रविवार, 23 जून 2019

प्रायश्चित !

        गौरव आज गांव आया हुआ था पिताजी ने गांव में एक मंदिर का निर्माण कराया है उसी का रुद्राभिषेक का कार्यक्रम है।पूजा में उसने भी श्रध्दापूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम के समापन पर भण्डारे का आयोजन था।

  मंदिर के विशाल प्रांगण में  भोजन करने वालों के दो ग्रुप थे उन्हें एक दूसरे से अलग बैठाया गया था तो गौरव को कुछ अजीब सा लगा लेकिन एक तरफ के लोग खाने के बाद पापा के पास आकर दूर से जमीन के पैर छू कर जा रहे थे । यह देखकर उससे रहा नहीं गया - "पापा ये क्या कर रहे हैं ये लोग ?"
"ये अछूत लोग है तो हमें न छूकर दूर से पैर छूते हैं ।"
"लेकिन इतने बुजुर्ग लोग भी ।"
"हाँ हाँ इसीलिए तो अन्नदाता कहते है ।"
    "पापा आप भी ये मानते चले आ रहे हैं । "
"ये परंपराएं तो बाप दादाओं के जमाने से चली आ रही हैं । इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ।"
"लेकिन मैं कर सकता हूँ , समय के हिसाब से परंपराएं बदली भी जा सकती हैं।और उसने बढ़कर एक अछूत बुजुर्ग के पैर छू लिए ।"
"ये क्या किया मालिक ?आप हमें पाप में डालेंगे ।"
"नहीं दादा अपने पूर्वजों के पाप का प्रायश्चित कर रहा हूँ ।"

शुक्रवार, 21 जून 2019

पहले मेरी माँ है @

        रानू जब सोकर उठा तो माँ वहाँ नहीं थी । आज माँ उसको जगाने भी नहीं आई । वह खोजता हुआ गया तो बाहर बरामदे में माँ लेटी थी और वहाँ सब लोग इकट्ठे थे । वो दादी जो कभी माँ से सीधे मुँह बात नहीं करती थी , माँ के सिर पर हाथ फिरा रहीं थी । बुआ माँ को सुंदर साड़ी पहना चुकी थी । लाल-लाल चूड़ियाँ , बाल भी अच्छे से बँधे थे ।
       रानू को समझ न आया कि आज माँ को ये लोग क्या कर रहीं हैं । कभी अच्छी साड़ी नानी के यहाँ से लाईं तो बुआ ने छीन ली । रात दिन काम में लगी रहने वाली माँ आज लेटी क्यों है?
पापा को लोग घेर कर बैठे थे । हर बात में माँ को झिड़कने वाले पापा चुप कैसे हैं ? वह माँ के पास जाकर हिलाने लगा - "उठो माँ तुम सोई क्यों हो?"
          बुआ ने हाथ पकड़ कर खींच लिया - "दूर रहो , तेरी माँ भगवान के घर चली गई है ।"
   "किसने भेजा है? पापा ने , दादी ने या आपने ?"
"बेटा कोई भेजता नहीं , अपने आप चला जाता है आदमी ।"
"झूठ , झूठ , सब झूठ कह रहे हो ।" वह आठ साल का बच्चा अपनी माँ को तिरस्कृत ही देखता आ रहा था । माँ कुछ कहती तो पापा कहते -"पहले मेरी माँ है , उनके विषय में कुछ न सुनूँगा ।"
           वह दौड़कर पापा के पास गया और झकझोरते हुए बोला - " पापा आपने मेरी माँ को क्यों भगवान के पास भेज दिया ? माँ से हमेशा कहते थे कि पहले मेरी माँ है , तो अपनी माँ को पहले क्यों नहीं भेजा ?"
           वापस दौड़कर माँ के पास आया और शव के ऊपर गिर कर चीख चीख कर रोने लगा ।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

स्वीकृति !

