रविवार, 29 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (5)

                                 नितिन के  इस तरह से मेरे जीवन में प्रवेश से मेरे जीवन में और मानसिक तौर पर हो रही उथल पुथल को मैं किस तरह से सह रहा था इस बारे में मैं किसी को बता नहीं सकता था. लेकिन उससे जुड़ी बातें और पिता से जुड़ी बातों के तार तो मन में ही जुड़ रहे थे. आज पापा की बहुत याद आ  रही थी क्योंकि वह हैं नहीं , वैसे तो दिल से हम बहुत दूर कर दिए गए थे लेकिन मन के तार कभी टूटे नहीं थे. 
                                 क्या वह सुबह मैं कभी भूल सकता हूँ, वह सर्दियों   की सुबह थी और मैं रजाई में छुपा सो रहा था . नानाजी सबसे पहले उठते थे क्योंकि पेपर चाटने   की आदत में व्यवधान न पड़े. अचानक उस दिन नानाजी के चीखने   की आवाज आई और हम सब बाहर बरामदे की तरफ भागे. नानाजी बहदवास से पेपर को देख रहे थे. कुछ बोल नहीं पा रहे थे मैंने उनके हाथ से पेपर लिया तो उन्होंने सिर्फ उस समाचार पर हाथ रख कर बताया. समाचार था = लखनऊ के डी एम प्रदीप कुमार की  सपत्नीक एक सड़क दुर्घटना में मौत " उसे पढ़कर मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया . तब ताक दीदी भी बाहर आ चुकी थी. उसने भी जब पढ़ तो बुरी तरह से रोने लगी. अन्दर का समाचार पढ़ने की हमारी हिम्मत और स्थिति ही नहीं रही. पूरी कॉलोनी के लोग घर में आने लगे क्योंकि सबको मालूम था. फिर मामाजी ने हिम्मत jutaai  और गाड़ी निकाल कर सबको लेकर लखनऊ के लिए चलने बात कही. इलाहबाद से लखनऊ तक का सफर - लग रहा था जैसे कि हम किसी अंतहीन यात्रा पर निकले हैं और फिर उसके आगे जो देखने को मिलेगा उस बारे में सोचने की bhee  स्थिति नहीं थी. हम लोग सीधे मर्चरी ही पहुंचे. तब तक पोस्ट मार्टम हो पाने की बात ही नहीं थी. बाहर कुछ उनके ऑफिस के लोग थे. ड्राईवर घायल था और अस्पताल में था. लेकिन हमें कोई नहीं janta था. वहाँ पर तरह तरह की बातें लोग कर रहे थे -
"कुछ नहीं ये तो मर्डर ही लगता है, किसी ने जानबूझ कर एक्सिडेंट करवाया है."
"वही न , जिसे देखो वही अपना काम करवाना चाहता है, पता नहीं किस ने क्या खुन्नस रखी हो मन में?"
"इतने सज्जन पुरुष की दुश्मनी तो किसी से हो नहीं सकती है."
"अगर दूसरा माने बैठा हो तो?"
"उसी का तो अंजाम लग रहा है, नहीं तो पीछे की सीट पर बैठे दोनों लोग ख़त्म और आगे की सीट से सिर्फ घायल."
"हो सकता है कि पीछे से टक्कर लगी हो."
"नहीं पीछे से नहीं लगी, ये बगल से मारी गयी है, गाड़ी के बगल का हिस्सा बिल्कुल ही क्षतिग्रस्त है."
"सुना है कि डी एम साहब किसी टेंडर के लिए सीतापुर गए थे, उनके साथ rakhee  उनकी अटैची भी गायब है."
"पता नहीं , ये क्या चक्कर है?"
"हमें तो किसी ठेकेदार की कारस्तानी लगती है., नहीं तो किसी की क्या दुश्मनी?"
                          हम सब एक किनारे खड़े थे और अलग अलग लोगों के मुँह से सबकी बातें सुन रहे थे. कानों में पड़ रही थी लेकिन अपना दिल औ दिमाग तो अभी भी कह रहा था कि नहीं पापा नहीं हो सकते हैं और नई माँ भी. यहाँ मौत जैसा सन्नाटा नहीं पसरा था. लोग अलग अलग समूह में खड़े अलग अलग बातें कर रहे थे लेकिन इतना था किसी ने भी पापा के बारे में कुछ भी गलत बात नहीं बोली थी. हाँ दबे स्वर में नई माँ के भाई के लिए जरूर लोग कुछ कह रहे थे लेकिन हमारे पास इतनी हिम्मत नहीं थी की हम उनकी बातें सुन पाते , लेकिन कान बंद भी नहीं किये जा सकते हैं.
                          आख़िर दिन में २ बजे पापा की बॉडी हमें मिली,  उससे पहले वहाँ पर नई माँ के दोनों भाई और पिता वहाँ आ चुके थे. नई माँ के बच्चे वहाँ नहीं थे. वहीं की गाड़ी से पापा और नई माँ की बॉडी को घर ले जाया गया. बॉडी को पापा के  सरकारी घर पर ही ले जाया गया था क्योंकि उनके निजी घर में तो नई माँ के भाई काबिज थे शायद उन्हीं के लिए खरीदा गया हो. नई माँ की शादी किसी साजिश के तहत ही कराइ गयी थी, उनके भाई ठेकेदार थे और फिर एक पॉवरफुल शख्स के साथ सम्बन्ध उनको भविष्य में कोई फायदा ही देने वाला था. 
                        जब पापा की बॉडी घर पहुँची तो पहले से ही सारी तैयारी हो चुकी थी, पहुँचते ही उसको ले जाने की प्रक्रिया पूरी कर दी गयी. दीदी पापा के शव से लिपट लिपट कर रो रही थी और बेहाल थी लेकिन मैं अपने को बहुत संयत किये हुए था. दीदी को मामा जी ने बहुत मुश्किल से अलग किया था. हम सब ने उनके शव पर फूल चढ़ाये और पैर छुए तो लगा कि अब ये रिश्ता बस इसी क्षण तक का है. अब हम पूरी तरह से अनाथ हो गए. न माँ और न पापा. बस हम दो ही बचे. नाना जी ने कहा कि मैं पापा को कन्धा lagaaun , नहीं तो उन लोगों के बीच हमारी उपस्थिति बिल्कुल नगण्य थी. उन्होंने हमें कहीं भी शामिल करने की जरूरत नहीं समझी. सब काम अपने हाथ से . नई माँ की १० साल की बेटी और ८ साल का बेटा भी वहीं थे. वे बुरी तरह से रो रहे थे लेकिन न वे हमें जानते थे और न हम उनके लिए कोई अर्थ रखते थे लेकिन इस समय हम से ज्यादा उन लोगों ने खोया था. हम तो माँ को बहुत पहले जब अबोध थे तब ही खो चुके थे और आज पापा को खोया है लेकिन इन दोनों ने तो अपने माँ और पापा दोनों को ही एक साथ इस उम्र में खो दिया. ये भी हमारी ही जमात में शामिल हो गए. 
                   जब पापा  का शव गाड़ी में रखा गया तो मैं उनके पैरों के पास ही बैठ गया. गाड़ी में नई माँ के भाई, नई माँ का बेटा और मैं थे. बाकी लोग आगे बैठे थे. यहाँ पर भी मुझे लग रहा था कि नई माँ के भाई पापा की बॉडी पर भी अपना हक जताना चाह रहे थे. मुझे पीछे हटा कर खुद वहाँ बैठ गए और अपने पास नई माँ के बेटे को बिठा लिया. उस समय मुझे ये कुछ समझ नहीं आया लेकिन सोचा कि ये संवेदनाएं हैं उन्हें लग रहा होगा कि इस बच्चे का अधिक लगाव है अभी छोटा है और माँ भी चली गयी. उस समय मुझे कुछ और समझने   की हिम्मत ही नहीं रह गयी थी. 
                      जब हम श्मशान   घाट पर पहुंचे तो सारी तैयारी के बाद नाना जी ने मुझे इशारा किया कि मैं पापा की अंतिम क्रिया के लिए आगे जाऊं क्योंकि उनका बालिग बेटा मैं ही था और नई माँ का बेटा अभी बहुत छोटा था. फिर मेरे रहते हुए उसको करने की जरूरत ही क्या थी? 
              पंडित जी ने कहा - "कौन क्रिया कर्म करेगा उसको बुलाइए." 
मैं आगे बढ़ गया और उनके पास जाकर खड़ा हो गया था. उसी समय अचानक नई माँ के भाई गरजे - "ख़बरदार, जो किसी चीज पर हक जताने की कोशिश की." 
            मैं सहम कर पीछे हट गया, ये तो गुंडों वाली भाषा थी. लेकिन नाना जी ने कहा, "ये प्रदीप का बेटा है , अंतिम संस्कार तो यही करेगा." 
"ए  वकील साहब अपनी वकालत अपने पास ही रखिये, यहाँ काम हमारी मर्जी से होगा." उसने नाना को भी जबाव दे दिया था.
उस समय मामा जी ने नाना जी को शांत रहने के लिए कहा और काम होने दीजिये कह कर पीछे कर लिया था. पापा का अंतिम संस्कार वैदिक रीति से नहीं उन लोगों ने आर्य समाज रीति से करवाया. इसे मैं अपना कहूं या  पापा का कि मैं अपने पापा का अंतिम संस्कार भी नहीं कर सका. और पापा अपने दो दो बेटों के होते हुए भी इस तरह से विदा किये गए. मैं उनसे दूर था लेकिन नई माँ का बेटा तो ये संस्कार कर ही सकता था. हम जब वैदिक रीति से सब काम करते हैं तो ये काम आर्य समाज रीति से करवाने के पीछे  कोई और चाल होगी. 
                                  अंतिम संस्कार के बाद हम हम लोग घर पहुंचे और वहीं रुकना चाहा तो उन लोगों ने कहा - "आप लोग जाइये, जब हवन होगा तब आइयेगा."
                          शायद पापा ने भी ये नहीं सोचा होगा कि इस तरह से उनके अपने बच्चे पराये कर दिए जायेंगे. बेटे के सबसे बड़े हक से वंचित कर दिया जाएगा. उन्हें दौलत चाहिए थी तो वे ले लेते लेकिन मुझे पापा का संस्कार तो कर लेने दिया होता. क्या सोचा होगा इन लोगों ने ? क्यों ऐसा किया? इन सब सवालों के उत्तर मेरे पास नहीं थे और न अब दिमाग कुछ सोचना चाह  रहा था बस यही कि पापा का संस्कार मैं नहीं कर पाया. 
                   जब हम वापस आने के लिए चलने लगे तो दीदी वहीं अड़ गयी - 'नहीं आशु, हम पापा के घर को कैसे छोड़ कर चले जाए? अभी पापा की आत्मा यहाँ होगी, वह रोएगी नहीं कि मेरे बच्चे इस तरह से छोड़ कर चले गए." कह कर वह फफक फफक कर रो पड़ी और मैं भी कहाँ अपने आंसुओं  को काबू कर पा रहा था. फिर भी मैंने दीदी को अपने से चिपका लिया और उसको पकड़ कर गाड़ी ताक लाया. वह वापस घर की तरफ  भागने की कोशिश कर रही थी. वहाँ पर मौजूद लोगों को अब पता चल चुका था कि हम भी उनके बच्चे हैं. लेकिन इससे क्या होता है? हमारे सारे हक तो उसी दिन ख़त्म हो गए थे जब पापा नई माँ लाये थे. 
                   फिर हम हवन के लिए आये, इलाहबाद से ४ गाड़ियाँ आयीं थीं , हमारे सारे रिश्तेदार और कॉलोनी वाले भी उसमें शामिल होने आये थे. हवन के बाद जब सब लोग चलने लगे तो घर के बाहर पहुँच गए , मैं गाड़ी में बैठने ही जा रहा था की नई माँ के भाई ने मुझे अन्दर बुलाया , वे चार पांच लोग वहाँ खड़े थे और बड़े रौब के साथ बोले - "देखो, इस घर में हम रहते हैं पहले से ही और इसे या पापा की नौकरी लेने की मत सोचना . अभी उनके बच्चे नाबालिग हैं और हम उनके गार्जियन    है. इसलिए  आप जहाँ   हैं वही रहिये    नहीं तो अच्छा  नहीं होगा. अपने बाप    का हश्र   देखे  हो."  उनके शब्द   पहले तो मेरी समझ आये लेकिन आखिरी  शब्दों  ने तस्वीर  साफ  कर दी. ये एक्सिडेंट हुआ  नहीं इन लोगों ने करवाया है और मेरी आँखों के आगे अँधेरा छाने   लगा. मैं लड़खड़ा  ही तो गया था कि उन लोगों ने थाम  लिया और मुझे बाहर ले आये. नाना से बोले की इन्हें  संभालो   बाप  के  जाने का गम  तो होता ही हैं न, अभी बच्चा  है न. " 
                             मैं आँखें  फाड़  कर उनको  देख रहा था कि कैसे गिरगिट  की तरह से रंग  बदल  रहे हैं. मैं ग्रेजुएशन     कर रहा था. फिर  माँ पापा  के साए  से दूर  मैंने भी दुनियाँ  के बहुत रंग  देखे  थे लेकिन ये रंग  कभी न देखा  था. नाना जी हम लोगों को लेकर आ गए और कहा की अब भूल जाओ  कि लखनऊ में तुम्हारा  कुछ भी है. 
                            तभी  मैंने सोचा था की पापा की नौकरी लेकर मैं क्या करता ? क्या वहाँ क्लर्क  होकर  काम करता ? एक डी एम का बेटा उसी ऑफिस में  - डूब  मरने  वाली बात होगी. वही क्षण तो था जब मैंने संकल्प  लिया था कि मैं भी पापा की तरह से आई ए एस   बनूँगा .

