सोमवार, 23 मई 2011

अग्नि-परीक्षा ! (२)

पूर्वकथा : निमिषा एक असामान्य शारीरिक संरचना का शिकार लड़की , जो आई आई टी से अंग्रेजी में पी एच डी कर रही थी अपनी इस कमजोरी के करण उसे उपहास का पात्र बनाया करते थे लोग समाज कि दृष्टि से ऐसी लड़की से कौन शादी करेगा? इसका भविष्य क्या होगा किन्तु वह अपनी इसी कमजोरी पर विजय पाने के लिए कटिबद्ध थी उसे पता था कि उसके घर वाले उसके लिए चिंतित है लेकिन जो उसके साथ चलने के लिए तैयार है उसके लिए वे कभी तैयार होंगे और इसी लिए उसने पहले अपनी पढ़ाई पूरी करने को संकल्प माँ कर आगे बढ़ना शुरू किया...........

गतांक से आगे :

वह यहाँ रही समय मिलने पर मिलने के लिए जाती थी लेकिन मेरा विभाग दूसरा और साथ के लोग भी दूसरे तो वह उतने खुल कर बात नहीं कर पाती थी फिर एक दिन वह अपनी थीसिस जमा करके चली गयी महीनों के बाद जब उसका डिफेंस हुआ तब आई थी उसमें उसने लंच पर मुझे भी बुलाया था लंच में कुमार भी था किन्तु आगे के विषय में मैंने कुछ पूछना ठीक समझ और इतने लोगों के बीच कुछ बताना उसने सही समझा होगा उसके बाद बहुत लम्बे समय तक उससे मुलाकात नहीं हुई और कोई समाचार ही मिला उन दिनों मोबाइल भी थे कि एक दूसरे से संपर्क कर पाते और नहीं नेट कि सुविधा इतनी अच्छी थी सफर के मुसाफिर की तरह से हम बिछुड़ चुके थे
कई वर्ष के बाद मुझे उसकी एक सहेली मिली तो उसने बताया कि निमिषा और कुमार ने कोर्ट मैरिज कर ली और दोनों घरों के दरवाजे दोनों के लिए बंद हो गए शादी करके वह सीधे मेरे ही घर आई थी और फिर मेरी मम्मी ने उसका बेटी कि तरह से स्वागत किया और विदाई की सुनकर बहुत अच्छा लगा कि उसको मंजिल तो मिली लेकिन वह मन्जिल थी या फिर अग्नि परीक्षा देना अभी बाकी था ये तो मुझे पता ही नहीं था
फिर एक लम्बा अंतराल और कोई खोज खबर नहींउसकी अपनी व्यक्तिगत बातों को तो उसके अलावा और कोई नहीं बता सकता था और मैं उससे बिल्कुल ही अनभिज्ञ थीफिर एक बार दुबारा उसकी मित्र से मुलाकात हुई क्योंकि वह कैम्पस की ही रहने वाली थी तो कभी जब भी आती तो जाती थीउससे ही पता चला कि निमिषा की जॉब लग गयी बेंगलोरे में और उसके एक बेटी भी हैकुमार ने भी वही पर जॉब कर ली हैउसका फ़ोननंबर तो मैंने लिए लेकिन फिर भूल गयी
इधर कुछ महीने पहले ही फेसबुक पर
उसका कमेन्ट देखा - हाय दी मैंने आपको खोज ही लियाउसमें ही उसके परिवार के फोटो भी देखे और एक दो बातें हुई लेकिन फिर सब अपने अपने में
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हम लोगों को कई दिन तक नर्सिंग होम में रहना पड़ा लेकिन अधिक मुलाकात नहीं हो सकीएक दिन वह गयी कि चलिए कहीं बैठते हैंउसे शायद कहने के लिए बहुत कुछ था और मुझे उससे सुनने के लिए भीनहीं तो शायद ये कहानी भी लिखी जातीहम सामने एक कैफेटेरिया में जाकर बैठ गए
"और सुनाओ कैसे कट रही है? "
"अब तो सब ठीक हो चुका है, लेकिन बहुत झेला है मैंने।"
"वही तो सुनने कि इच्छा है, कहाँ तो दोनों के परिवार इतने खिलाफ थे और कहाँ सब ठीक ।"
"आप सुनेंगी तो कहेंगी कि तुमने इतना सारा किया कैसे?"
"ये तो मैं जानती थी कि निमिषा तेरे में बहुत सहनशक्ति है और तू विपरीत धाराओं को भी मोड कर ला सकती है। "
"वो कैसे?"
"बस इंसान को परखने की समझ होनी चाहिए।"
अब छोड़ ये सब बस मुझे शोर्ट में बता दे कि कैसे ये सब हुआ?
"दी , मैंने अपनी पी एच डी पूरे होते ही, सबसे पहले अपने घर में कहा, लेकिन घर में तो कोई सवाल ही नहीं थामैंने घर छोड़ कर कुछ महीने हॉस्टल में ही बितायेमैं इस चक्कर में थी कि यहीं कोई प्रोजेक्ट में मुझे जॉब मिल जाय तो मैं फिर अपनी बात के लिए इन्तजार कर सकती हूँ लेकिन जॉब नहीं मिली और फिर एक दिन मैंने कुमार से कहा किअब हमें निर्णय लेना ही पड़ेगा नहीं तो कब तक हम सबके मुँह को देख कर बैठे रहेंगे
कुमार ने भी खुद को तैयार कर रखा था , उसने अपनी माँ से पहले ही बात कर ली थी और वे कतई राजी नहीं थींवे नौकरी करती थी और बहुत ही तेज तर्रार थींहम दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली और शादी करके मैं शुभ्रा के घर सीधे आई थीआंटी ने मुझे सपोर्ट दिया था और उन्होंने मुझे माँ की तरह से ही लियाउन्होंने कहा भी कि तुम कुछ दिन यहाँ रह सकती हो लेकिन मैंने इसके लिए मना कर दिया
हम यहाँ से बाहर जाकर रह नहीं सकते थे क्योंकि कुमार की जॉब यही पर थी लेकिन हमने अपने घरों से दूर एक घर लेकर रहना शुरू कर दियाकुमार की माँ का कहना था कि वह रोज वहाँ आएगाकुमार अपने घर दिन में एक बार जरूर जातेकुछ महीने के बाद उनकी माँ ने कहा कि तुम उसको लगा सकते हो लेकिन मैं उससे कुछ भी कहूं या करूँ तुम बोलोगे नहींकुमार को ये मंजूर नहीं थाउन्होंने मना कर दिया और मेरे पास आकर ये बात बतलाईमैंने कुमार से कहा कि क्यों नहीं मान लेते उनकी बात