                                          होली जैसे वीणा की जिंदगी में रंगों की जगह राख भर गयी थी।  उसकी पहली ही होली तो थी।  विनीत दोस्तों के साथ होली खेलने निकल गया लेकिन फिर लौटा नहीं। सारा का सारा ठीकरा वीणा के सिर पर फोड़ दिया गया। पता नहीं कैसी किस्मत है ?  मेरे बेटे को खा गयी।  वही तो इस घर का चिराग था और अँधेरा कर दिया।
                                     वीणा सब कुछ चुपचाप सुनती रहती थी और यंत्रवत काम करती रहती थी।  मायके भी नहीं भेजा जाता था क्योंकि अभी इस घर में जो एक साजिश पल रही थी , उसको तो पूरा हो जाने दें फिर वीणा को घर से धक्के देकर निकल दिया जायेगा। उसे न अपने वर्तमान का पता था और न ही भविष्य का।  बिना पैसे की नौकरानी बन गयी थी।  ननद और देवर उसे भाई की मौत का जिम्मेदार ठहरा चुके थे और सास भी कम नहीं थी। दिन में कई बार उसके बेटे को खा गयी ' का आरोप सुनने को मिलता रहता था।
              बस एक इंसान था , जो उससे सहानुभूति रखते थे , वह थे उसके ससुर।  वह जब भी उन्हें खाना पानी देने जाती तो वे बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फिराते थे लेकिन खामोश रहते थे। वीणा कहाँ जाती और क्या करती है,  इस पर सबकी निगाह रहती। वैसे भी वह बस कभी कभी घर से निकल कर मंदिर तक ही जाती थी और वही आँखें बंद करके भगवान से पूछती कि आखिर मेरा कुसूर क्या था ? घर वाले भी बहुत सपन्न न थे कि वह बेटी को अपने घर ले जाते।  वह तो विनीत के पैर में हलकी सी लचक थी तो इन लोगों ने वीणा की खूबसूरती देख कर बिना दहेज़ के शादी कर ली थी। घर का माहौल उसके लिए हमेशा तनावपूर्ण ही रहता था।  विनीत के पीछे तरह तरह के तंज कसे जाते थे. लेकिन वह विनीत के प्यार के आगे कुछ भी बुरा नहीं मानती थी।
                        तभी विनीत की ऑफिस की कार्यवाही पूरी हुई और उसकी  नौकरी का प्रस्ताव आ गया।  घर में खलबली मच गयी।  घर में तीन सदस्य उस पर दबाव बना रहे थे कि नौकरी देवर को देने के लिए वह लिख कर दे दे।  उसका भविष्य बन जाएगा तो घर का भार उठा लेगा। उसे तो भरण  पोषण के लिए पेंशन मिलती ही रहेगी।फिर इस घर की वहू नौकरी करने जायेगी तो लोग क्या कहेंगे ? बहू का खर्च तक नहीं उठा पा रहे हैं।
                           वह उहापोह में गुजर रही थी, तभी ससुर ने उसे समझाया कि बेटी नौकरी सुमित को देने के लिए राजी मत होना , नहीं तो इस नरक में रहकर आज तीन की और कल से चार की गुलामी तुम्हारा भविष्य बन  जाएगा। तुम इसी घर में घुट  घुट कर मर जाओगी।उसको भी ससुर की बात पहले से ही समझ आ रही थी।
                           फिर वह दिन आया उसे बैंक के मैनेजर ने बुलवाया , उसकी सहमति जानने के लिए।   उसके साथ सास और देवर भी गए और उसके पीछे पीछे लगे रहे और मैनेजर के कमरे में भी पहुँच गए।
                      मैनेजर ने कहा - "आप लोग बाहर रहें , मुझे वीणा जी से कुछ अकेले में बात करनी है। "
     मैनेजर की बात सुन कर देवर बिफर गया -  "अकेले में न जाने आप क्या लिखवा लें। "
उसकी बात सुनकर मैनेजर एकदम भड़क गया , " गैट आउट।" मैनेजर  का रुख देख कर दोनों चुपचाप बाहर 
निकल गए।
                         मैनेजर जिस तरह से  वीणा को बलि का बकरा बना देख रहा था , अचंभित था, लेकिन सहृदय और मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण था - "बेटी मुझे बताओ , तुम्हें नौकरी करनी है। "
"जी"
"फिर ये सब क्या चाहते हैं ?"
