बुधवार, 18 अप्रैल 2018

संकल्प !

                     


            मीनू अपनी छोटी बहन के को लेकर बहुत परेशां रहती थी क्योंकि उसमें और उसकी बहन में करीब १२ साल का अंतर था और वह जब तक ये समझ पायी कि उसकी बहन आटिज्म की मरीज है , बहुत देर हो  चुकी थी।  फिर भी उसने अपनी पढाई में खोजा कि इस तरह के बच्चों को कैसे सामान्य तरीके से जीना सिखाया जाय। उसकी माँ इस बात  स्वीकार करने के लिए  तैयार ही नहीं थी कि उनकी  बेटी कुछ असामान्य है।  वह अधिक शिक्षित नहीं थी लेकिन अशिक्षित भी नहीं थी।  बड़े घर की बेटी होने के नाते वह कुछ जिद्दी भी थी। पापा इतने व्यस्त थे लेकिन मीनू के प्रयासों से वह संतुष्ट थे।  कभी कभी वह उसकी प्रगति के बारे में उससे पूंछ लेते थे।
                                     मीनू अपनी प्यारी सी गुड़िया के लिए कुछ भी करने को तैयार थी और अब वह डॉक्टरों के पास जाने लगी और बहन को लेकर भी जाने लगी लेकिन सभी ने एक स्वर में उत्तर दिया कि  इस उम्र के बाद हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं।  इस तरह के बच्चों के लिए बचपन से लेकर चार साल की उम्र तक कुछ सुधार  की आशा की जा सकती है।  बेकार की दिलासा देकर हम आपको धोखे में नहीं रख सकते हैं।   .                                  कई डॉक्टरों से एक ही उतर पाने के बाद भी वह निराश नहीं हुई , अब उसने असामान्य बच्चों के लिए खुले हुए सेंटर में जाकर पता लगाना शुरू किया लेकिन वहां की फीस सुन कर वह स्तब्ध रह गयी क्योंकि ये उसके पापा के लिए संभव नहीं था।  उसकी गति में तेजी आई ही थी कि उसके पापा ने उसकी शादी अपने मित्र के बेटे के साथ तय कर दी।
                                मीनू उसको बस नाम से जानती थी लेकिन फिर भी उसने अपने पापा से समर से मिलने के लिए पूछा और जब मुलाकात हुई तो उसने सबसे पहले यही पूछा - ' क्या आप मेरे साथ मेरी बहन की जिम्मेदारी भी उठाने के लिए तैयार हैं , क्योंकि मेरी छोटी बहन माँ पापा के बाद मेरी जिम्मेदारी होगी। '
समर को उसकी बेबाकी और संवेदनशीलता बहुत अच्छी लगी और उसने अपनी सहमति दी।
              लेकिन मीनू के सारे प्रयास नए घर में आकर रुक से गए क्योंकि दूसरे घर में खुद को स्थापित करने के बाद ही कुछ इतर सोचा जा सकता था।
                माँ का पूरा ध्यान अपनी छोटी बेटी के तरफ ही रहता था क्योंकि उसको पता था कि बड़ी तो अपनी घर गृहस्थी में फँस जायेगी फिर वीनू का क्या होगा ? अपने दोनों के सामने ही उसके लिए भविष्य तय कर देना होगा। माँ बेटी के लेकर घर पर रहती थी और पिता अपनी नौकरी की जगह पर। फिर एक दिन अचानक मीनू के पापा का हार्ट अटैक में निधन हो गया।
                सिर्फ माँ ही नहीं बल्कि बेटी को भी लगा कि अब आगे अँधेरा ही है और उसमें रौशनी की कोई एक रेखा भी नजर नहीं आ रही थी। लेकिन ऐसे समय में समर ने मीनू को आश्वासन दिया कि वह दोनों ही परिवारों की जिम्मेदारी को उठाने में उसके साथ पूरी तरह से है।
                  धीरे धीरे माँ के अंदर अपनी और छोटी बेटी के प्रति असुरक्षा की भावना घर करने लगी और वह सबको यानि कि अपनी बेटी को भी शक की निगाह से देखती।  मीनू पर भी वह भरोसा नहीं कर पा रही थी।  मीनू अगर कुछ हित  की बात भी करती तो वह भड़क जाती और धीरे धीरे मीनू ने घर जाना कम कर दिया और  सिर्फ वीनू के लिए वह घर जाती थी - उसकी जरूरत का सामान ले जाती और उसको पसंद का सामाँन ले जाती।  वह वीनू को अपनी बहन नहीं बल्कि बेटी की तरह से देखती थी क्योंकि उसका मानसिक विकास इतना ही हुआ था। उसे बहुत दिन तक ये समझ नहीं आया कि पापा अब नहीं रहे।  वह सोचती रही कि पापा अपनी नौकरी पर हैं।
                एक दिन जब मीनू पहुंची तो उसने पूछा - दीदी पापा कब आएंगे ?
