मंगलवार, 12 जून 2012

भवितव्यता (२)

पूर्वकथा : नीतू की बुआ सावित्री बचपन में ही शादी कर दी सात भाइयों की इकलौती बहन और ससुराल में भी लक्ष्मी मानी जाती थी पति शशिधर समझदार युवक मिला एक एक करके बेटों की माँ बनी लेकिन शायद की नजर लग गयी और उसके वारा हो गए और वही की बर्बादी का कारण बनने लगे साथ सावित्री के भाग्य पर ग्रहण बन गए


गतांक   से आगे:


                                  इस तरह से तनाव में ही कुछ दिन बीते और फिर सब कुछ सामान्य होते हुए दिखाई देने लगा लेकिन किसी को क्या पता था कि ये तूफान से पहले की शांति है सर्दियों के दिन गए शाम जल्दी ढलने लगी थी और शशिधर को स्कूल से आते आते अँधेरा होने लगता लेकिन अपने मित्र के साथ होने के कारण कोई परेशानी होती उसका मित्र घर के दरवाजे पर आकर  उतार देता और फिर अपने घर चला जाता जल्दी शाम होने के कारण लोग शाम से ही जल्दी घरों में दुबक जाते हैं एक शाम वह दोनों घर लौट रहे थे कि रास्ते में कटे पेड़ का  तना पड़ा था जिसे हटाने के लिए शशिधर ही उतरा,  सी बीच कुछ लोगों ने शशिधर के सिर  पर किसी चीज से वार किया और वह चीख कर वहीं गिर पड़ा उसके सिर  से खून की धार फूट निकली , उसको  गिरता  देख  उसको मारने वाले भाग चुके थे गिरीश ने मोटरसाइकिल वहीं पटकी और शशिधर  के पास पहुंचा खून देख कर वह भी घबरा गया जो रुकने का नाम नहीं ले रहा था उसको कुछ भी नहीं सूझा उसने अपना मफलर उतार कर उसके सिर   पर बाँध दिया  और मोटरसाइकिल ले कर गाँव की तरफ भागा कि शायद कोई मिल जाए और उसको वहाँ से अस्पताल ले जाया जा सके शशिधर बहुत  अच्छा लड़का था गाँव में खबर लगते ही लोग टैक्टर लेकर भागे और शशिधर को उसमें लिटाकर उसे कस्बे के अस्पताल ले आये चोट बहुत गहरी थी अतः डॉक्टर ने उसको इंजेक्शन दे कर सुला दिया गाँव कोई वापस गया और उसके पिता भी रात में नहीं गए और उसकी पत्नी को लेकर सुबह ही सके बूढ़े कंधे और झुक गए क्योंकि उसके बूढ़े पैरों की ताकत तो लहूलुहान पडी थी पिता का निस्तेज चेहरा किसी पारिवारिक संकट की आशंका से भयभीत दिखाई दे रहा था . वह बहू की आखों में जो शून्यता देख रहे थे उसकी चिंता भी उनको खाए जा रही थी।


                          शशिधर की हालात में सुधार बहुत धीरे धीरे हो रहा था और उसको किसी अनहोनी की  आहट मिल चुकी थी गिरीश उसको छोड़ कर अपने घर गया था साए की तरह से उसके साथ में था शशिधर को जो आभास हो रहा था वह किसी से नहीं कह सकता था क्योंकि उसके तीन छोटे छोटे बच्चे और भोली भाली पत्नी जिसने पति और सास ससुर की सेवा के सिवा कुछ जाना ही नहीं था आखिर शशिधर को गिरीश के अतिरिक्त कोई दिखाई भी तो नहीं दे रहा था उसने गिरीश का हाथ पकड़ कर वचन लिया - 'दोस्त अगर मैं नहीं बचता तो तू सावित्री के साथ अन्याय मत होने देना मेरा पैसा और पेंशन उसके नाम करवा देना बच्चे अभी बहुत छोटे हैं पिताजी की  उम्र हो चली है और छोटे के हाल तुमसे छिपे नहीं हैं '


'ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है, तू क्यों चिंता करता है? ' गिरीश ने उसको सांत्वना दी


'नहीं गिरीश तू मुझे वचन दे , तभी मैं चैन से मर सकूंगा' शशिधर का गला भर आया था और गिरीश तो कुछ समझ भी नहीं  रहा था कि  वह इस समय उसको क्या वचन दे?


