रविवार, 7 अगस्त 2011

भवितव्यता !

पूरे मोहल्ले में यह खबर बिजली की तरह से फैल गयी कि बनारस में नीतू के फूफाजी का अचानकनिधन हो गयामोहल्ले के बड़े बुजुर्गों ने तो उनका बचपन भी देखा था और फिर व्याह, बच्चे सभी कुछ तो सबकेसामने हुआ किन्तु सावित्री जैसा भाग्य किसी ने किसी का नहीं देखा और सुना थाएक बार विधवा - कितना कठिनहोता है वैधव्य धोना और सावित्री फिर विधवा हो गयीविपत्तियों के पहाड़ तो उसने जीवन भर टूटते देखे और उनकेतले दब कर जीवन जियाकभी रोई, सिसकी, घुटी और फिर कभी चेहरे के मुस्कराहट से भरी भी नजर आई लेकिनइतने उतर-चढाव शायद किसी ने अपनी जिन्दगी में देखे होंगे
बचपन में गाँव के हिसाब से शादी कर दी गयी थी, पास के ही गाँव में भरे पूरे परिवार मेंइकलौती बेटीऔर सात भाइयों की इकलौती बहनबड़ी दुलारी प्यारी - कौन सी सुविधा थी जो उसे नहीं मिलीहर कोई इसी फिराक मेंरहता कि कौन सी खुशिया अपनी बहन और बेटी के आँचल में डाल देंसिर्फ पांचवे में पढ़ रही थी तभी उसकी शादी करदी गयी थीससुराल में भी उसको खूब सम्मान मिलाखूब सारा दहेज़ लेकर जो आई थी और फिर सबकी आँख का ताराबन कर रहीपति तब पढ़ ही रहा था - घर में अच्छी खेती बाड़ी थीधन धान्य की कमी थीघर में सम्पन्न परिवारोंकी निशानी ट्रैक्टर और जीप दोनों ही थेउसका पति पढ़ने में होशियार था तो उससे पिता को भी बहुत उम्मीदें थी किवह घर में पढ़ लिख जाएगा तो फिर बाकी भाई भी पढ़ लिख जायेंगे और खेती के बारे में भी वह सब देख सकता है
पढ़ने के बाद शशिधर की नौकरी पास के कस्बे में लग गयी, यद्यपि पिता कि इच्छा थी कि वह नौकरी करे लेकिनउसका कहना था कि घर से अधिक दूर नहीं है , घर से रोज आया और जाया जा सकता है तो फिर कोई बुराई नहीं हैइसशर्त पर कि वह घर से ही आया जाया करेगा उसके पिता मान गए
सावित्री के एक एक करके तीन बेटे हुएएक तो बड़ी बहू फिर घर में बेटे ही बेटे पलकों पर बिठाया जातावह अधिक दिन ससुराल में रहती कभी मायके और कभी ससुराल में बनी रहतीमन से एकदम भोली और साफ थीपति की कमाई से कोई मतलब थाजो पैसे दे देता बहुत थाफिर उसे पिता के घर से इतना मिलता रहता था किखाली हाथ तो उसका कभी रहता ही थासास तो उसे साक्षात लक्ष्मी ही मानती थीउसकी तरह से देवरों की शादी भीजल्दी ही कर दी गयी लेकिन अभी सास गौना लेने को तैयार थी क्योंकि सावित्री तो बड़ी बहू थी सो शौक के मारे जल्दीही गौना ले लिया थाउसके देवर शशिधर की तरह से पढ़ने लिखने वाले थेउनकी संगति बिगड़ चुकी थीवे तोबड़े भाई की तरह से कर्मठ और व्यवहारकुशल थे और ही जिम्मेदारसभी खेती के काम में लगे रहते और जो हाथ मेंआता उससे उनकी संगति बिगड़ने लगीघर का पैसा जुएँ और शराब में उड़ाना शुरू कर दियाचापलूस दोस्तों की कमी थीउसको घर के खिलाफ भड़का कर पैसे खर्च करवाने में किसी को बुरा लगता थामौज मस्ती उसके दम पर हीचल रही थी
शशिधर ने एक दिन भाइयों को ट्यूबबेल पर आवारा लड़के के साथ मस्ती करते देखा तो उसके कानखड़े हो गए कि ये तो बर्बादी के ओर बढ़ रहे हैंउसने उनको वही जाकर लताड़ा --
