सोमवार, 16 मई 2011

अनु होती ! (२)

पूर्व कथा:
एक धनी परिवार की बेटी और धनी परिवार की बहू अनु पारिवारिक षड़यंत्र का शिकार हुई। बच्चों सहित कई साल मायके रही औरजब लाया गया टो घर में नहीं घुसने दिया गया। कुछ दिन चाचा के घर रही और फिर वापस मायके। एक परित्यक्ता के दुःख को भोगा उसने, ज़माने वालों की बातें सही उसने और उसके मायके वाले भी इस का हल चाहते थे....

गतांक से आगे :
कुछ बददिमाग लोग ऐसे होते हैं कि उनके बीच में बोलना या फिर उसको सलाह देना व्यर्थ ही नहीं होता बल्कि अपने ही अपमान का सामान जुटाना होता . मैंने इस विषय में पहल नहीं कीसोच रही थी कि इसके और बच्चों केभाग्य में कुछ तो लिखा होगाफिर साल गुजर गएकुछ भी नहीं हुआहाँ समाचार दोनों तरफ के मिलते रहे
अब अनु कि उम्र २६ साल की हो चुकी थी उसके साल की बेटी और साल का बेटा थामाता पिता नेसोचना आरम्भ कर दिया कि इस तरह से पूरी जिन्दगी कहाँ तक बैठी रहेगीबच्चों के सहारे जिन्दगी गुजर जायेगी कहने और उसको सहने में बहुत अंतर होता हैवैसे उसका मायका इतना सम्पन्न था कि उसका सारा जीवन सुख पूर्वक गुजर जाता लेकिन समाज और उसका भविष्य क्या होता? आखिर उसके पिता और बाबा ने इसा विषय में सोचना शुरू कर दिया कि अगर कोई सही लड़का मिलता है तो वे दोनों बच्चों को अपने पास रख लेंगे औरअनु की दूसरी शादी कर दी जायअनु अपने बच्चों को छोड़ने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थीवह जीवन भरअकेले तो रह सकती है लेकिन बिना बच्चो के नहींफिर सोचा कि कोई विधुर या एक बच्चे वाला हो जो इन दोनों ही बच्चों को अपना ले तो ऐसे लड़के को देख लिया जायअनु और राकेश दोनों के कुछ रिश्तेदार कॉमन थे जिससे वहाँ के समाचार यहाँ भी मिलते रहते थे
आख़िर एक लड़का समझ आया और उसके बारे में बात शुरू हो गयी वह अनु के साथ दोनों बच्चों कों रखने के लिए राजी था क्योंकि उसकी पत्नी प्रसव में गुजर गयी थी और उसकी साल के बेटी थीइस बातचीत के शुरू होते ही इस विषय में खब़र राकेश को लग गयी कि अनु की दूसरी शादी की जाने वाली हैउसने अचानक इक दिन फ़ोन किया कि वह अनु और बच्चों को लेने रहा हैउसने अपने और अनु के लिए रहने के लिए नीचे वाले पोर्शन को तैयार करवा लिया हैसबको बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसा परिवर्तन एकाएक कैसे हो गया? कई दिन उसको उत्तर देने में ही लग गए कि अनु और बच्चे उसके साथ जाने के लिए तैयार भी हैं या नहींबहुत सोच विचार के बाद अनु ने कहा कि वह अब कानपुर ही जाएगी और अब वह जाकर बेचारी बनकर नहीं रहेगीअब अपनेअधिकारों के लिए लड़ेगी और जेठानी और जेठ ही नहीं अगर राकेश ने भी अपना रुख बदल तो वह बगावत कर देगीडर कर बहुत दिन जी लिया, अब तो रणचंडी बन कर जिया तो ये दानव उसके और उसके बच्चों के भविष्य को खा जायेंगे
अभी भी घर वालों को राकेश पर विश्वास था लेकिन उसके ससुर से बात की गयी तो वे बोले कि अगर राकेश खुद कह रहा है तो फिर मैं तो पीछे सब देखने के लिए तैयार हूँ हीआप मुझ पर भरोसा रखिये अब अनु को कोई तकलीफ नहीं होगीराकेश को आने के लिए बोल दिया गया और वह गाड़ी लेकर वहाँ पहुँच गयाफिर भी अनु के साथ उसकी बहन को भेजा गया कि अगर कुछ भी अनहोनी समझ आये तो वह सूचना दे
समस्या यह थी कि बड़े बाप के बेटे कुछ करते थे, बाप ही सारे बेटों और बहुओं के खर्च को उठते रहते थेऔर उनके पास था भी बेशुमार पैसाअनु ने पति से खुद कुछ करने के लिए बोला कि हम कब तक पापा जी केऊपर निर्भर रहेंगेवह खुद भी कुछ करने के लिए तैयार थीलेकिन घर की इज्जत के मारे उसको कुछ भी करने देने की अनुमति ही नहीं थीउसने पीछे रहकर कम शुरू किया और पति ने भीपिता आर्थिक सहायता देने केलिए थे ही
अनु जब मेरे यहाँ आती तो रात में आती क्योंकि चाचा और चाची के घर से जिस तरह से उसे बेइज्जत करके निकला गया था वह भूली नहीं थीअभी बचपना नहीं था लेकिन उम्र की परिपक्वता भी नहीं थीमैंने उसको समझाया कि अनु बगल में चली जाया कर ऐसा नहीं करते खून के रिश्ते कटुता की वजह से नहीं तोड़े जाते हैंबेमन से ही सही इस बात से इनकार तो नहीं कर सकती कि वे राकेश के चाचा हैंबाद में उसके सम्बन्ध भी मधुर सही लेकिन हाँ आने जाने लायक हो ही गएसब कुछ सामान्य चलने लगा
समय के साथ उसके बच्चे बड़े हो गए पढ़ाई में भी आगे से आगे बढ़ते जा रहे थेजीवन में व्यवधान तोआते ही रहते हैंअनु ने इतना झेला था कि उसको हाई ब्लड प्रेशर हो गयाअगर राकेश की गलती होती वो मुझे फ़ोन करता कि आप ही अनु को समझा सकती हैंबाद में जाने पर पता चलता कि माजरा क्या है? उसको हर तरीके से समझा देती
एक दिन उस परिवार पर कहर टूट पड़ा , कहीं जाते समय उसके ससुर को हार्ट अटैक पड़ा और वहाँ से सीधे वह नर्सिंग होम मेंकोमा में चले गए, वेंटिलेटर पर ४० दिन रहेहम सब उनके बचने की उम्मीद छोड़ ही चुके थेफिर भी पैसे वाले की उम्र पैसे के बल पर बढ़ भी जाती हैइस बीच में एक दिन अनु का ब्लड प्रेशर २००/१४० हुआरात में ही फ़ोन आया कि अनु बहुत बीमार है जाइये
वहाँ जाकर पता चला कि पिता की बीमारी में राकेश ने सारा पैसा खर्च किया है और इससे अनु को कोई भी परेशानी नहीं लेकिन अब जेठ जी ने उसके घर में दखल देना शुरू आकर दिया थाजो उसको बिल्कुल भी सहन नहीं थालेकिन राकेश का कहना था कि पिता दोनों के हैं मैं उनको साथ जाने या फिर उनसे सलाह लेने के लिए मना तो नहीं कर सकता और यही कारण है कि अनु कि तबियत ख़राब हो रही है.
मैं जब दो दिन बाद फिर उसको देखने गयी तो उसने मुझे बताया कि मैंने खुद सुना है कि मेरे जेठ जी कह रहे थे कि इसका सारा पैसा तो इलाज में लगवा दूँगा और फिर एक कौड़ी भी इसको नहीं देने वालेपिताजी तोअब उठने से रहेफिर देखता हूँ कि कहाँ से ये बच्चे पढेंगे और कहाँ से लड़की की शादी करेगी?