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (४)

           मैं फ़ोन करते करते थक गया लेकिन दीदी ने नहीं उठाया तो मैंने सोचा कि  उसको फिर कर लेता हूँ और मैंने अपने मित्र के यहाँ जाने का प्रोग्राम बनाया और निकल  गया. लेकिन क्या मन में चल रहे द्वंद्व को मैं छिपा सकता था? शायद नहीं ड्राइवर  से कुछ कह रहा हूँ और जाना कहीं और चाह रहा हूँ. फिर रास्ते देखे तो उससे मोड़ने के लिए कहता हूँ. ड्राइवर भी सोच रहा होगा कि आज साहब   को क्या हो गया है?
               पहुँच तो गया मैं उसके यहाँ और सोचा कि उसके साथ शतरंज खेल कर समय निकालूँगा. उसमें अगर लग गया तो फिर ये बातें मुझे परेशान नहीं करेंगी. कम से कम दीदी का फ़ोन मिलने तक तो मैं कुछ भी नहीं सोचना चाह रहा था.
"यार आज तो चैस खेलने का मन है, तेरा क्या इरादा है?" मैं उसके विचार जानना चाहता था.
"बढ़िया यार, निधि तो गयी है अपनी किटी  पार्टी में , मैं भी बोर ही हो रहा था." उसने अपने मन की बात बता दी.
                    हम शतरंज की बिसात बिछा कर बैठ गए, करीब दो घंटे तो मैंने यूँ ही बिता दिए और काफी तनाव  से मुक्त भी रहा. बहुत दिनों के बाद शतरंज खेली थी. जब से कॉलेज छूटा तब से कहाँ? बस पढ़ाई और कम्पटीशन की तैयारी में ही लगा रहा. कुछ और सोचने का वक्त कहाँ मिला? पापा के न रहने के बाद ही मैंने फैसला कर लिया था कि मैं भी आई ए एस ही बनूँगा  और उसके लिए मैंने बहुत संघर्ष किया. दो बार तो सिर्फ interview में ही रह गया था. लेकिन मेरा फैसला अटल था. नाना जी चाहते थे कि मैं उनके साथ कोर्ट जाने लगूं क्योंकि मैंने तैयारी के साथ साथ law की पढ़ाई भी कर ली थी.पर मैंने सोच रखा था कि अब अगर बनाना है तो यही नहीं तो कुछ भी नहीं. वकालत तो मैं नहीं ही करूंगा फिर चाहे दूसरी नौकरी ही कर लूं. ये झूठ और सच का खेल मेरे स्वभाव से मेल नहीं खाता था.
"यार , तुम तो अब भी बहुत अच्छी शतरंज खेल लेते हो." मित्र मेरी चालों से परेशान होकर बोला.
"शायद, बहुत दिनों से खेली तो नहीं थी." मैंने भी बड़े चलताऊ अंदाज में कहा.
"कभी सोचा तुमने कि क्या ये जिन्दगी एक शतरंज की बिसात से कम है?" उसने पूछा.
"सोचने की बात करते हो, जिन्दगी की बिसात में ही फँस कर रह जाता है इंसां. बस इस घर से उस घर और उस घर से इस घर. कहीं शह कहीं मात. फिर उसकी किस्मत कि अंत में उसको क्या मिलता है." मैं पता नहीं किस रौ में बोले जा रहा था.
"अरे फिलोसोफेर महोदय, अपनी शह बचाओ." उसने मुझे टोका. मुझे  भी आश्चर्य हो रहा था कि मेरा दिमाग कहाँ था  और मैं क्या बोले जा रहा था ?
"अभी लो, अब सोचो अगली चाल." मैं तुरंत ही सतर्क हो गया.
                      अगली चाल लेता उससे पहले दीदी की तरफ से फ़ोन आने लगा. मैं बगैर ये देखे कि हमारी बाजी कहाँ चल रही है, मैंने दीदी से  कहा कि मैं घर चल कर बात करता हूँ . कहीं जाना मत और मुझे बहुत सारी बातें करनी हैं.
"यार अब चलता हूँ, मुझे घर जाना है." मैं एकदम से उठ खड़ा हुआ.
"अरे , ये क्या होता है? अभी निधि नहीं आई है और तुमने कुछ लिया भी नहीं." उसको मेरा अचानक उठ  जाना कुछ समझ नहीं आया. वह मेरी ओर विस्मय से देख रहा था.
"यार, कोई बाहर का हूँ, फिर आ जाता हूँ न, दीदी से कुछ डिस्कस करना है और उसमें बहुत देर लगने वाली है. इसलिए मैं घर जाना चाहता हूँ. कोई फोर्मलिटी की जरूरत नहीं. फिर आता हूँ न."  कह कर मैं बाहर निकाल लिया जैसे कि मैं दीदी के मिलने तक के लिए समय गुजारने के लिए ही यहाँ आया था.
                        घर पहुँच कर मैं बैडरूम में बंद हो गया , इस बात को दीदी के अलावा और किसी से शेयर भी नहीं किया जा सकता है.वह मेरी छोटी माँ मुझे हमेशा से सही सलाह देती रही है और उसकी सलाह मुझे हमेशा निष्पक्ष और न्यायसंगत लगती है. वह गलत बात स्वीकार नहीं कर सकती और न ही होने देती हटी. मेरे संघर्ष के दिनों में भी वह मेरा संबल बनी रही. आज भी जब मैं सबसे अधिक तनाव में होता हूँ तो उसको ही रिंग करता हूँ.  उससे कह कर मैं खुद को हल्का महसूस भी करता हूँ. मैं उसको रिंग करता हूँ.
"दीदी आज न मुझे न नई माँ का बेटा मिला." मैं एक सांस में पूरी बात कह गया था.
"क्या? नई माँ का बेटा, लेकिन कहाँ?" दीदी को भी बड़ा आश्चर्य हो रहा था.
"यही मेरे बंगले में माली का कम करता है."
"क्या कह रहे हो तुम? मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा है." दीदी को मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था.
"हाँ दी, मैं सच कह रहा हूँ." मैं भी उसको विश्वास दिलाने का प्रयास कर रहा था.
"लेकिन तुमने कैसे जाना की वह नई माँ का ही बेटा है?"
"सबसे पहले उसकी शक्ल बिल्कुल पापा से मिलती है, और फिर मैंने उसके बारे में सब कुछ पूछा तो साफ हो गया की ये नई माँ का ही बेटा है."
"तुमने उससे कुछ कहा तो नहीं."
"नहीं, सब जानने के बाद मैं खुद इतना टेंस हो गया था कि मुझे खुद ही कुछ नहीं सूझ रहा था और तभी मैं आपको बार बार रिंग कर रहा था."
"ठीक है, उससे कुछ मत कहना, सब कुछ पहले जैसा ही चलने दो. मैं जब तेरे पास आउंगी तो फिर बताती हूँ की क्या करना चाहिए?" दीदी की दी हुई सलाह मेरे लिए शिरोधार्य थी. और मैं इस ओर से निश्चिन्त हो गया कि वह जरूर कोई रास्ता निकालेगी.
                      मेरा  और नितिन का खून का रिश्ता तो है ही, किन्तु उसकी रगों में नई माँ का खून दौड़ रहा था और वही मुझे कुछ सोचने पर विवश कर देता है क्योंकि पापा के घर में बिताई वह आखिरी रात मैं आज भी नहीं भूला हूँ. मेरा बचपन और पापा के प्यार को उन्होंने छीन लिया था. पापा होते हुए भी वे अपने बच्चों को सीने से लगाकर सुलाने के लिए तरस गए और विधाता ने क्या किया? नई माँ के बच्चों से - जो एक आलीशन   जिन्दगी के हक़दार थे, उन्हें तो वह भी नहीं मिला जो उनका अपना था. पर मेरा अपना भी तो उनकी माँ ने छीन लिया था. मुझसे तो वह छीन लिया था जिस पर तब तक सिर्फ मेरा हक़ था. तब उनके बच्चे थे ही कहाँ?  नई माँ के कारण ही पापा का फ़ोन आना धीरे धीरे कम हो गया था और पापा  आ  भी कम ही पाते थे. नई माँ के घर वालों ने घर में डेरा जमा रखा था. हाँ पैसे भेजने में पापा नियमित थे. हम दोनों के लिए पैसे जरूर वे समय से डाल देते थे. अब पापा अक्सर रात में आते और फिर सुबह वापस हो जाते. हम भी तो अब उनसे अलग थलग रहने लगे थे. जब आते तो सिर्फ औपचारिक बातें होती पढ़ाई कैसी चल रही है? आगे क्या करने का इरादा है? कोई जरूरत हो तो बता देना आदि आदि. हम भी बड़े क्लास में पहुच चुके थे और हमारी दोस्तों की अपनी अलग दुनियाँ बन चुकी थी.अब पापा की कमी तभी खलती थी जब कि हम अपने और मित्रों के घर जाता और उनके पापा को उनके साथ देखता था. वह अपने भविष्य के बारे में उनसे बात करते थे और उन्हें गाइड करते थे. मेरे पास कोई नहीं था. नाना की सोच अपने ज़माने के अनुसार थी . 
दीदी की शादी को लेकर जो बवाल नानी ने मचाया था तब से तो लगता है कि वह एक शरणगाह है बस रहो इसलिए क्योंकि पापा ने बहुत पैसे हमारे लिए दे रखे हैं उन लोगों को. 
                      दीदी का अहमदाबाद जाकर एम बी ए करना कहाँ किसी को पसंद था? लेकिन दीदी की जिद और मेरा समर्थन ही उनके लिए एक संबल बने थे. अब हम भाई बहन एक दूसरे के निर्णय के लिए सहायक थे. फिर वहाँ दीदी की जीजू से जानपहचान और शादी का निर्णय. घर में विस्फोट ही तो हो गया था. 
"मेरे लिए मर गयी तू और फिर लौट कर इस घर में कदम रखने कि जरूरत नहीं है." नानी का ऐलान और किस में इतनी हिम्मत थी कि नानी के ऐलान को लांघ जाए. नाना से लेकर मामा मौसी सभी उनकी हाथ की कठपुतली थे. बचपन से इतना सख्त अनुशासन की मामा मामी तो क्या नाना भी उनके सामने बोलने में डरते थे.
                दीदी को बढ़िया कंपनी में नौकरी मिली थी और वह इलाहाबाद  से पुणे चली गयी. कितनी बार जीजू ने नाना से बात की, उनके घर वालों ने की और मैंने भी की लेकिन नानी पत्थर की चट्टान बन चुकी थी. नानी ने भी दीदी को बचपन से पाला था लेकिन अपने इगो  के आगे उन्हें कुछ भी मंजूर नहीं था. 
                आख़िर जीजू के घर वालों ने खुद ही सारी तैयारी करके शादी करने का निर्णय ले लिया था. जिस दिन शादी थी मामा और मामी तथा मौसी तैयार थी जाने के लिए लेकिन नानी ने ऐलान कर दिया कि जो भी जाएगा वह मेरी लाश देखेगा . उन्होंने जिद की हद पर कर दी और मैंने भी ठान लिया था कि अपनी बहन को मैं ऐसे कैसे रहने दूं कि उसको विदा भी न कर सकूं. इस दुनियाँ में अब हम दो ही हैं. अगर पापा होते तो शायद दीदी को इस तरह से शादी में अकेले न तरसना पड़ता . नानी न सही पापा तो उसकी शादी जरूर करते और उसमें शामिल होते. लेकिन पापा नहीं हैं तो क्या अगर दीदी मेरे लिए माँ बन सकती है तो मैं भी उसके लिए पिता नहीं बन सकता हूँ. मैं बगैर किसी को बताये दिल्ली के लिए रवाना हो गया  और  फिर सारी रस्में मैंने ही पूरी की.
                 मैंने अपनी दीदी को अपने हाथों से विदा किया था. ये उसकी किस्मत थी कि जीजू के घर वाले बहुत ही अच्छे लोग थे. उन लोगों ने कभी इस असहयोग के लिए बात नहीं की. बाद में वही नानी सबके सामने दस झूठ बोल कर दीदी को बुलाने लगीं. बस उनका नाटक तो शादी के लिए ही था. उनकी गैर जाति में शादी करने से नाक काट जो रही थी.

