गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

हस्तांतरण !

                  माँ   तीन दिनों से बेटी के फ़ोन का इन्तजार कर रही थी और फ़ोन नहीं आ रहा था।  नवजात के साथ व्यस्त होगी सोचकर वह खुद भी नहीं कर पाती थी।  एक दिन उससे नहीं रहा गया और बेटी को फ़ोन किया  - 'बेटा कई दिन हो गए तेरी आवाज नहीं सुनी , कैसी हो ?'
' माँ तेरी जगह संभाली है न तो उस पर खरी उतरने का प्रयास कर रही हूँ।  इसके सोने और जागने का कोई समय नहीं होता और वही मेरे लिए मुश्किल होता है।  लेकिन फिक्र न करना विदा करते समय जैसे दायित्वों की डोर थामे थी न , वैसे ही उसको थामे हूँ।  बेटी बन उस घर में जन्मी लेकिन इस घर में बहू बन आयी और बेटी बनने का पूरा प्रयास करती रही।  अब माँ बनी तो जो जो तुमने किया और दिया, वही दे रही हूँ माँ।  कुछ सुविधाएँ बढ़ गयीं है लेकिन माँ के दायित्वों में कोई कमी न हो वह कोशिश कर रही हूँ। 
           '  तुम्हारी बेटी बाँट गयी है माँ -- एक बेटी और माँ के रिश्तों में।  पर चिंता नहीं करना , मैं बेटी पहले हूँ और दोनों रिश्तों को बखूबी निभा लूंगी।  आखिर तुम्हारी बेटी हूँ न।'  

                   माँ के आँखों में आंसू बह निकले , माँ बनते ही बेटी बड़ी हो जाती है।
             

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (31-12-2016) को "शीतलता ने डाला डेरा" (चर्चा अंक-2573) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.