"मैं नौकरी देवर को देने के लिए सहमति दे दूँ।"
",बिल्कुल नहीं , पत्नी के रहते हुए नौकरी किसी और को नहीं दी जायेगी। अब तुम जाओ बाकी  मैं देख लूँगा। "
              वीणा उन लोगों के साथ घर आ गयी।  ससुर की आँखों में प्रश्न तैर रहे थे और शेष  लोगों ने प्रश्नों की झड़ी लगा रखी थी। वह शांत थी और कहा कि मैनेजर ने कहा है कि वह खुद सोच कर बुलाएँगे।  एक हफ़्ते बाद ही वीणा का बुलावा आ गया और उस पत्र को पढ़ कर हंगामा मच गया।
"यही तो चाहती थी कि घर के बाहर जाकर घूमे फिरे और नौकरी का तो नाम है।  "
"मैंने कहा था न कि सुमित का नाम बोल देना वहां बोली ही नहीं होगी , इसको तो घूमने का चस्का लगा था।  शादी से पहले घूमंती रही होगी तो घर में दीदा कैसे लगे ?" सास चीख चीख कर घर सिर पर उठाये थी।  लेकिन अब कुछ हो नहीं सकता था और इस समय घर में सबसे खुश कोई व्यक्ति था तो वह थे वीणा के ससुर। वीणा ने बैंक जाना शुरू कर दिया फिर भी वह घर के ज्यादा से ज्यादा काम करके जाती थी और आकर तो करना ही होता था।  एक संतोष था कि घर के तनावपूर्ण माहौल से वह सात घंटे तो बाहर रहती है और सबसे हँस बोल कर अपने गम को भूली रहती है।
                                   फिर वही होली आने वाली थी और वीणा को होली के नाम से डर लगने लगा था।  बैंक में होली की छुट्टी से पहले खूब रंगबाजी हुई।  वीणा लाख मना करने के बावजूद बची न रह सकी और उसको भी रंग दिया गया।  जब वह घर लौटी तो रंगी हुई थी।  घर में जैसे बिजली से गिरी और चालू हो गए व्यंग्यबाण - "मैं तो पहले ही जानती थी कि इसके रंग ढंग , बाहर कदम निकले नहीं कि उड़ने लगेगी। " सास बम की तरह फ़ट पड़ी।
"तभी तो मुझे नौकरी नहीं मिलने दी। " देवर का कटुता भरा स्वर गूंजा।
"महारानी को होली सवार है , भैया को मरे हुए अभी एक साल नहीं हुआ और रंग बिरंगी घूमने लगी। " ननद का पीछे क्यों रह जाती ?
                     ससुर सबसे शांत रहे क्योंकि उन्होंने कुछ और ही सोच रखा था।  पार्क में बैठने वाले अपने मित्रों से वह बहू के विषय में बात करते थे और तभी उनको अपने एक पार्क मित्र के विधुर बेटे के विषय में पता चला तो उन्होंने होली मिलन के लिए घर बुला लिया।  उनका उद्देश्य सिर्फ इतना था कि  वीणा और वह एक दूसरे को देख लें।  बताया उन्होंने किसी को कुछ भी नहीं था।  बस पिताओं के बीच बात हुई थी। अगर दोनों राजी हो जाते हैं तो फिर उनका विवाह करवा दिया जाएगा क्योंकि वीणा के आगे अभी पूरी जिंदगी पड़ी है और मित्र के बेटे की तो शादी होनी ही है।  वे समय का इन्तजार करके हुए आगे बढ़ गए। तय हुआ कि अगर मित्र के बेटे को वीणा पसंद है और वह उसको जीवनसाथी बनाने के लिए राजी है तो वह रंग की प्लेट से पीला गुलाल उठा कर वीणा  ससुर को लगाएगा और यदि सहमत न हो तो लाल गुलाल लगाएगा।
                                   ससुर ने वीणा को भी समझाया कि होली मिलन में वह  गुझिया की प्लेट ससुर के हाथ में देगी न कि वह मेज पर रखेगी। बगैर किसी शोर शराबा के स्वीकृति मिल जाए और दोनों परिवार के प्रमुख को ये बात पता भी लग जाए।  फिर आगे की रणनीति बनाने में भी वीणा के ससुर को बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
होली मिलन के अवसर पर प्रवीण ने पीला गुलाल वीणा के ससुर जी को लगाया और वीणा ने गुझिया की प्लेट ससुर के हाथ में पकड़ाई।
                                 दोनों की मौन स्वीकृति से दोनों पुरुषों के चेहरे  संतोष की एक लहर आ गयी थी।       
               

