रविवार, 29 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (5)

                                 नितिन के  इस तरह से मेरे जीवन में प्रवेश से मेरे जीवन में और मानसिक तौर पर हो रही उथल पुथल को मैं किस तरह से सह रहा था इस बारे में मैं किसी को बता नहीं सकता था. लेकिन उससे जुड़ी बातें और पिता से जुड़ी बातों के तार तो मन में ही जुड़ रहे थे. आज पापा की बहुत याद आ  रही थी क्योंकि वह हैं नहीं , वैसे तो दिल से हम बहुत दूर कर दिए गए थे लेकिन मन के तार कभी टूटे नहीं थे. 
                                 क्या वह सुबह मैं कभी भूल सकता हूँ, वह सर्दियों   की सुबह थी और मैं रजाई में छुपा सो रहा था . नानाजी सबसे पहले उठते थे क्योंकि पेपर चाटने   की आदत में व्यवधान न पड़े. अचानक उस दिन नानाजी के चीखने   की आवाज आई और हम सब बाहर बरामदे की तरफ भागे. नानाजी बहदवास से पेपर को देख रहे थे. कुछ बोल नहीं पा रहे थे मैंने उनके हाथ से पेपर लिया तो उन्होंने सिर्फ उस समाचार पर हाथ रख कर बताया. समाचार था = लखनऊ के डी एम प्रदीप कुमार की  सपत्नीक एक सड़क दुर्घटना में मौत " उसे पढ़कर मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया . तब ताक दीदी भी बाहर आ चुकी थी. उसने भी जब पढ़ तो बुरी तरह से रोने लगी. अन्दर का समाचार पढ़ने की हमारी हिम्मत और स्थिति ही नहीं रही. पूरी कॉलोनी के लोग घर में आने लगे क्योंकि सबको मालूम था. फिर मामाजी ने हिम्मत jutaai  और गाड़ी निकाल कर सबको लेकर लखनऊ के लिए चलने बात कही. इलाहबाद से लखनऊ तक का सफर - लग रहा था जैसे कि हम किसी अंतहीन यात्रा पर निकले हैं और फिर उसके आगे जो देखने को मिलेगा उस बारे में सोचने की bhee  स्थिति नहीं थी. हम लोग सीधे मर्चरी ही पहुंचे. तब तक पोस्ट मार्टम हो पाने की बात ही नहीं थी. बाहर कुछ उनके ऑफिस के लोग थे. ड्राईवर घायल था और अस्पताल में था. लेकिन हमें कोई नहीं janta था. वहाँ पर तरह तरह की बातें लोग कर रहे थे -
"कुछ नहीं ये तो मर्डर ही लगता है, किसी ने जानबूझ कर एक्सिडेंट करवाया है."
"वही न , जिसे देखो वही अपना काम करवाना चाहता है, पता नहीं किस ने क्या खुन्नस रखी हो मन में?"
"इतने सज्जन पुरुष की दुश्मनी तो किसी से हो नहीं सकती है."
"अगर दूसरा माने बैठा हो तो?"
"उसी का तो अंजाम लग रहा है, नहीं तो पीछे की सीट पर बैठे दोनों लोग ख़त्म और आगे की सीट से सिर्फ घायल."
"हो सकता है कि पीछे से टक्कर लगी हो."
"नहीं पीछे से नहीं लगी, ये बगल से मारी गयी है, गाड़ी के बगल का हिस्सा बिल्कुल ही क्षतिग्रस्त है."
"सुना है कि डी एम साहब किसी टेंडर के लिए सीतापुर गए थे, उनके साथ rakhee  उनकी अटैची भी गायब है."
"पता नहीं , ये क्या चक्कर है?"
"हमें तो किसी ठेकेदार की कारस्तानी लगती है., नहीं तो किसी की क्या दुश्मनी?"
                          हम सब एक किनारे खड़े थे और अलग अलग लोगों के मुँह से सबकी बातें सुन रहे थे. कानों में पड़ रही थी लेकिन अपना दिल औ दिमाग तो अभी भी कह रहा था कि नहीं पापा नहीं हो सकते हैं और नई माँ भी. यहाँ मौत जैसा सन्नाटा नहीं पसरा था. लोग अलग अलग समूह में खड़े अलग अलग बातें कर रहे थे लेकिन इतना था किसी ने भी पापा के बारे में कुछ भी गलत बात नहीं बोली थी. हाँ दबे स्वर में नई माँ के भाई के लिए जरूर लोग कुछ कह रहे थे लेकिन हमारे पास इतनी हिम्मत नहीं थी की हम उनकी बातें सुन पाते , लेकिन कान बंद भी नहीं किये जा सकते हैं.
