बुधवार, 23 जून 2010

एक ऐसा सपना भी ! (समापन )

                            वह चली गयी और अपने कामों को पूरा करने में लग गयी. मैं भी अपने कामों में व्यस्त हो गयी. फिर एक दिन मेरी मित्र मेरे पास आई और मुझसे  बोली - 'तुम ही उसको समझाओ  न, यहाँ भी अच्छी नौकरी है, फिर उसकी शादी भी तो करनी है. हमारे लिए अभी दो लड़कियाँ और भी हैं. लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि लड़की कमाने भी लगी और शादी का नाम ही नहीं ले रहे हैं ये लोग."
                  मुझे उसकी दकियानूसी बातों और ये समाज या लोगों की दुहाई बहुत बुरी लगी. लेकिन मेरी पुरानी सहेली है और हर सुख और दुःख बांटा था हमने एक दूसरे के साथ. इस लिए उसको सही राय देना मेरा फर्ज था.

"देखो, ये लोग और समाज उनपर कटाक्ष करते हैं जो सुनते हैं. कल जब ये लड़कियाँ १८ घंटे तक पढ़ाई कर रहीं थी और वह भी एक लैम्प में - इमरजेंसी भी नहीं थी. तीनों बहनों ने मेज के बीच में लैम्प रख कर पढ़ा है , तब किसी समाज और लोगों ने पूछा था कि कैसे पढ़ रहीं है. कोई सामने आया था कि मैं इसकी व्यवस्था कर देता हूँ. नहीं न? फिर क्यों और किस लिए सुनती हो इन लोगों की बातें . फिर भी एक बार उसको समझा देती हूँ."
                     मैंने उन्हें नहीं बताया कि मैंने किस तरह से उसको सपोर्ट किया है. और फिर उसदिन वह चली गयी और हमारी हफ्तों मुलाकात नहीं हुई. फिर एक दिन उसकी बेटी आई और बोली - "मासी आप अपना चैक लगा सकती हैं."
"तुम्हारा काम हो गया?" मैंने उससे माँ के कहे हुए पर बात करने के लिए भी इच्छुक थी.
"हाँ, उतना तो हो गया सारे पेपर भी सबमिट हो गए. अभी मेरी फाइल जायेगी फिर पता चलेगा." 
"अच्छा एक बात बताओ यहाँ भी तो एक से एक अच्छी कंपनी हैं और उनके पॅकेज भी बहुत बढ़िया होते हैं फिर तुम बाहर क्यों जाना चाहती हो? " मैंने उसके विचारों को जानना चाहती थी.
"मासी , ये सब है लेकिन मैं कुछ और ही सोच रही हूँ." वह कहने में कुछ हिचकिचा रही थी.
"हाँ बताओ न , तुमने क्या सोच रखा है?"
"मासी आप जानती हैं न कि मम्मी और पापा कितने लोगों के कहने को महत्व देते हैं. उन्हें इस समाज में रहना जो है. एक दिन मुझसे कह रही थी कि कोई बेटा तो बैठा नहीं है कि कमा कर खिलायेगा." इतना कह कर वह चुप हो गयी.
"फिर, तुमने क्या कहा?"
"मैं खूब चिल्लाई थी कि क्या बेटा बेटा लगा रखा है. बेटे कौन से सोने के सिक्के कमा कर लायेंगे. लेकिन उनकी बात और मेरी बात दोनों अपनी अपनी जगह सही हैं."
"कैसे?"
"मैंने सोचा है कि मैं यहाँ से कनाडा चली जाऊँगी, वहाँ मेरे कुछ सीनियर हैं वो मुझे सपोर्ट कर रहे हैं. मुझे वहाँ जॉब मिल जायेगी. कुछ साल के बाद में छोटी को वहाँ बुला लूंगी. मम्मी पापा के पास कोई सरकारी नौकरी नहीं है और न ही कोई बड़ी सी जायदाद है कि वे बैठ कर गुजर कर लेंगे." माँ बाप के प्रति चिंता उसके शब्दों में ही झलक रही थी
"तुमने कुछ सोचा है क्या इस बारे में?" मैंने तह तक जाना चाह रही थी कि एक लड़की की सोच कितनी गहरी हो सकती है?
