मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

झूठ की लंका !

                                    गाँव में समाधान बैठक होने वाली थी और उसमें मंत्रीजी का आना तय था।  सरपंच गाँव में माहौल बनाने के लिए लोगों को पहले से समझाने में लगा था कि मंत्री जी के सामने कोई भी आदमी किसी बात की शिकायत नहीं करेगा बल्कि मैं जो बता रहा हूँ वैसे ही उत्तर हर आदमी को देना होगा।
-- यहाँ सब सुविधाएँ मिल रहीं है
--गाँव में बिजली आती है।
-- स्कूल में पढाई बराबर होती है।
-- मिड डे मील बढ़िया मिलता है
-- राशन का सामान मिलता है।
                           घर जाके पुरुष वर्ग अपनी पत्नियों को ये बातें समझा रहे थे और उनके बच्चे सुन रहे थे।  छुटकी बोली - बापू तुम झूठ बुलिहो और हमसे कहत हो कि झूठ बोलव पाप होत है। '
' चुप कर ये बड़ों की बातें तुम्हरे समझ न अइहें। ' बापू ने धमका दिया।
                   छुटकी चुपचाप कोने जाकर बैठ गई और बापू की कही बातें दुहराने लगी।
-- सुविधाएं  - नाहीं
-- बिजली -  कभउँ कभउँ
--पढाई  - बहनजी बोर्ड पर लिख देती है और फिर दस बार कॉपी में उतारो और वे सूटर बुनें बैठ जातीं.
--मिड डे मील - कच्चा पक्का , पानी की दाल , कंकड़ के चावल
-- ये राशन का होत  है नाहीं पता।
                         एक फ़टफ़टिया वाले बाबू आत है और हम सबन के नाम लिख ले जात  है बस।
                        मंत्री जी आये और सारे गाँव वाले पंचायत घर में इकट्ठे हो गए।  छुटकी थोड़ी देर बाद खिड़की से खुद कर सबके पीछे आकर खड़ी हो गयी।  मंत्री जी ने फाइलें देखीं और दो चार लोगों से पूछा तो सबकी एक ही इबारत।  उनकी नजर छुटकी पर पड़ी तो इशारे से उसको बुलाया।  वह मटकती हुई पहुँच गयी।  मंत्री जी ने वही सवाल छुटकी से पूछे और छुटकी जो दुहरा रही थी वही सब बोल दी।
                   सरपंच की झूठ की लंका छुटकी ने एक मिनट में ढहा दी।

शनिवार, 23 सितंबर 2017

दुस्साहस !



                 नीति स्कूल से निकल कर साइकिल से घर की तरफ चली जा रही थी।  ऑफिसर क्वार्टर होने के कारन कुछ रास्ता सुनसान भी पड़ता था।  वह उसी रास्ते पर चली जा रही थी कि  उसके बगल में एक गाड़ी रुकती है और उसको वह लोग गाड़ी में खींच लेते हैं और फिर उसके चिल्लाने से पूर्व ही उसको बेहोश करने के लिए कुछ सुँघा देते हैं।
                 नीति जब होश में आयी तो उसने अपने को एक अँधेरे कमरे में पाया , जिसमें एक पुराना  सोफा पड़ा था और एक तरफ एक बैड कहे जाने वाला दीवान। उससे नहीं मालूम था कि कितना बजा  था और वह कहाँ ला कर बंद की गयी थी? उसे भूख तेजी से लोग रही थी लेकिन खाने को कुछ भी न था।  फिर उसने देखा कि कोई दरवाजा खोल रहा है , अँधेरे में रौशनी तेजी से आनी  शुरू हुई तो उसकी आँखें चुंधियाने लगी और उसने आँखों को रौशनी से बचाने के लिए अपनी  हथेली सामने फैला ली। उसे आने वाले की शक्ल नहीं दिख रही थी।
"कौन ?" आने वाले ने पूछा।
"मैं नीति। ": उसने कांपती आवाज में कहा।
          आने वाला समझ गया कि ये कारस्तानी सेठ जी के बेटे की होगी।  वह अपने आवारा दोस्तों के साथ मिल कर कुछ भी कर सकता है।  वह अब धर्म संकट में फँस गया कि कैसे इसको बचाये ? एक लड़की की अस्मत बचना और एक क्षण उसे अपनी बेटी याद आ गयी , जिसे किसी ने इज्जत लूटने के बाद मार कर फ़ेंक दिया था। वह काँप गया। उसने तुरंत सोचा और नीति के पास गया। 
        :"बेटा मैं तुम्हें इस खिड़की तक पहुंचा दूंगा और तुम बाहर  कूद कर दायीं और भागती जाना तो बाउंड्री के किनारे मेरी कोठरी बनी है उसी में छुप जाना।  क्योंकि अगर सामने से भगाऊंगा तो मेरे नाम होगा और उन लड़कों की ऊपर महफ़िल जमी है।  वह लोग एक आध घंटे में यहाँ आएंगे।  तुम छिपी रहना और मैं खिड़की खुली छोड़ दूंगा जिससे वह समझेंगे की तुम खुद भाग गयी हो। "
"फिर काका आप को तो कुछ नहीं करेंगे ?"
"मेरी चिंता छोडो बेटी , ये गुजरी जिंदगी कितने पाप होते हुए देख चुकी है।अपनी बेटी तो न बचा सका। दूसरी बेटी की जिंदगी अब अपने हाथ से  बचा लूँ तो अहोभाग्य । "

