शनिवार, 7 अगस्त 2010

नियति के थपेड़े !

****मेरी यह सच कहानी "साप्ताहिक हिंदुस्तान" में सितम्बर १९७८ के अंक में प्रकाशित हुई थी.****

        रीना की नियुक्ति सबसे  पहले हमारे कालेज में ही हुई . उसके भोले से चेहरे को देखकर सोचा नहीं जा सकता है कि यह लड़की अपने २८ साल के जीवन में असह्य गम झेलते हुए प्रौढ़ा बन गयी. चेहरे पर उद्वेलित गाम्भीर्य तो स्वयं ही यह चीख चीख कर कह रहा था कि इस उम्र में वह दुनियाँ के हर रंग देख चुकी है, हर गम झेल चुकी है. उसकी नियुक्ति किसी वरीयता या योग्यता के आधार पर नहीं की गयी थी बल्कि वह एक ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति की बहन थी जो राज्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. वह अपने भाई के साथ नहीं रहना चाहती थी या भाई उसे नहीं रखना चाहता था - परिणामस्वरूप भाई के प्रभाव ने उसे इस जगह तक पहुंचा दिया.
             वह शादीशुदा थी और सधवा भी क्योंकि उसकी मांग का सिन्दूर और पैर के बिछुवे इस बात की गवाही दे रहे थे - लेकिन इसका पति कहाँ है? यह सवाल सभी के मन में रह रह कर कौंध जाता था. फिर भी बड़े आदमी की बहन किसी  की हिम्मत नहीं थी कि उससे कोई सवाल पूछ ले. सुना तो यह भी है कि वह एक बच्ची कि माँ भी है जिसको उसने हॉस्टल में  डाल रखा है. उसके रहने की समस्या का समाधान भी मुझे ही करना पड़ा था. उसको मैंने अपने ही आवास में एक कमरा दे दिया था. फिर भी कई बातें मेरे भी मन में सिर उठाकर पूछ रही थीं कि इतने बड़े आदमी की बहन होकर इसको नौकरी की क्या जरूरत है? शादीशुदा है तो कभी तो पति के पास जाती , न जाती तो कभी वह ही आता? यदि वह पारिवारिक विघटन का शिकार है तो कारण क्या है? ये सारे प्रश्न हर एक के मन में उठना स्वाभाविक है. पर मन कहीं न कहीं उनके उत्तरों के लिए बेचैन हो उठता था फिर मन मार कर रह जाती.
                 मैंने रीना का सम्पूर्ण  विश्वास प्राप्त कर लिया और जब हमारे संबंध अंतरंगता की सीमा तक पहुँच गए तब एक दिन उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में मैंने एक सवाल किया था, "रीना , मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानने की  बहुत इच्छुक हूँ, लेकिन आज तक पूछ नहीं पायी."
                            इतना कहने के बाद ,मैं उसकी प्रतिक्रिया देखना चाह रही थी, रीना उस समय कापियां चेक कर रही थी. मैं उसके चेहरे पर उभरने वाले भावों को पढ़ रही थी. सिर झुकाए हुए ही उसने कहा, "पूछिए, मैं आपको सब कुछ बता सकती हूँ." उसका स्वर बुझा-बुझा सा था. वह इससे अनभिज्ञ थी कि सारे कालेज में वह एक पहेली बन कर रह गयी है.,
   "तुम शादीशुदा हो, फिर भी पति से दूर क्यों रहती हो? सर्विस तो तुम्हें वहाँ भी मिल सकती थी." मेरे इस सवाल के साथ उसने ठंडी सांस भर कर सिर उठाया और पेन बंद करके कापियों के ढेर पर रख दिया.