"हाँ अगर मैं यहाँ रहती हूँ, तो आज नहीं कल ये शादी के वबाल खड़ा कर देंगे और मुझे करनी भी पड़ेगी नहीं तो रिश्तेदारों की क्या कहूं? कल एक ने बताया कि लड़का इलेक्ट्रोनिक्स की दूकान करता है. कोई बता देता है कि कहीं क्लर्क है और कोई खेती बाड़ी बढ़िया है शहर में मकान भी है और लड़की भी तो कमा रही है." वह निःश्वास लेकर चुप हो गयी. मैंने उसके इतने कहने से ही सारा कुछ समझ लिया था. जब माँ बाप के पास पैसा नहीं होता है तो रिश्तेदार  लड़कियों के लिए ऐसे ही प्रस्ताव लाते हैं. 
"लोग कहते हैं कि देने को तो तुम्हारे पास कुछ है नहीं , कलक्टर कहाँ से मिलेगा? मौसी मैं इसी लिए यहाँ से जाना चाहती हूँ कि न मैं सामने रहूंगी और न ही ये लोग परेशान करेंगे."
"क्या शादी नहीं करोगी?"
"करूंगी न, लेकिन उससे जो न लालची हो और मेरे मानसिक स्तर का हो. पैसे वाला न हो लेकिन अच्छी सोच वाला तो हो. जब मैं चली जाऊँगी तो इन लोगों को भी वही बुला लूंगी. वहाँ पर मासी सीनियर सिटिज़न होने के बाद माँ बाप को भी बुलाने की सुविधा है और फिर उनको वहाँ की सरकार पेंशन देती है. मैं जानती हूँ कि मम्मी पापा कितने खुद्दार हैं. बेटी की कमाई शादी के बाद तो बिल्कुल ही लेना पसंद नहीं करेंगे. अगर यहाँ शादी करती हूँ तो मैं जानती हूँ कि कितना भी सही मैं अपने मम्मी पापा को उतना नहीं देख पाऊँगी जितना कि चाहती हूँ. मैं ससुराल के लोगों के विरुद्ध भी नहीं जाना चाहूंगी और पता नहीं ससुराल और घर वाले कैसे मिलें? इसी लिए वहाँ पर रहूंगी तो इन लोगों का भविष्य मेरी ओर से पूरी तरह से सुरक्षित रहेगा. उनको पेंशन मिलेगी और मेरा पूरा सहारा रहेगा. बहनों को भी वहीं बुलाकर देखती रहूंगी. "
"तुम्हारी तो लम्बी प्लानिंग है." 
"हाँ मासी, मुझे अब ये भी सोचना है कि अब इनकी आराम की उम्र  आ रही है फिर ये कहाँ तक काम करते रहेंगे? वहाँ मुझे कोई चिंता नहीं रहेगी. मैं गलत तो नहीं हूँ न?" उसने मुझसे ही प्रश्न कर दिया था.
"नहीं बेटा , तुम कहीं भी गलत नहीं हो? बहुत सही सोच है तुम्हारी. मुझे ऐसी बेटियों पर गर्व होता है." 
"मासी अगर मेरा कोई भाई होता तो वह भी ऐसे ही सोचता न, कब तक ये लोग खटते रहेंगे."
"हाँ  , बेटा वो तो करता ही ऐसा, पर तुम किस बेटे से कम हो." मेरे मुँह से निकल ही गया. 
"अब चलूँ  मुझे अभी कोचिंग भी जाना है ." कह कर वह चली गयी. 
