मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (3)

"साब, चाय लाऊं क्या?" दयाल पूछ रहा था.
"हाँ , थोड़ी देर में ले आना."
"साब, नाश्ता कितने बजे लेंगे?" 
"आज मुझे जाना नहीं है, घर पर ही रहूँगा और यहाँ के और ऑफिस के लोगों से जान पहचान करूंगा." मैंने उसको बता दिया था कि मैं घर पर ही हूँ. अभी मुझे आये कुछ ही दिन हुए है, पहले तो गेस्ट हॉउस में रहा जब बंगला खाली हो गया तो सामान मंगवा कर यही शिफ्ट हो गया. अभी सबसे मेरा ठीक से परिचय भी नहीं हुआ था. बस चौकीदार और खानसामा दयाल से ही अधिक साबका पड़ता है इस लिए उनको जानता हूँ. 
                      आज मैं सबसे परिचित होना चाहता हूँ कि जो मेरे लिए काम करते हैं वे कैसे हैं? उनके घर परिवार के लोग क्या हैं? काम से काम उनको नाम से तो बुला सकूं. यहाँ भी सभी के परिवार हैं. इस बंगले में रहने वालों के बच्चे यदा कदा बाहर नजर आ जाते हैं और फिर कोई उनको डपट कर अन्दर कर लेता है  कि साहब गुस्सा होंगे. यही सोच कर कि सबसे पहचान हो जाये और सब मुझे भी पहचान लें.
                    उठने में बड़ा आलस आ रहा था लेकिन अभी दयाल चाय लेकर आ जायेगा और मैं बिस्तर में तो अच्छा नहीं लगता है . फिर नानी ने बचपन से आदत डाल रखी थी कि कोई भी बगैर नहाये नाश्ता भी नहीं करेगा. इसलिए सुबह तो जल्दी ही सारे काम से फ्री हो जाता हूँ फिर उसके बाद कुछ भी करो.
                दयाल चाय लेकर आ चुका था और मैं बाथरूम से बाहर आ रहा था. वह कुछ देर ठिठका कि शायद साहब कुछ कहें. मुझे उसको बताना भी था कि आज सबसे परिचय का दिन है.
               "दयाल जी, आज मैं नाश्ते के बाद बाहर लॉन में बैठूंगा और इस बंगले में काम करने वाले सभी लोगों से मिलूंगा. सिर्फ लोगों से ही नहीं बल्कि उनके परिवार वालों से भी. मुझे पता होना चाहिए कि यहाँ कितने लोग रहते हैं और कौन क्या करता है?"
"साहब कितने बजे तक?"
"मैं ११ बजे तक तैयार हो जाऊँगा और आप सभी लोग उसी समय आ जाए."

"ठीक है साहब मैं सबको बता देता हूँ." कह कर दयाल चला गया.    
  
                               *                            *                              *                              *                             *


