रविवार, 25 मार्च 2012

पतवार (३)

पूर्व कथा : छः माह के बेटे को लेकर राशि अपनी माँ के घर आ गयी थी और फिर यही उसका निधन भी हुआ बेटे को अपने पास रख कर उसने सोचा कि वह जीत गयी लेकिन अपनी झूठे अहंकार के चलाते वह उसे स्वीकार न कर सकी जिसको उसे करना चाहिए था। उसने झुकाना नहीं सीखा था और पाती ने हालात से समझौता करना ही उचित समझा।
दिव्यं माँ के साथ रहते हुए बड़ा हुआ और अपने पिता को भी मिस करता रहा फिर उसे मौका मिला पिता से मिलने का और उसके साथ ही माँ का जीवन कैंसर का शिकार हो गया । राशि को भी लगा कि अब उसका अंतिम समय आ गया है तो उसने बेटे से कुछ कहा ..........

गतांक से आगे :

दिव्यं तो कब से चाह रहा था कि वह भी और बच्चों की तरह से अपने माँ पापा के साथ रहे किन्तु ये सुख उसके नसीब में लिखा ही नहीं थाजो लिखा था वह उसके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं था, लेकिन उस अभिशाप को ढोने के लिए वह मजबूर थाउसके बाल मन पर पापा के लिए जो एक छवि अंकित थी उसको वह सहेज कर रखे था और जब मिला तो उसको लगा कि उसके पापा वाकई वैसे ही हें जैसे कि मौसी ने उसको बताया थाउसे अचानक लगा कि उसे पापा को तुरंत फ़ोन करना चाहिए और उसने तुरंत ही उन्हें फ़ोन किया -- "पापा जल्दी जाइए, मम्मा आपको बुला रही है."
"क्या?" समर को भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआउसने तो उसको करीब १५ साल से देखा तक नहीं था , उससे पहले वह उसको मना कर लाने के लिए वहाँ गया था लेकिन उसका प्रयास बेकार ही गया थाफिर उसने भी सोच लिया कि जीवन को अब शायद इसी तरह अकेले जीना उसकी नियति बन चुकी है
'हाँ , पापा प्लीज मेरे लिए।" दिव्यं को लगा कि इतनी उपेक्षा और अपमान झेल चुके पापा कहीं आने से इनकार कर दें
समर अचानक इस तरह कहने पर कुछ समझ या बोल नहीं पा रहा थाउसकी ख़ामोशी से दिव्यं को लगा कि पापा चुप क्यों है? । जब दिव्यं को कुछ सुनाई नहीं दिया तो उसने फिर से कहा - 'पापा प्लीज कम सून, मम्मा इस वैरी सीरियस।"
समर की तन्द्रा टूटी कि वह फ़ोन पर बात कर रहा है फिर वह हड़बड़ा कर बोला - ' के कमिंग सून।"
समर ऑफिस से उठकर सीधे स्टेशन की तरफ निकल लियाउसे भी ये पता था कि राशि को कैंसर है लेकिन किस स्टेज पर है ये उसको पता नहीं थाउसने रास्ते से ही माँ को सूचना दी कि वह कहीं बाहर जा रहा हैउसे लौटने में समय भी लग सकता हैवह फ़ोन पर बराबर बात करता रहेगा
समर किसी तरह से स्टेशन पहुँच कर एक ट्रेन में चढ़ लिया और एक सीट पर बैठ कर आँखें बंद कर के पीछे सर टिका कर बैठ गयावह उस अतीत में डूबने तिरने लगा जिसे वह बहुत पीछे तो छोड़ आया था लेकिन उसको भूला बिल्कुल भी नहीं थाउसकी आखों में राशि की वही छवि थी. जिस समय वह दिव्यम को लेकर घर छोड़ कर चली आई थीसमर राशि की सुन्दरता को देखकर ही उस पर फिदा हो गया था और उसने तुरंत ही शादी के लिए हाँ कर दी थीराशि उसके साथ साथ उसकी विधवा माँ की भी आँखों का तारा थीउसने राशि को कभी बहू माना ही नहीं , उसने हमेशा उसको बेटी माना और उसी तरह से उसका ख्याल रखती शायद इसलिए कि उसके कोई बेटी नहीं थीलेकिन राशि को ये बिल्कुल भी पसंद नहीं था , उसे माँ का समर का इतना ख्याल रखना पसंद था , वह चाहती थी कि वह समर के सारे काम करने में समर्थ है तो माँ को समर के किसी भी काम में कोई रूचि नहीं लेनी चाहिएमाँ तो माँ होती है जो जन्म से लेकर उसके विवाह तक अपने बेटे में ही अपनी सारी दुनियाँ देखती है और फिर एक विधवा माँ के लिए तो जीने का सहारा ही उसका बेटा होता है फिर वह कैसे ऐसा कर सकती है?
समर के लिए शादी होना कोई नई परिवर्तन लाने वाली घटना नहीं थी वह पहले की तरह से ही अपने सेलरी लेकर माँ को ही देता था और फिर माँ उससे घर के खर्च के लिए पैसे निकल कर राशि को दे देती थी लेकिन ये ही राशि को गवारा नहीं था . वह चाहती थी कि समर की सेलरी पर उसका पूरा अधिकार है और उसे पूरी सेलरी अपने हाथ में चाहिए थी और फिर उसके बाद वह सास को दे कि किस तरह घर के खर्च को वह पूरा करेसमर उसको बहुत समझाने की कोशिश करता कि आखिर सेलरी तो उसके पास ही जाती है लेकिन राशि को समझ नहीं आता था या फिर उसको अपना अहम् आहत होते हुए समझ आता थासमर इस बात को माँ के कानों तक नहीं जाने देना चाहता थाउसे अपनी माँ का किया गया संघर्ष पूरी तरह से याद हैउसकी माँ सिर्फ २५ साल की उम्र में विधवा हो गयी थी , अपने साल के बेटे को लेकर वह ससुराल और मायके सभी जगह पनाह पाने के लिए भटकती रही और हर जगह उसको सिर्फ दुत्कार ही मिलीकोई उसको बोझ समझ कर अपने पा नहीं रखना चाहता था
उसके पिता की दुकान थी , वह साल का ही था और उसके पिता की मृत्यु एक दुर्घटना में हो गयी थीदुकान बंद हो गयी क्योंकि उस समय औरतें दुकान पर नहीं बैठा करती थीकोई बड़ी जमा पूँजी नहीं थीमाँ उस समय के अनुसार घरेलु काम ही करना जानती थी इसलिए वह घर पर ही रहकर सिलाई और बुनाई का काम करके एक अलग घर लेकर उसको पालने लगीवह पढ़ने में होशियार था और जल्दी ही उसको स्कॉलरशिप मिलने लगी और बाकी वह भी ट्यूशन करके अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने लगा था और जल्दी ही उसको बैंक में नौकरी मिल गयी
(क्रमशः)

1 टिप्पणी:

कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.