                          उसने अपनी उम्र से अधिक सोच लिया था. सारी प्लानिंग इतने सुघड़ ढंग से की , सोचती हूँ कि कभी कोई बेटा भी ऐसा ही सोचता होगा. जरूर सोचता होगा लेकिन ऐसी बेटियां भी कितनी होती हैं कि अपने माँ बाप के भविष्य के लिए इतनो  चिंतित हों . माँ बाप बच्चों के सुखद भविष्य की कामना  करते हैं और ये अपने माँ बाप के लिए क्या क्या नहीं कर रही है. मेरा मन उस लड़की के प्रति श्रद्धा से भर उठा कि धन्य है वो माँ बाप जिन्होंने ऐसे संस्कार और सोच दी. उनके  जीवन का संघर्ष मुझे इसी क्षण सफल होता लगा कि अपने तन और मन से जुट कर उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया और इसमें कितने अपमान और कटाक्ष भी सहे किन्तु अब सब सफल हो चुके हैं. कहते हैं न की भगवान के घर देर है अंधेर नहीं.

                                               (इति)

एक ऐसा सपना भी!

               कहानियां कहाँ जन्म लेती हैं? हमारे आस पास और हमारे ही बीच में. उनके पात्र हम ही तो होते हैं. बस नाम बदले होते हैं और उनके हालत भी , बाकी सब चीजें वही होती हैं. एक परिवार, समाज , देश और उसमें पलने वाले लोग. वही इतिहास रचते हैं और वही साहित्य गढ़ते हैं. ऐसे ही लोगों में कुछ ऐसे भी जीवन देखने को मिल जाते हैं कि लगता है अरे ये तो मेरी ही कहानी है या फिर ये तो बिल्कुल उससे मिलती हुई कहानी है.
                ये आदमी के हालात की कहानी है और उन हालातों से लड़ने की कहानी भी कही सकती है. वह मेरे बहुत करीब हैं आज से नहीं ज़माने से - उच्च शिक्षित और प्रबुद्ध महिला. हाँ आज कहानी ही तो बन चुकी है उसकी जिन्दगी और इतनी रोचक कि सभी को लगता है कि ऐसे भी लोग जीते हैं. कई बार इसे पन्नों पर उतारना चाहा लेकिन हिम्मत ही नहीं हुई. पता नहीं क्या सोचें? वह न भी सोचें - उसके पति और बच्चे बाकी घर के लोग. पर आज सोचा कि उनके और उस घर में पलने वाली सोच को गढ़ ही दूं फिर पता चलेगा कि यहाँ सुघढ़, समझदार और विवेकशील और प्रबुद्ध होकर भी जीवन के रास्ते हमेशा आसन नहीं होते.
              वे तीन बेटियों की माँ - पति पत्नी दोनों ने अथक प्रयास के बाद बेटियों की शिक्षा जारी रखी. ये तो भाग्य का एक बुरा पक्ष ही कहा जाएगा कि दोनों में इतने सारे गुण और प्रतिभा हो और वे स्थापित न हो पायें. यह भाग्य की विडम्बना ही कहेंगे. कहीं उन्हें स्थायित्व नहीं मिला. इसके लिए उन्होंने कितनी मेहनत की और किन किन कार्यों को अपनाया लेकिन अपने आत्मसम्मान और जमीर को कभी नहीं बेचा.
          अपने ही बहुत सगे कहे जाने वाले लोगों के व्यंग्य का भी सामना करते रहे . उस दिन ये बात बताते हुए वह फफक पड़ी कि उनके किसी बहुत खास ने कहा - "मैं सोचता हूँ कि इनकी लड़कियों का क्या होगा?"  ह्रदय चीर के रख दिया था उनके शब्दों ने. 