                          

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

संकल्प !

                    


            मीनू अपनी छोटी बहन के को लेकर बहुत परेशान  रहती थी क्योंकि उसमें और उसकी बहन में करीब १२ साल का अंतर था और वह जब तक ये समझ पायी कि उसकी बहन आटिज्म की मरीज है , बहुत देर हो  चुकी थी।  फिर भी उसने अपनी पढाई में खोजा कि इस तरह के बच्चों को कैसे सामान्य तरीके से जीना सिखाया जाय। उसकी माँ इस बात स्वीकार करने के लिए  तैयार ही नहीं थी कि उनकी  बेटी कुछ असामान्य है।  वह अधिक शिक्षित नहीं थी लेकिन अशिक्षित भी नहीं थी।  बड़े घर की बेटी होने के नाते वह कुछ जिद्दी भी थी। पापा इतने व्यस्त थे लेकिन मीनू के प्रयासों से वह संतुष्ट थे।  कभी कभी वह उसकी प्रगति के बारे में उससे पूंछ लेते थे।
                                     मीनू अपनी प्यारी सी गुड़िया के लिए कुछ भी करने को तैयार थी और अब वह डॉक्टरों के पास जाने लगी और बहन को लेकर भी जाने लगी लेकिन सभी ने एक स्वर में उत्तर दिया कि  इस उम्र के बाद हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं।  इस तरह के बच्चों के लिए बचपन से लेकर चार साल की उम्र तक कुछ सुधार  की आशा की जा सकती है।  बेकार की दिलासा देकर हम आपको धोखे में नहीं रख सकते हैं।   .                                  कई डॉक्टरों से एक ही उतर पाने के बाद भी वह निराश नहीं हुई , अब उसने असामान्य बच्चों के लिए खुले हुए सेंटर में जाकर पता लगाना शुरू किया लेकिन वहां की फीस सुन कर वह स्तब्ध रह गयी क्योंकि ये उसके पापा के लिए संभव नहीं था।  उसकी गति में तेजी आई ही थी कि उसके पापा ने उसकी शादी अपने मित्र के बेटे के साथ तय कर दी।
                                मीनू उसको बस नाम से जानती थी लेकिन फिर भी उसने अपने पापा से समर से मिलने के लिए पूछा और जब मुलाकात हुई तो उसने सबसे पहले यही पूछा - ' क्या आप मेरे साथ मेरी बहन की जिम्मेदारी भी उठाने के लिए तैयार हैं , क्योंकि मेरी छोटी बहन माँ पापा के बाद मेरी जिम्मेदारी होगी। '
समर को उसकी बेबाकी और संवेदनशीलता बहुत अच्छी लगी और उसने अपनी सहमति दी।
              लेकिन मीनू के सारे प्रयास नए घर में आकर रुक से गए क्योंकि दूसरे घर में खुद को स्थापित करने के बाद ही कुछ इतर सोचा जा सकता था।
                माँ का पूरा ध्यान अपनी छोटी बेटी के तरफ ही रहता था क्योंकि उसको पता था कि बड़ी तो अपनी घर गृहस्थी में फँस जायेगी फिर वीनू का क्या होगा ? अपने दोनों के सामने ही उसके लिए भविष्य तय कर देना होगा। माँ बेटी के लेकर घर पर रहती थी और पिता अपनी नौकरी की जगह पर। फिर एक दिन अचानक मीनू के पापा का हार्ट अटैक में निधन हो गया।
                सिर्फ माँ ही नहीं बल्कि बेटी को भी लगा कि अब आगे अँधेरा ही है और उसमें रौशनी की कोई एक रेखा भी नजर नहीं आ रही थी। लेकिन ऐसे समय में समर ने मीनू को आश्वासन दिया कि वह दोनों ही परिवारों की जिम्मेदारी को उठाने में उसके साथ पूरी तरह से है।
                  धीरे धीरे माँ के अंदर अपनी और छोटी बेटी के प्रति असुरक्षा की भावना घर करने लगी और वह सबको यानि कि अपनी बेटी को भी शक की निगाह से देखती।  मीनू पर भी वह भरोसा नहीं कर पा रही थी।  मीनू अगर कुछ हित  की बात भी करती तो वह भड़क जाती और धीरे धीरे मीनू ने घर जाना कम कर दिया और  सिर्फ वीनू के लिए वह घर जाती थी - उसकी जरूरत का सामान ले जाती और उसको पसंद का सामान ले जाती।  वह वीनू को अपनी बहन नहीं बल्कि बेटी की तरह से देखती थी क्योंकि उसका मानसिक विकास इतना ही हुआ था। उसे बहुत दिन तक ये समझ नहीं आया कि पापा अब नहीं रहे।  वह सोचती रही कि पापा अपनी नौकरी पर हैं।