"इस लिए कि मैं जानता हूँ कि मेरी माँ कितनी जिद्दी और कड़क स्वभाव की हैउसने अगर दुर्व्यवहार किया तो मैं सहन नहीं कर पाऊंगा और फिर जो लिहाज के पर्दा बना हुआ था वह उठ जाएगा। "
"ऐसा कुछ भी नहीं होगा, मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूँ कि मैं सब कुछ सह लूंगी।"
"तुम सह लोगी ये मैं जानता हूँ लेकिन शायद मैं सहन नहीं कर पाऊंगाहमने शादी की है कोई गुनाह नहीं कियाजिसकी सजा तुमको मिलेमैं भी तो बराबर का हकदार हूँफिर वही मेरे लिए होना चाहिए।"
"कुमार, एक बार उन्हें मौका दो, घर छोड़ कर हम भी तो सुख से नहीं रह पा रहे हैं, उनकी आत्मा भी मुझे कोसती होंगी कि मेरे बेटे को छीन लिया।"
"अगर मुझसे सहन नहीं हुआ तो फिर मैं उस घर को जीवन भर के लिए त्याग दूँगाअगर इस बात पर तुम राजी होतो मैं तुम्हें वहाँ ले जा सकता हूँ। "
"ठीक है, मुझे मंजूर है."
दी हम लोग उस घर में चले गए लेकिन लगता ऐसा था कि वे मुझसे कोई बदला लेने की सोच रखी थीउन्होंने सारे काम वाले निकाल कर बाहर कर दिएमैं अपने शरीर के कारण नीचे बैठ कर कोई काम नहीं कर पाती थी. फिर मैंने अपने को इसके लिए तैयार कियावह जल्दी अपने ऑफिस चली जाती थी और फिर कुमार भी मेरे साथ काम लेतेइस जंग में कुमार ने जिस तरह से मेरा साथ दिया है तभी मैं उनकी माँ की परीक्षा में सफल हो पाई नहीं तो शायद मैं कब की टूट जाती
मैंने दो साल उस घर में नौकरानी से भी बदतर स्थिति में गुजारे और मैं अकेले मैं खूब रोती कि क्या मैंइतनी पढ़ाई करके यही करती रहूंगीमेरे पास जो डिग्री थी उसकी बहुत कीमत थी लेकिन जब तक कुछ नहीं तो बेकार ही थीफिर शायद ईश्वर को मेरे ऊपर तरस गया और मुझे बेंगलोर से इंटरव्यू के लिए कॉल गयीघर में मचा बवंडर कि इतनी दूर क्यों जाएगी यही कहीं कॉलेज में मिले तो कर लेनालेकिन नहीं मुझे यहाँ से निकलनेका मौका मिल रहा था और मैं उसको छोड़ना नहीं चाहती थीईश्वर ने भी साथ दिया और मुझे वहाँ जॉब मिल गयीमैं वहाँ से वापस ही नहीं लौटी , पहले वहीं पर गेस्ट हाउस में रहने की जगह मिल गयीकुमार ने यहाँ आकर सबको बता दियाघर में कुहराम मच गया कि क्या जरूरत थी इतनी दूर जाने कीमैं तुमको तो वहाँ जाने नहीं दूँगीकुमार तुरंत ही आने को तैयार थे कि वहीं कोई जॉब देख लूँगा लेकिन मैंने उसको मना किया कि मुझे कन्फर्म हो जाने दो फिरकोई कदम उठनामैं कन्फर्म हो गयी और फिर कुमार भी यहीं गएयही क्षिति का जन्म हुआलोगों को ये था कि मेरे शरीर के वजह से मैं कभी माँ नहीं बन पाऊँगी लेकिन ईश्वर ने वह भी रास्ता खोल दिया
क्षिति के जन्म के बाद सासु माँ ने वहाँ बुलाना चाहा लेकिन मैं ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि वे यहाँ आकर रह सकती हैं लेकिन मैं वापस नहीं आऊँगी
"तेरे मम्मी पापा का क्या रूख रहा।"
"मेरे मम्मी पापा भी सालों तक माफ नहीं कर सके लेकिन जब पापा को कैंसर हुआ तो भाई तो बाहर जाकर बस गयाथादीदी लोग भी बाहर ही थी लेकिन उनको भरोसा था अपनी बच्चे पर सो मेरे पास खबर भेजी कि क्या आखिरीसमय भी नहीं आएगीमैं वहाँ रहती थी तो छुट्टी नहीं लेती थी इसलिए मैं लम्बी छुट्टी लेकर आई और फिर पापा की बहुत सेवा की किन्तु वह उनका आखिरी समय था और वे भी चले गए । "
बहने मेरी पहले भी मेरी बहुत विरोधी थी , सबके साथ औपचारिक सम्बन्ध बने हुए थे और आज भीबने हुए हैं
फिर हम लोग उठ कर जब नर्सिंग होम आये तो मैंने सोचा कि निमिषा की सासू माँ से मिलती हीचलूँऔर मैं उसके साथ उसकी सास के पास चले गएउनसे मेरा परिचय करवाया - "मम्मी जी, ये रेखा दी है, मेरेसाथ आई आई टी में काम करती थी, ये तो अभी भी वहीं हैऊपर इनका कोई घर वाला भर्ती है तो मिल गयी औरआपसे मिलने के लिए आयीं है।"
उनसे नमस्ते करके मैं वहीं बैठ गयीचेहरे से बड़ी ही खुर्राट लग रही थी, इस उम्र में भी उनके चेहरे पर चमक थीमैं इतना कुछ इनके बारे में सुन चुकी थी कि मुझे लग रहा था कि निमिषा कैसे इनके साथ रह रही है?
"आप की तबियत कैसी है?"
"हाँ अब तो ठीक हूँ, काफी आराम हो रहा है।"
"ये आपकी सेवा करती है या फिर ऐसे ही।"
"नहीं, ये मेरी बेटी है तो और बहूँ है तो इसने मेरी बहुत सेवा की हैमुझे उम्मीद नहीं थी कि ये मेरी इतनी सेवाकरेगी।"
उनके इन्हीं शब्दों के साथ मुझे लगा कि निमिषा ने वाकई अग्नि परीक्षा पास ही नहीं की बल्कि उसमें तपकर खरा सोना बन कर निकली है
(समाप्त)