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

नया साल !

                        समर घर से निकला तो पत्नी और बच्चों के लिए गिफ्ट पहले ही खरीदता हुआ होटल पहुंचा था।  रात में प्रोग्राम ख़त्म करके सीधे घर भागेगा क्योंकि कई साल से वह बच्चों के साथ नए साल का स्वागत नहीं कर पाया है।  आज उसने बच्चों से वादा किया है कि वे नए साल का केक साथ ही काटेंगे।
                        आज साल का आखिरी दिन है और होटल में बहुत चहल पहल रहती है , देर रात तक पार्टी चलती रहती है , इसलिए उसने मैनेजर से दो दिन पहले ही बोल दिया था कि वह आज के दिन जल्दी जाएगा और उसकी जगह किसी और को बुला लें।  यहाँ  वालों के लिए तो आज का दिन मौज मस्ती और पानी की तरह पैसे बहाने का दिन होता है और होटल के काम करने वालों का तो साल का पहला दिन बैल की तरह काम करते हुए शुरू होता है।  दूसरों के लिए ही तो वो यहाँ काम करते हैं।  साज़कारों की उंगलियां अपने अपने साजों पर होती हैं लेकिन आँखें घडी पर होती है कि कब उन्हें यहाँ से जाने को मिलेगा।
                          जब घडी ने ग्यारह बजाये तो उसकी धड़कने तेज होने लगी , कहीं कोई और न आया तो वह फिर बच्चों के सामने झूठ साबित हो जाएगा और बच्चे भी तो निराश हो जाते हैं। वह धीरे से उठकर मैनेजर के कमरे में गया - 'सर मैंने कहा था कि आज मुझे जल्दी जाना है , दूसरा आदमी कब आएगा ? '
'रुको तुम अपने काम पर लगे रहो , मैं अभी व्यवस्था करता हूँ। '
                             उसने वापस आकर आपने साज संभाल लिया।  घडी की सुइयां अपनी चाल से चल रही थी और उसकी आत्मा उतनी ही तेजी से उसे धिक्कार रही थी।  उसकी नज़रें मैनजर को खोज रही थीं लेकिन वह कहीं नजर नहीं आया। न ही उसको अपनी जगह लेने वाला कोई आता दिख रहा था।  वह गुस्से से उठा और फिर मैनेजर के केबिन में जाकर खड़ा हो गया -- ' सर मैंने आपसे पहले ही कहा था कि मुझे जल्दी जाना है , मेरी जगह आने वाला क्यों नहीं आया ?'
'समर मैंने बुलाया तो था उसको लेकिन वह नहीं आया और जब तक साहब लोग फ्लोर पर हैं साज बंद नहीं होंगे।  यही तो हमारे लिए कमाई का मौका होता है।  जाओ अपना काम देखो। '
          इसके आगे वह कुछ कह नहीं सकता था और शायद इसी को दूसरे के इशारों पर नाचना कहते हैं।  वह फिर आकर अपने साज पर बैठ गया।  उंगलियां साज पर चल रही थीं लेकिन उसका मन उनकी आवाज को संगीत नहीं बल्कि कानों में पड़ने वाले गर्म शीशे की तरह महसूस कर रहा था।  रोज वह झूम झूम कर यही साज बजाता था लेकिन आज नहीं हो पा  रहा था।
   सुबह तीन बजे कार्यक्रम ख़त्म हुआ और वह भी लड़खड़ाते पैरों  से गिफ्ट उठा कर घर की तरफ निकला।  जब उसने दरवाजा खोल तो टी वी चल रहा था।  मेज पर केक रखा था और पत्नी और बच्चे सोफे लुढ़के हुए थे और उनकी रजाई ऊपर से खिसक कर जमीन पर गिरी हुई थी।
                     उसने धीरे से रजाई उठा कर बच्चों पर डालनी चाही तो बच्चे जाग गए , उसकी विवशता आँखों से लेकर चेहरे तक उत्तर चुकी थी कि बच्चे उठा कर खड़े हो गए और वह कुछ कहता उससे पहले ही बोल उठे -- ' कोई बात नहीं पापा मम्मा कह रही थी कि ये वाला अपना न्यू इयर थोड़े ही होता है , ये तो बड़े लोगों का होता है।  अपना तो जब होता है , तब हम पूजा करके मनाते हैं। '
                      समर कृतज्ञता से पत्नी को देखा और गर्व से बच्चों को सीने से लगा चुका था।
              

