सोमवार, 1 नवंबर 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (१२)

           
पिछला  कथा सारांश    --
                                           आशु एक डी एम का बेटा जो अपनी माँ की मौत के बाद नाना नानी के घर पला और फिर पिता की दूसरी शादी ने उससे उसके पिता को भी दूर कर दिया. पिता और सौतेली माँ के एक्सीडेंट में निधन के बाद उसने खुद पापा की तरह आई ए एस बनने का संकल्प लिया   और फिर उसकी पहली पोस्टिंग उसी जगह हुई जहाँ वह पैदा हुआ था. उसी बंगले में मिला उसे अपना सौतेला भाई,  ट्रान्सफर होने के बाद वह वहाँ आ पहुंचा जहाँ के पास के गाँव में उसकी सौतेली बहन की शादी हुई थी. ये शादी उसके ससुराल वालों ने पापा की संपत्ति के लालच में आकर की थी और फिर पापा की संपत्ति पर कब्जे के लिए उसके वैरिफिकेशन का दायित्व उस पर आया. उसने शामली के पति से उसको लाने के लिए कहा लेकिन वह आनाकानी करता रहा , जब आशु उस पर बिगड़ गया तो वह लाने के लिए मजबूर हो गया. आशु से उसके सामने ही पूछताछ करने के लिए कहने लगा. आशु ने नितिन को शामली के वैरिफिकेशन के लिए उन्नाव से बुलवा लिया था. और नहीं चाहता था की नितिन को उसका पति देखे . इसलिए उसने उसके पति को बाहर जाने को कहा और मजबूर होने पर वह वहाँ से गया. ................
गतांक से आगे...
                          .संदीप के बाहर जाते ही शा.मली भी उठ खड़ी हुई. उसके चेहरे पर भय की रेखाएं दिखाई दे रहीं थी. मैंने उससे  बहुत प्यार से बोला , "घबराओ मत , मुझे अपने भाई की तरह समझो. तुमको मालूम है कि तुम्हें यहाँ क्यों लाया गया है?"
"हाँ बताया था कि आप कह देंगे तो पापा की जायदाद हमें मिल जाएगी."
"और कुछ कहा गया ." मैं पहले खुद ही जानना चाहता था कि ये लड़की क्या सोचती है? कहीं मेरा विचार कि इसको सिर्फ संपत्ति के लिए ही लाया गया है या फिर इससे शादी की गयी है गलत तो नहीं है.
"हाँ कि मैं ज्यादा न बोलूं - जो मुझसे पूछें उसी का जबाव दूं जो उन्होंने मुझे बताया है."
"अच्छा क्या क्या बताया गया है तुमको?"
"मैं वो नहीं बताऊंगी नहीं तो ....."कहते कहते वह चुप हो गयी. मुझे लगा कि इसको बहुत दबा कर रखा गया है . यहाँ तक कि क्या बोलना है इसके लिए भी जबाव इसको बताये गए हैं.
"तुम अपने घर से कभी कहीं घूमने  जाती हो." मैं उसको विश्वास में लेने के लिए कुछ व्यक्तिगत प्रश्न पूछने लगा ताकि उसको ये न लगे कि मैं कुछ गलत कर सकता हूँ.
"नहीं, जब से शादी हुई है , पहली बार घर से बाहर निकली हूँ." कह कर वह चुप हो गयी.
"क्यों अपने घर नहीं जाती हो?"
"मेरे कोई नहीं है, नाना हैं उनने शादी करके दुबारा सुध नहीं ली." उसके स्वर में बेचारगी और अफसोस दोनों ही झलक रहा था.
"नितिन" मैंने नितिन को आवाज दी तो वह कुछ चौंकी , मैंने ये सोचा कि जब तक इसका कोई बहुत अपना नहीं होगा ये सही बात नहीं बताएगी और मेरे निर्णय इसके ऊपर निर्भर करते हैं. वह भयभीत तो थी ही क्योंकि उसका अब इस दुनियाँ में कोई कुशल जानने वाला नहीं है . नाना के लिए कहे शब्द उसकी बेबसी को उजागर कर रहे थे. लेकिन वह हकीकत से बिल्कुल ही अनजान थी. नितिन को भी उसके घर वालों ने मिलने नहीं दिया ये भी तो उसको पता नहीं था. पता नहीं कितने वर्षों के बाद वह नितिन को देखेगी.
