सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

स्वीकृति !

                                          होली जैसे वीणा की जिंदगी में रंगों की जगह राख भर गयी थी।  उसकी पहली ही होली तो थी।  विनीत दोस्तों के साथ होली खेलने निकल गया लेकिन फिर लौटा नहीं। सारा का सारा ठीकरा वीणा के सिर पर फोड़ दिया गया। पता नहीं कैसी किस्मत है ?  मेरे बेटे को खा गयी।  वही तो इस घर का चिराग था और अँधेरा कर दिया।
                                     वीणा सब कुछ चुपचाप सुनती रहती थी और यंत्रवत काम करती रहती थी।  मायके भी नहीं भेजा जाता था क्योंकि अभी इस घर में जो एक साजिश पल रही थी , उसको तो पूरा हो जाने दें फिर वीणा को घर से धक्के देकर निकल दिया जायेगा। उसे न अपने वर्तमान का पता था और न ही भविष्य का।  बिना पैसे की नौकरानी बन गयी थी।  ननद और देवर उसे भाई की मौत का जिम्मेदार ठहरा चुके थे और सास भी कम नहीं थी। दिन में कई बार उसके बेटे को खा गयी ' का आरोप सुनने को मिलता रहता था।
              बस एक इंसान था , जो उससे सहानुभूति रखते थे , वह थे उसके ससुर।  वह जब भी उन्हें खाना पानी देने जाती तो वे बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फिराते थे लेकिन खामोश रहते थे। वीणा कहाँ जाती और क्या करती है,  इस पर सबकी निगाह रहती। वैसे भी वह बस कभी कभी घर से निकल कर मंदिर तक ही जाती थी और वही आँखें बंद करके भगवान से पूछती कि आखिर मेरा कुसूर क्या था ? घर वाले भी बहुत सपन्न न थे कि वह बेटी को अपने घर ले जाते।  वह तो विनीत के पैर में हलकी सी लचक थी तो इन लोगों ने वीणा की खूबसूरती देख कर बिना दहेज़ के शादी कर ली थी। घर का माहौल उसके लिए हमेशा तनावपूर्ण ही रहता था।  विनीत के पीछे तरह तरह के तंज कसे जाते थे. लेकिन वह विनीत के प्यार के आगे कुछ भी बुरा नहीं मानती थी।
                        तभी विनीत की ऑफिस की कार्यवाही पूरी हुई और उसकी  नौकरी का प्रस्ताव आ गया।  घर में खलबली मच गयी।  घर में तीन सदस्य उस पर दबाव बना रहे थे कि नौकरी देवर को देने के लिए वह लिख कर दे दे।  उसका भविष्य बन जाएगा तो घर का भार उठा लेगा। उसे तो भरण  पोषण के लिए पेंशन मिलती ही रहेगी।फिर इस घर की वहू नौकरी करने जायेगी तो लोग क्या कहेंगे ? बहू का खर्च तक नहीं उठा पा रहे हैं।
                           वह उहापोह में गुजर रही थी, तभी ससुर ने उसे समझाया कि बेटी नौकरी सुमित को देने के लिए राजी मत होना , नहीं तो इस नरक में रहकर आज तीन की और कल से चार की गुलामी तुम्हारा भविष्य बन  जाएगा। तुम इसी घर में घुट  घुट कर मर जाओगी।उसको भी ससुर की बात पहले से ही समझ आ रही थी।
                           फिर वह दिन आया उसे बैंक के मैनेजर ने बुलवाया , उसकी सहमति जानने के लिए।   उसके साथ सास और देवर भी गए और उसके पीछे पीछे लगे रहे और मैनेजर के कमरे में भी पहुँच गए।
                      मैनेजर ने कहा - "आप लोग बाहर रहें , मुझे वीणा जी से कुछ अकेले में बात करनी है। "
     मैनेजर की बात सुन कर देवर बिफर गया -  "अकेले में न जाने आप क्या लिखवा लें। "
उसकी बात सुनकर मैनेजर एकदम भड़क गया , " गैट आउट।" मैनेजर  का रुख देख कर दोनों चुपचाप बाहर 
निकल गए।
                         मैनेजर जिस तरह से  वीणा को बलि का बकरा बना देख रहा था , अचंभित था, लेकिन सहृदय और मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण था - "बेटी मुझे बताओ , तुम्हें नौकरी करनी है। "
"जी"
"फिर ये सब क्या चाहते हैं ?"
"मैं नौकरी देवर को देने के लिए सहमति दे दूँ।"
",बिल्कुल नहीं , पत्नी के रहते हुए नौकरी किसी और को नहीं दी जायेगी। अब तुम जाओ बाकी  मैं देख लूँगा। "