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (3)

"साब, चाय लाऊं क्या?" दयाल पूछ रहा था.
"हाँ , थोड़ी देर में ले आना."
"साब, नाश्ता कितने बजे लेंगे?" 
"आज मुझे जाना नहीं है, घर पर ही रहूँगा और यहाँ के और ऑफिस के लोगों से जान पहचान करूंगा." मैंने उसको बता दिया था कि मैं घर पर ही हूँ. अभी मुझे आये कुछ ही दिन हुए है, पहले तो गेस्ट हॉउस में रहा जब बंगला खाली हो गया तो सामान मंगवा कर यही शिफ्ट हो गया. अभी सबसे मेरा ठीक से परिचय भी नहीं हुआ था. बस चौकीदार और खानसामा दयाल से ही अधिक साबका पड़ता है इस लिए उनको जानता हूँ. 
                      आज मैं सबसे परिचित होना चाहता हूँ कि जो मेरे लिए काम करते हैं वे कैसे हैं? उनके घर परिवार के लोग क्या हैं? काम से काम उनको नाम से तो बुला सकूं. यहाँ भी सभी के परिवार हैं. इस बंगले में रहने वालों के बच्चे यदा कदा बाहर नजर आ जाते हैं और फिर कोई उनको डपट कर अन्दर कर लेता है  कि साहब गुस्सा होंगे. यही सोच कर कि सबसे पहचान हो जाये और सब मुझे भी पहचान लें.
                    उठने में बड़ा आलस आ रहा था लेकिन अभी दयाल चाय लेकर आ जायेगा और मैं बिस्तर में तो अच्छा नहीं लगता है . फिर नानी ने बचपन से आदत डाल रखी थी कि कोई भी बगैर नहाये नाश्ता भी नहीं करेगा. इसलिए सुबह तो जल्दी ही सारे काम से फ्री हो जाता हूँ फिर उसके बाद कुछ भी करो.
                दयाल चाय लेकर आ चुका था और मैं बाथरूम से बाहर आ रहा था. वह कुछ देर ठिठका कि शायद साहब कुछ कहें. मुझे उसको बताना भी था कि आज सबसे परिचय का दिन है.
               "दयाल जी, आज मैं नाश्ते के बाद बाहर लॉन में बैठूंगा और इस बंगले में काम करने वाले सभी लोगों से मिलूंगा. सिर्फ लोगों से ही नहीं बल्कि उनके परिवार वालों से भी. मुझे पता होना चाहिए कि यहाँ कितने लोग रहते हैं और कौन क्या करता है?"
"साहब कितने बजे तक?"
"मैं ११ बजे तक तैयार हो जाऊँगा और आप सभी लोग उसी समय आ जाए."

"ठीक है साहब मैं सबको बता देता हूँ." कह कर दयाल चला गया.    
  
                               *                            *                              *                              *                             *


