बुधवार, 1 नवंबर 2017

चिता की राख !

                                                     
                                                    
          रात में अचानक जोर जोर से आवाज आने से उनकी नींद खुल गयी।  अंदर से आवाजें आ रहीं थी।  माँ के जेवरों के बंटवारे को लेकर बहस हो रही थी।  बहुओं को ननद से शिकायत थी क्योंकि पापाजी ने मम्मीजी के भारी भारी गहने उन्हें पहले ही दे दिए थे और वह इनमें से भी चाह रही थी।  इसी बात पर सब आक्रोशित थे।  
                       निशांत बाबू के कानों में शब्द शीशे की तरह उतर रहे थे।  कल तक भाई साहब तो थे लेकिन इनमें से कोई न था।  रात में फ़ोन करके उन्होंने छोटे भाई को बुला लिया लेकिन बेटे को नहीं।
"आज रात मेरे पास रुको कुछ बातें करनी है।"
"जी भाई साहब।"
                 उनसे चुपचाप उन्होंने बड़े बेटे को फ़ोन किया - " पापा के पास आ जाओ।"
"चाचाजी अभी ही टूर से लौटा हूँ , सुबह आता हूँ , आप तो हैं ही। "
                  निशांत कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे।  लौटकर आकर भाई साहब के पास बैठ गए।  वह पता नहीं कितनी पुरानी बातें याद करते रहे और फिर बोले जाओ छोटे सो जाओ , मुझे भी नींद  आ रही है। कुछ ही घंटे तो वे अकेले रहे सोते समय और जब वह सुबह उठ कर आये तो भाई साहब सोते ही रह गए।  बहुत जगाया नहीं जागे।  तब फिर बड़े बेटे को फ़ोन किया और बता दिया कि अब तो आ जाओ।  उसने बाकी सब बहन और भाइयों को खबर दी।
                   शाम तक अंतिम संस्कार के बाद जब घर जाने को हुए तो बच्चों ने कहा चाचा जी हवन तक आप भी घर में रहें।  वह भी मन नहीं कर सके , आखिर भाई साहब ने ही तो बुलाया था तो अभी हवन तक उनकी आत्मा यही बसी रहेगी।  उनके सारे बच्चे उच्च पदों पर थे और दामाद भी, लेकिन भाभी के न रहने पर वह घर छोड़ कर कहीं बसना नहीं चाहते थे और उनके बच्चे इस मकान  में नहीं आना चाहते थे। टिफिन लगा लिया था खाने के लिए , बाकी चाय वगैरह खुद कर लेते थे।  जल्दी किसी के पास न गए।भाभी के न रहने पर वे अकेले हो गए थे तो कभी कभी भाई को बुला लेते थे।    उस  दिन भी उन्होंने भाई को फ़ोन किया कि मुझे अपनी तबियत ठीक नहीं लगती है , क्या तुम आ सकते हो ? शायद उनको अहसास हो गया था या कुछ और लगा था।
                नीद  आ नहीं रही थी , करवटें बदलते रहे और जब शोर सहन नहीं हुआ तो उनसे रहा नहीं गया।    वे आखिर उस कमरे में आ ही गये और गुस्से से बोले  - " अरे मूर्खो तुम लोग करोड़ों के मालिक हो फिर भी इस तरह लड़ रहे हो। उनकी चिता की राख  तो ठंडी हो जाने देते। " और वह बाहर निकल गए। 
                   

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 87वां जन्म दिवस - अब्दुल कावी देसनवी - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (03-11-2017) को
    "भरा हुआ है दोष हमारे ग्वालों में" (चर्चा अंक 2777)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. मर्मस्पर्शी
    बहुत से लोग अपने स्वार्थ के आगे भला-बुरा कुछ भी देखने की स्थिति में कभी नहीं रह पाते हैं

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.