रविवार, 7 अगस्त 2011

भवितव्यता !

पूरे मोहल्ले में यह खबर बिजली की तरह से फैल गयी कि बनारस में नीतू के फूफाजी का अचानकनिधन हो गयामोहल्ले के बड़े बुजुर्गों ने तो उनका बचपन भी देखा था और फिर व्याह, बच्चे सभी कुछ तो सबकेसामने हुआ किन्तु सावित्री जैसा भाग्य किसी ने किसी का नहीं देखा और सुना थाएक बार विधवा - कितना कठिनहोता है वैधव्य धोना और सावित्री फिर विधवा हो गयीविपत्तियों के पहाड़ तो उसने जीवन भर टूटते देखे और उनकेतले दब कर जीवन जियाकभी रोई, सिसकी, घुटी और फिर कभी चेहरे के मुस्कराहट से भरी भी नजर आई लेकिनइतने उतर-चढाव शायद किसी ने अपनी जिन्दगी में देखे होंगे
बचपन में गाँव के हिसाब से शादी कर दी गयी थी, पास के ही गाँव में भरे पूरे परिवार मेंइकलौती बेटीऔर सात भाइयों की इकलौती बहनबड़ी दुलारी प्यारी - कौन सी सुविधा थी जो उसे नहीं मिलीहर कोई इसी फिराक मेंरहता कि कौन सी खुशिया अपनी बहन और बेटी के आँचल में डाल देंसिर्फ पांचवे में पढ़ रही थी तभी उसकी शादी करदी गयी थीससुराल में भी उसको खूब सम्मान मिलाखूब सारा दहेज़ लेकर जो आई थी और फिर सबकी आँख का ताराबन कर रहीपति तब पढ़ ही रहा था - घर में अच्छी खेती बाड़ी थीधन धान्य की कमी थीघर में सम्पन्न परिवारोंकी निशानी ट्रैक्टर और जीप दोनों ही थेउसका पति पढ़ने में होशियार था तो उससे पिता को भी बहुत उम्मीदें थी किवह घर में पढ़ लिख जाएगा तो फिर बाकी भाई भी पढ़ लिख जायेंगे और खेती के बारे में भी वह सब देख सकता है
पढ़ने के बाद शशिधर की नौकरी पास के कस्बे में लग गयी, यद्यपि पिता कि इच्छा थी कि वह नौकरी करे लेकिनउसका कहना था कि घर से अधिक दूर नहीं है , घर से रोज आया और जाया जा सकता है तो फिर कोई बुराई नहीं हैइसशर्त पर कि वह घर से ही आया जाया करेगा उसके पिता मान गए
सावित्री के एक एक करके तीन बेटे हुएएक तो बड़ी बहू फिर घर में बेटे ही बेटे पलकों पर बिठाया जातावह अधिक दिन ससुराल में रहती कभी मायके और कभी ससुराल में बनी रहतीमन से एकदम भोली और साफ थीपति की कमाई से कोई मतलब थाजो पैसे दे देता बहुत थाफिर उसे पिता के घर से इतना मिलता रहता था किखाली हाथ तो उसका कभी रहता ही थासास तो उसे साक्षात लक्ष्मी ही मानती थीउसकी तरह से देवरों की शादी भीजल्दी ही कर दी गयी लेकिन अभी सास गौना लेने को तैयार थी क्योंकि सावित्री तो बड़ी बहू थी सो शौक के मारे जल्दीही गौना ले लिया थाउसके देवर शशिधर की तरह से पढ़ने लिखने वाले थेउनकी संगति बिगड़ चुकी थीवे तोबड़े भाई की तरह से कर्मठ और व्यवहारकुशल थे और ही जिम्मेदारसभी खेती के काम में लगे रहते और जो हाथ मेंआता उससे उनकी संगति बिगड़ने लगीघर का पैसा जुएँ और शराब में उड़ाना शुरू कर दियाचापलूस दोस्तों की कमी थीउसको घर के खिलाफ भड़का कर पैसे खर्च करवाने में किसी को बुरा लगता थामौज मस्ती उसके दम पर हीचल रही थी
शशिधर ने एक दिन भाइयों को ट्यूबबेल पर आवारा लड़के के साथ मस्ती करते देखा तो उसके कानखड़े हो गए कि ये तो बर्बादी के ओर बढ़ रहे हैंउसने उनको वही जाकर लताड़ा --