मीनू के पास कोई जवाब तो था नहीं लेकिन उसने उसको समझाया कि पापा अब नहीं आएंगे तो वह जोर जोर से रोने लगी - 'दीदी पापा नहीं आएंगे तो हमें कौन प्यार करेगा ? दीदी मुझे अपने साथ ले चलो मैं वहां रहूंगी। '
लेकिन मीनू के कहने के बाद भी माँ उसके साथ जाने को राजी नहीं हुई क्योंकि यहाँ गाँव की खेती और सारी  जायदाद को कौन देखेगा ? माँ के पास पापा की पेंशन थी और खेती का सब था।  लेकिन वह असुरक्षा की भावना से घिरी रहती थी शायद बेटा न होने के कारण या फिर कुछ और।
                    उनकी इस भावना का लोगों ने फायदा उठाना चाहा और उनसे कहा कि वह वीनू के लिए अच्छा सा लड़का बताएँगे और अगर वह सारी  संपत्ति उसके नाम कर देंगी तो वह शादी करके उसको अच्छी तरह से रखेगा। उनके बुढ़ापे का सहारा भी मिल जाएगा।  वह ख़ुशी से फूली न समा रही थीं।  उन्होंने ये बात मीनू को बताना ठीक न समझा कि कहीं मीनू और समर उनके इस निर्णय से खुश न हुए तो वह ये काम करने नहीं देंगे।
लेकिन वीनू ने भोलेपन में अपने दीदी को बताया कि दीदी मम्मी मेरी शादी करने जा रही हैं।  मीनू और समर  का दिमाग ठनका कि कोई असामान्य लड़की से शादी बिना किसी लालच के न करेगा और सामान्य लड़कियों के साथ तो दौलत के लालच में लोग कितने तरीके के दुर्व्यवहार करते हैं , यदि उसकी बहन के साथ कुछ भी किया तो क्या होगा ? वह तो न विरोध कर पाएगी और न ही सुख से जी पाएगी।
                      मीनू घर गयी तो माँ से पूछा कि वह क्या करने जा रही है ? माँ भड़क गयी  - उन्हें जीते जी अपनी बेटी के बारे में सोचना है और तुम क्या तुम्हारा अपना घर संसार है और अपनी बेटी है तुम कैसे मेरी बेटी को देख पाओगी ? '
     अब मीनू की बारी थी और उसने भी माँ को सख्त शब्दों में समझा दिया - " आपने अभी दुनिया देखी ही कितनी है ? गाँव और घर के अलावा कुछ खबर नहीं रहती है।  बाहर  निकालिये और देखिये कि लोग अच्छी अच्छी लड़कियों को पैसे के लिए मार देते हैं और कहीं तो जीवन उनका नर्क बना देते हैं।  अगर आपने उनको सारी संपत्ति दे भी दी तो क्या गारंटी हैं कि वे वीनू को अच्छी तरह से रखेंगे। कल को उन्होंने मार दिया तो संपत्ति तो उन्हें मिल ही जायेगी। वह जैसे भी है मेरे और आपके सामने तो है और आपको पता है कि समर उसको बहन की तरह ही मानते हैं।  उसको कभी भी कोई भी कमी नहीं महसूस होगी। "
             मीनू शहर में पापा के बनवाये मकान में ही रह रही थी सो वह चाहती थी कि माँ और वीनू भी आकर उसके साथ रहें। लेकिन माँ को वहां पर बंधन लगता था क्योंकि गाँव में चार औरतें आकर उसके साथ बैठ कर समय बिताया करती थी और चार पैसे की जरूरत होने पर उनसे उधर ले जाती थीं फिर आकर उनके चार काम भी कर देती थीं।  माँ ने हिम्मत नहीं हारी और अपने प्रयासों में और तेजी ला दी।  उसे गाँव में भी उसके पापा से ईर्ष्या रखने वाले कई लोग थे और उन लोगों को मौका मिला कि इनके साथ कुछ धोखा भी किया जा सकता है।  किसी ने माँ को एक लड़का बताया कि वह वीनू से शादी कर सकता है लेकिन उसकी एक शादी हो चुकी है और उसकी पत्नी मर चुकी है लेकिन वह समझा बुझा कर करवा देंगे।  फिर जिसे इतनी संपत्ति मिलेगी तो बेटी को हाथों हाथों रखेंगे।  माँ की ममता कुछ सोच नहीं पा रही थी और उसने वीनू को दिखाने के लिए उन लोगों को बुला लिया।  वीनू ने दीदी को खबर कर दी कि कल उसकी शादी होने वाली है।  मीनू सारा काम छोड़ कर समर के साथ घर भागी लेकिन शादी नहीं उसको देखने के लिए आ रहे थे।  मीनू और समर ने बहुत धैर्य से काम लिया और उन्होंने आने वालों को आने दिया।  फिर बैठ कर उनसे बात की तो पता चला कि वह तीन बच्चों का बाप है और उसकी पत्नी आग लगने से मरी है।  उसको बच्चों को पालने वाली चाहिए।
                   मीनू ने उनको बड़े धैर्य से समझाया कि  उनकी बहन सामान्य नहीं है , वह कोई भी काम नहीं कर सकती है।  उसको देखभाल के लिए खुद एक व्यक्ति की जरूरत पड़ती है।  यह सुन कर वह लोग वापस हो गए।
माँ ने बेटी को खूब डांटा कि तुम ऐसे मेरी बेटी को बदनाम  कर दोगी। कैसी बहन हो तुम , उसका घर क्यों नहीं बसने देती हो ? मेरे मरने के बाद उसका क्या होगा ?"