                जब बड़ी बेटी का एम सी ए में चयन हुआ तो पढ़ाने के लिए अपने जो भी गहने थे बेच दिए और फिर कुछ और मेहनत बढ़ा दी. किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं, बच्चे अपने रास्ते पर चल रहे थे और उनके माता पिता उनके पीछे ढाल की तरह खड़े उन्हें सुरक्षा और साहस दे रहे थे. बेटी की तीन साल की पढ़ाई ने उनको पूरी तरह से खोखला कर दिया था. पैसे से तो बहुत मजबूत हो ही नहीं पाए लेकिन शरीर से भी अथक परिश्रम ने उन्हें कमजोर बना दिया था. छोटी दो बेटियां भी अभी पढ़ाई में लगी थी. गाड़ी धीरे धीरे चल रही थी.
                वह दिन भी आया कि बड़ी बेटी अपनी पढ़ाई पूरी करके आ गयी और उसने अपने लिए नौकरी भी खोज ली. धीरे धीरे गाड़ी  कुछ पटरी पर आने लगी. उसकी और पति की उम्र भी बढ़ रही थी और साथ ही साथ बेटी की शादी का तनाव भी बढ़ने लगा था. घर - पढ़ाई और महंगाई ने उन्हें तोड़ दिया था. ऐसा नहीं बच्चियां भी इस बात से पूरी तरह से वाकिफ थी.  कभी कोई फरमाइश नहीं की. यहाँ तक कि उनके घर में टी वी भी नहीं था. किसी के पास फुरसत ही कहाँ थी? बच्चे पढ़ाई में और माता पिता काम में. जब फुरसत पाते तो इतने थके होते थे कि नयी सुबह के लिए सोना भी जरूरी था. ये चीजें जो बहुत जरूरी समझी जाती हैं, दोपहर के सीरियल देखे बगैर तो महिलाओं का समय ही नहीं कटता है और वे सब कुछ और कर रहे होते थे.
                        बड़ी बेटी ने घर में TV लाकर रख दिया फिर भी उन लोगों को समय कहाँ था.? फिर एक  दिन वह बहुत गुस्सा हुई -
"आखिर कब तक आप लोग इस तरह से खटते रहेंगे? अब मैं कमा रही हूँ, आप लोग थोड़ा सा आराम करना भी शुरू कीजिये." 
"बच्ची है न, हमारी जिम्मेदारियों  को अभी नहीं समझती है." पिता ने धीरे से मन ही मन बुदबुदा लिया.
"हमें तो इसी तरह से करना है, कोई बेटा थोड़े बैठा है कि कमा के खिलायेगा." माँ ने अपनी शंका जाहिर कर दी.
"क्या कहा ? बेटा नहीं है, तो हम क्या काठ के पुतले हैं? जिन्हें आप घर से निकालने की सोचती रहती हैं. आइन्दा मैं ये शब्द नहीं सुनूं."  उसे बहुत तेज गुस्सा आ गया था.
                     उस दिन की बात उसके दिन में बैठ गयी कि इन्हें बेटे की कमाई से मतलब है  की  उसपर इनका पूरा अधिकार होगा और मेरा कमाना और करना इन्हें  शास्त्र  विरुद्ध  लगता है. फिर  उसने निर्णय ले लिया कि वह यहाँ से चली जायेगी. उसने विदेश में अपने सीनियर और मित्रों से संपर्क साधा और बाहर जाने का मन बना लिया. इस सिलसिले में भागदौड़ भी करने लगी. माँ बाप को इसका कारण समझ आ रहा था कि वह अधिक पैसा कामना चाहती है इसी लिए बाहर जाना चाहती है. मेरे साथ भी एक बार जिक्र किया ,  ' आपकी बात मानती है, उससे कहिये कि बाहर जाने कि बात न करे, हम यहीं जितना कमा रहे हैं उसी में आराम से रह लेंगे.'
                     मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और फिर उसकी बेटी मुझे मिली भी नहीं. एक दिन वह खुद मेरे पास आई. 
"मासी मैं ऐसा सोच रही हूँ कि मैं बाहर निकल जाऊं."
"इससे क्या होगा?" 