बस इसके बाद मुझे नहीं पता और मैं बेहोश हो गयीइस सदमें को वह झेल नहीं पाईइस बात को उसने किसी को भी नहीं बताया था
अस्पताल में उसको ससुर से मिलने वालों की लिस्ट में जगह नहीं दी गयी है, सिर्फ जेठ और उसका बेटा ही जाते हैंकिसी तरह से वह लोग जब जेठ हो तब जा पाते हैं लेकिन ससुर तो कुछ बोल ही नहीं सकते हैं
इन लोगों की आगे क्या प्लानिंग ये भी मुझे नहीं पता है
मैंने उसे बच्चों का वास्ता दिया कि देख अगर तुम्हें कुछ भी हुआ - हाई ब्लड प्रेशर में ब्रेन स्ट्रोक से पैरालेसिस भी हो सकता है , तुम्हारी जान भी जा सकती हैतब फिर इन बच्चों का भविष्य क्या होगा? अभी इनका जीवन बनाने का समय हैतुम्हें इस समय हिम्मत से काम लेना होगाखुद को मजबूत बनाओ तभी इस राजनीति से निकाल सकोगीमैं उसके पास सारे दिन रही और उसको समझाती ही रहीवह समझ भी गयी क्योंकि फिर बहुत दिनों तक कोई भी समस्या की जानकारी मुझे नहीं हुई थी
वह अतीत के दंश से अभी मुक्त नहीं हो पाई थी और उसको जेठ की चालों में वही सब दिखलाई देने लगता थायद्यपि उसके बच्चे बेटी बी बी कर रही थी और बेटा इंटर में चुका थावे दोनों माँ के लिए सुरक्षाकवच बन चुके थेराकेश भी अगर कुछ कहता तो वे सामने खड़े हो जाते कि अब आप मेरी मम्मा को कुछ नहीं कहेंगेमुझे भी संतोष था कि इन बच्चों ने अपनी माँ को बचपन से संघर्ष करते देखा है तो उसको अनुभव भी किया हैअनु आर्थिक तौर पर सुदृढ़ थी लेकिन फिर से पति के दुर्व्यवहार और अशांति की आशंका से उसको डर लगता था
अनु और राकेश ने लाखों रुपये खर्च किया और उसके पिता घर वापस गएसारा परिश्रम सफल हुआ लेकिन ये क्या उसके जेठ ने पिता को कैद कर लिया और सारी संपत्ति अपनी नाम लिखवा लीउनसे मोबाइल भी ले लिया और वे अभी चलने फिरने में असमर्थ थेकुछ कह भी नहीं पाते क्योंकि रिश्तेदरों के आने पर कोई कोई उनके पास मौजूद रहता
मैं तो उनके सामने नहीं जाती थी , उनकी पत्नी से ही मेरा मिलना होता थाएक दिन मेरे पति उन्हें देखने गए हम रिश्तेदार थे तो कोई बैठा भी नहीं थावे रोने लगे कि देखो भैया तुम राकेश और अनु का साथ छोड़ना वे अब अकेले पड़ जायेंगेइसके इरादे ठीक नहीं है और मुझे तो ये चिंता की मेरे बाद मेरी पत्नी का क्या होगा? ये स्थिति थी एक करोड़ पति इंसान की
फिर क्या हुआ? मुझे नहीं पता क्योंकि मैं दस दिन के लिए दिल्ली चली गयी क्या हालात हुए? अनु चली गयीढेरों प्रश्न अपने पीछे छोड़कर और उनका कुछ बोझ मुझ पर भी छोड़ कर क्योंकि अगर मैं समय से उससे मिल पाती तो शायद कुछ समझा पाती और ये सब होतावह उस मनःस्थिति से उबर पाती और जिंदा होती
मगर सत्य यही है कि अनु चली गयी

