मंगलवार, 23 जून 2026

अपना अतीत!

 अपना अतीत! 


          .... निबरिया के नीचे बैठा रामनाथ स्कूल जाते बच्चों को देख रहा था कि उसने देखा कन्हैया का बेटा राधे अपने आठ साल छोटे भाई को साइकिल के कैरियर पर बिठाकर और खुद कैंची चला कर स्कूल जा रहा था।  वंह खुद भी बहुत बड़ा नहीं था।

          रामनाथ से रहा नहीं गया और चिल्ला पड़ा - "काहे ढो रहे हो, इसका जान दो ना अपने पाँवन से।" 

 "अरे बब्बा छोटा हमार संग जइहै तो हमहीं साइकल चलावे ना।" राधे ने रामनाथ को चलते-चलते कहा और निकल गया। 

            रामनाथ जाते हुए देखता रहा और कुछ सोचता हुआ अपने अतीत में पहुँच गया।  लखन उसका छोटा भाई 8 साल छोटा था और वह भी ऐसे ही लखन को ले जाता। अम्मा मलकिन रहीं और लखन दुलारा। अचानक दद्दा न रहे तो खुद की पढ़ाई छोड़ कर खेती बाड़ी देखने लगा।  पहले कक्का के साथ फिर खुद ही। आगे पढ़ नहीं पाया तो लखन को पढ़ाने का मन बना लिया, उसे पास के शहर में पढ़ने भेजा फिर ओवरसियर की पढ़ाई करवाई । जब उसकी नौकरी लग गई तो उसने पूरे गाँव में मिठाई बाँटी क्योंकि लखन गाँव का पहला ऑफीसर बना था और शादी भी उसने खूब धूमधाम से कर दी । 

        इसके बाद पहले तो लखन तिथ त्यौहार आ जाता था। चिट्ठी-पत्री लिखने का समय कभी ना रहा। हाँ कभी-कभी अम्मा के नाम मनीआर्डर भेज देता था, फिर धीरे-धीरे वह भी बंद हो गया।

        अचानक उसकी पत्नी को टीबी होने का पता चला। रामनाथ को कुछ न सूझा सो पोस्ट ऑफिस से फोन किया - "डॉक्टर तोहार भौजी को टीबी बतात है का करी?"

 "शहर में तो इलाज महँगा है और रहने का ठौर कहाँ? हमारे बच्चे छोटे और पढ़ने वाले हैं । टीबी छूत का रोग होत है। ऐसा करो वैदजी को ही पकड़े रहो।" लखन ने दो टूक जवाब दे दिया।

        गाँव के वैदजी काढ़ा, चूरन सब देकर हार गए, लेकिन वह सिया को ना बचा पाए। 

           अम्मा को दिखता नहीं सो सुबह-शाम रोटी बनाकर बाहर निबरिया के नीचे आकर बैठ जाता और आने जाने वालों से बतियाता रहता। कभी 4 साथी आ जाते तो सुख दुख बाँट लेता।

       "इसके साथ भी यही होना है  बेटा आज ढो रहे हो, कल इनकी लातें खाना ।" अपनी बर्बादी सोचकर  उसकी आँखों से दो आँसू चू पड़े।


--रेखा श्रीवास्तव

1 टिप्पणी:

  1. यह कहानी दिल को छू जाती है। बड़े भाई का प्यार, त्याग और जिम्मेदारी इसमें बहुत सच्चाई के साथ दिखती है। रामनाथ ने अपने छोटे भाई के लिए अपना सब कुछ लगा दिया, लेकिन बदले में उसे अपनापन नहीं मिला। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.