"इस बारे में मैं आपको बाद में बताऊंगी . मुझे आपसे एक सहायता चाहिए लेकिन ये बात अभी मम्मी पापा से मत कहियेगा. मुझे वीजा के लिए अपने खाते में ५ लाख रुपये दिखाने हैं, तभी बन सकता है - कोई २ लाख मैंने खुद जोड़ रखा है - बस १५ दिन के लिए पैसे मेरे खाते में रहेगा. अगर आप कुछ हेल्प कर सकें तो मैं आपको पोस्ट पैड चेक दे दूँगी और जैसे ही मैं स्टेटमेंट निकलवा लूंगी आप चेक लगा दीजियेगा. " 
"कितना चाहिए, मुझे भरोसा है तुम पर?"मैं उससे क्या उसके पूरे परिवार से आश्वस्त थी.
"मासी दो लाख सिर्फ १५ दिन के लिए मेरे अकाउंट में रहेगा उसके बाद आप चेक जमा कर सकती हैं."
'ठीक है, मैं तुम्हें चेक देती हूँ. '
                       उस चेहरे कि ख़ुशी मैं बयान नहीं कर सकती . ये बच्ची सुबह ६ बजे घर से निकलकर शाम ७ बजे वापस आती थी. स्कूल  , कोचिंग सब साईकिल से चलते चलते इसने पढ़ाई की थी और आज उसके सपनों के पंख लग गए हैं - विमान से उड़ने के . वह इसके काबिल भी है किन्तु घर की परिस्थिति ने उसे जीवन के संघर्ष से बखूबी साक्षात्कार करवा दिया था. सब अपने बूते करने वाली ये बाला होनहार तो है ही. आज भी अपनी नौकरी के बाद शाम को एक कोचिंग में २ घंटे क्लास लेती है. तब सोच पा रही है कि वह खुद कुछ कर सकती है.
(क्रमशः)                                                                                                                                                                                                                              

मंगलवार, 22 जून 2010

बड़े घर की कीमत (समापन)

                      मेरे अंतर में एक द्वंद्व चल रहा था, कितना अच्छा घर बार था, लड़का भी अच्छा था, कितने सज्जन लोग और सास तो कनु की बलिया ले ले कर नहीं थक रही थी. ननदें भी आगे पीछे घूम रही थीं. उसका पति अवश्य ही जहाँ जैसे माँ और बहनें कह रही थी वैसे ही करता जा रहा था. उस समय कुछ अटपटा जरूर लगा कि आज कल तो लड़के कितने स्मार्ट होते हैं और फिर लड़का इंजीनियर हो तो क्या कहने?
                      वैसे कनु जैसी परी  को स्वर्ग जैसी ससुराल मिली यह सोच कर सभी बहुत खुश दिख रहे थे. बार बार जेहन में  वही शादी की रात की सभी रस्में घूम रही थीं. कनु का खिला  खिला चेहरा और गहनों की चमक से और ही दमक रहा था.
                       सहसा कनु ने सिर उठाया तो मेरी तन्द्रा टूटी और मैं चौंक गयी. उसके मुरझाये चहरे को देख कर मैं यथार्थ के धरातल पर आ गयी . तब तक वह भी अपने मन के गुबार से रोकर हलकी हो चुकी थी.
"क्या हुआ कनु? तुम अकेले क्यों आई हो? तुम्हारा बेटा कहाँ है? " जितने भी सवाल मेरे जेहन में इतनी  देर से उमड़ रहे सब बादलों की तरह से एक साथ फट पड़े.
"आंटी , मैंने पिछले तीन साल नरक में जिए हैं, कितनी बार इच्छा हुई कि आत्महत्या कर लूं,  लेकिन बिट्टू के चेहरे  ने मेरे पैरों में बेड़ियाँ डाल रखी  थीं."
"क्या समर कुछ भी नहीं?" कहकर मैं चुप हो गई समर न सुन सकता था और न बोल.