                         ११ बजे जब मैं लॉन में पहुंचा तो सभी लोग वहाँ थे और अपने अपने परिवार के साथ अलग अलग बैठे थे. उन सब को देख कर लग रहा था कि इस बंगले के परिसर में कितने सारे लोग रहते हैं? शायद ये एक कमरे में ही रहते होंगे या फिर और कुछ जगह होगी और मेरे लिए इतना बड़ा बंगला और रहने वाला सिर्फ मैं? ये भी तो अपनी अपनी किस्मत होती हैं.
"दयाल जी, आप सबसे पहले आइये." मैंने दयाल को ही बुलाया.
"जी साब," और दयाल अपने परिवार के साथ आ गया , उसके साथ उसकी पत्नी , एक बड़ी बेटी जो करीब १५ साल कि होगी और २ उससे छोटी थी.
"हाँ सबसे हमारा परिचय तो कराइए."
"साब, ये हमारी घरवाली मीना, ये बड़ी बिटिया शालू, और ये दोनों जुड़वां है कम्मो और मम्मो." 
"बिटिया कहीं पढ़ती है?"
"हाँ , साहब नगर पालिका के स्कूल में पढ़ रही है नवे क्लास में."
"ये तो अच्छा है, ये छोटी वाली?"
"ये अभी नहीं जाती हैं, बड़ी बहन ही घर में पढ़ा देती है."
"इन्हें भी जाना चाहिए, अब बड़ी हो गयीं , इन्हें भी भेजिए स्कूल."
               ठीक है, अब और लोगों को भेज दीजिये. फिर अगला व्यक्ति आया उसके साथ उसकी पत्नी भर थी.
"साब मैं राम किशोर बंगले में माली का काम करता हूँ और ये मेरी पत्नी किशोरी."
"अरे वाह राम किशोर जी की पत्नी किशोरी क्या संयोग मिला है." मैं ये चाहता था कि इन सब के मन मैं मेरे प्रति कोई डर न रहे अपनी बात और तकलीफें ये मुझे खुल कर बता सकें. मुझे अपना अफसर समझने के साथ साथ एक हमदर्द भी समझें.
"साब मैं शम्भू और ये हमर घरवाली परबतिया. इ हमार बिटवा चैन और बिटिया राहत."
"अरे वाह शम्भू  जी यहाँ तो बड़े अच्छे लोग हैं. शम्भू को मिली हैं पारवती जी और बेटे बेटी चैन और राहत." मैंने सबके लिए कुछ न कुछ सोचा रहा था और यहाँ अजीब संयोग भी देख रहा था.
                   फिर और भी कई लोगों से मेरा परिचय हुआ और अंत में आया एक सबसे काम उम्र का लड़का, उम्र उसकी होगी कोई बीस साल और उसका चेहरा देख कर तो मैं चौंक ही गया - वहा माली का काम करता था. इस उम्र में माली का काम कुछ समझ भी नहीं आ रहा था और फिर ये उम्र तो पढ़ने लिखने कि होती है. क्या ये सारा जीवन इसी तरह से माली ही बना रहेगा. 
वह अपना काम कर रहा था , जब सब लोग चले गए तो दयाल ने उसको ही बुलाया - "अरे नितिन , अब तुम भी आ जाओ, सब परिवार वाले तो मिल लिए साहब से अब तुम अकेले तो अकेले में ही मिलो. " दयाल जी अपने काम में लग गए.
वह मेरे सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया , वह देखने में किसी संभ्रांत परिवार का लग रहा था. उसका रहन सहन और पहनावा सबसे किन्तु माली का काम कुछ मेरे समझ नहीं आया और सबसे अधिक समझ नहीं  आया उसकी सूरत बिल्कुल पापा जैसे थी. पता नहीं मन में कितनी उथल पुथल मच गयी उसको देख कर.
"हाँ, बताओ अपने बारे में." वह चुप खड़ा था तो मुझे ही उससे पूछना पड़ा.
"जी, मेरा नाम नितिन है और मैं यहाँ माली का काम करता हूँ." यह कह कर वह चुप हो गया.
"पढ़ाई नहीं की, इस  काम में क्यों लग गए?" 
"पढ़ाई शुरू तो की थी , लेकिन फिर नहीं पढ़ सका."
"कहाँ के रहने वाले हो?
"पहले लखनऊ में रहता था और पापा के न रहने पर पुरवा चला गया था नाना नानी के पास."
"तुम्हारे पापा क्या करते थे?"
"जी, आई ए एस अफसर थे." मुझे किसी ने ऊपर से नीचे लगा कर पटक दिया था. ये लड़का क्या कह रहा है? किसी आई ए एस का बच्चा माली का काम करेगा.
"क्या नाम था तुम्हारे पापा का नाम."
"स्व. प्रदीप कुमार माथुर." उसके मुँह से ये नाम निकला और मेरे पसीना छूट  गया क्या ये नई माँ का बेटा है, लेकिन यहाँ कैसे ? क्या हुई सारी जायदाद , पापा की सारी प्रोपर्टी कि ये माली का काम कर रहा है.
"तुम्हारे घर में और कौन है? तुम्हारी माँ भाई बहन?"
"माँ भी नहीं है, बहन है उसकी शादी हो गयी है."
"अच्छा अब तुम जाओ." यह कर कर मैं उठकर अन्दर चला आया. मैं अपने को संयत नहीं कर पा रहा था. ये नई माँ का बेटा इस तरह से कैसे हो सकता है? लेकिन मैं अभी उससे कुछ भी जानना नहीं चाहता था और पापा का नाम सुनकर मेरे दिमाग की सारी नसें फटने लगीं थी. इतना अधिक तनाव हो रहा था कि कल से मैं किन सुखद और दुखद स्थितियों से खुद को गुजरता हुआ देख रहा था और उनके साथ सामंजस्य स्थापित कर खुद को सामान्य करने की कोशिश में लगा था फिर एक और विस्फोट हो गया. जिसकी आवाज किसी ने नहीं सुनी और उसकी त्रासदी किसी ने नहीं देखी लेकिन ये मैंने जो देखा और सहा उसके लिए मैं क्या करूँ.? 
उसी बाप का बेटा मैं यहाँ पर अफसर और उसी बात का दूसरा बेटा माली , लेकिन मैंने उनके साथ एक दिन तो क्या एक पल भी नहीं गुजारा था तब हमको क्या लेना देना होना चाहिए. नई माँ ने जिस तरह से हमें पापा से अलग करके पापा को हमसे छीन लिया था फिर ईश्वर ने कुछ बुरा तो नहीं किया. हम कितने रोये थे और कितना तडपे थे उस दिन तो पापा भी बहुत रोये थे जब हमें वहाँ से भेज रहे थे. नई माँ तो बाहर तक निकाल कर नहीं आयीं थी. 
'पर इससे क्या? इसमें इन बच्चों का क्या दोष?''
क्यों दोष क्यों नहीं? अपनी माँ के किये का फल ईश्वर ने उन्हें यहीं दे दिया.'
'लेकिन वो माँ तो नहीं है और इन बच्चों का क्या कुसूर है? '
'कुसूर हैं न कि ये ही वो हैं जिनके मिलने पर पापा का प्यार हमसे कम हो गया था. और उस प्यार जिसपर हमारा भी थोड़ा सा हक था वह भी ख़त्म हो गया था'
'इसके लिए सिर्फ ये बच्चे दोषी हैं, पापा नहीं थे उनको भी तो अपने बड़े bachchon के प्रति अपनी फर्ज को नहीं भूलना चाहिए था.'
. फिर मैं क्या करूँ? किससे पूंछूं ? नाना नानी से , मामा मामी से या मौसी से? नहीं किसी से भी नहीं किसी का भी मन इन लोगों के लिए सहानुभूति नहीं है और मेरा मन - मुझे नहीं मालूम इस लड़के के चेहरे को देखा तो पापा का चेहरा ही सामने खड़ा है, बिल्कुल पापा की तरह से इसकी शक्ल है. 
                     फिर मैं किससे पूंछूं कि मैं क्या करूँ? कैसे उबरुं  इस तनाव से और कैसे इस लड़के को यहाँ देख सकता हूँ.  हाँ दीदी से बात कर सकता हूँ वह ही मुझे सही सलाह दे सकती है. पर दीदी भी अभी घर पर ही होगी और उससे खूब सारी बाते पूँछ लूँगा. दीदी को फ़ोन मिलने कि कोशिश कर रहा हूँ और फ़ोन नहीं उठ रहा है. हो सकता है कि कहीं काम में लगी हो या बात रूम में थोड़ी देर बाद फिर करूंगा. आज छुट्टी तो उसकी भी होगी. 
                                                                                                                                   (क्रमशः)

रविवार, 22 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (२)

