शुक्रवार, 2 मार्च 2012

पतवार !

राशि नहीं रही, अभी उसके जाने की उम्र नहीं थी लेकिन शायद वह इतनी ही उम्र लेकर आई थी। इसी शहर में पैदा हुई पढ़ी लिखी और ब्याह कर अपने पति के घर गयी लेकिन कुछ ऐसा लेख लिखा था कि वह अंतिम समय फिर अपनी जन्म भूमि पर आकर ही धरती छोड़ कर चली गयी। वह ससुराल से एक बेटे को लेकर वापस आई थी और फिर दुबारा गयी ही नहीं - बस इतनी सी कहानी थी उसकी और वह भी ख़त्म हो गयी।
जब उसकी अर्थी उठी तो उसे उठाने वालों में आगे लगे लोगों में एक नया चेहरा था, उसे देखते ही लोगों में खुसफुसाहट होने लगी खास तौर पर औरतों में --
'ये आदमी कौन है?'
'अरे कोई रिश्तेदार होगा।'
'लेकिन कोई आगे लग कर कंधा तो नहीं देता है।'
'अरे होगा कोई हम क्यों सिर खपायें?।
औरतों के इन सवालों को पीछे खड़ी राशि की बहन निधि सुन रही थी, उससे नहीं रहा गया क्योंकि अगर इस बहस को अभी पूर्ण विराम न लगाया गया तो फिर ये बात का बतंगड़ बन कर रोज चर्चा का विषय बना रहेगा।
'ये मेरे जीजाजी हें, राशि दीदी के पति।" थोड़े से सख्त लहजे में निधि पीछे से बोली तो सबने मुड़ कर देखा।
'वही न, हम पहचानते नहीं थे, इसीलिए बात कर रहे थे।'
'अब तो समाधान हो गया।'
अर्थी जा चुकी थी और मोहल्ले वाले भी अपने अपने घरों को जा चुके थे। लेकिन राशि के बाद राशि की कहानी भले ही ख़त्म हो जाए लेकिन क्या घर वालों के लिए ये एक ख़त्म होने वाली दास्ताँ है। नहीं आज से उनके आगे राशि न होगी लेकिन उसके यहाँ रहने और जाने तक के समय को शायद ही कोई भुला पाए।
राशि अपने पति के घर से २० साल पहले ६ महीने के बेटे को लेकर चली आई थी और तब से माँ के घर पर ही रह रही थी। यहाँ रहकर उसने कम जलालत नहीं सही, माँ बाप के लिए वह उनका अंश थी और भाइयों के लिए भी वह दुश्मन न थी लेकिन भाभियों के लिए आँख की किरकिरी थी। सबके सामने न सही लेकिन अकेले में भाभियाँ उसके ऊपर कटाक्ष करने में नहीं चूकती थी. लेकिन जब वह अपने अहंकार के चलते के दरवाजे बंद करके आ चुकी थी तो कोई दूसरा रास्ता किसी दूसरे दरवाजे की ओर जाता ही न था। उसने घर से बाहर रहने और अपने बच्चे की परवरिश करने के लिए कुछ कमाने की सोची और एक स्कूल में नौकरी कर ली। वह अपने और बेटे के गुजरे भर के लिए बहुत कमा लेती थी किसी पर आश्रित न थी । उसके भाई और पिता ने बहुत समझाने की कोशिश की कि वह अपने घर वापस चली जाय क्यों अपने स्वर्ग से घर को ठुकरा रही है लेकिन उसकी इगो ने उसको अंधा बना दिया था और कमाने के बाद तो और भी। किसी की भी इस तरह की सलाह पर वह तुरंत अलग घर लेकर रहने की धमकी देने लगी थी । घर की इज्जत को बनाये रखने के लिए अब घर वाले भी मजबूर हो चुके थे और उन लोगों ने भी बेटी की इगो के आगे घुटने टेक दिए। सिर्फ उसकी माँ ने उसको शह दे रखी थी और उसके चलते ही वह और हठी हो चुकी थी।
दिव्यम बड़ा हुआ तो अपने ममेरे भाइयों के साथ स्कूल जाने लगा। स्कूल में सभी बच्चे अपने अपने पापा के बारे में बातें करते तो उसे भी यह लगने लगा कि उसके पापा भी होते तो वह भी बहुत सारी बातें इन सबके बीच करता किन्तु वह सिर्फ सुना करता था। यह सब बातें उसके बालमन को बहुत कष्ट देती थी। जैसे जैसे वह बड़ा हो रहा था उसे पापा की कमी खलने लगी थी और तब वह बहुत आहत होता जब उसके मित्र व्यंग्य करते - 'यार इसके तो पापा यहाँ हैं ही नहीं, ये क्या करता होगा?'
-'तू हमारी बातें मत सुनाकर, तेरे पास तो कुछ कहने के लिए होता ही नहीं है।'
एक दिन वह बालमन स्कूल से आहत होकर लौटा तो माँ से बगावत कर बैठा - 'मम्मी मेरे पापा मेरे पास क्यों नहीं रहते? आप ही चलिए उनके पास मुझे अपने पापा से मिलना है।'
'कोई जरूरत नहीं है जाने की, वो अपनी माँ के साथ रहेंगे और तू अपनी माँ के साथ रह। उन्हें मेरी या तेरी जरूरत होती तो अपनी माँ का पल्ला छोड़ चुके होते।' राशि ने दिव्यम को बहुत बुरी तरह से झिड़का।
वह बच्चा चुपचाप सहम कर रह गया और ड्राइंग रूम में जाकर अपने पापा की तस्वीर को देखने लगा। उसे अपने पापा बहुत अच्छे लगते थे और एक दिन उससे नहीं रहा गया तो उसने अपनी मौसी से पूछ ही लिया - 'मासी मेरे पापा बहुत गंदे हें, मुम्म को परेशान करते थे जो मम्मा यहाँ आ गयी।'
'नहीं बेटा, पापा बहुत अच्छे हें और कोई होता तो तलाक ले लेता लेकिन वह तो तुझे और मम्मा को पैसे भेजते रहते हें। उन्होंने बहुत कोशिश की कि मम्मा उनके साथ चले लेकिन मेरी मम्मा की जिद है कि वह तेरी दादी के साथ नहीं रहेगी।'