10 टिप्‍पणियां:

  1. कभी कभी कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं………मार्मिक चित्रण्।

    उत्तर देंहटाएं
  2. दर्द भरा अंत ...जबाब शायद खुद अनु भी न दे पाती.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय रेखा जी जिंदगी में न जाने क्या क्या रंग देखने को मिलते हैं ह्रदय को छू लेने वाला आप का लेख और दुखद अंत निम्न एक प्रश्न -काश सब कुछ ठीक चले जिंदगी में -

    अनु चली गयी । ढेरों प्रश्न अपने पीछे छोड़कर और उनका कुछ बोझ मुझ पर भी छोड़ कर
    बधाई हो -
    आइये अपना स्नेह व् सुझाव समर्थन हमें भी दें इस गति में हम भी बढते रहें
    शुक्ल भ्रमर ५

    उत्तर देंहटाएं
  4. हर तरह के लोग इसी दुनिया में हैं...क्या कहा जाये...मार्मिक कहानी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेहद मार्मिक और सामयिक.कहानी जो बिकुकुल यथार्थ के साथ कंधे से कान्धा मिलाकर चलती है.एक सवाल छोड़ती मार्मिक रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  6. दुखद है अनु का इस तरह जाना ...
    मार्मिक रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहद मार्मिक रचना|धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  8. और अनु चली गई ........उसे जाना ही था ..जिन्दगी से लड़ी तो पर जीत नहीं पाई ....खुद कि जिन्दगी से ...पर ऐसा अंत होगा ये वो भी नहीं जानती थी .....दुःख हुआ अनु का सच जान के .....

    उत्तर देंहटाएं

कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.