                  डिनर से लौटते लौटते बहुत देर हो गयी. कालेज टाइम का दोस्त था उसका परिवार बस चुका था फिर भी ऐसा लगा नहीं कि मैं उससे बहुत दिनों के बाद मिला हूँ. पुरानी पुरानी बातें याद करके हम सब हँस रहे थे. उसकी पत्नी भी बहुत अच्छी थी. बहुत जल्दी ही हमें अपने परिवार के सदस्य की तरह स्वीकार कर लिया.
"यार मलय जब भी समय खाली हो तो चला आया कर." नितीश ने कहा.
"हाँ भाई साहब हम भी तो अकेले ही रहते हैं, आप आ जायेंगे तो हमारा भी समय बढ़िया काट जाएगा." अब बारी उसकी पत्नी की थी. 
"हाँ , सोच तो मैं भी यही रहा हूँ, क्योंकि यहाँ मेरा कोई और तो बैठा नहीं है. ऑफिस से फ्री हुआ तो बस यार दोस्तों का ही सहारा रहेगा." मैं उन लोगों को इस बात से आश्वस्त करके रात १२ बजे घर पहुंचा.
                सारे नौकर सो चुके थे सिर्फ चौकीदार  जाग रहा था. अन्दर जाकर देखा तो बैडरूम सही ढंग से तैयार था और मैं हाथ मुँह धोकर बिस्तर में लेट गया. बिस्तर में लेट जाने से ही तो आदमी सो नहीं जाता. मुझे नींद नहीं आ रही थी.  पहला दिन हर किसी जगह तो अच्छा नहीं लगता और जगह बदलने से नींद भी तो नहीं आती है. मेरा दिमाग फिर उन्हीं सब बातों में भटकने लगा   ---- मैं और दीदी नाना नानी के पास चैन से रहने लगे थे. जब पापा किसी काम से आते तो हम लोगों के पास जरूर आते और एक दो  दिन रुक कर वापस चले जाते. हमारे खर्च के लिए पापा पैसे हर महीने बैंक में डाल देते . हम लोगों को किसी भी बात की कमी न थी. वैसे हमारे नाना और नानी भी बहुत सम्पन्न थे फिर भी पापा को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास रहे इसलिए उन्होंने कह रखा था की बच्चों के लिए  कुछ पैसा हर महीने बैंक में डाल दें.
                  अचानक एक दिन पापा का फ़ोन आया की वे शादी कर रहे हैं - नानी ने तब बहुत बखेड़ा खड़ा किया था. मम्मी के न रहने के बाद पापा ने तीन साल तक  अकेले रह कर जीवन जिया इसके बाद हमारी दादी का भी निधन हो गया और पापा बिल्कुल अकेले रह गए. हाँ मीना मौसी अब भी उनके घर में खाना आदि के लिए रहती थीं. नाना नानी के बवाल मचने से कुछ नहीं हुआ पापा का निर्णय तो अपना निर्णय था और उन्होंने अपना फैसला सुना दिया था. नाना नानी को हम लोगों का भविष्य खतरे में पड़ता नजर आया होगा तो उन्होंने पापा के सामने ये शर्त रखी कि वे हम लोगों के नाम कुछ लाख रुपये फिक्स कर दें . पापा ने उन्हें लाख समझाया कि ये हमारे बच्चे हैं और इनकी मेरी जिम्मेदारी है. सब अच्छी तरह से सेट होते ही मैं अपने बच्चों को अपने साथ ही रखूंगा. लेकिन नाना नानी नहीं माने उन्होंने हम दोनों के नाम पैसा जमा करवा ही लिया. 
                   पापा ने अपनी शादी में किसी को नहीं बुलाया. उन्होंने सिर्फ कोर्ट में शादी की थी. जिनसे शादी हुई उनके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. शादी के बाद पापा नयी माँ को लेकर नाना के घर आये थे और नानी से कहा कि अब मंजू की जगह ये ही आपकी बेटी है और बच्चों की माँ. नानी ने तो उन्हें अपनी बेटी स्वीकार कर लिया था. उनकी जाते समय उसी तरह से विदाई की जैसे बेटी कि होती है. पर नई माँ को शायद ये अच्छा नहीं लगा क्योंकि उनकी कुछ अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली थी और इस के बाद ही नानी ने सोच लिया था कि बच्चों को वह पापा के पास कभी नहीं भेजेंगी.
                    पापा के फ़ोन उसी तरह से आते रहते थे. उनका प्यार हम लोगों के लिए वही था. लेकिन वह नई माँ को तो विवश नहीं कर सकते थे. ये जरूरी नहीं था कि वे पापा के साथ उनके बच्चों को भी स्वीकार कर लें. पापा कि शादी के  दो साल बाद उस साल गर्मियों की छुट्टी में पापा हमको  अपने साथ ले गए. नई माँ को कुछ अच्छा नहीं लगा. पापा हम लोगों को घुमाने ले जा रहे थे. नई मम्मी एक दो बार हमारे साथ गयीं लेकिन फिर बहाना कर देतीं. ऐसा नहीं कि पापा उनकी इस बेरुखी को नहीं पहचान रहे थे लेकिन वे हमें इस बात का अहसास न हो इसलिए हम लोगों पर पूरा ध्यान देते थे. कभी पिकनिक कभी हिल स्टेशन और कभी क्लब ले जाते . हमें सिर्फ पापा कि वजह से वहाँ अच्छा लग रहा था और अगर पापा के अलावा मैं और दीदी अकेले होते तो शायद नहीं रह सकते थे.  पापा ने सोचा था कि पहले नई माँ बच्चों के साथ हिल मिल जाये तो फिर वे यहीं ले आयें. एकदम  से नहीं लाना चाहते थे क्योकि नई माँ और हम लोगों के बीच पनपने वाले रिश्ते की गहराई भी तो मापनी थी उनको. 
           और फिर एक रात वह भी आई जब कि वह और दीदी डिनर करने के बाद सोने चले गए. हम लोगों को नीद नहीं आ रही थी तो हंम लोग लूडो खेलने लगे. काफी रात हो गयी होगी कि पापा के बैडरूम से तेज तेज आवाजें आने लगीं --
"मुझे तुम्हारे बच्चों का यहाँ रहना बिल्कुल पसंद नहीं है."
"क्यों  वे गर्मियों में ही तो आ जाते हैं, तुम्हें क्या परेशानी है?"  पापा का स्वर बड़ा ही संयत था. 
"मुझे परेशानी ही परेशानी है - मैं इनको बर्दास्त नहीं कर पा रही हूँ." नई माँ खीज रहीं थी.
"उनको मैं  entertain  करता हूँ, तुम्हें दखल देने की जरूरत नहीं है." 
"तुम कहो तो मैं खुद यहाँ से चली जाऊं , फिर तुम रहो और तुम्हारे ये बच्चे."
"हाँ, जा सकती हो लेकिन ये सोचकर जाना कि फिर कभी इस घर में नहीं आ सकती हो." पापा का स्वर गुस्से में लग रहा था.
"हाँ , हाँ, मुझे तो तुमसे शादी करनी ही नहीं थी, वो तो मेरे घर वालों ने तुमसे अपने बनते कामों के लिए मेरी बलि चढ़ा दी." 
                       और फिर पापा चुप हो गए और आवाजें आनी बंद हो गयीं. मैं और दीदी बहुत बड़े न थे लेकिन दीदी सायानी हो गयी थी. हम लोग इस के लिए अपनी बुद्धि के अनुसार हल खोजने में लग गए. हम लोगों ने सोचा कि अगर वाकई नई माँ पापा को छोड़ कर चली गयीं तो पापा फिर अकेले हो जायेंगे. हम लोगों को तो नाना नानी का घर है ही और फिर हमको यहाँ कितने दिन रहना होगा. इससे तो अच्छा ये होगा कि हम लोग अभी ही नाना के यहाँ लौट जाएँ और फिर कभी यहाँ न आयें. पापा तो हम लोगों से मिलने आते ही रहेंगे. 
                     सुबह ब्रेकफास्ट पर सिर्फ पापा और हम  लोग थे, मीना मौसी ने सब कुछ तैयार करके लगा दिया था. नई माँ नाश्ते के लिए नहीं आयीं थी. पापा का खामोश चेहरा यह बता रहा था कि पापा बहुत तनाव में हैं.
       बात दीदी ने शुरू की - "पापा , हमें रमेश अंकल के साथ वापस भेज दीजिये."
"क्यों? अभी तो काफी छुट्टियाँ बाकी हैं " पापा दीदी के बात सुनकर चौंक गए थे. उनको कहाँ पता था कि उनकी सारी बातें हम लोगों ने सुन ली हैं. हमें भी पापा से उतना ही प्यार है जितना कि पापा को हम लोगों से.
"अभी अभी तो तुम लोग आये हो, अभी हम ठीक से साथ रह और घूम भी नहीं पाए हैं कि तुम लोग जाने की बात कर रहे हो. पापा को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था.
"इस बार हम लोग अपना होम वर्क करके नहीं आये हैं और न ही साथ लाये हैं - अभी कम्प्लीट भी नहीं हुआ था. फिर हम उसको पूरा भी नहीं कर पाएंगे." दीदी ने बात को बड़े चतुराई से मोड़ कर जाने के लिए वजनदार कारण पापा के सामने प्रस्तुत
कर दिया.

"हाँ, आशु तुम्हारा क्या कहना है?" पापा ने मेरी ओर मुखातिब होकर पूछा .
"हाँ पापा दीदी ठीक कह रही है, इस बार हम लोग पूजा की छुट्टियों में आ जायेंगे." मैंने भी तो दीदी की बात की पुष्टि कर दी थी.
                 फिर पापा तैयार हो गए . मीना मौसी ने हमारी तैयारी कर दी और हमें गले लगा कर विदा किया. पापा ने रमेश अंकल के साथ हमारे जाने की तैयारी पर मुहर लगा दी. जब हम लोग चले तो पापा के चेहरे की वह उदासी और गीली आँखें हम दोनों से छिपी नहीं रहीं और अंत में पापा गाड़ी में बिठाते वक्त हम लोगों को गले से लगा कर रो पड़े. पापा के उस दिन के दर्द को हम दोनों ने भी  सहा था. नई माँ कमरे से बाहर निकल कर नहीं आयीं थी. ये बात हमने नाना नानी को नहीं बताई थी लेकिन मीना मौसी ने फ़ोन पर मेरी मौसी को बता दी.
                      फिर हम पापा के पास रहने के लिए कभी नहीं गए . पापा जरूर जब भी टाइम मिलता हमसे मिलने आ जाते थे. कई सालों तक ये सिलसिला चला और फिर उसके बाद पापा को भी नई माँ से एक बेटा और एक बेटी मिल गए और पापा का प्यार भी दो की बजाय चार में बाँट गया . फिर वे दो जो चौबीस घंटे उनके साथ रहते थे , स्वाभाविक है की उनका पापा के प्यार पर अधिकार ज्यादा  ही होगा . फिर पापा का ट्रान्सफर लखनऊ हो गया और उन्होंने वहीं पर एक मकान भी खरीद लिया. जब गृह प्रवेश किया तो हम लोगों को यानि नाना नानी, मामी और मौसी सबको बुलाया था. वे बहुत खुश थे लेकिन नई माँ के घर वाले मुझे जरा से भी अच्छे न लगे, सब लोग गुंडे मावली लग रहे थे किन्तु हमको कुछ लेना देना तो था नहीं सो हम लोग गृह प्रवेश के बाद अपने घर वापस आ गए. 
                   पापा हम लोगों का खर्च बराबर डाल देते थे लेकिन अब उनका आना काम हो गया था. हो सकता है की नई माँ के कारण न आ पाते हों. मीना मौसी से ही पाता चलता था की उनके घर वाले डेरा डाले रहते थे इस लिए पापा ने गृह प्रवेश के बाद भी अपना सरकारी बंगला नहीं छोड़ा . वे परिवार के साथ वही रहते थे और नई माँ के भाई वगैरह इस नए घर में.
                सोचते पता  नहीं कब नींद आ गयी ये पता ही नहीं चला,. सुबह जब बैड टी के लिए पूछने के लिए नौकर आया तो लगा कि सवेरा हो चुका है.

शनिवार, 21 अगस्त 2010

कौन कहाँ से कहाँ?