'यहाँ क्या तमाशा मचा रखा है।'
'कुछ नहीं - ये लोग गए तो ताश खेल रहे थे। ' जुएँ के ताश समेट रहे दोस्तों को उसने कसकर थप्पड़ लगाये और भाईको तो घसीटते हुए घर लाकर पिता के सामने खड़ा कर दियापिता ने भी उसको दो चार तमाचे जड़ दिएशशिधर के येकदम घर को बर्बादी से बचाने के लिए उसकी अपनी जिन्दगी और परिवार के लिए आगे मंहगा पड़ेगा ये किसी ने नहींसोचा था
घर में ही महाभारत होने लगीबड़े भाई की कमाई पर ऐश करना बंद हो गयापिता ने भी अब पैसे देने केबारे में सोचना शुरू कर दियाशायद भाई सुधर भी जाते लेकिन उनके आवारा यार दोस्तों ने तो अपनी मौज मस्ती मेंखलल पड़ते हुए देखी तो वे उसको भड़काने लगे -
'तुम भी तो इस खेती के हिस्सेदार हो और अभी तुम्हारा खर्चा ही क्या है? सारी गृहस्थी तो तुम्हारे भाई की हैसाराहिस्सा तो उसके बीबी बच्चों पर खर्च होता हैतुम अपनी खेती बंटवा लो , फिर कोई रोकने टोकने वाला नहीं होगा। '
उन मूढ़ मगज को बरगलाना आसान था क्योंकि पढ़ाई लिखाई से उनको कोई मतलब नहीं था और फिर घरसे भी अधिक उन्हें अपने दोस्तों पर भरोसा जो था कि वे सही राय देंगेउनकी समझ आने लगा कि दोस्त सही कह रहेहैंउसने घर में बंटवारे की बात की तो और भी धुनाई हुईअब घर वालों को समझ गया था कि इसके मक्कार दोस्तही इसको भड़का रहे हैंमुफ्त में खाना पीना किसे बुरा लगता है? सब के सब ऐसे ही छोटे घरों के थे, चापलूसी करने मेंकोई पैसे खर्च तो होते नहीं है
शशिधर को अब पूरे घर की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही थीउसने अपने बचपन के दोस्त जो उसके साथही स्कूल में टीचर था उसके गाँव से होकर रास्ता जाता था उसके गाँव कावह रोज मोटर साइकिल से जाता था, अबशशिधर ने उसके साथ घर लौटना शुरू कर दियाइससे वह घर जल्दी आने लगा क्योंकि साइकिल से जाते आते देर जोजाती थीदोस्त भी उसका बचपन का दोस्त ही नहीं बल्कि अन्तरंग भी थाअंतरंगता के चलते वे आपस में अपने सारेसुख दुःख बाँट लिया करते थे
छोटे भाइयों को हथियार बनाकर उसके कंधे पर बन्दूक रख कर चलाने वाले और भी पैदा होने लगे क्योंकि गाँव में उनकी समृद्धि और खुशहाली से जलने वालों की कमी थीकिसके मन में क्या पल रहा है ये सब कुछ तो जाना नहीं जा सकता हैवैसे भी ऐसे में घर और कुनबे के लोग भी दुश्मन बन जाते हैंघर में कुछ कहने वाले शशिधर को इस बात का अहसास होने लगा था कई बार उसने अपने मित्र से कहा भी - 'मुझे अपने और अपने परिवार के लिए डर लगने लगा है।'
'ऐसा क्यों?'
'पता नहीं क्यों ये मेरी आत्मा को लगने लगा है, कि कहीं कुछ अनहोनी हो जाए ?'
'ऐसा विचार मन में मत लाया करो, उस ईश्वर पर भरोसा रखो।' मित्र उसको दिलासा दिया करता था
'वह तो रह ही जाता है, हम कर भी क्या सकते हैं? ' वह हताश स्वर में कभी कभी बोल जाता था
कोई नहीं जानता था की शशिधर की ये शंका इतनी जल्दी ही सत्य सिद्ध हो जाएगी और सब कुछ ऐसे बिखर जाएगा जैसे की कभी कुछ था ही नहींवह सावित्री जो अभी भी एकदम भोली थी , अपने बच्चों और पति के अलावाउसकी कोई दुनियाँ थी ही नहीं