                एक दिन जब मीनू पहुंची तो उसने पूछा - "दीदी पापा कब आएंगे ?"
            मीनू के पास कोई जवाब तो था नहीं लेकिन उसने उसको समझाया कि पापा अब नहीं आएंगे तो वह जोर जोर से रोने लगी - "दीदी पापा नहीं आएंगे तो हमें कौन प्यार करेगा ? दीदी मुझे अपने साथ ले चलो मैं वहां रहूंगी।"
             लेकिन मीनू के कहने के बाद भी माँ उसके साथ जाने को राजी नहीं हुई क्योंकि यहाँ गाँव की खेती और  सारी  जायदाद को कौन देखेगा ? माँ के पास पापा की पेंशन थी और खेती का सब था।  लेकिन वह असुरक्षा की भावना से घिरी रहती थी शायद बेटा न होने के कारण या फिर कुछ और।
                    उनकी इस भावना का लोगों ने फायदा उठाना चाहा और उनसे कहा कि वह वीनू के लिए अच्छा सा लड़का बताएँगे और अगर वह सारी  संपत्ति उसके नाम कर देंगी तो वह शादी करके उसको अच्छी तरह से रखेगा। उनके बुढ़ापे का सहारा भी मिल जाएगा।  वह ख़ुशी से फूली न समा रही थीं।  उन्होंने ये बात मीनू को बताना ठीक न समझा कि कहीं मीनू और समर उनके इस निर्णय से खुश न हुए तो वह ये काम करने नहीं देंगे।
लेकिन वीनू ने भोलेपन में अपने दीदी को बताया कि दीदी मम्मी मेरी शादी करने जा रही हैं।  मीनू और समर  का दिमाग ठनका कि कोई असामान्य लड़की से शादी बिना किसी लालच के न करेगा और सामान्य लड़कियों के साथ तो दौलत के लालच में लोग कितने तरीके के दुर्व्यवहार करते हैं , यदि उसकी बहन के साथ कुछ भी किया तो क्या होगा ? वह तो न विरोध कर पाएगी और न ही सुख से जी पाएगी।
                      मीनू घर गयी तो माँ से पूछा कि वह क्या करने जा रही है ?  माँ भड़क गयी  - "मुझे  जीते जी अपनी बेटी के बारे में सोचना है और तुम क्या तुम्हारा अपना घर संसार है और अपनी बेटी है।  तुम कैसे मेरी बेटी को देख पाओगी?"
             अब मीनू की बारी थी और उसने भी माँ को सख्त शब्दों में समझा दिया - " आपने अभी दुनिया देखी ही कितनी है ? गाँव और घर के अलावा कुछ खबर नहीं रहती है।  बाहर  निकलिये और देखिये कि लोग अच्छी अच्छी लड़कियों को पैसे के लिए मार देते हैं और कहीं तो जीवन उनका नर्क बना देते हैं।  अगर आपने उनको सारी संपत्ति दे भी दी तो क्या गारंटी हैं कि वे वीनू को अच्छी तरह से रखेंगे। कल को उन्होंने मार दिया तो संपत्ति तो उन्हें मिल ही जायेगी। वह जैसे भी है मेरे और आपके सामने तो है और आपको पता है कि समर उसको बहन की तरह ही मानते हैं।  उसको कभी भी कोई भी कमी नहीं महसूस होगी। "
             मीनू शहर में पापा के बनवाये मकान में ही रह रही थी,  सो वह चाहती थी कि माँ और वीनू भी आकर उसके साथ रहें। लेकिन माँ को वहां पर बंधन लगता था क्योंकि गाँव में चार औरतें आकर उसके साथ बैठ कर समय बिताया करती थी और चार पैसे की जरूरत होने पर उनसे उधर ले जाती थीं फिर आकर उनके चार काम भी कर देती थीं।  माँ ने हिम्मत नहीं हारी और अपने प्रयासों में और तेजी ला दी।  उसे गाँव में भी उसके पापा से ईर्ष्या रखने वाले कई लोग थे और उन लोगों को मौका मिला कि इनके साथ कुछ धोखा भी किया जा सकता है।  किसी ने माँ को एक लड़का बताया कि वह वीनू से शादी कर सकता है लेकिन उसकी एक शादी हो चुकी है और उसकी पत्नी मर चुकी है लेकिन वह समझा बुझा कर करवा देंगे।  फिर जिसे इतनी संपत्ति मिलेगी तो बेटी को हाथों हाथ रखेंगे।  