                          आख़िर दिन में २ बजे पापा की बॉडी हमें मिली,  उससे पहले वहाँ पर नई माँ के दोनों भाई और पिता वहाँ आ चुके थे. नई माँ के बच्चे वहाँ नहीं थे. वहीं की गाड़ी से पापा और नई माँ की बॉडी को घर ले जाया गया. बॉडी को पापा के  सरकारी घर पर ही ले जाया गया था क्योंकि उनके निजी घर में तो नई माँ के भाई काबिज थे शायद उन्हीं के लिए खरीदा गया हो. नई माँ की शादी किसी साजिश के तहत ही कराइ गयी थी, उनके भाई ठेकेदार थे और फिर एक पॉवरफुल शख्स के साथ सम्बन्ध उनको भविष्य में कोई फायदा ही देने वाला था. 
                        जब पापा की बॉडी घर पहुँची तो पहले से ही सारी तैयारी हो चुकी थी, पहुँचते ही उसको ले जाने की प्रक्रिया पूरी कर दी गयी. दीदी पापा के शव से लिपट लिपट कर रो रही थी और बेहाल थी लेकिन मैं अपने को बहुत संयत किये हुए था. दीदी को मामा जी ने बहुत मुश्किल से अलग किया था. हम सब ने उनके शव पर फूल चढ़ाये और पैर छुए तो लगा कि अब ये रिश्ता बस इसी क्षण तक का है. अब हम पूरी तरह से अनाथ हो गए. न माँ और न पापा. बस हम दो ही बचे. नाना जी ने कहा कि मैं पापा को कन्धा lagaaun , नहीं तो उन लोगों के बीच हमारी उपस्थिति बिल्कुल नगण्य थी. उन्होंने हमें कहीं भी शामिल करने की जरूरत नहीं समझी. सब काम अपने हाथ से . नई माँ की १० साल की बेटी और ८ साल का बेटा भी वहीं थे. वे बुरी तरह से रो रहे थे लेकिन न वे हमें जानते थे और न हम उनके लिए कोई अर्थ रखते थे लेकिन इस समय हम से ज्यादा उन लोगों ने खोया था. हम तो माँ को बहुत पहले जब अबोध थे तब ही खो चुके थे और आज पापा को खोया है लेकिन इन दोनों ने तो अपने माँ और पापा दोनों को ही एक साथ इस उम्र में खो दिया. ये भी हमारी ही जमात में शामिल हो गए. 
                   जब पापा  का शव गाड़ी में रखा गया तो मैं उनके पैरों के पास ही बैठ गया. गाड़ी में नई माँ के भाई, नई माँ का बेटा और मैं थे. बाकी लोग आगे बैठे थे. यहाँ पर भी मुझे लग रहा था कि नई माँ के भाई पापा की बॉडी पर भी अपना हक जताना चाह रहे थे. मुझे पीछे हटा कर खुद वहाँ बैठ गए और अपने पास नई माँ के बेटे को बिठा लिया. उस समय मुझे ये कुछ समझ नहीं आया लेकिन सोचा कि ये संवेदनाएं हैं उन्हें लग रहा होगा कि इस बच्चे का अधिक लगाव है अभी छोटा है और माँ भी चली गयी. उस समय मुझे कुछ और समझने   की हिम्मत ही नहीं रह गयी थी. 
                      जब हम श्मशान   घाट पर पहुंचे तो सारी तैयारी के बाद नाना जी ने मुझे इशारा किया कि मैं पापा की अंतिम क्रिया के लिए आगे जाऊं क्योंकि उनका बालिग बेटा मैं ही था और नई माँ का बेटा अभी बहुत छोटा था. फिर मेरे रहते हुए उसको करने की जरूरत ही क्या थी? 
              पंडित जी ने कहा - "कौन क्रिया कर्म करेगा उसको बुलाइए." 
मैं आगे बढ़ गया और उनके पास जाकर खड़ा हो गया था. उसी समय अचानक नई माँ के भाई गरजे - "ख़बरदार, जो किसी चीज पर हक जताने की कोशिश की." 
            मैं सहम कर पीछे हट गया, ये तो गुंडों वाली भाषा थी. लेकिन नाना जी ने कहा, "ये प्रदीप का बेटा है , अंतिम संस्कार तो यही करेगा." 
"ए  वकील साहब अपनी वकालत अपने पास ही रखिये, यहाँ काम हमारी मर्जी से होगा." उसने नाना को भी जबाव दे दिया था.
उस समय मामा जी ने नाना जी को शांत रहने के लिए कहा और काम होने दीजिये कह कर पीछे कर लिया था. पापा का अंतिम संस्कार वैदिक रीति से नहीं उन लोगों ने आर्य समाज रीति से करवाया. इसे मैं अपना कहूं या  पापा का कि मैं अपने पापा का अंतिम संस्कार भी नहीं कर सका. और पापा अपने दो दो बेटों के होते हुए भी इस तरह से विदा किये गए. मैं उनसे दूर था लेकिन नई माँ का बेटा तो ये संस्कार कर ही सकता था. हम जब वैदिक रीति से सब काम करते हैं तो ये काम आर्य समाज रीति से करवाने के पीछे  कोई और चाल होगी. 