(क्रमशः )

सोमवार, 23 मई 2011

अग्नि-परीक्षा ! (२)

पूर्वकथा : निमिषा एक असामान्य शारीरिक संरचना का शिकार लड़की , जो आई आई टी से अंग्रेजी में पी एच डी कर रही थी अपनी इस कमजोरी के करण उसे उपहास का पात्र बनाया करते थे लोग समाज कि दृष्टि से ऐसी लड़की से कौन शादी करेगा? इसका भविष्य क्या होगा किन्तु वह अपनी इसी कमजोरी पर विजय पाने के लिए कटिबद्ध थी उसे पता था कि उसके घर वाले उसके लिए चिंतित है लेकिन जो उसके साथ चलने के लिए तैयार है उसके लिए वे कभी तैयार होंगे और इसी लिए उसने पहले अपनी पढ़ाई पूरी करने को संकल्प माँ कर आगे बढ़ना शुरू किया...........

गतांक से आगे :

वह यहाँ रही समय मिलने पर मिलने के लिए जाती थी लेकिन मेरा विभाग दूसरा और साथ के लोग भी दूसरे तो वह उतने खुल कर बात नहीं कर पाती थी फिर एक दिन वह अपनी थीसिस जमा करके चली गयी महीनों के बाद जब उसका डिफेंस हुआ तब आई थी उसमें उसने लंच पर मुझे भी बुलाया था लंच में कुमार भी था किन्तु आगे के विषय में मैंने कुछ पूछना ठीक समझ और इतने लोगों के बीच कुछ बताना उसने सही समझा होगा उसके बाद बहुत लम्बे समय तक उससे मुलाकात नहीं हुई और कोई समाचार ही मिला उन दिनों मोबाइल भी थे कि एक दूसरे से संपर्क कर पाते और नहीं नेट कि सुविधा इतनी अच्छी थी सफर के मुसाफिर की तरह से हम बिछुड़ चुके थे
कई वर्ष के बाद मुझे उसकी एक सहेली मिली तो उसने बताया कि निमिषा और कुमार ने कोर्ट मैरिज कर ली और दोनों घरों के दरवाजे दोनों के लिए बंद हो गए शादी करके वह सीधे मेरे ही घर आई थी और फिर मेरी मम्मी ने उसका बेटी कि तरह से स्वागत किया और विदाई की सुनकर बहुत अच्छा लगा कि उसको मंजिल तो मिली लेकिन वह मन्जिल थी या फिर अग्नि परीक्षा देना अभी बाकी था ये तो मुझे पता ही नहीं था
फिर एक लम्बा अंतराल और कोई खोज खबर नहींउसकी अपनी व्यक्तिगत बातों को तो उसके अलावा और कोई नहीं बता सकता था और मैं उससे बिल्कुल ही अनभिज्ञ थीफिर एक बार दुबारा उसकी मित्र से मुलाकात हुई क्योंकि वह कैम्पस की ही रहने वाली थी तो कभी जब भी आती तो जाती थीउससे ही पता चला कि निमिषा की जॉब लग गयी बेंगलोरे में और उसके एक बेटी भी हैकुमार ने भी वही पर जॉब कर ली हैउसका फ़ोननंबर तो मैंने लिए लेकिन फिर भूल गयी
इधर कुछ महीने पहले ही फेसबुक पर
उसका कमेन्ट देखा - हाय दी मैंने आपको खोज ही लियाउसमें ही उसके परिवार के फोटो भी देखे और एक दो बातें हुई लेकिन फिर सब अपने अपने में
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हम लोगों को कई दिन तक नर्सिंग होम में रहना पड़ा लेकिन अधिक मुलाकात नहीं हो सकीएक दिन वह गयी कि चलिए कहीं बैठते हैंउसे शायद कहने के लिए बहुत कुछ था और मुझे उससे सुनने के लिए भीनहीं तो शायद ये कहानी भी लिखी जातीहम सामने एक कैफेटेरिया में जाकर बैठ गए
"और सुनाओ कैसे कट रही है? "
"अब तो सब ठीक हो चुका है, लेकिन बहुत झेला है मैंने।"
"वही तो सुनने कि इच्छा है, कहाँ तो दोनों के परिवार इतने खिलाफ थे और कहाँ सब ठीक ।"
"आप सुनेंगी तो कहेंगी कि तुमने इतना सारा किया कैसे?"
"ये तो मैं जानती थी कि निमिषा तेरे में बहुत सहनशक्ति है और तू विपरीत धाराओं को भी मोड कर ला सकती है। "
"वो कैसे?"
"बस इंसान को परखने की समझ होनी चाहिए।"
अब छोड़ ये सब बस मुझे शोर्ट में बता दे कि कैसे ये सब हुआ?
"दी , मैंने अपनी पी एच डी पूरे होते ही, सबसे पहले अपने घर में कहा, लेकिन घर में तो कोई सवाल ही नहीं थामैंने घर छोड़ कर कुछ महीने हॉस्टल में ही बितायेमैं इस चक्कर में थी कि यहीं कोई प्रोजेक्ट में मुझे जॉब मिल जाय तो मैं फिर अपनी बात के लिए इन्तजार कर सकती हूँ लेकिन जॉब नहीं मिली और फिर एक दिन मैंने कुमार से कहा किअब हमें निर्णय लेना ही पड़ेगा नहीं तो कब तक हम सबके मुँह को देख कर बैठे रहेंगे
कुमार ने भी खुद को तैयार कर रखा था , उसने अपनी माँ से पहले ही बात कर ली थी और वे कतई राजी नहीं थींवे नौकरी करती थी और बहुत ही तेज तर्रार थींहम दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली और शादी करके मैं शुभ्रा के घर सीधे आई थीआंटी ने मुझे सपोर्ट दिया था और उन्होंने मुझे माँ की तरह से ही लियाउन्होंने कहा भी कि तुम कुछ दिन यहाँ रह सकती हो लेकिन मैंने इसके लिए मना कर दिया
हम यहाँ से बाहर जाकर रह नहीं सकते थे क्योंकि कुमार की जॉब यही पर थी लेकिन हमने अपने घरों से दूर एक घर लेकर रहना शुरू कर दियाकुमार की माँ का कहना था कि वह रोज वहाँ आएगाकुमार अपने घर दिन में एक बार जरूर जातेकुछ महीने के बाद उनकी माँ ने कहा कि तुम उसको लगा सकते हो लेकिन मैं उससे कुछ भी कहूं या करूँ तुम बोलोगे नहींकुमार को ये मंजूर नहीं थाउन्होंने मना कर दिया और मेरे पास आकर ये बात बतलाईमैंने कुमार से कहा कि क्यों नहीं मान लेते उनकी बात