          मेरी  पोस्टिंग उन्नाव में हुई सिर्फ इस जगह के बारे में सुना ही था. यहीं पर मेरा जन्म हुआ था और संयोग देखिये कि सिर्फ जन्म भूमि ही नहीं बल्कि वह जन्म स्थल भी वही मिला . जिस घर में पैदा हुआ और फिर वहीं आकर उस सीट पर बैठने का संयोग मिला जहाँ कभी मेरे पापा बैठते होंगे. आज मुझे बहुत ही रोमांचक लग रहा था. वही जगह जहाँ पापा बैठे लेकिन क्या उन्होंने कभी ये सोचा होगा कि उनका जो बेटा इस जगह पैदा हुआ है किसी दिन उसी घर में उसी जगह आकर बैठेगा. शायद नहीं क्योंकि ये संयोग तो हजारों नहीं लाखों में हुआ करते हैं.
            अपने जन्म की कहानी तो मैंने नानी के मुँह से ही सुनी थी. मौसी बताया करती थी कि मम्मी बहुत सुन्दर थी और पापा से उनकी शादी तो एक बहुत ही अच्छा संयोग था. सबको मम्मी के भाग्य से बहुत ईर्ष्या होती थी , कितना अच्छा लड़का मिला वह भी आई ए एस और फिर पहले घर में लक्ष्मी आई यानि कि दीदी पैदा हुई थी और फिर उसके बाद पापा का प्रमोशन उसके दो साल के बाद मेरा जन्म होना तो जैसे ईश्वर ने सारी मुँह मांगी मुराद पूरी कर दी थीं. दोनों घरों में खूब खुशियाँ मनायीं गयीं थी.  पता नहीं किस मुँह जले  कि नजर लग गयी और फिर मम्मी को मेनिन्जाइतिस हुआ और फिर उनको बचाया नहीं जा सका.  मैं तब तो बहुत ही छोटा था शायद तीन साल का रहा होऊंगा और दीदी थी ५ साल की. दोनों ही दूसरों की  दया पर निर्भर हो गए. हमारे घर में एक मीना मौसी थी जो कि मम्मी से साथ ही नानी के घर से यहाँ आयीं थी, हमको देखने के लिए. ऐसा कब तक चलता - पापा को कभी बाहर और कभी देर रात तक मीटिंग में रहना होता तो मैं और दीदी शायद बहुत रोते थे. नाना ने पापा को मना कर हम लोगों को अपने पास ले जाने का निर्णय ले लिया और हम फिर नाना के घर चले गए.
                         नौकर गाड़ी से सामान उतार रहे थे और अन्दर लाकर लगाने के लिए बार बार पूछने लगते तो मेरे विचारों का तारतम्य टूट जाता और   लगता कि मैं वहीं जीता रहूँ.
"साहब , ये सामान कहाँ लगा दूं?" अर्दली ने पूंछा  तो तन्द्रा टूट गयी.
"हाँ क्या पूछा तुमने? मैंने उससे फिर से पूछा.
"ये सामान साहब  कहाँ लगेगा?"
"इसको अभी पीछे कि लॉबी  में रखवा  दो फिर बाद में लगाते  रहना."
               मैं अपने बचपन के बारे में सोचते ही रहना चाह रहा था , लगा रहा था कि मैं फिर शायद मम्मी की गोद में यहाँ बैठा होऊंगा और दीदी के साथ यहाँ खेला होऊंगा और फिर सब कुछ ख़त्म हो गया. पापा का साथ छूट गया. नाना के साथ चला गया. नाना नानी ने मम्मी और पापा का प्यार ही दिया लेकिन पापा के आगोश में खेलने का अहसास कब मिला मुझे? माँ के आँचल की तपिश , ममता की छाँव तो कहीं दूर छूट गयी और फिर कभी नहीं मिली. दीदी ने जरूर मम्मी की तरह से मुझे प्यार दिया. वह मुझसे ३ साल ही  तो बड़ी थी  लेकिन उसने अपनी गोद में वह अहसास दिया था. सिर पर माँ के साए न होने के अहसास को उसने होने नहीं दिया. मेरी छोटी सी माँ ही तो बनी रही - अपना बचपन उसने कब जिया? पता नहीं मुझे तो वह बड़ी ही लगी जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ वह सदा मुझसे बड़ी ही तो रहेगी. माँ को नहीं देखा उसको ही तो देखा है और समझा है. यहाँ तक पहुँचने में भी उसी ने मुझे उंगली पकड़ कर सहारा दिया है, दिशा निर्देश दिया है. मैं उसके बाद किसी का ऋणी नहीं.
"साब, खाना क्या बनेगा?" कुक ने आकर पूछा
"क्या?" मैं विचारों में झटका लगा तो धरा पर आ गया.
"देखो, मैं तो नहीं खाऊंगा, मेरा कहीं और खाना है. तुम लोग जैसा चाहो कर लो." 
"ठीक  है  साब ." कह  कर  वह  तो  चला  गया लेकिन मेरा मन तो इस घर के एक एक जगह को देख कर ये सोच रहा था की इसमें कहाँ पापा मम्मी की फोटो लगाऊंगा और पहले कहाँ लगी होगी? कहाँ माँ पापा बैठकर बातें करते होंगे और मैं और दीदी इसी घर में दौड़ दौड़ कर  खेलते होंगे. फिर क्यों मुझे इसी घर में भगवान लाया है ? यहाँ अकेले रहना क्या मुझे बुरा नहीं लगेगा, हर जगह मुझे नहीं रुलाएगी. अब मैं बच्चा नहीं हूँ, लेकिन मन क्या कभी अपने अतीत और वह भी एक अधूरे अतीत से विलग रह पाता है. वह अतीत जो मुझे ईश्वर ने देकर मेरा बचपन छीन लिया. न माँ के आँचल में मचला , न पापा की बाहों में झूला , कभी जिद भी नहीं कर पाया. दूसरे घर में रहने का अहसास कभी नहीं हुआ लेकिन वो खालीपन भी कभी भरा नहीं जो अपने दोस्तों को स्कूल से निकलते समय माँ को बैग दे देना और खुद झूमते हुए जाना, पापा के पीछे बैठकर दोस्तों से हाथ हिलाते हुए जाना. पापा के संग कभी कभी स्कूल आना. कुछ भी तो नहीं जिया मैंने. बस बचपन से सीधा बड़ा हो गया. कुछ करने और बनने की चाह ने समय से पहले ही बड़ा बना दिया.
"साब , बाहर कोई गाड़ी आई है?" माली ने आकर मुझे जगा दिया.
"अच्छा बोलो मैं आ रहा हूँ." कह कर मैं उठकर बाथरूम में जाकर अपनी आँखों में बसी  यादों को धोकर ही कहीं जाना चाहता था, कहीं आँखों में बसी ये यादें चुगली न कर दें.
                     मुझे अपने एक दोस्त के यहाँ लंच पर जाना था. वह भी यहीं पोस्टेड था. मैं यह भी सोचकर खुश था की चलो कोई तो यहाँ अपने जान पहचान  का मिला. ओफिसिअल रिश्ते तो औपचारिक होते ही हैं. मैं अपनेपन के रिश्तों कि तलाश में घूमता रहता हूँ. कहीं वो माँ वाला प्यार - पापा वाला दुलार मिल जाये तो उसको कस के पकड़ लूं. सब कुछ तो मिला नाना नानी , मामा मामी, मौसी से किन्तु ये अहसास पाता नहीं क्यों गया ही नहीं है? ये खालीपन का अहसास मेरे मन के किसी कोने में आजतक बसा है.
                                                                                                                                         (क्रमशः)



          

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

नियति के थपेड़े! (अंतिम कड़ी)