13 टिप्‍पणियां:

  1. प्रथम भाग से शुरु करना पड़ेगा फिर से...

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  2. jeevan ke sach ko aapne phir se sabke samne rakha...bahut khub..

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  3. सही कहा तप कर ही सोना खरा होता है।

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  4. बहुत बढ़िया लगा! ज़िन्दगी की सच्चाई को बहुत ही सुन्दरता से आपने प्रस्तुत किया है!

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  5. बहुत ही अच्छी तरह आपने सुनाई निमिषा की कहानी.
    अंत भला तो सब भला..

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  6. ise hi nibhana kahte ,jo bina dhairya ke sambhav nahi ,aur yahi tapsaya hai .kuchh pane ke liye bahut khona padta hai .bahut badhiya laga padhkar

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  7. दोनों भाग एक साथ पढ़े ... इतनी सहनशीलता बहुत मुश्किल है ... पर ऐसे ही लोंग ज़िंदगी में आगे बढ़ पाते हैं ..

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  8. क्या बात है, जिस उतार चढाव से होती हुई कहानी को आपने अंजाम तक पहुंचाया है, काबिले तारीफ है। बहुत सुंदर

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  9. bahut saari pareshaniyon ke baad bhi dil jeet liya Nimisha ne aur aakhir me Happy Ending... kahani dukh ke bihdon se gujarti huvi khusiyon kee abaadi me aa gayi... bahut Sundar kahani ..umDa

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.