"इस लिए कि मैं जानता हूँ कि मेरी माँ कितनी जिद्दी और कड़क स्वभाव की हैउसने अगर दुर्व्यवहार किया तो मैं सहन नहीं कर पाऊंगा और फिर जो लिहाज के पर्दा बना हुआ था वह उठ जाएगा। "
"ऐसा कुछ भी नहीं होगा, मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूँ कि मैं सब कुछ सह लूंगी।"
"तुम सह लोगी ये मैं जानता हूँ लेकिन शायद मैं सहन नहीं कर पाऊंगाहमने शादी की है कोई गुनाह नहीं कियाजिसकी सजा तुमको मिलेमैं भी तो बराबर का हकदार हूँफिर वही मेरे लिए होना चाहिए।"
"कुमार, एक बार उन्हें मौका दो, घर छोड़ कर हम भी तो सुख से नहीं रह पा रहे हैं, उनकी आत्मा भी मुझे कोसती होंगी कि मेरे बेटे को छीन लिया।"
"अगर मुझसे सहन नहीं हुआ तो फिर मैं उस घर को जीवन भर के लिए त्याग दूँगाअगर इस बात पर तुम राजी होतो मैं तुम्हें वहाँ ले जा सकता हूँ। "
"ठीक है, मुझे मंजूर है."
दी हम लोग उस घर में चले गए लेकिन लगता ऐसा था कि वे मुझसे कोई बदला लेने की सोच रखी थीउन्होंने सारे काम वाले निकाल कर बाहर कर दिएमैं अपने शरीर के कारण नीचे बैठ कर कोई काम नहीं कर पाती थी. फिर मैंने अपने को इसके लिए तैयार कियावह जल्दी अपने ऑफिस चली जाती थी और फिर कुमार भी मेरे साथ काम लेतेइस जंग में कुमार ने जिस तरह से मेरा साथ दिया है तभी मैं उनकी माँ की परीक्षा में सफल हो पाई नहीं तो शायद मैं कब की टूट जाती
मैंने दो साल उस घर में नौकरानी से भी बदतर स्थिति में गुजारे और मैं अकेले मैं खूब रोती कि क्या मैंइतनी पढ़ाई करके यही करती रहूंगीमेरे पास जो डिग्री थी उसकी बहुत कीमत थी लेकिन जब तक कुछ नहीं तो बेकार ही थीफिर शायद ईश्वर को मेरे ऊपर तरस गया और मुझे बेंगलोर से इंटरव्यू के लिए कॉल गयीघर में मचा बवंडर कि इतनी दूर क्यों जाएगी यही कहीं कॉलेज में मिले तो कर लेनालेकिन नहीं मुझे यहाँ से निकलनेका मौका मिल रहा था और मैं उसको छोड़ना नहीं चाहती थीईश्वर ने भी साथ दिया और मुझे वहाँ जॉब मिल गयीमैं वहाँ से वापस ही नहीं लौटी , पहले वहीं पर गेस्ट हाउस में रहने की जगह मिल गयीकुमार ने यहाँ आकर सबको बता दियाघर में कुहराम मच गया कि क्या जरूरत थी इतनी दूर जाने कीमैं तुमको तो वहाँ जाने नहीं दूँगीकुमार तुरंत ही आने को तैयार थे कि वहीं कोई जॉब देख लूँगा लेकिन मैंने उसको मना किया कि मुझे कन्फर्म हो जाने दो फिरकोई कदम उठनामैं कन्फर्म हो गयी और फिर कुमार भी यहीं गएयही क्षिति का जन्म हुआलोगों को ये था कि मेरे शरीर के वजह से मैं कभी माँ नहीं बन पाऊँगी लेकिन ईश्वर ने वह भी रास्ता खोल दिया
क्षिति के जन्म के बाद सासु माँ ने वहाँ बुलाना चाहा लेकिन मैं ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि वे यहाँ आकर रह सकती हैं लेकिन मैं वापस नहीं आऊँगी
"तेरे मम्मी पापा का क्या रूख रहा।"
"मेरे मम्मी पापा भी सालों तक माफ नहीं कर सके लेकिन जब पापा को कैंसर हुआ तो भाई तो बाहर जाकर बस गयाथादीदी लोग भी बाहर ही थी लेकिन उनको भरोसा था अपनी बच्चे पर सो मेरे पास खबर भेजी कि क्या आखिरीसमय भी नहीं आएगीमैं वहाँ रहती थी तो छुट्टी नहीं लेती थी इसलिए मैं लम्बी छुट्टी लेकर आई और फिर पापा की बहुत सेवा की किन्तु वह उनका आखिरी समय था और वे भी चले गए । "
बहने मेरी पहले भी मेरी बहुत विरोधी थी , सबके साथ औपचारिक सम्बन्ध बने हुए थे और आज भीबने हुए हैं
फिर हम लोग उठ कर जब नर्सिंग होम आये तो मैंने सोचा कि निमिषा की सासू माँ से मिलती हीचलूँऔर मैं उसके साथ उसकी सास के पास चले गएउनसे मेरा परिचय करवाया - "मम्मी जी, ये रेखा दी है, मेरेसाथ आई आई टी में काम करती थी, ये तो अभी भी वहीं हैऊपर इनका कोई घर वाला भर्ती है तो मिल गयी औरआपसे मिलने के लिए आयीं है।"
उनसे नमस्ते करके मैं वहीं बैठ गयीचेहरे से बड़ी ही खुर्राट लग रही थी, इस उम्र में भी उनके चेहरे पर चमक थीमैं इतना कुछ इनके बारे में सुन चुकी थी कि मुझे लग रहा था कि निमिषा कैसे इनके साथ रह रही है?
"आप की तबियत कैसी है?"
"हाँ अब तो ठीक हूँ, काफी आराम हो रहा है।"
"ये आपकी सेवा करती है या फिर ऐसे ही।"
"नहीं, ये मेरी बेटी है तो और बहूँ है तो इसने मेरी बहुत सेवा की हैमुझे उम्मीद नहीं थी कि ये मेरी इतनी सेवाकरेगी।"
उनके इन्हीं शब्दों के साथ मुझे लगा कि निमिषा ने वाकई अग्नि परीक्षा पास ही नहीं की बल्कि उसमें तपकर खरा सोना बन कर निकली है
(समाप्त)