"वह थे ही कहाँ? शादी के  महीने बाद ही कंपनी ने उन्हें नाइजीरिया भेज दिया. तब तक बिट्टू के होने की बात पता चल चुकी थी और सास ने बहाना  बनाकर भेजने से इंकार कर दिया. "
                  "इतना बड़ा परिवार - घर में सिर्फ समर और उसकी दो बहनें ही थी किन्तु सास जी के अलावा समर के मामा मामी और उनके बच्चे भी उसी घर में रहा करते थे. उन सबको मिली थी एक पढ़ी लिखी नौकरानी. समाज में प्रतिष्ठा बनाने के लिए एक खूबसूरत इंजीनियर बहू लाई थी क्योंकि बेटे के जोड़ के लिए यही सबसे सही जोड़ था. जिसने बहू देखी जी खोलकर तारीफ की. उससे अधिक तारीफ इस बात के लिए कि बिना लिए दिए शादी की थी. कुछ दिनों की खातिरदारी के बाद धीरे धीरे जिम्मेदारियों का बोझ आने लगा और उन अच्छे और भले कहे जाने वाले चेहरों से शराफत का नकाब भी उतरने  लगा. "
                  "समर के जाते ही - सास और ननदों का नया रूप जागृत हुआ. सुबह से आधी  रात तक नौकरों के साथ साथ काम में जुटे रहना. शायद नौकरों से अधिक अच्छी भाषा का प्रयोग किया जाता. इस दुनियाँ में कोई पुरसा हाल नहीं था. मामा मामियों ने भी तो बला टाल  दी थी. फिर दुबारा सुध नहीं ली. नाना और नानी इतने बूढ़े थे कि  मामा पर ही तो आश्रित थे. पिता होते हुए भी कभी नहीं रहे. "
"यहाँ  से फिर कोई वहाँ नहीं गया? कोई फ़ोन या पत्र कुछ भी नहीं?" मुझे उसकी बात सुनकर आश्चर्य हो रहा था.
"नहीं, बस मुझे तो उन लोगों ने बोझ समझ कर रखा था और उसको फ़ेंक दिया और बोझ उतर गया. वाहवाही अलग से मिली." कनु के स्वर की तल्खी स्पष्ट रूप से दिखाई ले रही थी.               
           "रात और दिन के बीच उतने घंटे जितने में काम नहीं किया जा सकता था मेरे लिए आराम के घंटे होते. फिर भी दिन के बीच में रह रहकर ये वेदवाक्य दुहराए जाते -
"कभी देखा है बाप के घर इतना - बढ़िया खाने पहनने को मिल रहा है तब  भी काम नहीं होता. "
 "कितनी ही सुनाओ इस पर कोई असर नहीं होता है - बड़ा पढ़ाई का घमंड है, सब उतर जाएगा, जरा बच्चा तो होने दे."
                         "इतनी भद्दी भद्दी गालियाँ सुनी है आंटी कि कितनी बार मुझे मर मर कर जीना पड़ा है. बस एक अपने बच्चे की खातिर मुझे सब कुछ सहना था. उस बेचारे  का तो कोई कुसूर भी नहीं था .  मुझे उसे हर हाल में इस दुनियाँ में लाना था."
       "क्या  उनको जरा सा भी तरस नहीं आता था?" मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि आदमी कैसे दोहरे चेहरे लगाये रहता है. यहाँ पर तो उनका रूप ही कुछ और था और बाद में.
                          "नहीं आंटी, तरस क्या होता है? वे मुझे इंसान ही समझ लेते तो मैं धन्य हो जाती. बहू तो बहुत बड़ी चीज होती है. मेरे डिलीवरी के समय मेरे पास सिर्फ एक नौकरानी थी. बाकी सब  घर में -  जब पता चला कि बेटा हुआ है तो हॉस्पिटल पहुँचीं. बच्चे  को देखकर सब खुश हो रहीं थी . पता नहीं मुझसे कौन सी दुश्मनी निकाल  रही थीं. किसी ने मुस्करा कर भी मेरी तरफ नहीं देखा. चुपचाप आंसुओं को पीकर रह गयी."