                         ११ बजे जब मैं लॉन में पहुंचा तो सभी लोग वहाँ थे और अपने अपने परिवार के साथ अलग अलग बैठे थे. उन सब को देख कर लग रहा था कि इस बंगले के परिसर में कितने सारे लोग रहते हैं? शायद ये एक कमरे में ही रहते होंगे या फिर और कुछ जगह होगी और मेरे लिए इतना बड़ा बंगला और रहने वाला सिर्फ मैं? ये भी तो अपनी अपनी किस्मत होती हैं.
"दयाल जी, आप सबसे पहले आइये." मैंने दयाल को ही बुलाया.
"जी साब," और दयाल अपने परिवार के साथ आ गया , उसके साथ उसकी पत्नी , एक बड़ी बेटी जो करीब १५ साल कि होगी और २ उससे छोटी थी.
"हाँ सबसे हमारा परिचय तो कराइए."
"साब, ये हमारी घरवाली मीना, ये बड़ी बिटिया शालू, और ये दोनों जुड़वां है कम्मो और मम्मो." 
"बिटिया कहीं पढ़ती है?"
"हाँ , साहब नगर पालिका के स्कूल में पढ़ रही है नवे क्लास में."
"ये तो अच्छा है, ये छोटी वाली?"
"ये अभी नहीं जाती हैं, बड़ी बहन ही घर में पढ़ा देती है."
"इन्हें भी जाना चाहिए, अब बड़ी हो गयीं , इन्हें भी भेजिए स्कूल."
               ठीक है, अब और लोगों को भेज दीजिये. फिर अगला व्यक्ति आया उसके साथ उसकी पत्नी भर थी.
"साब मैं राम किशोर बंगले में माली का काम करता हूँ और ये मेरी पत्नी किशोरी."
"अरे वाह राम किशोर जी की पत्नी किशोरी क्या संयोग मिला है." मैं ये चाहता था कि इन सब के मन मैं मेरे प्रति कोई डर न रहे अपनी बात और तकलीफें ये मुझे खुल कर बता सकें. मुझे अपना अफसर समझने के साथ साथ एक हमदर्द भी समझें.
"साब मैं शम्भू और ये हमर घरवाली परबतिया. इ हमार बिटवा चैन और बिटिया राहत."
"अरे वाह शम्भू  जी यहाँ तो बड़े अच्छे लोग हैं. शम्भू को मिली हैं पारवती जी और बेटे बेटी चैन और राहत." मैंने सबके लिए कुछ न कुछ सोचा रहा था और यहाँ अजीब संयोग भी देख रहा था.
                   फिर और भी कई लोगों से मेरा परिचय हुआ और अंत में आया एक सबसे काम उम्र का लड़का, उम्र उसकी होगी कोई बीस साल और उसका चेहरा देख कर तो मैं चौंक ही गया - वहा माली का काम करता था. इस उम्र में माली का काम कुछ समझ भी नहीं आ रहा था और फिर ये उम्र तो पढ़ने लिखने कि होती है. क्या ये सारा जीवन इसी तरह से माली ही बना रहेगा. 
वह अपना काम कर रहा था , जब सब लोग चले गए तो दयाल ने उसको ही बुलाया - "अरे नितिन , अब तुम भी आ जाओ, सब परिवार वाले तो मिल लिए साहब से अब तुम अकेले तो अकेले में ही मिलो. " दयाल जी अपने काम में लग गए.
वह मेरे सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया , वह देखने में किसी संभ्रांत परिवार का लग रहा था. उसका रहन सहन और पहनावा सबसे किन्तु माली का काम कुछ मेरे समझ नहीं आया और सबसे अधिक समझ नहीं  आया उसकी सूरत बिल्कुल पापा जैसे थी. पता नहीं मन में कितनी उथल पुथल मच गयी उसको देख कर.
"हाँ, बताओ अपने बारे में." वह चुप खड़ा था तो मुझे ही उससे पूछना पड़ा.
"जी, मेरा नाम नितिन है और मैं यहाँ माली का काम करता हूँ." यह कह कर वह चुप हो गया.
"पढ़ाई नहीं की, इस  काम में क्यों लग गए?" 
"पढ़ाई शुरू तो की थी , लेकिन फिर नहीं पढ़ सका."
"कहाँ के रहने वाले हो?
"पहले लखनऊ में रहता था और पापा के न रहने पर पुरवा चला गया था नाना नानी के पास."
"तुम्हारे पापा क्या करते थे?"
"जी, आई ए एस अफसर थे." मुझे किसी ने ऊपर से नीचे लगा कर पटक दिया था. ये लड़का क्या कह रहा है? किसी आई ए एस का बच्चा माली का काम करेगा.
"क्या नाम था तुम्हारे पापा का नाम."
"स्व. प्रदीप कुमार माथुर." उसके मुँह से ये नाम निकला और मेरे पसीना छूट  गया क्या ये नई माँ का बेटा है, लेकिन यहाँ कैसे ? क्या हुई सारी जायदाद , पापा की सारी प्रोपर्टी कि ये माली का काम कर रहा है.