          मेरी आवाज सुनकर नितिन बाहर आ गया और वह एकदम से उठकर खड़ी हो गयी. उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गयीं. नितिन उसके करीब आकर खड़ा हो गया. उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे लेकिन उसने नितिन को अपने हाथ से पकड़ कर देखा और फिर दोनों हाथों से उसको पकड़ कर झकझोर दिया. "कहाँ चला गया था तू, इतने दिन ये भी नहीं सोचा कि मैं जिन्दा हूँ कि मर गयी." कह कर वह फूट फूट कर रोने लगी. नितिन ने उसको अपने सीने से लगा लिया और उसकी आँखों से भी आंसूं बहने लगे . नितिन उसके सिर पर हाथ फिरा रहा था, मानो वह छोटा सा लड़का बहुत सयाना हो गया हो . ये मार्मिक दृश्य मुझसे नहीं देखा गया और फिर मैं भी उस भावुकता ने अपने को बहता हुआ उन लोगो के सामने तो नहीं दिखा सकता था और मैं अन्दर चला गया.  उन दोनों के मिलन को देख कर लगा कि मेरे सिर से कोई भारी बोझ उतर गया है. मुझे आँखों के सामने पापा कि तस्वीर मुस्कराती हुई नजर आई मानो कह रही हो - 'बेटा तू अपने फर्ज को पूरा करना.' सोचा तो यही है कि अब सारी जिम्मेदारी भगवान को मेरे हाथ से ही पूरी करवानी है तो इनके लिए जो बन सकेगा करूगा और इनके हक़ के लिए मैं खुद लडूंगा. खुद को संयत करने के बाद मैं बाहर आ गया तो दोनों बैठे बात कर रहे थे. मुझे देख कर नितिन उठ कर खड़ा हो गया और बोला - "दीदी , ये मेरे साहब हैं, पहले उन्नाव में थे और अब यहाँ आ गए हैं. इन्हीं ने मुझे बुलवाया था. "
"नितिन तुम बैठो , मुझे शामली से कुछ बातें पूछनी है."
"जी पूछिए." शामली खुद ही बोल पड़ी.
"तुम रहती कहाँ हो?"
"जी गाँव में , अर्जुनपुरगढ़ा  नाम है. "
"तुम्हारा पति क्या करता है?"
"मुझे नहीं मालूम, बाहर ही रहते हैं."
"गाँव में नहीं ."
"नहीं, "
"ये तो बताता ही होगा कि उसका क्या काम है?"
"मुझे कुछ नहीं मालूम, गाँव में रहते ही कम है. जब पापा के जायदाद के लिए कुछ काम होता है तभी बात भी करते हैं नहीं तो कोई मतलब नहीं ."
"घर में कौन कौन है?"
"मेरी बीमार सास, अपाहिज ननद और मेरे ससुर."
"घर में नौकर तो होंगे ही."
"नहीं कोई नहीं है, एक औरत आती है, खेती के काम करने के लिए. उसी ने बताया था कि शहर में कोई और है जिसके साथ रहते हैं."
"तुमने खुद कभी नहीं पूछा ?"
"क्या पूछूं? कहाँ जाऊँगी ? मेरा कौन है? एक ये भाई इसने भी मुझे छोड़ दिया और नाना ने तो  शादी करके कुँए में डाल कर छुट्टी पा ली. मार मुझे इसलिए नहीं सकता क्योंकि घर में सेवा और काम कौन करेगा? फिर पापा की जायदाद के लालच में तो शादी की ही थी. " वह बताते बताते रुआंसी हो उठी.
"तुम्हें पता है की तुम्हारे नाना जी नहीं रहे, नितिन तुम्हारे पास गया था तो तुम्हारे घर वालों ने उसको मिलने नहीं दिया. तब से वह भी तो बेसहारा भटक रहा है "
"नहीं, मुझे कुछ भी नहीं पता है."
"पढ़ाई की है."
"हाँ, एर्थ तक ."
"इसमें तो हाई स्कूल का सर्टिफिकेट लगा है."
"हाँ, कहीं गाँव से नाना जी ने फार्म भरवा दिए थे और फिर बिना  एक्जाम दिए ही पास हो गयी और ये सर्टिफिकेट मिल गया."
"ओह - तो ये बात है."
"अब क्या होगा?"
"कुछ नहीं, तुम्हें पता है कि तुम्हारे पापा की संपत्ति में नितिन का भी हिस्सा है. तुम दो दावेदार हो."
"नहीं , दावेदार तो चार हैं."
"चार और कौन है?"