अग्नि-परीक्षा !

कुछ ही दिन पहले वह मुझे नर्सिंग होम कि लिफ्ट में टकरा गयीएक लम्बे अरसे बाद मिलीसारी चीजेंवही लेकिन बस चेहरे से उम्र झलकने लगी थी और हो भी क्यों करीब १९ वर्ष के लम्बे अंतराल के बाद वह मुझे मिलीथी
इस बीच कभी उसकी कोई सहेली मिल गयी और जिक्र हुआ तो कुछ समाचार उसका मिलता रहा , बसइतना जानती थी कि निमिषा बेंगलोरे में किसी संस्थान में प्रोफेसर है
"निमिषा" मैं तो उसको देख कर चीख ही पडी थी
"हाय दीदी, आप यहाँ कहाँ?"
"यहाँ मेरा भांजा एडमिट है - उन्हीं के साथ हूँ और तुम?"
"सासू माँ एडमिट है - उनसे पास हूँ।" उसकी मंजिल गयी और वह रूम नं बता कर आगे बढ़ गयी और मैं ऊपरचली गयी
लिफ्ट तो ऊपर जा रही थी और मैं अतीत के सागर में गोते लगाने लगीहम भूल जाते हैं कभी कभी ऐसे लोगोंको जिनको कुछ कहा जा सकता है और ऐसी ही निमिषा थी वर्षों तक वह मुझसे बराबर मिलती रही थी जिसमें सेएक साल तो हम साथ ही बैठते थे और हर बात भी शेयर करते थे लेकिन तब वह सिर्फ एक पढ़ने वाली लड़की ही थी
आज से २४ साल पहले कि बात है तब मैंने अपनी नौकरी नई नई ज्वाइन की थीआई आई टी के मानविकीविभाग में मेरी पहली नियुक्ति हुई थीनिमिषा वहीं पर अंग्रेजी में पी एच डी कर रही थीउसके गाइड का कमरा मेरेकमरे के ठीक सामने था और वह अक्सर आती और वहाँ से निकल कर हमारे कमरे में बैठ जाती और कभी अपनाकाम करती और कभी बातें करने लगती
इस दुनियाँ में उपहास करने वाले बहुत होते हैं और उसकी फिजिक कुछ ऐसी थी कि अक्सर लड़के कमलड़कियाँ यहाँ तक की उसके साथ ही पढ़ने वाली उसकी हंसी उड़ाया करती थींमैं सुनती सब रहती लेकिन मेरी बोलनेकी आदत कम ही है तो उनके प्रति मेरे भाव कभी अच्छे रहेवह सामान्य से कुछ अलग थीचेहरा में उसकेभोलापन और छोटा सा चेहरा लेकिन कंधे से लेकर नीचे तक उसका शरीर कभी मोटा थाकंधे पर बैग टांग कर वहअक्सर आकर बैठ जातीधीरे धीरे वह कब इतनी करीब गयी पता नहीं लगाफिर उसने ही बताया कि बचपन मेंएक बार उसे रीढ़ की हड्डी में कोई समस्या हुई थी और डॉक्टर ने आपरेशन किया जिसमें कोई गड़बड़ी गयी औरफिर उसका शरीर इस तरह से बेडौल हो गयावह अच्छे सम्पन्न घर की लड़की तीन बहनों में सबसे छोटी थी औरभाई उससे भी छोटासोच और व्यवहार से बड़ी समझदार और सहृदय थीभगवान ने उसे सोने सा दिल दिया था , तभी उसे किसी से कोई शिकायत नहीं होती और अगर किसी ने कह दिया तो उसने कभी उसका काम करने से इनकारनहीं कियासंस्थान के नियमानुसार उसने हॉस्टल में ही कमरा लिया था और छुट्टी में वह घर चली जाती
मैं घर से लंच बना कर ले जाती और गर्मियों में वह इतनी धूप में पैदल हॉस्टल जाने के डर से अपना खानापैक करवाकर वहीं मंगवा लेती थीफिर हम लोग साथ बैठ कर खाना खातेअपनी कमी पर विजय पाने के लिए हीउसने आई आई टी से पी एच डी करने का संकल्प लिया और उसमें सफल भी हुईआलोचना करने वालों कि कहीं भीकमी नहीं होती है और ऐसे ही मेरे ही साथ काम करने वाली और भी लड़कियाँ और महिलायें थीजिनकी चर्चा काविषय कभी कभी निमिषा ही होती थी
"कौन करेगा इससे शादी? अच्छे अच्छों का तो ठिकाना नहीं है।"
"कोई दुहाजू या फिर तलाकशुदा मिल जायेगाकुवारा तो मिलने से रहा और कोई करेगा। "
"इसकी शादी हो ही नहीं सकती है।"
"बाकी बहनों कि हो जायेगी और ये उसके घर में बच्चे संभालेगी।"
इस तरह से जुमले मेरे ही कमरे में उछाला करते थे और जब वह होती तो हमारे कमरे में बैठने वालीलड़कियाँ ही ऐसा करतीमेरी सोच शुरू से ही ऐसी ही रही , किसी कि आलोचना या फिर उसकी कमी पर कमेन्टकरना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगाप्रपंच और गाशिप भी मुझे कभी पसंद नहीं रहीमैं सोचती कि भगवान नेउसके लिए भी तो कुछ सोचा होगा , ईश्वर करे इसको भी मनचाहा वर मिले आख़िर उसके भी तो सपने होंगेफिर येईश्वर के दिए दंड उसके जीवन का अभिशाप क्यों बने?
सारे लोग लंच में घर या फिर हॉस्टल चले जाते मैं ही कमरे में अकेली रहती थी और निमिषा जाती क्योंकिवह साइकिल नहीं चला पाती और हॉस्टल विभाग से बहुत दूर थावह अकेले में बैठ कर बातें करने लगती
"मम्मी पापा को मेरी ही चिंता है, दीदी की शादी हो गयी , दूसरी की भी हो जाएगीमुझसे कौन करेगा?"
"ऐसा नहीं होता है, कोई तो वर तेरे लिए भी रचा गया होगा।"
"हाँ है , पर मम्मी पापा पता नहीं माने या माने?"
"क्यों?"
"वह हमारे दूर का रिश्ते का है, उसकी एक्सीडेंट में एक हाथ काट गया था और उसने नकली लगवाया हुआ हैवैसे सबअच्छा है
"फिर"
":नहीं लगता कि घर वाले राजी होंगे, घर आता जाता है, एक दिन उसने ही प्रस्ताव रखा - 'निमिषा, हम लोगों को कोई सामान्य तो समझता नहीं है , फिर क्यों हम लोग एक दूसरे का हाथ थाम लें।" मैंने उससे सोचने का समयमाँगा और उससे अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कहा है
"फिर परेशानी क्या है?"
"मेरे और उसके घर वाले कभी राजी नहीं होंगेमेरी शादी हो ये तो घर वालों को मंजूर है लेकिन कुमार से नहीं।"
"कभी पूछा तुमने इसबारे में?"
"पूछना क्या है? मैं जानती हूँ , अभी तो अपनी डिग्री पर ध्यान देना है फिर कुछ और सोचूंगी।"
ये बात आई गयी हो गयीउसने एक बार कुमार से मुझे मिलवाया भी थाउसके हॉस्टल कि कुछलड़कियों ने बताया भी कि इसके पास कोई इसका रिश्तेदार आता है , शायद दोनों में कुछ चल रहा हैएक साल तकमैं उस विभाग में रही और फिर मशीन अनुवाद में कंप्यूटर साइंस में गयीरोज का मिलना बंद हो गया और फिरवह कभी कभी जातीउसकी पढ़ाई पूरी हो गयी तो फिर कभी दिनों तक उससे मुलाकात नहीं हुई