"विनोद के साथ शादी होने के नवें महीने ही मैंने निधि को जन्म दिया था. उसकी सूरत एकदम सुरेश पर गयी थी. दोनों शादियों में अंतर ही कितना था? विनोद ने इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन मैं इस बात को समझ गयी थी कि ये सुरेश की ही निशानी है. जब निधि कुछ बड़ी हुई तो विनोद ने एक दिन मजाक में कहा - 'यार निधि कि सूरत न तो मेरे जैसी है और न ही तुम्हारी जैसी ऐसा तो नहीं कि ये किसी और की बेटी हो.'  मैं उस समय क्या कहती? न सफाई में और न ही गुनाह में. मैं शादी के बाद फिर कभी मायके गयी ही नहीं थी. न ही और भाई बहनों की  शादी में उन लोगों ने बुलाने की  जरूरत समझी. कभी कभी भाई साहब  जरूर ले जाते ताकि विनोद को शक न हो और मेरे लिए जाना भी जरूरी हो जाता था. "
"तुम्हें कभी इस बात का अपराध बोध नहीं हुआ?" मैं उसके मन की बात जानना चाहती थी.
"अपराध बोध किस बात का? मैंने अपनी मर्जी से ये शादी नहीं की थी. सुरेश और हमने शादी की थी तो निधि का होना मैं तो कोई गुनाह नहीं समझती थी. हाँ यह बात और थी कि वह विनोद की बेटी कहला रही थी. लेकिन ये सच भी बहुत जल्दी ही सामने आ गया. तब निधि ४ साल की थी. मेरे एक कालेज फ्रेंड भी उसी जगह पहुँच गयी थी. कभी कभी  आ जाती थी. लेकिन दिन में न विनोद होते और न ही निधि. और जो हुआ उसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था. वैसे इसमें मैं किसको दोष दूं? ये तो मेरे भाग्य के लेख थे जो मेरे लिए भुगतने जरूरी थे. एक दिन  वह  छुट्टी वाले दिन आ गयी , मैं  और  वह   ड्राइंग रूम  में बैठे  बात कर रहे थे. विनोद   निधि के साथ बेडरूम में  खेल रहे थे. निधि अचानक दौड़ती हुई मेरे पास आ गयी और निधि को देखती ही मेरी सहेली मुझसे बोली -- 'रीना , यह तो बिल्कुल सुरेश ki तरह है, कहीं ये उसकी ही बेटी तो नहीं है?'  स्वीकार करने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था लेकिन मुझे ये पता नहीं था कि निधि के साथ विनोद भी दरवाजे तक आ गया था. "
                  "उसके बाद विनोद गुमसुम रहने लगा, महीनों बीत गए मैं सब कुछ समझ चुकी थी लेकिन मैं विवश थी. मैंने अपने ४ साल के वैवाहिक जीवन में विनोद को पहली बार शराब पीते हुए देखा. इसके लिए मैं अपने को दोषी मान रही थी लेकिन मैं इसमें कहाँ तक दोषी थी? इसका निर्णय कोई दूसरा ही कर सकता है. मैंने उससे कारण जानना चाहा - 'तुम्हें आख़िर  हुआ क्या है? क्यों पीने लगे हो? कौन सा गम है?'
'ये तुम मुझसे पूछ रही हो, यही तो गम है कि तुमने मुझे धोखा क्यों दिया?' वह कम आहत नहीं था.
'मैंने कोई धोखा नहीं दिया है?' इससे अधिक कहने के लिए मेरे पास कुछ था ही कहाँ?
'निधि उसकी बेटी है, जिसे मैं जानता नहीं लेकिन जरूर किसी पाप का फल है."
"नहीं, मैंने उससे कोर्ट मैरिज की थी, निधि उसकी ही बेटी है." मेरे सामने सच बयान करके खुद को अपराध बोध से मुक्त करने का अब अवसर आ ही गया था.
"पहले क्यों नहीं बताया? मैं तुम्हें खुद ही मुक्त कर देता."
"लेकिन मैं कहीं नहीं जाना चाहती, इतने वर्षों से मैं तुम्हारी हूँ और अब तुम्हारी ही रहना चाहती हूँ."
"लेकिन मैं कैसे अपने को समझाऊं  कि तुम मुझसे नहीं किसी और से भी प्यार करती रही हो.तुम मेरी तरफ से स्वतन्त्र हो और कहीं भी जा सकती हो, यहाँ रहना चाहो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन अब हमारा कोई भी सम्बन्ध नहीं रहेगा. " विनोद ने अपना निर्णय सुना दिया था लेकिन मैं सोच रही थी कि हम इतने सालों साथ रहे हैं और एक दिन विनोद जरूर मुझे माफ कर देगा. लेकिन ये मेरा भ्रम निकला, विनोद पत्थर कि तरह से कठोर हो चुका था. उसकी पीने की सीमा बढ़ने लगी थी. और जो निधि पर अपनी जान छिड़कता था उसने निधि से बात करना बंद कर दिया.अगर कभी वह बच्ची अपनी ओर से जाकर उससे लिपट जाती तो वह बुरी तरह से झिड़क कर उसको अपने से अलग कर देता था.  उस बच्चीके अभी अर्धविकसित मष्तिष्क  पर क्या असर पड़ेगा ये सोच कर मैंने उसे देहरादून हॉस्टल में डाल दिया. "
                "इसके बाद मैंने भी उस घर को छोड़ने का फैसला कर लिया, मैं न माँ बाप के पास गयी और न ही भाई के पास - इतना अवश्य किया कि उनको एक पत्र   लिखा कि मुझे कहीं नौकरी दिलवा दीजिये. उन्होंने मुझसे ये नहीं पूछा कि मुझे नौकरी की जरूरत क्यों है? और न ही मैंने उनको बताने कि जरूरत समझी. भाग्य ने साथ दिया और मैं यहाँ आ गयी हूँ और अब कहीं नहीं जाना चाहती."
         "लोगों के बीच एक पहेली बन कर रह गयी हूँ. . कौन मेरा विश्वास करेगा? सिवा उपहास के कुछ न मिलेगा. निधि के लिए जिन्दा रहना होगा. विनोद से मुझे कोई शिकायत नहीं, ईश्वर करे कि वह किसी और से शादी करके सुखी रहे. मेरे भाग्य में तो सुख लिखा ही नहीं था. सोचती हूँ कि अगर मैं किसी गरीब घर में पैदा हुई होती तो शायद इस तरह बेघर न हुई होती क्योंकि  तब मुझे कोई सुरेश से अलग न करता. एक बड़े परिवार में जन्म लेने की सजा मैं भुगत रही हूँ - यही सौगात है एक बड़े और प्रतिष्ठित परिवार की. एक बसता हुआ आशियाँ उजाड़ कर दूसरा बसाया था और वह भी उजड़ गया."
                                इतना कह कर रीना ने कुर्सी से सिर टिका कर  आँखें बंद  कर लीं. बहुत थक गयी थी, इतना सब झेलते हुए या अपनी कहानी दुहराते हुए , कह नहीं सकती.    

सोमवार, 9 अगस्त 2010

नियति के थपेड़े !( दूसरी कड़ी )

                      हमने कॉलेज में कई साल एक साथ गुजारे थे. बी ए  के बाद मैंने एम ए और सुरेश ने एल एल बी करने की राह पकड़ी थी और हमारा यही इरादा था कि हम अपनी पढ़ाई पूरी करके ही शादी की सोचेंगे. मुझे और सुरेश दोनों को ही पूरा विश्वास था कि एकदम तो नहीं लेकिन हमारे घर वाले मनाने पर राजी हो जायेंगे और हमारे विवाह के रास्ते में ऐसी कोई बड़ी अड़चन नहीं आने वाली है. मैं अपने परिवार की सबसे दुलारी बेटी जो थी. मेरी प्रतिभा और मेरे रंग रूप पर पूरे घर को नाज था.
                    सुरेश भी अपने परिवार में सबसे बड़ा बेटा था और सबकी आशाओं का केंद्रबिंदु भी था. उसे तो पूरा भरोसा था कि अगर हम लोग शादी कर लेते हैं तो उसके घर वाले मुझे अवश्य ही अपना लेंगे. फिर भी हमें इस बात को शादी के बाद ही खुलासा करना था क्योंकि उससे पहले बताने का मतलब था कि घर में तूफान आ जाता और शादी के बाद कुछ दिन बाद सही सब लोग मान ही जाते हैं. हमें सब कुछ योजनाबद्ध  तरीके से करना था. इसी लिए एक दिन हम लोग बिना किसी सूचना के दिल्ली के लिए रवाना हो गए. सुरेश ने कोर्ट मैरिज के लिए वहाँ पहले से अर्जी दे रखी थी. हमने दिल्ली पहुँच कर सबसे पहले शादी की और फिर हम एक होटल में रुक गए. हमारा कहीं बाहर जाने का इरादा भी नहीं था. क्योंकि ये तो पता था कि घर से चले आने के बाद घर में हडकंप मच गया होगा और हमारी खोज भी हो रही होगी. फिर भी हम बेफिक्र थे कि अब हम बालिग़ हैं और हमारी शादी भी हो चुकी है. वहाँ हम लोगों ने एक हफ्ता गुजारा और फिर एक दिन पुलिस ने हमें अपने कब्जे में ले लिया और हमें हमारे शहर लाया गया. मैं और सुरेश अलग अलग कर दिए गए. मैंने लाख कहा कि हमने शादी कर ली है और वे हमारी शादी को गैर कानूनी घोषित नहीं कर सकते हैं. मेरे घर वाले बुरी तरह से बौखला गए थे, उन्हें शायद मुझसे ऐसी आशा न थी  और हमारी बातों से उनको और अधिक गुस्सा  आ  रही थी. मैं तो जैसे सुरेश के लिए पागल हो रही थी."
                   "इसके साथ ही मेरे दुर्भाग्य की कहानी शुरू हो गयी. मेरे घर वालों ने सुरेश को बहुत समझाया और धमकाया कि वह मुझे छोड़ कर कहीं और चला जाये , उसको बढ़िया नौकरी दिलवा दी जायेगी बस शर्त यही थी कि मुझे भूल जाए. लेकिन सुरेश किसी भी कीमत पर मुझे छोड़ने के लिए तैयार न था और यही मेरे अडिग विश्वास का सबसे मजबूत स्तम्भ था. पर इन पैसे वालों का कोई जमीर नहीं होता और कब किस के विश्वास के स्तम्भ को ढहा कर ये खंडहर में बदल दें, इस के लिए कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. सुरेश के खिलाफ मुकदमा कर दिया गया कि उसने मुझको फुसला कर शादी की है और वह इसके  लिए दोषी है. शहर के सारे वकील मेरे डैडी के साथ थे - कुछ जलने  वाले लोग खुश हो रहे थे कि इनकी इज्जत कैसे सड़क पर उछाली जा रही है.  सुरेश ने अपनी पैरवी खुद ही की. "
"घर में तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा था, क्या वे तुमसे इस विषय में कुछ भी नहीं कहते थे?" 
                    "घर में मुझे हर तरीके से समझाया जा रहा था -- प्यार से , धमाका कर, परिवार की इज्जत का हवाला देकर कि मैं अपना बयान कोर्ट में ये दूं कि सुरेश ने मुझे नशे की हालत में कोर्ट में ले जाकर शादी की थी. मुझे यह मंजूर नहीं था. फिर ये भी नौबत आई कि घर की दुलारी प्यारी बेटी को यातनाएं भी दीं गयीं. बाकी बहनों के जीवन का हवाला भी दिया गया. मेरे सोचने और समझने की शक्ति खो चुकी थी. सुरेश से मिल पाने का तो कोई सवाल ही नहीं था. मेरे डैडी घर बाहर कम ही निकलते थे और मम्मी जब भी मेरे सामने पड़ती मुझे कोसती हुईं - मैं पैदा होते ही मर क्यों न गयी? हमें पता होता कि तू ये दिन दिखलाएगी तो पैदा होते ही तेरा गला घोंट देते? तुझने हम लोगों को कहीं मुँह दिखाने काबिल नहीं छोड़ा है.
ये सब तो आम बातें थी. उनका बस एक ही उद्देश्य था कि मैंने कोर्ट में वही बयान दूं जो वे चाहते हैं  जिससे हमारी शादी गैरकानूनी साबित हो और सुरेश को सजा हो जाए. "
                   "मैंने ये नहीं सोचा था ki मेरा ये कदम इतना बड़ा बवंडर  मचा देगा अन्यथा इस कदम को उठने से पहले एक बार सोच जरूर लेती. मेरा ये इरादा बिल्कुल भी नहीं था और अपने घर वालों से ऐसी आशा भी नहीं थी. उनकी यातनाएं बढ़ती ही चली गयी और कुछ दिनों  में मैं टूट गयी क्योंकि उन लोगों को सुरेश को ख़त्म करने की साजिश  रचते हुए मैंने सुना था और मैं ऐसा कभी नहीं चाह सकती थी. आखिर मैंने कोर्ट में वह बयान दे दिया जो वो लोग चाहते थे और जज ने हमारी शादी को गैरकानूनी घोषित कर दिया. मैं बयान देकर वही बेहोश हो गयी थी और फिर सुरेश को आखिरी बार भी नहीं देख सकी. वह उस शहर में मेरा आखिरी दिन था."
                         "मुझे कार में डालकर वहाँ से भाई साहब के घर लाया गया. इस बीच में उन लोगों ने मेरी शादी भी कहीं तय कर दी थी और फिर क्या था मेरी शादी रातों रात कर दी गयी. ये सब उन लोगों ने पहले से ही तय कर रखा था. और एक महीने के अन्दर मेरी दुबारा शादी भी कर दी गयी."
                        "दूसरी शादी के वक्त मेरी मनोदशा को कोई दूसरा व्यक्ति नहीं समझ सकता था और मैं तो जैसे यंत्रचालित  सी हो गयी थी. जो भी हो रहा है दूसरे की मर्जी से दूसरों की ख़ुशी के लिए हो रहा है. मेरा उससे क्या सरोकार था? सिर्फ मेरा जीवन था जो की मोहरा बना कर चला जा रहा था.  मेरे पति विनोद जूनियर इंजीनियर थे और उनके परिवार में उनकी माँ  के अतिरिक्त कोई और न था. मेरे घर वालों ने शायद ऐसा लड़का इसी लिए चुना था. मैं विनोद को पति के रूप में बहुत दिनों तक स्वीकार नहीं कर पायी और जब किया तो विनोद ने परित्यक्ता बना दिया. उनका भी इसमें कोई दोष नहीं था और फिर मैं भी कहाँ दोषी थी? ये शतरंज की बाजी तो अपनी इज्जत के लिए बिछाई गयी थी और फिर उसमें शह और मात का कोई प्रश्न ही नहीं था. वे हर हाल  में सिकंदर थे."
                       "विनोद के साथ रहते हुए भी मैं अपने मन से सुरेश को भुला नहीं पाई थी. वह कोई भूलने वाला रिश्ता था. हमने अपने प्यार में कितने साल साथ गुजारे थे? फिर भी मैंने अपने दायित्वों को विनोद के प्रति पूरी तरह से निभाया था. उसको किसी प्रकार की शिकायत या फिर उपेक्षा मेरे मन में कभी नहीं रही. वह तो बस बड़े लोगों की साजिश का शिकार हुआ था. मेरे गले में पड़ी हुई ये जंजीर सुरेश के दी हुई है, जिसे पता नहीं घर वालों ने कैसे नहीं देखा? बस यही आखिरी निशानी है उसकी. अब तो बस यही कामना है की वह जहाँ भी हो खुश हो."
"क्या तुम फिर अपने घर नहीं गयीं?" मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था की कैसे एक लड़की कभी मायके गयी ही नहीं.
"नहीं, जब मन होता तो भाई साहब  लोक लज्जा के लिए अपने घर बुला लेते और फिर वही से वापस हो जाती. कभी डैडी और माँ आते तो बुला लेते लेकिन क्या मेरा उन सब लोगों से मिलने का मन होता था. नहीं वे अब मुझे अपने जन्मदाता नहीं बल्कि किसी जन्म के बैरी लगते थे."
                                                                                                                                      (क्रमशः)