"मेरी पहली मम्मी थी , जिनके मेरे एक भाई और एक बहन और भी हैं." उसके मुँह से ये सुनकर लगा कि मेरा दिल एकदम से बैठने लगा था. ये जरा सी लड़की इस बात को स्वीकार कर रही है जिसको उसकी माँ ने कभी नहीं स्वीकारा.
"क्या? तुम जानती हो उन्हें?"
"नहीं, वे मम्मी पापा के न रहने पर आये थे, तब हम छोटे थे. मामाजी ने उनको पापा से दूर रहने के लिए कहा था. फिर वे कभी नहीं आये." उसका गला भर आया था.
"उसके बाद उनकी कोई खबर नहीं मिली."
"अब नहीं पता, पहले अपने नाना के पास इलाहबाद में रहते थे."
"तुम्हें ये सब किसने बताया?"
"मैंने मम्मी और पापा से ही सुना था. अब तो वे न तो  हमें जानते होंगे और न मैं उन्हें कि सब लोग कहाँ गए?"
"कोई बात नहीं, सारी संपत्ति तुम्हें अकेले नहीं मिल सकती , ये तुम्हें पता है न."
"जी, नितिन भी है न, मैं अकेले लेना भी नहीं चाहती हूँ."
"अच्छा ये बताओ कि , अगर तुम्हें पापा मिल जाएँ तो?"
"मैं उनके पास भाग कर चली जाऊँगी, मुझे वहाँ नहीं रहना है."
"अब अगर मैं इन कागजों पर आब्जेक्शन लगा कर भेज दूं तो तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं होगी."
"नहीं, पहले नितिन को भी मिलनी चाहिए."
"ठीक है - जरूरत पड़ी तो मैं फिर तुम्हें बुलाऊंगा और मैं खुद भी आ सकता हूँ पूछताछ करने के लिए."
"जी, ठीक है."
"अभी अपने पति को नितिन के मिलने के बारे में कुछ मत बताना, बहुत कार्यवाही होना बाकी है."
"ठीक है, मैं अपने भाई को फिर से नहीं खोना चाहती."
                 मैंने चपरासी को कहकर संदीप को बुलवाया और नितिन को वहाँ से हटा दिया. संदीप जब कमरे में घुसा तो उसके चेहरे पर तनाव झलक रहा था. फिर भी बहुत संयत होकर उसने पूछा -" साहब, सारी पूछताछ हो गयी."
"हाँ, अब इनको ले जा सकते हो."
"अब कितने दिन में कागज़ चला जाएगा."
"बहुत जल्दी और इसकी सूचना तुम्हारे पास पहुँच जायेगी."
              ठीक है साहब कहते हुए उसने शामली का हाथ पकड़ा और तेजी से बाहर निकल गया.
"

8 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी ने बाँध कर रखा है...दोनों भाई-बहनों को अब शायद न्याय मिल सके.
    अगली कड़ी की प्रतीक्षा

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  2. पढ़ते जा रहे हैं प्रवाह में..बहुत बढ़िया कसी हुई चल रही है.,

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  3. अब लग रहा है जैसे कहानी कोई सुखद मोड लेगी.काश कि अंत दुखद न होकर अपने हक के लिए लड़ कर जीतना सिखाए :)

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  4. दिल भर आया भाई बहन का मिलन देख कर। रोचक कहानी जैसे साक्षात हमारे सामने ही सब कुछ घट रहा हो। अगली कडी का इन्तजार। दीपावली की शुभकामनायें।

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  5. ab kahani se khud ko juda hua mahsoos hone laga.........sach me marmik rachna hai, aur beshabri se agle post ka intzaar rahega.........:)

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  6. Beech k kai bhaag miss ho gaye the, aaj mauka mila h...kahani ki rochakata barkaraar h.. agli kadi ki prateeksha rahegi :)

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.