिए जिन्दा रहना होगा. विनोद से मुझे कोई शिकायत नहीं, ईश्वर करे कि वह किसी और से शादी करके सुखी रहे. मेरे भाग्य में तो सुख लिखा ही नहीं था. सोचती हूँ कि अगर मैं किसी गरीब घर में पैदा हुई होती तो शायद इस तरह बेघर न हुई होती क्योंकि  तब मुझे कोई सुरेश से अलग न करता. एक बड़े परिवार में जन्म लेने की सजा मैं भुगत रही हूँ - यही सौगात है एक बड़े और प्रतिष्ठित परिवार की. एक बसता हुआ आशियाँ उजाड़ कर दूसरा बसाया था और वह भी उजड़ गया."
                                इतना कह कर रीना ने कुर्सी से सिर टिका कर  आँखें बंद  कर लीं. बहुत थक गयी थी, इतना सब झेलते हुए या अपनी कहानी दुहराते हुए , कह नहीं सकती.    

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  2. अब कहने को बचा ही क्या है……………ये समाज अन्धा है ……………ज्यादा कहने की स्थिति मे तो मै भी नही हूँ।

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  3. अपनों द्वारा दिए गये जख्मो को भरती हुई एक स्त्री की करुण कथा |

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.