शनिवार, 7 अगस्त 2010

नियति के थपेड़े !

****मेरी यह सच कहानी "साप्ताहिक हिंदुस्तान" में सितम्बर १९७८ के अंक में प्रकाशित हुई थी.****

        रीना की नियुक्ति सबसे  पहले हमारे कालेज में ही हुई . उसके भोले से चेहरे को देखकर सोचा नहीं जा सकता है कि यह लड़की अपने २८ साल के जीवन में असह्य गम झेलते हुए प्रौढ़ा बन गयी. चेहरे पर उद्वेलित गाम्भीर्य तो स्वयं ही यह चीख चीख कर कह रहा था कि इस उम्र में वह दुनियाँ के हर रंग देख चुकी है, हर गम झेल चुकी है. उसकी नियुक्ति किसी वरीयता या योग्यता के आधार पर नहीं की गयी थी बल्कि वह एक ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति की बहन थी जो राज्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. वह अपने भाई के साथ नहीं रहना चाहती थी या भाई उसे नहीं रखना चाहता था - परिणामस्वरूप भाई के प्रभाव ने उसे इस जगह तक पहुंचा दिया.
             वह शादीशुदा थी और सधवा भी क्योंकि उसकी मांग का सिन्दूर और पैर के बिछुवे इस बात की गवाही दे रहे थे - लेकिन इसका पति कहाँ है? यह सवाल सभी के मन में रह रह कर कौंध जाता था. फिर भी बड़े आदमी की बहन किसी  की हिम्मत नहीं थी कि उससे कोई सवाल पूछ ले. सुना तो यह भी है कि वह एक बच्ची कि माँ भी है जिसको उसने हॉस्टल में  डाल रखा है. उसके रहने की समस्या का समाधान भी मुझे ही करना पड़ा था. उसको मैंने अपने ही आवास में एक कमरा दे दिया था. फिर भी कई बातें मेरे भी मन में सिर उठाकर पूछ रही थीं कि इतने बड़े आदमी की बहन होकर इसको नौकरी की क्या जरूरत है? शादीशुदा है तो कभी तो पति के पास जाती , न जाती तो कभी वह ही आता? यदि वह पारिवारिक विघटन का शिकार है तो कारण क्या है? ये सारे प्रश्न हर एक के मन में उठना स्वाभाविक है. पर मन कहीं न कहीं उनके उत्तरों के लिए बेचैन हो उठता था फिर मन मार कर रह जाती.
                 मैंने रीना का सम्पूर्ण  विश्वास प्राप्त कर लिया और जब हमारे संबंध अंतरंगता की सीमा तक पहुँच गए तब एक दिन उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में मैंने एक सवाल किया था, "रीना , मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानने की  बहुत इच्छुक हूँ, लेकिन आज तक पूछ नहीं पायी."
                            इतना कहने के बाद ,मैं उसकी प्रतिक्रिया देखना चाह रही थी, रीना उस समय कापियां चेक कर रही थी. मैं उसके चेहरे पर उभरने वाले भावों को पढ़ रही थी. सिर झुकाए हुए ही उसने कहा, "पूछिए, मैं आपको सब कुछ बता सकती हूँ." उसका स्वर बुझा-बुझा सा था. वह इससे अनभिज्ञ थी कि सारे कालेज में वह एक पहेली बन कर रह गयी है.,
   "तुम शादीशुदा हो, फिर भी पति से दूर क्यों रहती हो? सर्विस तो तुम्हें वहाँ भी मिल सकती थी." मेरे इस सवाल के साथ उसने ठंडी सांस भर कर सिर उठाया और पेन बंद करके कापियों के ढेर पर रख दिया.

"मिस्टर कुमार तुम्हारे भाई हैं, उन्हीं  के साथ रह सकती हो." मैं एक एक कर के पहेली सुलझाना चाह रही थी जिससे कि वह घबरा न जाय.
"मेरे माँ-बाप, भाई-बहन सब हैं. बहुत बड़े परिवार कि बेटी हूँ, लेकिन फिर भी कोई ऐसा नहीं है, जिसे अपना समझ सकूं. किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि जो अपने साथ मुझे रख ले. शादी करके वह अपने दायित्व से मुक्त हो गए - अब किसी का कोई फर्ज नहीं है मेरे प्रति और जो दायित्व उन्होंने निभाए हैं उससे तो अच्छा होता कि वे मुझे मार दिए होते."    रीना इतने सपाट स्वरत में बोल रही थी मानो कि वह अपने नहीं किसी और के जीवन के बारे में कहानी सुना रही हो.
"ऐसा तो नहीं होता घरवालों का लड़की की शादी के बाद कोई फर्ज ही न बनता हो. जब तुम्हारे पति ने तुम्हें छोड़ा तो परिवार में किसी ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया. आखिर उनकी बहन और बेटी के जीवन का सवाल था."
"कोई क्या कहता? सब की नज़रों में मैं बहुत पहले गिर चुकी थी और विनोद को कोई क्यों कुछ कहता? उसके द्वारा मेरा परित्याग करना भी उचित ही था -- कोई भी होता तो शायद यही करता. अच्छे वक्त के ही सब साथी होते हैं, बुरे वक्त में साया भी साथ नहीं देता. अपने -अपने दुर्भाग्य को अकेले ही झेलना होता है और वह दुर्भाग्य जो मेरे घर वालों ने अपने हाथ से रचा हो. इसी तरह मेरी जिन्दगी के इस उतार चढाव में सब किनारे हो लिए. जो नियति होती है, उससे बच कर कहीं भी नहीं भागा जा सकता है."
"रीना, बड़ी अजीब बात है कि घर वाले अगर लड़की के बुरे वक्त में भी साथ नहीं देंगे तो कब देंगे?"
"कभी नहीं, जो रचा उन्होंने उसे मैं ही तो भोगूंगी, वे साथ क्यों देंगे?"  रीना का स्वर तिक्त हो चला था.
"देखो, रीना मैं तेरी बड़ी बहन जैसे ही हूँ, तुम मुझसे सब बातें शेयर कर सकती हो, इससे तुम्हें भी अच्छा लगेगा और शायद मैं भी कुछ करने की सोच सकूं." मैं उसके अतीत में झांकने कि कोशिश कर रही थी , कुछ गलत भाव नहीं था मेरा किन्तु उसके प्रति सहानुभूति जरूर थी. इतना लम्बा जीवन सिर्फ एक बच्ची के सहारे. अगर कोई न होता तो ये उसका दुर्भाग्य होता, किन्तु सब के होते हुए भी वह इस तरह से जिए तो इससे अधिक कष्टप्रद और क्या हो सकता है?
       "मैं शहर के एक बहुत प्रतिष्ठित और प्रगतिशील विचारों वाले परिवार में पैदा हुई थी. अभावों से हमारा परिचय न था. मेरे पिता शहर के नामी वकील थे. सुन्दरता प्रकृति ने मुक्तहस्त से दी थी और कालेज पहुँच कर रंगमंच रीना के बिना अधूरा था -- वही पर सुरेश से मुलाकात और परिचय हुआ. साथ-साथ अभिनय करते करते हम कब  एक दूसरे के इतने करीब आ गए पता ही नहीं चला. सारा कालेज हमारे प्रणय से परिचित था, लेकिन सभी को पूरा विश्वास था कि मेरा प्रगतिशील परिवार हमारे इस अंतरजातीय विवाह को स्वीकार कर लेगा और मुझे भी ये विश्वास था.
                                                                                                                                (क्रमशः)