(क्रमशः)

सोमवार, 16 मई 2011

अनु होती ! (२)

पूर्व कथा:
एक धनी परिवार की बेटी और धनी परिवार की बहू अनु पारिवारिक षड़यंत्र का शिकार हुई। बच्चों सहित कई साल मायके रही औरजब लाया गया टो घर में नहीं घुसने दिया गया। कुछ दिन चाचा के घर रही और फिर वापस मायके। एक परित्यक्ता के दुःख को भोगा उसने, ज़माने वालों की बातें सही उसने और उसके मायके वाले भी इस का हल चाहते थे....

गतांक से आगे :
कुछ बददिमाग लोग ऐसे होते हैं कि उनके बीच में बोलना या फिर उसको सलाह देना व्यर्थ ही नहीं होता बल्कि अपने ही अपमान का सामान जुटाना होता . मैंने इस विषय में पहल नहीं कीसोच रही थी कि इसके और बच्चों केभाग्य में कुछ तो लिखा होगाफिर साल गुजर गएकुछ भी नहीं हुआहाँ समाचार दोनों तरफ के मिलते रहे
अब अनु कि उम्र २६ साल की हो चुकी थी उसके साल की बेटी और साल का बेटा थामाता पिता नेसोचना आरम्भ कर दिया कि इस तरह से पूरी जिन्दगी कहाँ तक बैठी रहेगीबच्चों के सहारे जिन्दगी गुजर जायेगी कहने और उसको सहने में बहुत अंतर होता हैवैसे उसका मायका इतना सम्पन्न था कि उसका सारा जीवन सुख पूर्वक गुजर जाता लेकिन समाज और उसका भविष्य क्या होता? आखिर उसके पिता और बाबा ने इसा विषय में सोचना शुरू कर दिया कि अगर कोई सही लड़का मिलता है तो वे दोनों बच्चों को अपने पास रख लेंगे औरअनु की दूसरी शादी कर दी जायअनु अपने बच्चों को छोड़ने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थीवह जीवन भरअकेले तो रह सकती है लेकिन बिना बच्चो के नहींफिर सोचा कि कोई विधुर या एक बच्चे वाला हो जो इन दोनों ही बच्चों को अपना ले तो ऐसे लड़के को देख लिया जायअनु और राकेश दोनों के कुछ रिश्तेदार कॉमन थे जिससे वहाँ के समाचार यहाँ भी मिलते रहते थे
आख़िर एक लड़का समझ आया और उसके बारे में बात शुरू हो गयी वह अनु के साथ दोनों बच्चों कों रखने के लिए राजी था क्योंकि उसकी पत्नी प्रसव में गुजर गयी थी और उसकी साल के बेटी थीइस बातचीत के शुरू होते ही इस विषय में खब़र राकेश को लग गयी कि अनु की दूसरी शादी की जाने वाली हैउसने अचानक इक दिन फ़ोन किया कि वह अनु और बच्चों को लेने रहा हैउसने अपने और अनु के लिए रहने के लिए नीचे वाले पोर्शन को तैयार करवा लिया हैसबको बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसा परिवर्तन एकाएक कैसे हो गया? कई दिन उसको उत्तर देने में ही लग गए कि अनु और बच्चे उसके साथ जाने के लिए तैयार भी हैं या नहींबहुत सोच विचार के बाद अनु ने कहा कि वह अब कानपुर ही जाएगी और अब वह जाकर बेचारी बनकर नहीं रहेगीअब अपनेअधिकारों के लिए लड़ेगी और जेठानी और जेठ ही नहीं अगर राकेश ने भी अपना रुख बदल तो वह बगावत कर देगीडर कर बहुत दिन जी लिया, अब तो रणचंडी बन कर जिया तो ये दानव उसके और उसके बच्चों के भविष्य को खा जायेंगे