माँ की ममता कुछ सोच नहीं पा रही थी और उसने वीनू को दिखाने के लिए उन लोगों को बुला लिया।  वीनू ने दीदी को खबर कर दी कि कल उसकी शादी होने वाली है।  मीनू सारा काम छोड़ कर समर के साथ घर भागी लेकिन शादी नहीं उसको देखने के लिए आ रहे थे।  मीनू और समर ने बहुत धैर्य से काम लिया और उन्होंने आने वालों को आने दिया।  फिर बैठ कर उनसे बात की तो पता चला कि वह तीन बच्चों का बाप है और उसकी पत्नी आग लगने से मरी है।  उसको बच्चों को पालने वाली चाहिए।
                   मीनू ने उनको बड़े धैर्य से समझाया कि  उनकी बहन सामान्य नहीं है , वह कोई भी काम नहीं कर सकती है।  उसको देखभाल के लिए खुद एक व्यक्ति की जरूरत पड़ती है।  यह सुन कर वह लोग वापस हो गए।
माँ ने बेटी को खूब डांटा कि तुम ऐसे मेरी बेटी को बदनाम  कर दोगी। कैसी बहन हो तुम , उसका घर क्यों नहीं बसने देती हो ? मेरे मरने के बाद उसका क्या होगा ?"
" आप चिंता क्यों करती हैं ? वीनू मेरे लिए दीपाली की तरह है और वह हमेशा मेरे साथ रहेगी।  जब तक मैं हूँ मैं देखूँगी और मेरे बाद दीपाली उसको देखेगी।  पापा का घर है वह , वहां मेरे साथ साथ वीनू को भी रहने का पूरा  हक़ है। " मीनू ने उनको समझने का भरसक प्रयत्न किया।
        " मान लीजिये कोई उससे शादी कर लेता है और फिर उसको वापस घर भेज देता है क्योंकि उसको आप पूरी  संपत्ति तो पहले ही देने वाली हो। या फिर उसने वीनू को कुछ कर दिया तो आप क्या करोगी ? अभी मेरी बहन जैसी भी है मेरे सामने हैं। "
           " आप समझने की कोशिश कीजिये मुझे सिर्फ वीनू की चिंता नहीं है बल्कि मैं वीनू जैसी और भी लड़कियों और लड़कों के बारे में सोच रही हूँ।  मैं पापा के नाम से एक संस्था खोल रही हूँ , जिसमें ऐसे ही बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम किया जाएगा , इसके लिए विशेष पढाई करके डॉक्टर आते हैं और फिर उनका इलाज होता है।  अगर बच्चे की इस कमी का पता चार साल की उम्र से पहले इलाज शुरू हो जाता है तो वह सामान्य जीवन जी सकते हैं और बड़ी उम्र हो जाने पर उनको आत्मनिर्भर तो बनाया ही जा सकता है। जिनके कोई नहीं है उनके लिए मैं हॉस्टल बना दूँगी।  पापा के इस पैसे और संपत्ति का मुझे कुछ भी नहीं लेना है बल्कि उनके नाम से ऐसे काम करूंगी कि  लोग पापा का नाम इसी तरह से याद रखेंगे। "
                    माँ की समझ में कुछ आया या नहीं लेकिन मीनू अपने काम में आकर लग गयी उसने अपने पापा के नाम से "श्री रामनाथ फाउंडेशन " की स्थापना करके उसे सार्वजनिक रूप से उसको सबके सामने लाने का उपक्रम किया और उसके लिए उसने एक आयोजन रखा जिसमें औपचारिक रूप से उद्घाटन माँ के हाथ से ही करने का विचार रखा
                  वह दिन आ गया और उसने माँ और वीनू को बुला भेजा।  सारी  तैयारियां हो चुकी थीं और वह माँ का इन्तजार कर रही थी।  जैसे ही माँ की गाड़ी रुकी उसने जाकर माँ का स्वागत किया और वह माँ के गले लग गयी।  माँ इतना सारा इंतजाम देख कर भौचक्की रह गयी।
                   मीनू ने माँ के हाथ से फीता कटवा कर फाउंडेशन का उद्घाटन करवाया तो माँ की आँखों में आंसूं आ गये  और पापा की जिम्मेदारी को उठाने के साथ साथ पापा के नाम को एक मुकाम देने के लिए मीनू का प्रयास सफल हुआ क्योंकि माँ के आशीर्वाद के बिना वह अधूरा ही रहता।  वह पापा की तस्वीर के आगे खड़े होकर कह रही थी - "पापा मैं जीत गई आपकी बेटी हूँ न , माँ और वीनू अब मेरे पास हैं और मैं माँ बेटी और बहन सारे दायित्व निभाऊंगी। "