" आप चिंता क्यों करती हैं ? वीनू मेरे लिए दीपाली की तरह है और वह हमेशा मेरे साथ रहेगी।  जब तक मैं हूँ मैं देखूँगी और मेरे बाद दीपाली उसको देखेगी।  पापा का घर है वह , वहां मेरे साथ साथ वीनू को भी रहने का पूरा  हक़ है। " मीनू ने उनको समझने का भरसक प्रयत्न किया।
        " मान लीजिये कोई उससे शादी कर लेता है और फिर उसको वापस घर भेज देता है क्योंकि उसको आप पूर्ति संपत्ति तो पहले ही देने वाली हो। या फिर उसने वीनू को कुछ कर दिया तो आप क्या करोगी ? अभी मेरी बहन जैसी भी है मेरे सामने हैं। "
           " आप समझने की कोशिश कीजिये मुझे सिर्फ वीनू की चिंता नहीं है बल्कि मैं वीनू जैसी और भी लड़कियों और लड़कों के बारे में सोच रही हूँ।  मैं पापा के नाम से एक संस्था खोल रही हूँ , जिसमें ऐसे ही बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम किया जाएगा , इसके लिए विशेष पढाई करके डॉक्टर आते हैं और फिर उनका इलाज होता है।  अगर बच्चे की इस कमी का पता चार साल की उम्र से पहले इलाज शुरू हो जाता है तो वह सामान्य जीवन जी सकते हैं और बड़ी उम्र हो जाने पर उनको आत्मनिर्भर तो बनाया ही जा सकता है। जिनके कोई नहीं है उनके लिए मैं हॉस्टल बना दूँगी।  पापा के इस पैसे और संपत्ति का मुझे कुछ भी नहीं लेना है बल्कि उनके नाम से ऐसे काम करूंगी कि  लोग पापा का नाम इसी तरह से याद रखेंगे। "
                    माँ की समझ में कुछ आया या नहीं लेकिन मीनू अपने काम में आकर लग गयी उसने अपने पापा के नाम से "श्री रामनाथ फाउंडेशन " की स्थापना करके उसे सार्वजनिक रूप से उसको सबके सामने लाने का उपक्रम किया और उसके लिए उसने एक आयोजन रखा जिसमें औपचारिक रूप से उद्घाटन माँ के हाथ से ही करने का विचार रखा
                  वह दिन आ गया और उसने माँ और वीनू को बुला भेजा।  सारी  तैयारियां हो चुकी थीं और वह माँ का इन्तजार कर रही थी।  जैसे ही माँ की गाड़ी रुकी उसने जाकर माँ का स्वागत किया और वह माँ के गले लग गयी।  माँ इतना सारा इंतजाम देख कर भौचक्की रह गयी।
                   मीनू ने माँ के हाथ से फीता कटवा कर फाउंडेशन का उद्घाटन करवाया तो माँ की आँखों में आंसूं आ गये  और पापा की जिम्मेदारी को उठाने के साथ साथ पापा के नाम को एक मुकाम देने के लिए मीनू का प्रयास सफल हुआ क्योंकि माँ के आशीर्वाद के बिना वह अधूरा ही रहता।  वह पापा की तस्वीर के आगे खड़े होकर कह रही थी - "पापा मैं जीत गई आपकी बेटी हूँ न , माँ और वीनू अब मेरे पास हैं और मैं माँ बेटी और बहन सारे दायित्व निभाऊंगी। "

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.