"कैसे पत्थर दिल इंसान होते हैं?" मैं तो सुनकर हैरान थी कि क्या ऐसे भी लोग हैं दुनियाँ में.
"इस समय मुझे समर की कमी खल रही थी. नहीं बोल सकते और सुन सकते किन्तु  अपने सीने से लगाकर सिर पर हाथ फिराता तो सारे गम भूल जाती थी. पत्र मैं उसको लिख नहीं सकती थी कि उसको ले कौन जाएगा? और फिर पोस्ट भी होगा कि नहीं , नहीं मालूम. फ़ोन करने का सवाल ही पैदा नहीं होता." कनु का गला बार बार भर जाता और मुझे लग रहा था कि मेरी आत्मा बहुत आहत है. मैंने अपनी बेटियों की सहेलियों को भी अपनी बेटियों से कम  नहीं माना  फिर कनु तो बिना माँ की थी. 
"फिर समर कब वापस आया?"
 "करीब १० महीने बाद. बिट्टू १०  महीने का हो गया था. वह मुझे जिस हाल में छोड़ कर गया था और इस समय उसने मेरी हालत देखी तो उसकी आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं. किन्तु हाय रे लाचारी - कुछ कह भी नहीं सकता था. लेकिन उसने अपने क्रोध को दबाया नहीं बल्कि उसने कांच के उस शो पीस को उठाकर फ़ेंक  दिया था , जिसे उसकी मम्मी बड़े शौक से खरीद कर लायीं थी."  इस आक्रोश के प्रदर्शन से कनु को कुछ राहत मिली ऐसा लगा. उसको लगा कि  कोई उसकी परवाह करने वाला है. उसके साथ हो रहे अन्याय के प्रतिरोध को उसने अपना मजबूत पक्ष समझा.
               फिर समर  को कंपनी ने चेन्नई भेज दिया और उसके वहाँ रहने का अब कोई सवाल नहीं था लेकिन अगर वह यहाँ रही तो पागल हो जायेगी और उसकी माँ उसको अभी भी भेजने के लिए तैयार न थीं. कनु ने हताश होकर जीने से बगावत की सोच ली और उसने भी कई जगह एप्लाई कर दिया. भाग्य ने उसका साथ दिया और दिल्ली में उसको जॉब मिल गयी. उसे पता था की घरवाले समर के साथ जाने नहीं देंगे और इस घर में वह जी नहीं सकती थी. अपनी नौकरी की बात जब उसने घर में बताई तो सास आग बबूला हो गयीं. उसने समर को ये बात बता दी कि वह अब नहीं रहेगी. अभी जहाँ मिल रही है कर लेती है फिर वह वहीं आने की सोच रही है फिलहाल इस घर से तो निकलना ही होगा. समर उसके निर्णय से सहमत था. 
                  "आंटी जब मैं नौकरी के लिए चलने को तैयार हुई तो सास ने बिट्टू को मुझसे छीनकर मामी के यहाँ भेज दिया, मैं बिलखती रही बच्चे के लिए लेकिन - "अब बच्चा तो तुम्हें नहीं मिलेगा या तू नौकरी कर या बच्चा रख. सोच ले तुझे करना क्या है? "
                    "मैं  सोच चुकी थी कि अब इस घर में रही तो मर ही जाऊँगी  और बच्चा तो मैं हासिल कर ही लूंगी  इसी लिए वह अटैची उठा कर चल दी." 