ठीक तो है, पापा अपनी मम्मा से अलग क्यों रहें? वो फिर पापा के बगैर कैसी रहेगी? अगर मैं चला जाऊं तो मम्मा कैसे रहेगी?'

'चुप चुप मम्मा सुन लेगी तो मेरे ऊपर गुस्सा होगी।'

'पर मैं तो बड़ा होकर पापा के पास जाया करूंगा.'

दिव्यम के बड़े होने के साथ साथ उसके प्रश्नों ने राशि को परेशान कर दिया उससे निजात पाने के लिए उसने दिव्यम को हॉस्टल भेज दिया । इस निर्णय से राशि के पिता को भी एक नया रास्ता मिल गया और उसने राशि के पति से कहा कि अब दिव्यम बड़ा हो रहा है और उसको उसकी जरूरत है इस लिए वह अब आगे जिम्मेदारी को बांटने का काम कर सकता है। उसको दिव्यम की फीस और पढ़ाई का खर्चा उठाना चाहिए। उसके पिता इस काम से कभी भी विमुख नहीं रहना चाहते थे अभी तक वह इस रकम को बैंक में भेज देते थे और अब खुद ही उठाने लगे।
(kramashah )

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर,
    वैसे तो कहानी है, पर लग रहा है कि एक सच्ची घटना को आपने शब्दों में बांधा है।

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  2. mahendra jee ke baato se sahmat hoon... ek dum sachchi kahani dikh rahi hai...
    holi ki shubhkamnayen di..

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.