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

हस्तांतरण !

                  माँ   तीन दिनों से बेटी के फ़ोन का इन्तजार कर रही थी और फ़ोन नहीं आ रहा था।  नवजात के साथ व्यस्त होगी सोचकर वह खुद भी नहीं कर पाती थी।  एक दिन उससे नहीं रहा गया और बेटी को फ़ोन किया  - 'बेटा कई दिन हो गए तेरी आवाज नहीं सुनी , कैसी हो ?'
' माँ तेरी जगह संभाली है न तो उस पर खरी उतरने का प्रयास कर रही हूँ।  इसके सोने और जागने का कोई समय नहीं होता और वही मेरे लिए मुश्किल होता है।  लेकिन फिक्र न करना विदा करते समय जैसे दायित्वों की डोर थामे थी न , वैसे ही उसको थामे हूँ।  बेटी बन उस घर में जन्मी लेकिन इस घर में बहू बन आयी और बेटी बनने का पूरा प्रयास करती रही।  अब माँ बनी तो जो जो तुमने किया और दिया, वही दे रही हूँ माँ।  कुछ सुविधाएँ बढ़ गयीं है लेकिन माँ के दायित्वों में कोई कमी न हो वह कोशिश कर रही हूँ। 
           '  तुम्हारी बेटी बाँट गयी है माँ -- एक बेटी और माँ के रिश्तों में।  पर चिंता नहीं करना , मैं बेटी पहले हूँ और दोनों रिश्तों को बखूबी निभा लूंगी।  आखिर तुम्हारी बेटी हूँ न।'  

                   माँ के आँखों में आंसू बह निकले , माँ बनते ही बेटी बड़ी हो जाती है।
             

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

विजय पर्व !