"मिस्टर कुमार तुम्हारे भाई हैं, उन्हीं  के साथ रह सकती हो." मैं एक एक कर के पहेली सुलझाना चाह रही थी जिससे कि वह घबरा न जाय.
"मेरे माँ-बाप, भाई-बहन सब हैं. बहुत बड़े परिवार कि बेटी हूँ, लेकिन फिर भी कोई ऐसा नहीं है, जिसे अपना समझ सकूं. किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि जो अपने साथ मुझे रख ले. शादी करके वह अपने दायित्व से मुक्त हो गए - अब किसी का कोई फर्ज नहीं है मेरे प्रति और जो दायित्व उन्होंने निभाए हैं उससे तो अच्छा होता कि वे मुझे मार दिए होते."    रीना इतने सपाट स्वरत में बोल रही थी मानो कि वह अपने नहीं किसी और के जीवन के बारे में कहानी सुना रही हो.
"ऐसा तो नहीं होता घरवालों का लड़की की शादी के बाद कोई फर्ज ही न बनता हो. जब तुम्हारे पति ने तुम्हें छोड़ा तो परिवार में किसी ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया. आखिर उनकी बहन और बेटी के जीवन का सवाल था."
"कोई क्या कहता? सब की नज़रों में मैं बहुत पहले गिर चुकी थी और विनोद को कोई क्यों कुछ कहता? उसके द्वारा मेरा परित्याग करना भी उचित ही था -- कोई भी होता तो शायद यही करता. अच्छे वक्त के ही सब साथी होते हैं, बुरे वक्त में साया भी साथ नहीं देता. अपने -अपने दुर्भाग्य को अकेले ही झेलना होता है और वह दुर्भाग्य जो मेरे घर वालों ने अपने हाथ से रचा हो. इसी तरह मेरी जिन्दगी के इस उतार चढाव में सब किनारे हो लिए. जो नियति होती है, उससे बच कर कहीं भी नहीं भागा जा सकता है."
"रीना, बड़ी अजीब बात है कि घर वाले अगर लड़की के बुरे वक्त में भी साथ नहीं देंगे तो कब देंगे?"
"कभी नहीं, जो रचा उन्होंने उसे मैं ही तो भोगूंगी, वे साथ क्यों देंगे?"  रीना का स्वर तिक्त हो चला था.
"देखो, रीना मैं तेरी बड़ी बहन जैसे ही हूँ, तुम मुझसे सब बातें शेयर कर सकती हो, इससे तुम्हें भी अच्छा लगेगा और शायद मैं भी कुछ करने की सोच सकूं." मैं उसके अतीत में झांकने कि कोशिश कर रही थी , कुछ गलत भाव नहीं था मेरा किन्तु उसके प्रति सहानुभूति जरूर थी. इतना लम्बा जीवन सिर्फ एक बच्ची के सहारे. अगर कोई न होता तो ये उसका दुर्भाग्य होता, किन्तु सब के होते हुए भी वह इस तरह से जिए तो इससे अधिक कष्टप्रद और क्या हो सकता है?
       "मैं शहर के एक बहुत प्रतिष्ठित और प्रगतिशील विचारों वाले परिवार में पैदा हुई थी. अभावों से हमारा परिचय न था. मेरे पिता शहर के नामी वकील थे. सुन्दरता प्रकृति ने मुक्तहस्त से दी थी और कालेज पहुँच कर रंगमंच रीना के बिना अधूरा था -- वही पर सुरेश से मुलाकात और परिचय हुआ. साथ-साथ अभिनय करते करते हम कब  एक दूसरे के इतने करीब आ गए पता ही नहीं चला. सारा कालेज हमारे प्रणय से परिचित था, लेकिन सभी को पूरा विश्वास था कि मेरा प्रगतिशील परिवार हमारे इस अंतरजातीय विवाह को स्वीकार कर लेगा और मुझे भी ये विश्वास था.
                                                                                                                                (क्रमशः)

7 टिप्‍पणियां:

  1. रेखाजी
    बहुत अच्छा लगा लगा की आपका स्वास्थ सुधार पर है ईश्वर से प्रार्थना करते है की आप जल्दी जल्दी अपने सक्रीय रूप में आ जावे |इतने दिन बाद आपकी पोस्ट देखकर अच्छा लगा |
    कहानी की शुरुआत अच्छी है देखे आगे क्या मोड़ है ?

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  2. आपके शीघ्र स्वास्थ लाभ की प्रार्थना.

    रीना की कहानी जानने की उत्सुक्ता तो हमारी इस शुरुवात को पढ़कर ही बढ़ गई तो फिर आप के तो वो साथ में थी, निश्चित ही आप की स्थिति समझी जा सकती है.

    आगे इन्तजार है जानने का.

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  3. बहुत अच्छा लगा लगा की आपका स्वास्थ सुधार पर है ईश्वर से प्रार्थना करते है की आप जल्दी जल्दी अपने सक्रीय रूप में आ जावे |इतने दिन बाद आपकी पोस्ट देखकर अच्छा लगा |

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  4. कहानी पढ़ कर उत्सुक्ता बढ़ गई ..आगे क्या होगा ? इंतजार है अगली किश्त का ..सुन्दर कहानी के लिए शुक्रिया ..
    आपने सच कहा कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकलते है..झूठ बोलने वाले किरदार समाज में ज्यादा है और जो लोगों में सच बोलने का साहस नहीं वो झूठों के साथ हो जाते है और इस तरह सच बोलने वाला अलग थलग हो कर खुद को अकेला खड़ा पाता है..परिवार में भी और समाज में भी..मेरे निजी अनुभव के अनुसार .. मक्
    jo bhi de-de maalik tu kar le qubool
    kabhi-kabhi kaanton mein bhi khilte hain phool
    wahaan der bhale hain andher nahin
    ghabraa ke yoon gilaa mat keeje
    bahut diyaa dene waale ne tujhko
    aanchal hi na samaaye to kyaa keeje..

    This rare GEM is for you..my latest YT upload

    http://www.youtube.com/watch?v=y-cSeV61XBo

    http://www.youtube.com/mastkalandr
    http://www.youtube.com/9431885

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  5. आपके शीघ्र स्वास्थ लाभ की कामना.

    कहानी दिलचस्प मोड ले रही है और ये क्रमशः का आना बुरा लग रहा है. रीना के विषय में जिज्ञासा बढ़ रही है. आप की स्थिति समझी जा सकती है.

    क्रमशः के आगे की कथा शीघ्र ही आये.

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  7. ब्‍लागजगत पर आपका स्‍वागत है ।

    किसी भी तरह की तकनीकिक जानकारी के लिये अंतरजाल ब्‍लाग के स्‍वामी अंकुर जी, हिन्‍दी टेक ब्‍लाग के मालिक नवीन जी और ई गुरू राजीव जी से संपर्क करें ।

    ब्‍लाग जगत पर संस्‍कृत की कक्ष्‍या चल रही है ।

    आप भी सादर आमंत्रित हैं,
    http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/ पर आकर हमारा मार्गदर्शन करें व अपने सुझाव दें, और अगर हमारा प्रयास पसंद आये तो हमारे फालोअर बनकर संस्‍कृत के प्रसार में अपना योगदान दें ।
    धन्‍यवाद

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.