बुधवार, 1 नवंबर 2017

चिता की राख !

                                                     
                                                    
          रात में अचानक जोर जोर से आवाज आने से उनकी नींद खुल गयी।  अंदर से आवाजें आ रहीं थी।  माँ के जेवरों के बंटवारे को लेकर बहस हो रही थी।  बहुओं को ननद से शिकायत थी क्योंकि पापाजी ने मम्मीजी के भारी भारी गहने उन्हें पहले ही दे दिए थे और वह इनमें से भी चाह रही थी।  इसी बात पर सब आक्रोशित थे।  
                       निशांत बाबू के कानों में शब्द शीशे की तरह उतर रहे थे।  कल तक भाई साहब तो थे लेकिन इनमें से कोई न था।  रात में फ़ोन करके उन्होंने छोटे भाई को बुला लिया लेकिन बेटे को नहीं।
"आज रात मेरे पास रुको कुछ बातें करनी है।"
"जी भाई साहब।"
                 उनसे चुपचाप उन्होंने बड़े बेटे को फ़ोन किया - " पापा के पास आ जाओ।"
"चाचाजी अभी ही टूर से लौटा हूँ , सुबह आता हूँ , आप तो हैं ही। "
                  निशांत कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे।  लौटकर आकर भाई साहब के पास बैठ गए।  वह पता नहीं कितनी पुरानी बातें याद करते रहे और फिर बोले जाओ छोटे सो जाओ , मुझे भी नींद  आ रही है। कुछ ही घंटे तो वे अकेले रहे सोते समय और जब वह सुबह उठ कर आये तो भाई साहब सोते ही रह गए।  बहुत जगाया नहीं जागे।  तब फिर बड़े बेटे को फ़ोन किया और बता दिया कि अब तो आ जाओ।  उसने बाकी सब बहन और भाइयों को खबर दी।
                   शाम तक अंतिम संस्कार के बाद जब घर जाने को हुए तो बच्चों ने कहा चाचा जी हवन तक आप भी घर में रहें।  वह भी मन नहीं कर सके , आखिर भाई साहब ने ही तो बुलाया था तो अभी हवन तक उनकी आत्मा यही बसी रहेगी।  उनके सारे बच्चे उच्च पदों पर थे और दामाद भी, लेकिन भाभी के न रहने पर वह घर छोड़ कर कहीं बसना नहीं चाहते थे और उनके बच्चे इस मकान  में नहीं आना चाहते थे। टिफिन लगा लिया था खाने के लिए , बाकी चाय वगैरह खुद कर लेते थे।  जल्दी किसी के पास न गए।भाभी के न रहने पर वे अकेले हो गए थे तो कभी कभी भाई को बुला लेते थे।    उस  दिन भी उन्होंने भाई को फ़ोन किया कि मुझे अपनी तबियत ठीक नहीं लगती है , क्या तुम आ सकते हो ? शायद उनको अहसास हो गया था या कुछ और लगा था।
                नीद  आ नहीं रही थी , करवटें बदलते रहे और जब शोर सहन नहीं हुआ तो उनसे रहा नहीं गया।    वे आखिर उस कमरे में आ ही गये और गुस्से से बोले  - " अरे मूर्खो तुम लोग करोड़ों के मालिक हो फिर भी इस तरह लड़ रहे हो। उनकी चिता की राख  तो ठंडी हो जाने देते। " और वह बाहर निकल गए। 
                   

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

झूठ की लंका !