                                  अंतिम संस्कार के बाद हम हम लोग घर पहुंचे और वहीं रुकना चाहा तो उन लोगों ने कहा - "आप लोग जाइये, जब हवन होगा तब आइयेगा."
                          शायद पापा ने भी ये नहीं सोचा होगा कि इस तरह से उनके अपने बच्चे पराये कर दिए जायेंगे. बेटे के सबसे बड़े हक से वंचित कर दिया जाएगा. उन्हें दौलत चाहिए थी तो वे ले लेते लेकिन मुझे पापा का संस्कार तो कर लेने दिया होता. क्या सोचा होगा इन लोगों ने ? क्यों ऐसा किया? इन सब सवालों के उत्तर मेरे पास नहीं थे और न अब दिमाग कुछ सोचना चाह  रहा था बस यही कि पापा का संस्कार मैं नहीं कर पाया. 
                   जब हम वापस आने के लिए चलने लगे तो दीदी वहीं अड़ गयी - 'नहीं आशु, हम पापा के घर को कैसे छोड़ कर चले जाए? अभी पापा की आत्मा यहाँ होगी, वह रोएगी नहीं कि मेरे बच्चे इस तरह से छोड़ कर चले गए." कह कर वह फफक फफक कर रो पड़ी और मैं भी कहाँ अपने आंसुओं  को काबू कर पा रहा था. फिर भी मैंने दीदी को अपने से चिपका लिया और उसको पकड़ कर गाड़ी ताक लाया. वह वापस घर की तरफ  भागने की कोशिश कर रही थी. वहाँ पर मौजूद लोगों को अब पता चल चुका था कि हम भी उनके बच्चे हैं. लेकिन इससे क्या होता है? हमारे सारे हक तो उसी दिन ख़त्म हो गए थे जब पापा नई माँ लाये थे. 
                   फिर हम हवन के लिए आये, इलाहबाद से ४ गाड़ियाँ आयीं थीं , हमारे सारे रिश्तेदार और कॉलोनी वाले भी उसमें शामिल होने आये थे. हवन के बाद जब सब लोग चलने लगे तो घर के बाहर पहुँच गए , मैं गाड़ी में बैठने ही जा रहा था की नई माँ के भाई ने मुझे अन्दर बुलाया , वे चार पांच लोग वहाँ खड़े थे और बड़े रौब के साथ बोले - "देखो, इस घर में हम रहते हैं पहले से ही और इसे या पापा की नौकरी लेने की मत सोचना . अभी उनके बच्चे नाबालिग हैं और हम उनके गार्जियन    है. इसलिए  आप जहाँ   हैं वही रहिये    नहीं तो अच्छा  नहीं होगा. अपने बाप    का हश्र   देखे  हो."  उनके शब्द   पहले तो मेरी समझ आये लेकिन आखिरी  शब्दों  ने तस्वीर  साफ  कर दी. ये एक्सिडेंट हुआ  नहीं इन लोगों ने करवाया है और मेरी आँखों के आगे अँधेरा छाने   लगा. मैं लड़खड़ा  ही तो गया था कि उन लोगों ने थाम  लिया और मुझे बाहर ले आये. नाना से बोले की इन्हें  संभालो   बाप  के  जाने का गम  तो होता ही हैं न, अभी बच्चा  है न. " 
                             मैं आँखें  फाड़  कर उनको  देख रहा था कि कैसे गिरगिट  की तरह से रंग  बदल  रहे हैं. मैं ग्रेजुएशन     कर रहा था. फिर  माँ पापा  के साए  से दूर  मैंने भी दुनियाँ  के बहुत रंग  देखे  थे लेकिन ये रंग  कभी न देखा  था. नाना जी हम लोगों को लेकर आ गए और कहा की अब भूल जाओ  कि लखनऊ में तुम्हारा  कुछ भी है. 
                            तभी  मैंने सोचा था की पापा की नौकरी लेकर मैं क्या करता ? क्या वहाँ क्लर्क  होकर  काम करता ? एक डी एम का बेटा उसी ऑफिस में  - डूब  मरने  वाली बात होगी. वही क्षण तो था जब मैंने संकल्प  लिया था कि मैं भी पापा की तरह से आई ए एस   बनूँगा .

8 टिप्‍पणियां:

  1. .आज ही बाकी सारी कड़ियाँ पढ़ीं...बहुत अच्छी जा रही है,कहानी....अगली कड़ी का इंतज़ार

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  2. ज़िंदगी के सारे रंग भर दिए हैं कहानी में ...बहुत मार्मिक प्रस्तुतिकरण ....अच्छी कड़ी ..

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  3. sahi kaha sangeeta di ne, jindagi ke saare dukh bhare rang aapne bhar diye.....achchhi rachna.......aage dekhte hain.......!!

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.