              वीणा उन लोगों के साथ घर आ गयी।  ससुर की आँखों में प्रश्न तैर रहे थे और शेष  लोगों ने प्रश्नों की झड़ी लगा रखी थी। वह शांत थी और कहा कि मैनेजर ने कहा है कि वह खुद सोच कर बुलाएँगे।  एक हफ़्ते बाद ही वीणा का बुलावा आ गया और उस पत्र को पढ़ कर हंगामा मच गया।
"यही तो चाहती थी कि घर के बाहर जाकर घूमे फिरे और नौकरी का तो नाम है।  "
"मैंने कहा था न कि सुमित का नाम बोल देना वहां बोली ही नहीं होगी , इसको तो घूमने का चस्का लगा था।  शादी से पहले घूमंती रही होगी तो घर में दीदा कैसे लगे ?" सास चीख चीख कर घर सिर पर उठाये थी।  लेकिन अब कुछ हो नहीं सकता था और इस समय घर में सबसे खुश कोई व्यक्ति था तो वह थे वीणा के ससुर। वीणा ने बैंक जाना शुरू कर दिया फिर भी वह घर के ज्यादा से ज्यादा काम करके जाती थी और आकर तो करना ही होता था।  एक संतोष था कि घर के तनावपूर्ण माहौल से वह सात घंटे तो बाहर रहती है और सबसे हँस बोल कर अपने गम को भूली रहती है।
                                   फिर वही होली आने वाली थी और वीणा को होली के नाम से डर लगने लगा था।  बैंक में होली की छुट्टी से पहले खूब रंगबाजी हुई।  वीणा लाख मना करने के बावजूद बची न रह सकी और उसको भी रंग दिया गया।  जब वह घर लौटी तो रंगी हुई थी।  घर में जैसे बिजली से गिरी और चालू हो गए व्यंग्यबाण - "मैं तो पहले ही जानती थी कि इसके रंग ढंग , बाहर कदम निकले नहीं कि उड़ने लगेगी। " सास बम की तरह फ़ट पड़ी।
"तभी तो मुझे नौकरी नहीं मिलने दी। " देवर का कटुता भरा स्वर गूंजा।
"महारानी को होली सवार है , भैया को मरे हुए अभी एक साल नहीं हुआ और रंग बिरंगी घूमने लगी। " ननद का पीछे क्यों रह जाती ?
                     ससुर सबसे शांत रहे क्योंकि उन्होंने कुछ और ही सोच रखा था।  पार्क में बैठने वाले अपने मित्रों से वह बहू के विषय में बात करते थे और तभी उनको अपने एक पार्क मित्र के विधुर बेटे के विषय में पता चला तो उन्होंने होली मिलन के लिए घर बुला लिया।  उनका उद्देश्य सिर्फ इतना था कि  वीणा और वह एक दूसरे को देख लें।  बताया उन्होंने किसी को कुछ भी नहीं था।  बस पिताओं के बीच बात हुई थी। अगर दोनों राजी हो जाते हैं तो फिर उनका विवाह करवा दिया जाएगा क्योंकि वीणा के आगे अभी पूरी जिंदगी पड़ी है और मित्र के बेटे की तो शादी होनी ही है।  वे समय का इन्तजार करके हुए आगे बढ़ गए। तय हुआ कि अगर मित्र के बेटे को वीणा पसंद है और वह उसको जीवनसाथी बनाने के लिए राजी है तो वह रंग की प्लेट से पीला गुलाल उठा कर वीणा  ससुर को लगाएगा और यदि सहमत न हो तो लाल गुलाल लगाएगा।
                                   ससुर ने वीणा को भी समझाया कि होली मिलन में वह  गुझिया की प्लेट ससुर के हाथ में देगी न कि वह मेज पर रखेगी। बगैर किसी शोर शराबा के स्वीकृति मिल जाए और दोनों परिवार के प्रमुख को ये बात पता भी लग जाए।  फिर आगे की रणनीति बनाने में भी वीणा के ससुर को बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
होली मिलन के अवसर पर प्रवीण ने पीला गुलाल वीणा के ससुर जी को लगाया और वीणा ने गुझिया की प्लेट ससुर के हाथ में पकड़ाई।
                                 दोनों की मौन स्वीकृति से दोनों पुरुषों के चेहरे  संतोष की एक लहर आ गयी थी।       
               

                          

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज मंगलवार (05-02-2019) को "अढ़सठ बसन्त" (चर्चा अंक-3238)
    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन इंटरनेट माध्यमों की नश्वरता : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.