                                    आज इरा अपने बेटे की नौकरी लगने के उपलक्ष्य में एक छोटी सी पार्टी दे रही थी।  इस दिन को लाने में उसने अपने जीवन के २४ साल होम कर दिए।  इतने वर्ष तो उसने अपने पति की बुराइयों के बीच उसकी ज्यादतियों से लड़ते लड़ते  गुजार दिए।  आज तो विषय भी अच्छे  से सजा  संवरा लोगों का स्वागत कर रहा था।  आज की स्थिति देख कर  ये लग रहा था कि इरा ने इतने दिनों से इसी विजय  पर्व के लिए तपस्या की थी।
                         इरा रिटायर्ड पिता की सबसे छोटी संतान थी , पढ़ी लिखी और बैंक में नौकरी कर रही थी।  किसी ने रिश्ता बताया और माँ -  बाप तैयार हो गए।  बड़े गाड़ी और बंगले वाले घर का रिश्ता आया था , ऊपर से लडके का बड़ा सा बिजनेस।  उन लोगों ने कहा कि उन्हें नौकरी नहीं करवानी है और अगर शादी के बाद छोड़ेगी तो लोग कहेंगे कि ससुराल वालों ने नौकरी छुडवा दी।  इरा ने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और अपनी शादी की  तैयारी में जुट गयी। उसके रिश्तेदार और परिचितों  सभी में इरा  भाग्य से ईर्ष्या हो रही थी कि देने लेने के लिए कुछ भी नहीं और इतने बड़े घर में रिश्ता हो रहा है।  बाहर की चमक दमक देख कर अंदर झांकने या फिर उसके बारे में पता लगाने की कोई जरूरत भी नहीं समझी।  ससुर भी बहुत इज्जतदार और समझदार इंसान थे।
                         घर में आने पर इरा का खूब स्वागत हुआ।  पता नहीं क्यों इरा को ये सब पच नहीं रहा था।  लेकिन अपने मन की आशंका वह कहे तो किससे ? पहली ही रात नशे में धुत विषय को देख कर उसको अपने इस घर में लाने का कारण  कुछ कुछ समझ आने लगा था। धीरे धीरे वह समझ गयी कि वह बिगड़े हुए रईसजादे के लिए लाया गया था। सास और ननद ने बहुत दिनों तक लीपापोती की लेकिन सच कब तक छुप सकता था।
                          पत्नी के प्रति अधिकार और उनका उपयोग विषय को बखूबी आता था और कोशिश करता था कि उसको कुछ पता न लगे लेकिन आखिर कब तक ? इरा को सब कुछ समझ आ गया कि  बिजनेस के नाम पर सारा काम दूकान पर नौकर देखा करते थे और विषय को घूमने फिरने और लड़कियों को घुमाने से फुरसत नहीं मिलती थी।  पैसा पानी की तरह बहाना उसका आदत में शुमार था। कुछ दिनों तक इरा को भी खूब घुमाया फिराया और फिर अपनी आदत के अनुकूल वह बाहर की मटरगश्ती शुरू कर दी।
                           विषय के लिए गांजा और शराब घर के सामान की तरह आया करता था।  पहले तो सास ने लीपापोती की और फिर उसको ही दोष देना शुरू कर दिया कि शादी इसी लिए की थी कि ये शादी के बाद सुधर जाएगा और इसी लिए तुम जैसी लड़की को चुना था कि  समझदार हो तो सब कुछ ठीक कर लोगी। अपना भविष्य भी तो देखो , ऐसे ही सब उडाता रहा तो एक दिन सड़क पर आ जाएंगे।  पापा कब तक कमाते रहेंगे और अभी तो नीना की शादी भी तो करनी है। कुछ बचेगा ही नहीं तो क्या करेंगे ? तुम्हें क्या लगता है ? इसने सारे पैसे उड़ाने में कोई कसर नहीं  है।
                          कुछ महीने बाद ही उसको पता चला कि वह माँ बनाने वाली है , सारा घर खुश हो गया और ऐसा नहीं विषय भी बहुत खुश हो गया। और इसके साथ ही उसका बाहर रहना भी बढ़ गया।  वह महंगे महंगे गिफ्ट लेकर दोस्तों की पत्नियों को देने जाता था और अगर कोई लड़की मिल  जाए तो रईसियत दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ता था। घर में खूबसूरत पढ़ी लिखी पत्नी होने के बाद भी उसको बाहर की हर औरत चाहे किसी कि पत्नी ही क्यों न हो , उसको उसे प्रभावित करने में भी पीछे न हटता था।
                            समय पर बेटा हुआ और फिर अपनी शान और रुतबा देखने में खूब खर्च किया गया।  घर का बिजनेस उसके खर्चों को झेलने  चला जा रहा था। पैसे की वसूली का काम विषय के हाथ में था और फिर खर्च करने में कैसा संकोच ? आखिर कब तक ? बिजनेस में घाटा हुआ और बंद करना पड़ा। विषय की लतों पर अंकुश अभी भी न  लग पाया था।
