सोमवार, 16 मई 2011

अनु होती !

पिछले दिनों जब मैं दिल्ली में थी तो वह परेशान थी, कारणों से तो मैं वाकिफ थी और एक बार उसको समझा करभी आई थी लेकिन ये मनोभाव कब क्या कर बैठें नहीं जानते? दिल्ली में ही उसके पति का फ़ोन आया था कि आप जाइये और अनु को समझा दीजिये। मैं क्या करती? फ़ोन से कितना समझाया जा सकता है? जब मैं वापसआई तो घर और ऑफिस के बीच फँस गयी नहीं जा सकी आज सुबह जाना ही पड़ा - क्योंकि अनु अपने दोकिशोर बच्चों और अपने पति को नजरअंदाज करके इस दुनियाँ से कूच कर गयी थी।
आत्म हत्या का निर्णय क्या इतना ही आसान होता है? उसने तब आत्महत्या नहीं की, जब दो छोटे छोटे बच्चों केसाथ घर से निकाल दी गयी थी। वर्षों उन बच्चों को लिए माँ बाप के घर रही। बहुत छोटी उम्र में उसकी शादी कर दीगयी थी। एक तो ठाकुर परिवार दकियानूसी और दूसरे कई बेटियों के पैसे वाले पिता ने पैसे वाले ही घर के बेटे कोचुना था। वह सिर्फ हाई स्कूल कर पाई थी। संयुक्त परिवार में जेठानी की राजनीति सिर्फ सीरियल में ही नहीं होती हैबल्कि आम परिवारों में अपने वर्चस्व और संपत्ति पर एकाधिकार की भावना ने घर को कुरुक्षेत्र बना दिया था। देवरको भी अपने आदेश का गुलाम बना कर उसने हदें पार कर दीं। अनु के पिता उसको बच्चों सहित बचा कर किसीतरह से वापस अपने घर ले गए।
दो साल बेटी को घर में बिठाना आज भी समाज में सिर्फ माँ बाप ही नहीं बल्कि बेटी के लिए भी शाप बन जाता है।चाहे जितना पढ़ा लिखा समाज हो, एक प्रश्न चिह्न लड़की के ऊपर ही लगा दिया जाता है बगैर ये जाने कि उसकीक्या स्थिति होगी वहाँ? जब उसने वह घर छोड़ा है। घर के दरवाजे उसके लिए बंद कर दिए गए थे। हाँ सास ससुरजरूर कभी कभी मिलने आते थे क्योंकि उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न था और उन्हें बहू और बच्चे प्यारे भी थे।

फिर एक दिन ससुर ने निर्णय लिया कि हम बच्चों को लेकर आयेंगे। सुबह गाड़ी से निकले और रात में लेकरवापस लौटे तो घर का गेट नहीं खोला गया क्योंकि उसके लिए घर में कोई जगह नहीं थी। विवश ससुर ने गाड़ीअपने छोटे भाई के घर की ओर बढ़ा ली और इत्तेफाक से वह हमारे पड़ोसी हैं और हमारे दोनों ही भाइयों के साथगहरे और घरेलू सम्बन्ध हैं। हम उनके हालात से वाकिफ थे लेकिन उनके घरेलू मामलों में हमारी कोई दखल नहींथी। अनु जब यहाँ आकर रही तो मेरे पास भी आना शुरू हो गया और बच्चे तो घर में बच्चों के होने से यही परखेलते रहते थे। धीरे धीरे सब बातों से राजदार बन गए। कुछ दिन तो चाचा के यहाँ भी ठीक से रखा फिर उसके बादयहाँ पर भी बोझ समझी जाने लगी। नौकरानी की तरह से काम करती फिर भी उसके प्रति व्यवहार बिगड़ने लगा।
एक रात उसने आवाज दी क्योंकि हमारे घरों के बीच छोटी से बाउंड्री ही थी। हम खड़े होकर बात कर सकते थे।उसके चाचा ने फरमान सुनाया कि इसी वक्त यहाँ से चली जाओ। मैं कहाँ जाऊं? आप ससुर जी को फ़ोन करदीजिये। हमने कहा कि अगर ऐसा ही हो तो मेरे घर जाओ सुबह ससुर जी को बुला लेंगे। फ़ोन उनको रात में हीकर दिया लेकिन वह सुबह आये और बहू और बच्चों को लेकर वापस उसके मायके छोड़ आये। कुल महीने वहयहाँ रही और फिर वापस।
एक परित्यक्ता का दर्द क्या होता है? उसको समाज के सामने क्या क्या देखना पड़ता है , इस बारे में मैंने उस दिनअनुभव किया। इत्तेफाक से मुझे उसके शहर जाना था , हमारे बीच इतनी आत्मीयता हो चुकी थी कि हमारा फ़ोनसे संपर्क बना रहा। जब उसको पता चला तो उसने स्टेशन पर गाड़ी भेज दी कि आप जहाँ भी जायेंगी पहले हमारेयहाँ आएँगी। जैसे ही मैं गाड़ी से उतरी वह बाहर मेरा इन्तजार कर रही थी। गाड़ी कि आवाज और किसी के आने किआहट पर शायद उसके पड़ोसी नजर रखते थे। जरा सी देर में सब अपने अपने घर के छज्जे या फिर बालकनी मेंआकर खड़े हो गए। उसने बाहर ही मेरे पैर छुए। यहाँ महत्व इस बात का नहीं कि पैर छुए बल्कि महत्व इस बातका है कि उन लोगों ने देखा कि अनु ने पैर छुए जरूर इसकी ससुराल से कोई आया है। एक बार उनके मुँह पर तालालगाने के लिए शायद ये काफी था। उसके दोनों बच्चे बड़ी मम्मी कहकर लिपट गए। वह मेरी बेटी की उम्र की तोनहीं थी लेकिन वह मुझसे काफी छोटी थी। वह पति के अनुसार भाभी ही कहती थी। रात में उनके ही घर रुकी औरउसके मम्मी पापा से मेरी बात होती रही। उन लोगों ने कहा कि किसी तरह से समझौता करवा दिया जाय। इनबच्चों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। .
(शेष)

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनाएँ बहुत सहजता से दिल को मोह लेती हैं....और गहरा असर करती हैं...अनु के बारे में पढ़ कर बस मूक हूँ ..शब्द नहीं है...क्या सचमुच वह हार गई थी... !!!

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  2. बहुत ही सुन्दर कथा!
    शायद हर घर की यही कहानी है!

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  3. क्या कहा जाये....एक परित्यक्ता का दर्द क्या होता है?

    बस!! आगे इन्तजार है...

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  4. अब तो बेसब्री से आगे का इन्तज़ार है।

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  5. ये कहानी है या सच्ची घटना ? काश कहानी ही हो ...

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  6. अनु की कहानी में एक अनुत्तरित प्रश्न छुपा है जो औरत की लाचारी के पन्नों पर समाज द्वारा लिखा गया है !
    बहुत ही दर्दनाक !

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  7. आदरणीय रेखा श्रीवास्तव जी
    नमस्कार !
    .......बहुत ही सुन्दर कथा!

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  8. औरत का दर्द आज भी वैसा ही है जैसे पहले था

    आगे की पोस्ट का इंतज़ार रहेगा

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.