"तुम्हारे घर में और कौन है? तुम्हारी माँ भाई बहन?"
"माँ भी नहीं है, बहन है उसकी शादी हो गयी है."
"अच्छा अब तुम जाओ." यह कर कर मैं उठकर अन्दर चला आया. मैं अपने को संयत नहीं कर पा रहा था. ये नई माँ का बेटा इस तरह से कैसे हो सकता है? लेकिन मैं अभी उससे कुछ भी जानना नहीं चाहता था और पापा का नाम सुनकर मेरे दिमाग की सारी नसें फटने लगीं थी. इतना अधिक तनाव हो रहा था कि कल से मैं किन सुखद और दुखद स्थितियों से खुद को गुजरता हुआ देख रहा था और उनके साथ सामंजस्य स्थापित कर खुद को सामान्य करने की कोशिश में लगा था फिर एक और विस्फोट हो गया. जिसकी आवाज किसी ने नहीं सुनी और उसकी त्रासदी किसी ने नहीं देखी लेकिन ये मैंने जो देखा और सहा उसके लिए मैं क्या करूँ.? 
उसी बाप का बेटा मैं यहाँ पर अफसर और उसी बात का दूसरा बेटा माली , लेकिन मैंने उनके साथ एक दिन तो क्या एक पल भी नहीं गुजारा था तब हमको क्या लेना देना होना चाहिए. नई माँ ने जिस तरह से हमें पापा से अलग करके पापा को हमसे छीन लिया था फिर ईश्वर ने कुछ बुरा तो नहीं किया. हम कितने रोये थे और कितना तडपे थे उस दिन तो पापा भी बहुत रोये थे जब हमें वहाँ से भेज रहे थे. नई माँ तो बाहर तक निकाल कर नहीं आयीं थी. 
'पर इससे क्या? इसमें इन बच्चों का क्या दोष?''
क्यों दोष क्यों नहीं? अपनी माँ के किये का फल ईश्वर ने उन्हें यहीं दे दिया.'
'लेकिन वो माँ तो नहीं है और इन बच्चों का क्या कुसूर है? '
'कुसूर हैं न कि ये ही वो हैं जिनके मिलने पर पापा का प्यार हमसे कम हो गया था. और उस प्यार जिसपर हमारा भी थोड़ा सा हक था वह भी ख़त्म हो गया था'
'इसके लिए सिर्फ ये बच्चे दोषी हैं, पापा नहीं थे उनको भी तो अपने बड़े bachchon के प्रति अपनी फर्ज को नहीं भूलना चाहिए था.'
. फिर मैं क्या करूँ? किससे पूंछूं ? नाना नानी से , मामा मामी से या मौसी से? नहीं किसी से भी नहीं किसी का भी मन इन लोगों के लिए सहानुभूति नहीं है और मेरा मन - मुझे नहीं मालूम इस लड़के के चेहरे को देखा तो पापा का चेहरा ही सामने खड़ा है, बिल्कुल पापा की तरह से इसकी शक्ल है. 
                     फिर मैं किससे पूंछूं कि मैं क्या करूँ? कैसे उबरुं  इस तनाव से और कैसे इस लड़के को यहाँ देख सकता हूँ.  हाँ दीदी से बात कर सकता हूँ वह ही मुझे सही सलाह दे सकती है. पर दीदी भी अभी घर पर ही होगी और उससे खूब सारी बाते पूँछ लूँगा. दीदी को फ़ोन मिलने कि कोशिश कर रहा हूँ और फ़ोन नहीं उठ रहा है. हो सकता है कि कहीं काम में लगी हो या बात रूम में थोड़ी देर बाद फिर करूंगा. आज छुट्टी तो उसकी भी होगी. 
                                                                                                                                   (क्रमशः)

8 टिप्‍पणियां:

  1. अगली कड़ी की प्रतीक्षा...

    *** भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!

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  2. पढ़ते जा रहे हैं..जारी रहिये..अगली कड़ी का इन्तजार है.

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  3. यह तो ज़बरदस्त मोड़ ले कर आ गयी कड़ी ...बढ़िया ...

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  4. किशोर और किशोरी का अच्छा संगम! अब अगली कड़ी की प्रतीक्षा है.

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  5. जबरदस्त मोड़ आ गया कहानी में

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.