                                    बच्चे के लिए महँगे खिलौने और कपड़ों के लिए उसने दोस्तों से उधर लेना शुरू कर दिया और जब सिर से पैर तक कर्ज में डूब गया तो इरा के गहने बेचना शुरू किया और फिर गाड़ी , स्कूटर सब कुछ बेच कर सड़क पर खड़ा हो गया और इसके लिए इरा के सिर सारा ठीकरा फोड़ दिया गया -
 "पता नहीं कैसे पैर पड़े कि सब कुछ बरबाद हो गए ?"
"अगर मेरी कहीं और शादी हो गयी होती तो पता नहीं कितना दहेज़ मिलता ? ये मेरी गले बाँध दिया तुम लोगों ने। " विषय भी अपने शौक और अय्याशी में बाधा देख कर उसको सुनाया करता था।  धीरे धीरे उसने इरा को अपने पिता से , बहन से और रिश्तेदारों से उधर माँगने के लिए मजबूर कर दिया।  वह गैरत वाली लड़की सौ बार मरती और सौ बार जीती। उसके सारे गहने बेच कर उड़ा दिए।  ससुर ने अपने रिटायर होने पर सारा पैसा विषय के जॉइंट में था निकल कर उड़ा चूका था।
                        इन सब बातों की जानकारी माँ को हुई तो एक रात अचानक वह हार्ट फेल  होने से चल बसी।
                         इरा अब तक बहुत दबाव में थी लेकिन जब हर काम के लिए हाथ फैलने से अच्छा उसने विषय को सुधारने का संकल्प लिया।  ससुर से कह कर उसने घर का किराया और पेंशन अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया।  उसने सबसे पहले झूटी शान को ढोने वाले घर वालों के मन से ये निकलने के लिए कहा और खुद घर के हर काम करने वाले को हटा दिया और सरे काम खुद करने शुरू कर दिए।  सुबह से शाम तक सब कुछ करती।  अब वह नशे के लिए विषय को महीने में गिने चुने पैसे देती थी।  सरे दोस्तों को उसने मना कर दिया कि अगर कोई विषय को पैसे उधर देगा तो वापस मिलने की उम्मीद न करें।
                                जब विषय ने ये सब सुना तो एक रात उसको बहुत मारा।  बच्चा सहम कर रह गया लेकिन इरा ने कसम खाई थी कि  मैं आत्महत्या नहीं करूंगी और न ही अपने बच्चे को सड़क पर लाने दूँगी।
वह बोलती बहुत कम थी लेकिन उसने नशे को छुड़ाने के लिए कुछ प्रयोग किये और वह विषय को चाय में डाल कर देने लगी क्योंकि जानती थी कि इसके छोड़े बिना इस घर का बचाया नहीं जा सकता है। इरा के इतने प्रयासों के बाद मित्रों ने साथ छोड़ दिया , रिश्तेदारों ने भी देना बंद कर दिया। इरा को घर से बाहर नहीं जाने देता था क्योंकि उसको लगता था कि जैसे वह दूसरी सुन्दर औरतों का दीवाना था वैसे ही कोई उसकी पत्नी के पीछे भी पड़  सकता है। उसने बाहर नौकरी की उम्मीद छोड़ दी और उसने  घर पर ही काम शुरू कर दिया।  बच्चे को पढना था और पति से नाउम्मीद इरा का सारा भविष्य बच्चे के लिए चाहती थी।  बच्चे भी वक्त से पहले समझदार हो चुके थे।  वह कहीं जा नहीं सकती थी तो बच्चे के प्रिंसिपल को पत्र के सहारे अपने हालात व्यक्त कर फीस माफ करवाई और प्रिंसिपल ने हालात समझ कर उसे फ्री कोचिंग लेना शुरू कर दिया।
                   सब कुछ बहुत अच्छा तो नहीं लेकिन सारा बोझ अपने सर लेकर वह घर को चला रही थी और फिर एक दिन किसी डॉक्टर को ड्राइवर की जरूरत थी और फिर न जाने कौन सा माध्यम बना और विषय जो कभी खुद दो दो गाड़ी रखता था , उस डॉक्टर के यहाँ ड्राइवर की  नौकरी करने लगा।  इरा का धैर्य और सहनशीलता अब जाकर सफल हो रही थी।  उसने विषय जैसे बिगड़ैल रईस को रास्ते पर ला दिया था।  उसने कभी कोई लड़ाई नहीं की , मार खाई , गलियां खायीं लेकिन हिम्मत नहीं हारी।
                     बेटे का चयन इंजीनिरिंग के लिए हुआ और उसने बैंक से लोन लेकर उसका एडमिशन करवाया। विषय इतना बदल जाएगा उसको पता नहीं था।  सुबह आठ बजे घर से निकालता और शाम चार बजे वापस।
कुछ उम्र कहें या फिर इरा की दृढ इच्छाशक्ति के आगे झुक गया।  बच्चों की और भी ध्यान देना शुरू कर दिया था।
                    आज बेटे की नौकरी लगने पर और विषय के सारे व्यसनों से मुक्त करवा कर उसने विजय पर्व मनाया है।  