                                    गाँव में समाधान बैठक होने वाली थी और उसमें मंत्रीजी का आना तय था।  सरपंच गाँव में माहौल बनाने के लिए लोगों को पहले से समझाने में लगा था कि मंत्री जी के सामने कोई भी आदमी किसी बात की शिकायत नहीं करेगा बल्कि मैं जो बता रहा हूँ वैसे ही उत्तर हर आदमी को देना होगा।
-- यहाँ सब सुविधाएँ मिल रहीं है
--गाँव में बिजली आती है।
-- स्कूल में पढाई बराबर होती है।
-- मिड डे मील बढ़िया मिलता है
-- राशन का सामान मिलता है।
                           घर जाके पुरुष वर्ग अपनी पत्नियों को ये बातें समझा रहे थे और उनके बच्चे सुन रहे थे।  छुटकी बोली - बापू तुम झूठ बुलिहो और हमसे कहत हो कि झूठ बोलव पाप होत है। '
' चुप कर ये बड़ों की बातें तुम्हरे समझ न अइहें। ' बापू ने धमका दिया।
                   छुटकी चुपचाप कोने जाकर बैठ गई और बापू की कही बातें दुहराने लगी।
-- सुविधाएं  - नाहीं
-- बिजली -  कभउँ कभउँ
--पढाई  - बहनजी बोर्ड पर लिख देती है और फिर दस बार कॉपी में उतारो और वे सूटर बुनें बैठ जातीं.
--मिड डे मील - कच्चा पक्का , पानी की दाल , कंकड़ के चावल
-- ये राशन का होत  है नाहीं पता।
                         एक फ़टफ़टिया वाले बाबू आत है और हम सबन के नाम लिख ले जात  है बस।
                        मंत्री जी आये और सारे गाँव वाले पंचायत घर में इकट्ठे हो गए।  छुटकी थोड़ी देर बाद खिड़की से खुद कर सबके पीछे आकर खड़ी हो गयी।  मंत्री जी ने फाइलें देखीं और दो चार लोगों से पूछा तो सबकी एक ही इबारत।  उनकी नजर छुटकी पर पड़ी तो इशारे से उसको बुलाया।  वह मटकती हुई पहुँच गयी।  मंत्री जी ने वही सवाल छुटकी से पूछे और छुटकी जो दुहरा रही थी वही सब बोल दी।
                   सरपंच की झूठ की लंका छुटकी ने एक मिनट में ढहा दी।

शनिवार, 23 सितंबर 2017

दुस्साहस !



                 नीति स्कूल से निकल कर साइकिल से घर की तरफ चली जा रही थी।  ऑफिसर क्वार्टर होने के कारन कुछ रास्ता सुनसान भी पड़ता था।  वह उसी रास्ते पर चली जा रही थी कि  उसके बगल में एक गाड़ी रुकती है और उसको वह लोग गाड़ी में खींच लेते हैं और फिर उसके चिल्लाने से पूर्व ही उसको बेहोश करने के लिए कुछ सुँघा देते हैं।
                 नीति जब होश में आयी तो उसने अपने को एक अँधेरे कमरे में पाया , जिसमें एक पुराना  सोफा पड़ा था और एक तरफ एक बैड कहे जाने वाला दीवान। उससे नहीं मालूम था कि कितना बजा  था और वह कहाँ ला कर बंद की गयी थी? उसे भूख तेजी से लोग रही थी लेकिन खाने को कुछ भी न था।  फिर उसने देखा कि कोई दरवाजा खोल रहा है , अँधेरे में रौशनी तेजी से आनी  शुरू हुई तो उसकी आँखें चुंधियाने लगी और उसने आँखों को रौशनी से बचाने के लिए अपनी  हथेली सामने फैला ली। उसे आने वाले की शक्ल नहीं दिख रही थी।
"कौन ?" आने वाले ने पूछा।
"मैं नीति। ": उसने कांपती आवाज में कहा।
          आने वाला समझ गया कि ये कारस्तानी सेठ जी के बेटे की होगी।  वह अपने आवारा दोस्तों के साथ मिल कर कुछ भी कर सकता है।  वह अब धर्म संकट में फँस गया कि कैसे इसको बचाये ? एक लड़की की अस्मत बचना और एक क्षण उसे अपनी बेटी याद आ गयी , जिसे किसी ने इज्जत लूटने के बाद मार कर फ़ेंक दिया था। वह काँप गया। उसने तुरंत सोचा और नीति के पास गया। 
        :"बेटा मैं तुम्हें इस खिड़की तक पहुंचा दूंगा और तुम बाहर  कूद कर दायीं और भागती जाना तो बाउंड्री के किनारे मेरी कोठरी बनी है उसी में छुप जाना।  क्योंकि अगर सामने से भगाऊंगा तो मेरे नाम होगा और उन लड़कों की ऊपर महफ़िल जमी है।  वह लोग एक आध घंटे में यहाँ आएंगे।  तुम छिपी रहना और मैं खिड़की खुली छोड़ दूंगा जिससे वह समझेंगे की तुम खुद भाग गयी हो। "
"फिर काका आप को तो कुछ नहीं करेंगे ?"
"मेरी चिंता छोडो बेटी , ये गुजरी जिंदगी कितने पाप होते हुए देख चुकी है।अपनी बेटी तो न बचा सका। दूसरी बेटी की जिंदगी अब अपने हाथ से  बचा लूँ तो अहोभाग्य । "