अभी भी घर वालों को राकेश पर विश्वास था लेकिन उसके ससुर से बात की गयी तो वे बोले कि अगर राकेश खुद कह रहा है तो फिर मैं तो पीछे सब देखने के लिए तैयार हूँ हीआप मुझ पर भरोसा रखिये अब अनु को कोई तकलीफ नहीं होगीराकेश को आने के लिए बोल दिया गया और वह गाड़ी लेकर वहाँ पहुँच गयाफिर भी अनु के साथ उसकी बहन को भेजा गया कि अगर कुछ भी अनहोनी समझ आये तो वह सूचना दे
समस्या यह थी कि बड़े बाप के बेटे कुछ करते थे, बाप ही सारे बेटों और बहुओं के खर्च को उठते रहते थेऔर उनके पास था भी बेशुमार पैसाअनु ने पति से खुद कुछ करने के लिए बोला कि हम कब तक पापा जी केऊपर निर्भर रहेंगेवह खुद भी कुछ करने के लिए तैयार थीलेकिन घर की इज्जत के मारे उसको कुछ भी करने देने की अनुमति ही नहीं थीउसने पीछे रहकर कम शुरू किया और पति ने भीपिता आर्थिक सहायता देने केलिए थे ही
अनु जब मेरे यहाँ आती तो रात में आती क्योंकि चाचा और चाची के घर से जिस तरह से उसे बेइज्जत करके निकला गया था वह भूली नहीं थीअभी बचपना नहीं था लेकिन उम्र की परिपक्वता भी नहीं थीमैंने उसको समझाया कि अनु बगल में चली जाया कर ऐसा नहीं करते खून के रिश्ते कटुता की वजह से नहीं तोड़े जाते हैंबेमन से ही सही इस बात से इनकार तो नहीं कर सकती कि वे राकेश के चाचा हैंबाद में उसके सम्बन्ध भी मधुर सही लेकिन हाँ आने जाने लायक हो ही गएसब कुछ सामान्य चलने लगा
समय के साथ उसके बच्चे बड़े हो गए पढ़ाई में भी आगे से आगे बढ़ते जा रहे थेजीवन में व्यवधान तोआते ही रहते हैंअनु ने इतना झेला था कि उसको हाई ब्लड प्रेशर हो गयाअगर राकेश की गलती होती वो मुझे फ़ोन करता कि आप ही अनु को समझा सकती हैंबाद में जाने पर पता चलता कि माजरा क्या है? उसको हर तरीके से समझा देती
एक दिन उस परिवार पर कहर टूट पड़ा , कहीं जाते समय उसके ससुर को हार्ट अटैक पड़ा और वहाँ से सीधे वह नर्सिंग होम मेंकोमा में चले गए, वेंटिलेटर पर ४० दिन रहेहम सब उनके बचने की उम्मीद छोड़ ही चुके थेफिर भी पैसे वाले की उम्र पैसे के बल पर बढ़ भी जाती हैइस बीच में एक दिन अनु का ब्लड प्रेशर २००/१४० हुआरात में ही फ़ोन आया कि अनु बहुत बीमार है जाइये
वहाँ जाकर पता चला कि पिता की बीमारी में राकेश ने सारा पैसा खर्च किया है और इससे अनु को कोई भी परेशानी नहीं लेकिन अब जेठ जी ने उसके घर में दखल देना शुरू आकर दिया थाजो उसको बिल्कुल भी सहन नहीं थालेकिन राकेश का कहना था कि पिता दोनों के हैं मैं उनको साथ जाने या फिर उनसे सलाह लेने के लिए मना तो नहीं कर सकता और यही कारण है कि अनु कि तबियत ख़राब हो रही है.
मैं जब दो दिन बाद फिर उसको देखने गयी तो उसने मुझे बताया कि मैंने खुद सुना है कि मेरे जेठ जी कह रहे थे कि इसका सारा पैसा तो इलाज में लगवा दूँगा और फिर एक कौड़ी भी इसको नहीं देने वालेपिताजी तोअब उठने से रहेफिर देखता हूँ कि कहाँ से ये बच्चे पढेंगे और कहाँ से लड़की की शादी करेगी?