अहसास !

                         रानू जब से माँ बनने की ओर बढ़ी है , रोज ही कुछ न कुछ परेशानियां उसको लगी रहती थीं तो परेशान होकर नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया और घर में रहने लगी।  वह घर में अकेली ही रहती थी लेकिन ऋषिन को उसकी चिंता अपने ऑफिस में लगी रहती थी।  वह दिन में कई बार फ़ोन करके उससे हाल चाल लेता रहता था।  
                       रानू और ऋषिन का एक ही जगह जॉब होने के कारण और कोई परेशानी नहीं थी लेकिन समय पास आने के साथ साथ उनकी अलग तरह की चिंताएं बढती चली जा रही थीं। रानू स्वभाव से संवेदनशील थी लेकिन इस समय की परेशानियों के कारण वह गुस्सा भी जल्दी हो जाया करती थी।  ऋषिन उसके स्वभाव से बहुत अच्छी तरह परिचित था और वह अच्छे से सामंजस्य बिठाये हुए था। ऐसा नहीं कि रानू सिर्फ ससुराल में ऐसा करती थी वह अपनी बहनों और माँ से भी जल्दी गुस्सा हो जाती थी और थोड़ी देर बाद सॉरी कह  कर सामान्य हो जाती। लेकिन दूसरे परिवार में आकर ये आदत उसे सहज रूप से लेने वाली न थी। सास की बातों से वह खिन्न हो जाती थी और कभी कभी झुंझला भी जाती थी। 
                      ऋषिन ने उसकी माँ को सहायता के लिए बुला लिया था लेकिन रानू महसूस कर रही थी कि  माँ की  बातों में अपने बेटे , बहू और पोते की चिंता ज्यादा झलकती थी।  रानू ने महसूस किया कि माँ उसे कम प्यार नहीं करती लेकिन ज्यादा झुकाव उसका अपने बेटे और बहू के प्रति अधिक था।  उसने माँ को जाने के लिए कह दिया। 
                         ऋषिन ने सोचा था कि रानू को प्रसव के लिए उसकी माँ के पास भेज देगा और फिर अपने घर ले जाएगा। इस दौरान रानू को ये अच्छी तरह से अहसास हो चुका था कि एक बच्चे को जन्म देने में माँ कितना कष्ट उठाती है ? ये नौ महीने का समय वह एक एक सांस अपने बच्चे के साथ लेती है फिर वह अपने से दूर होने की बात कैसे स्वीकार कर सकती है और फिर अगर कोई और बीच में आकर दूर करना चाहे तो वह सहर्ष स्वीकार तो नहीं कर सकती।  शायद वह भी नहीं कर पायेगी। 
                    उसके घर जाने का समय करीब आ रहा था और उसने अपनी ससुराल जाने का टिकट बुक करा लिया।  तैयारी कर ली तब पति को टिकट दिया तो उसने देखा और बोला -- "तुम्हें कहाँ चलना है। " 
"मम्मी जी के पास। "
"क्यों मम्मी के पास नहीं जाना है ?"
"नहीं मम्मी ने जो कष्ट तुम्हारे लिए उठाये होंगे , उसका अहसास मुझे अब हुआ है।  अब तो उनके पास ही जाकर डिलीवरी करुँगी , उनको बहुत ख़ुशी होगी और शायद मुझे भी। "
         ऋषिन रानू की संवेदनशीलता को पहले से ही जानता था और आज उसको इस रूप में देखा तो अपने को खुशनसीब समझ रहा था।
                              

शनिवार, 21 जुलाई 2012

भवितव्यता (5) !



 पूर्वकथा :

सावित्री अपने मइके या ससुराल दोनों में दुलारी थी। घर में लक्ष्मी मानी  जाती। उसका पति समझदार और जिम्मेदार युवक था। छोटे भाई की संगती के बिगड़ने से चिंतित रहता और उसके इस बात के लिए रोकने पर उसके साथ कुछ ऐसा बुरा हुआ कि  कई जिन्दगी इसमें पिसने लगी । शशिधर का दोस्त गिरीश ने अंतिम समय उसे वचन दिया की वह उसकी पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय नहीं होने देगा.  बच्चों को कसबे में  के लिए ले जाने के सवाल पर गिरीश और शशि के घर वालों के बीच कहा सुनी हो गयी और उसी बीच गिरीश ने कह दिया कि  शशि को  मारने वाले उसके देवर के साथ ही थे . इसा बात से शशि के माता पिता अब अपने पोतों के विषय में चिंतित हुए और उन्हें कसबे भेजने के लिए तैयार हो गए . गिरीश उन्हें ले गया और उन्हें रखा भी लेकिन इतने छोटे बच्चे हरी बीमारी में माँ को ही बुलाते और वह परेशां होकर बच्चों के लिए सावित्री को भेजने का प्रस्ताव लेकर आया . जिसके लिए पंचायत बुलाई गयी और उसके मायके वालों से भी सलाह लेने की बात  कही गयी.........