'यहाँ क्या तमाशा मचा रखा है।'
'कुछ नहीं - ये लोग गए तो ताश खेल रहे थे। ' जुएँ के ताश समेट रहे दोस्तों को उसने कसकर थप्पड़ लगाये और भाईको तो घसीटते हुए घर लाकर पिता के सामने खड़ा कर दियापिता ने भी उसको दो चार तमाचे जड़ दिएशशिधर के येकदम घर को बर्बादी से बचाने के लिए उसकी अपनी जिन्दगी और परिवार के लिए आगे मंहगा पड़ेगा ये किसी ने नहींसोचा था
घर में ही महाभारत होने लगीबड़े भाई की कमाई पर ऐश करना बंद हो गयापिता ने भी अब पैसे देने केबारे में सोचना शुरू कर दियाशायद भाई सुधर भी जाते लेकिन उनके आवारा यार दोस्तों ने तो अपनी मौज मस्ती मेंखलल पड़ते हुए देखी तो वे उसको भड़काने लगे -
'तुम भी तो इस खेती के हिस्सेदार हो और अभी तुम्हारा खर्चा ही क्या है? सारी गृहस्थी तो तुम्हारे भाई की हैसाराहिस्सा तो उसके बीबी बच्चों पर खर्च होता हैतुम अपनी खेती बंटवा लो , फिर कोई रोकने टोकने वाला नहीं होगा। '
उन मूढ़ मगज को बरगलाना आसान था क्योंकि पढ़ाई लिखाई से उनको कोई मतलब नहीं था और फिर घरसे भी अधिक उन्हें अपने दोस्तों पर भरोसा जो था कि वे सही राय देंगेउनकी समझ आने लगा कि दोस्त सही कह रहेहैंउसने घर में बंटवारे की बात की तो और भी धुनाई हुईअब घर वालों को समझ गया था कि इसके मक्कार दोस्तही इसको भड़का रहे हैंमुफ्त में खाना पीना किसे बुरा लगता है? सब के सब ऐसे ही छोटे घरों के थे, चापलूसी करने मेंकोई पैसे खर्च तो होते नहीं है
शशिधर को अब पूरे घर की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही थीउसने अपने बचपन के दोस्त जो उसके साथही स्कूल में टीचर था उसके गाँव से होकर रास्ता जाता था उसके गाँव कावह रोज मोटर साइकिल से जाता था, अबशशिधर ने उसके साथ घर लौटना शुरू कर दियाइससे वह घर जल्दी आने लगा क्योंकि साइकिल से जाते आते देर जोजाती थीदोस्त भी उसका बचपन का दोस्त ही नहीं बल्कि अन्तरंग भी थाअंतरंगता के चलते वे आपस में अपने सारेसुख दुःख बाँट लिया करते थे
छोटे भाइयों को हथियार बनाकर उसके कंधे पर बन्दूक रख कर चलाने वाले और भी पैदा होने लगे क्योंकि गाँव में उनकी समृद्धि और खुशहाली से जलने वालों की कमी थीकिसके मन में क्या पल रहा है ये सब कुछ तो जाना नहीं जा सकता हैवैसे भी ऐसे में घर और कुनबे के लोग भी दुश्मन बन जाते हैंघर में कुछ कहने वाले शशिधर को इस बात का अहसास होने लगा था कई बार उसने अपने मित्र से कहा भी - 'मुझे अपने और अपने परिवार के लिए डर लगने लगा है।'
'ऐसा क्यों?'
'पता नहीं क्यों ये मेरी आत्मा को लगने लगा है, कि कहीं कुछ अनहोनी हो जाए ?'
'ऐसा विचार मन में मत लाया करो, उस ईश्वर पर भरोसा रखो।' मित्र उसको दिलासा दिया करता था
'वह तो रह ही जाता है, हम कर भी क्या सकते हैं? ' वह हताश स्वर में कभी कभी बोल जाता था
कोई नहीं जानता था की शशिधर की ये शंका इतनी जल्दी ही सत्य सिद्ध हो जाएगी और सब कुछ ऐसे बिखर जाएगा जैसे की कभी कुछ था ही नहींवह सावित्री जो अभी भी एकदम भोली थी , अपने बच्चों और पति के अलावाउसकी कोई दुनियाँ थी ही नहीं

(क्रमशः )