बस इसके बाद मुझे नहीं पता और मैं बेहोश हो गयीइस सदमें को वह झेल नहीं पाईइस बात को उसने किसी को भी नहीं बताया था
अस्पताल में उसको ससुर से मिलने वालों की लिस्ट में जगह नहीं दी गयी है, सिर्फ जेठ और उसका बेटा ही जाते हैंकिसी तरह से वह लोग जब जेठ हो तब जा पाते हैं लेकिन ससुर तो कुछ बोल ही नहीं सकते हैं
इन लोगों की आगे क्या प्लानिंग ये भी मुझे नहीं पता है
मैंने उसे बच्चों का वास्ता दिया कि देख अगर तुम्हें कुछ भी हुआ - हाई ब्लड प्रेशर में ब्रेन स्ट्रोक से पैरालेसिस भी हो सकता है , तुम्हारी जान भी जा सकती हैतब फिर इन बच्चों का भविष्य क्या होगा? अभी इनका जीवन बनाने का समय हैतुम्हें इस समय हिम्मत से काम लेना होगाखुद को मजबूत बनाओ तभी इस राजनीति से निकाल सकोगीमैं उसके पास सारे दिन रही और उसको समझाती ही रहीवह समझ भी गयी क्योंकि फिर बहुत दिनों तक कोई भी समस्या की जानकारी मुझे नहीं हुई थी
वह अतीत के दंश से अभी मुक्त नहीं हो पाई थी और उसको जेठ की चालों में वही सब दिखलाई देने लगता थायद्यपि उसके बच्चे बेटी बी बी कर रही थी और बेटा इंटर में चुका थावे दोनों माँ के लिए सुरक्षाकवच बन चुके थेराकेश भी अगर कुछ कहता तो वे सामने खड़े हो जाते कि अब आप मेरी मम्मा को कुछ नहीं कहेंगेमुझे भी संतोष था कि इन बच्चों ने अपनी माँ को बचपन से संघर्ष करते देखा है तो उसको अनुभव भी किया हैअनु आर्थिक तौर पर सुदृढ़ थी लेकिन फिर से पति के दुर्व्यवहार और अशांति की आशंका से उसको डर लगता था
अनु और राकेश ने लाखों रुपये खर्च किया और उसके पिता घर वापस गएसारा परिश्रम सफल हुआ लेकिन ये क्या उसके जेठ ने पिता को कैद कर लिया और सारी संपत्ति अपनी नाम लिखवा लीउनसे मोबाइल भी ले लिया और वे अभी चलने फिरने में असमर्थ थेकुछ कह भी नहीं पाते क्योंकि रिश्तेदरों के आने पर कोई कोई उनके पास मौजूद रहता
मैं तो उनके सामने नहीं जाती थी , उनकी पत्नी से ही मेरा मिलना होता थाएक दिन मेरे पति उन्हें देखने गए हम रिश्तेदार थे तो कोई बैठा भी नहीं थावे रोने लगे कि देखो भैया तुम राकेश और अनु का साथ छोड़ना वे अब अकेले पड़ जायेंगेइसके इरादे ठीक नहीं है और मुझे तो ये चिंता की मेरे बाद मेरी पत्नी का क्या होगा? ये स्थिति थी एक करोड़ पति इंसान की
फिर क्या हुआ? मुझे नहीं पता क्योंकि मैं दस दिन के लिए दिल्ली चली गयी क्या हालात हुए? अनु चली गयीढेरों प्रश्न अपने पीछे छोड़कर और उनका कुछ बोझ मुझ पर भी छोड़ कर क्योंकि अगर मैं समय से उससे मिल पाती तो शायद कुछ समझा पाती और ये सब होतावह उस मनःस्थिति से उबर पाती और जिंदा होती
मगर सत्य यही है कि अनु चली गयी