गतांक से आगे : 
 शीला के मायके वालों को इस विषय में कुछ भी पता नहीं था। वे आते जरूर और अपनी बहन का हालचाल  लेकर चले जाते . कभी सावित्री ने अपने घर वालों को इस विषय में कुछ भी नहीं बताया . उसे ये बात अच्छी तरह से पता था कि  अगर उसने अपने घर वालों से कोई भी शिकायत की तो उसके भाई उसको यहाँ पर नहीं रहने   देंगे.  इस बात को जानकार तो बिलकुल भी नहीं कि  उसके देवर ही शशि की मौत के जिम्मेदार हैं,  लेकिन वह अपने तीन बच्चों के साथ मायके में जाकर रहना नहीं चाहती थी क्योंकि उसको ये पता है कि उसके भाई तो उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहेंगे लेकिन उनके जाने के बाद बड़ी भाभी के तानों को कौन सुन  पायेगा?   उनके साथ रहने सेअच्छा  है कि  अपने घर में रहा जाय।  वह समझदार और गंभीर दोनों ही  थी। उसने ये भी सोचा कि  अगर यहाँ से चली गयी तो फिर इस घर से अपने सारे  अधिकार  भी खो देगी   . सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसके कारण  उसके सास ससुर को भी पता नहीं क्या क्या सहना पड़े? किस तरह से वह उनको रखे? नहीं वह अपने परिवार के साथ ही रहेगी। 
                  सावित्री के भाइयों को बुलावा भेज दिया गया और वे भी बिना किसी देर के दूसरे दिन ही वहा आ पहुंचे। शशिधर के  पिता ने उन लोगों से और अधिक छुपाना उचित नहीं समझा  क्योंकि एक तो पड़ोस के गाँव की बात है और दूसरे आज नहीं तो कल ये सब बातें उनको पता चल ही जायेंगी लेकिन अगर ये बातें कोई और उन्हें बताये तो इससे बेहतर है की वह खुद ही बता कर समाधान खोज लें। सावित्री और बच्चों के बारे में जितना वे सोचते हैं उससे अधिक उसके मायके वाले भी सोचते होंगे लेकिन बेटी या बहन की ससुराल के मामले में बिना सलाह लिए बोलना उनको ठीक नहीं लगता होगा . अगर अब ये सारी  बातें उन्हें खुद न बतायीं गयी तो कल को उन पर शशि और उसके परिवार के प्रति पक्षपाती होने का आरोप भी लग सकता है। 
                 सावित्री के भाइयों ने आकर यही सलाह दी की सावित्री को कसबे भेजने से पहले गिरधर का गौना  करा लिया जाय ताकि माय  को कोई भी परेशानी न हो और उसके बाद सावित्री बच्चों के साथ चली जाय। गल्ला पानी घर से भेजा जाएगा और शशि  की पेंशन से बाकि खर्च पूरे हो जायेंगे . संरक्षण के लिए सावित्री के भाई, ससुर और देवर वहां जाकर उसकी परेशानियों का ध्यान रखेंगे छुट्टियों में बच्चे गाँव में आकर रहेंगे। ताकि बाबा दादी को अपने पोतों से मिलने का और साथ रहने का मौका मिलता रहे। 
                   आखिर वह दिन भी आ गया कि  सावित्री अपना जरूरी सामान लेकर बच्चों के साथ जाने की तैयारी  करने लगी। चलने से पहले सास  उसे गले लगा कर खूब रोई और समझाया कि  कोई भी परेशानी हो तो वह घर खबर भेज दे उसके पास हम तुरंत पहुँच जायेंगे। कसबे में संभाल कर रहने की हिदायत भी दी गयी। वह गाँव की रहने वाली थी और गाँव में ही रही उसको दुनियांदारी की समझ अधिक न थी। लेकिन वक़्त इंसान को सब कुछ सिखा देता  है। 
                 गिरीश ने मकान की व्यवस्था पहले से ही कर रखी थी सो कोई परेशानी नहीं हुई . लेकिन गिरीश घर नहीं आता था वह बच्चों से सारा हाल ले लेता था और कोई समस्या होने पर उन्हें उसके बारे में सुझाव दे देता था। उसका अपना पहले की तरह से रूटीन शुरू हो गया . वह सिर्फ स्कूल  पढ़ाने  के लिए आता था और अपने गाँव वापस हो जाता . वह अपने वचन के मुताबिक हर चीज पर  नजर  रखता था।
                एक दिन दोनों बच्चे स्कूल नहीं गए , इस बात को गिरीश ने  ध्यान में रखा  और  दो अगले दिनों में भी उसे बच्चे नहीं दिखलाई दिए तो उसका माथा ठनका . वह छुट्टी के बाद सीधे बच्चों के हालचाल लेने के लिये उनके घर गया कि  कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गयी। उन लोगों का वहां  पर कोई नहीं था। किसी से उनकी कोई जानपहचान भी नहीं थी की मुसीबत के समय वह किसी से सहायता मांग लेती .
                 जाकर उसने  जैसे   ही दरवाजा  खटखटाया अन्दर डर  के मारे सब दुबक गए और बड़ी देर तक उन लोगों ने कोई उत्तर नहीं  दिया और न ही दरवाजा खोला . तब गिरीश को जरूर कुछ शक हुआ कि ऐसी क्या बात है कि  कोई दरवाजा ही नहीं खोल रहा है। तब उसने बाहर  से कहा कि  मैं गिरीश हूँ और बच्चों की खैरियत  जानने आया हूँ। तब सावित्री ने दरवाजा खोला। चेहरे से वह सहमी सहमी लग रही थी। गिरीश का उससे अधिक वास्ता तो पड़ा नहीं था तो बोलने और बात करने में भी वह झिझक रहा था। सामने गिरीश को देख कर दोनों बच्चे उससे आकर लिपट गए और रोने लगे - 'चाचा हमें अपने साथ ले चलो , हम अकेले नहीं रहेंगे नहीं तो चाचा माँ  को मार  डालेंगे .' 
                  गिरीश को कुछ समझ नहीं आ रहा था की माजरा क्या है? वह तो समझ रहा था कि  बच्चे माँ के साथ अच्छी तरह से होंगे।  वह वही जमीन पर बैठ गया और बच्चों को चुप कराया फिर उनसे पूछा कि  क्या बात है? सावित्री उसके सामने नहीं आई वह पीठ करके एक कोने में खड़ी  रही। 
                गिरीश बच्चों के मुंह से नहीं बल्कि सावित्री के मुंह से सुनना चाह  रहा था की बात क्या हो गयी? 