'दोस्त मैं तुझे वचन देता हूँ , लेकिनतू फिक्र क्यों करता है? तू बिल्कुल ठीक हो जायेगा ' गिरीश ने कांपते हुए स्वर  में उसके हाथ को पकड़  वचन दिया।


                             शशिधर ने एक हफ्ते तक जिन्दगी और मौत के बीच संघर्ष किया , कभी लगता कि  वह ठीक हो जाएगा और कभी लगता कि आज की रात भारी  है। वह मनहूस  दिन भी आ गया , शशिधर अपनी दोस्ती का नाता तोड़ कर गिरीश को एक धर्मसंकट में छोड़ कर  चला गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा?  उसने अपने दोस्त को जो वचन दिया है उसको तो वह हर हाल में निभाएगा भले ही  इसके लिए उसे घर परिवार और समाज से टक्कर ही क्यों न लेनी पड़े?  उसको इस बात की पूरी संभावना थी कि  अब शशि के परिवार वाले उसकी पत्नी और बच्चों को एक तरफ करके खुद ही उसके पैसे पर काबिज होना चाहेंगे। इस बात के लिए  गिरीश पहले से ही तैयार था 

                            शशिधर के  पार्थिव शरीर को लेकर वह ही घर भी पहुंचा। पूरे गाँव में इस बात की खबर पहले ही हो चुकी थी इसलिए उसके दरवाजे पर काफी लोग जमा थे। सावित्री के घर वालों को भी खबर लग चुकी थी और उसके भाई और पिता भी आकर बैठे हुए थे। अपने दोस्त के उस पार्थिव को उठा कर लाने  का साहस उसमें न था , शव वाहन जाने के लिए तैयार था , उसके घर वालों ने वाहन से शव  कर चबूतरे पर रखा।
पिता बेहोश  पड़े थे , घर की औरतें बाहर नहीं आ सकती थी तो वे सब ओसारे में बैठी रो रही थी। सावित्री कहाँ थी और किस हाल में थी? इस बात के लिए बाहर  का कोई भी नहीं बता सकता था।
                           शाम तक उसकी अंतिम क्रिया पूरी हुई तो गिरीश अपने घर पहुंचा . वह तो अपने घर सिर्फ इतने दिन अपनी माँ  के हालचाल लेने के लिए कभी कभी ही गया। शेष वह स्कूल में छुट्टी लगाये शशिधर के पास ही रहता था। शशि के भाइयों पर उसको अब बिलकुल भी भरोसा नहीं रह गया था।  इसलिए उसने स्कूल में ऑफिस में और वहां के कर्मियों को ये निर्देश दे दिए थे कि  शशिधर के पैसे के मामले में कोई भी बात उठे तो उसे जरूर बुला लिया जाए। पूरे स्कूल की सहानुभूति शशिधर के परिवार के साथ थी।   
                           इस तरह से हफ्तों बीत गए कहीं से भी शशि के परिवार का कोई समाचार गिरीश को नहीं मिल रहा था और अब उसका उसके घर जाने का कोई औचित्य भी नहीं था। उसकी दोस्ती सिर्फ शशिधर से थी और वह उसके घर तो कभी होली या दीवाली ही  जाता था। बच्चों से वह परिचित था  और सावित्री से गाँव के माहौल के नाते कभी मिलना हुआ ही नहीं था। वह सावित्री को नहीं पहचान सकता था। धीरे धीरे वह भी शशि के सदमे से बाहर आने की कोशिश कर रहा था और उसको लग रहा था की शशि के जाने के बाद घर में सब कुछ ठीक ही चल रहा होगा।




                                                                                        (क्रमशः )

2 टिप्‍पणियां:

कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.