'देखिये आप इस तरह से अकेली रहेंगी और फिर बात भी नहीं करेंगी तो फिर मैं आपकी सहायता कैसे कर पाऊंगा ? आपको यहाँ पर्दा करके काम नहीं चलेगा , कल को आपको बाहर  निकलना है और बच्चों केलिए सारे काम करने होंगे तो काम कैसे करेंगी? '    गिरीश ने सावित्री से कहा।

'ये तो सही है लेकिन हम कभी इस तरह से रहे नहीं है तो हमारी हिम्मत नहीं पड़ती है।'

'ये मैं मानता  हूँ लेकिन अब घर से बाहर निकल कर तो सब करना ही पड़ेगा। सब को  बोलना और बताना भी पड़ेगा। बच्चों के स्कूल जाना पड़ेगा तब क्या करेंगी? '

'वह तो है? बात ये है कि  बच्चे बहुत डर  गए हैं ,  परसों इनके चाचा राशन डालने के लिए आये थे और वापस जाने के लिए उनने हमसे पैसे मांगे तो हमने कह दिया कि  हमारे पास नहीं है। इस पर वह बिगड़ गए  और गाली - गलौज करने लगे। बच्चे उसी से डर  गए।'

'फिर वह चले गए या फिर आयेंगे 

' हाँ कह कर गए हैं कि  जल्दी ही आयेगे और पैसे लेकर ही जायेगे । उन्हें पेंशन से पैसे चाहिए। घर के ऊपरी खर्च के लिए पैसा कहाँ से आएगा?'

'बच्चे स्कूल क्यों नहीं जा रहे हैं? '

'उसी दिन से डर गए और नहीं जा रहे हैं।' 

'तुम लोगों को स्कूल आना है, यहाँ पर तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। हम  हैं न, कल से स्कूल जरूर आना . पढाई का हर्ज होता है और फिर तुम लोग पीछे रह जाओगे तब कौन पूरा कराएगा? 

'अच्छा अब कल से ये लोग स्कूल आयेंगे।' सावित्री ने कहा।

'और हाँ अगर घर में कोई बात हो तो इनसे कहला दिया करो मैं देख लूँगा। मैं रोज घर चला जाता हूँ इसलिए आ नहीं सकता। आगे से इस बात का ध्यान रखना।'  ये कह कर गिरीश चला गया।
 

                                                                                                                                          (क्रमशः)