                     "मैंने स्टेशन पहुँच कर फ़ोन किया - 'मम्मी जी मेरी बिट्टू से बात तो करवा दीजिये.' लेकिन सास ने वही दुहराया - 'नौकरी करनी है तो बच्चे को भूल जा, नौकरी या बच्चा एक ही मिलेगा. मेरे बेटे को बरगला लिया लेकिन मैं तेरी बातों में नहीं आने वाली." और उन्होंने फ़ोन काट दिया. " बताते बताते बच्चे की याद करके कनु फिर से रो दी और मेरी आँखें भी गीली हो गयीं. 
                   दिल्ली में उतर कर वह यहीं सीधे आई थी. अभी उसको ज्वाइन करने में दो दिन बाकी हैं. तब तक वह अनु के साथ ही रहेगी. अनु भी तो अकेली ही रहती है मेरा क्या कभी छुट्टियों में आ जाती हूँ. 
                  कनु की दास्ताँ सुनकर लगा कि  उसने बड़े घर की कीमत अपने अरमानों , बच्चे और खुशियों से चुकाई है. इतने साल के बाद कोई अपना मिला - एक माँ का कन्धा मिला तो जी भर कर रो लिया. एक नयी जिजीविषा भी तो चाहिए वह तो उसे अपनों के बीच ही मिलेगी. यहाँ वह सब कुछ बाँट सकती है. उस बड़े घर के तिलस्म से निकली कनु यहाँ खुले आकाश तले गहरी सांस ले रही है.



सोमवार, 21 जून 2010

बड़े घर की कीमत !

वह मेरी गोद में सिर रख कर वह फूट फूट कर रो रही थी और मेरे हाथ उसके बालों को सहला रहे थे. मैं समझ नहीं पा रही थी की उससे क्या पूछूं और  क्या कहूं? कुछ भी तो मुझे पता नहीं था. मैं तो शादी के बाद आज उसको देख रही थी . कभी अनु से पूछा की कनु कैसी है? तो कह दिया ठीक ही है, पर कभी कुछ बताया नहीं हो सकता है कि उसको भी कुछ पता न हो. कनु शादी के बाद लौट कर आई ही कहाँ थी?
हम तो सोचते थे कि इतने अच्छे लोग मिले हैं तो खुश ही होगी. कभी मामी से नानी से मुलाकात हुई तो पता चला की बहुत सुखी है.
                     कनु मेरी बेटी की सहेली है. शुरू से ही साथ पढ़ी हैं और एक ही सेक्शन में तो उनकी दोस्ती उतनी गाढ़ी होती गयी जितने कि साल बढ़ रहे थे. बिना माँ की थी, नाना नानी के घर में पली थी. पिता तो दूसरी शादीके बाद ही पराये हो गए. नाना नानी की बात और थी , अपनी बेटी की बेटी उन्हें जान से ज्यादा प्यारी थी. मामियों के लिए उनके अपने बच्चे थे , कनु  बड़ी बहन की जिम्मेदारी निभा रही थी. फिर भी उसे पराया सा लगता लेकिन रहना वहीं था. परिस्थितियों से जूझ कर वह बहुत समझदार  हो गयी थी. वह अक्सर अनु के साथ मेरे घर आ जाती. कोचिंग पढ़ने आती तो मेरे घर से पास थी . बीच में टाइम मिलता तो दोनों आ  जाती और फिर लंच लेकर चली जाती थी. कभी तो दोनों साथ साथ पढ़ा करती थी. कभी कभी तो  सारे दिन यही पढ़ती रहती . घर में बता देती की अनु के साथ  पढ़ रही हूँ. हमारे परिवार बच्चों के साथ होने से एक दूसरे से परिचित हो गए थे तो उन्हें भी चिंता न रहती.
                      कनु ने एम सी ए किया और अनु डॉक्टर बनी. जब कनु पढ़ाई पूरी कर चुकी तो उसने नौकरी के लिए आवेदन देना शुरू कर दिया कि तभी एक शादी में गयी और वहाँ आने वाले मेहमानों ने कनु को शादी के लिए पसंद कर लिया. वह थी भी बहुत खूबसूरत. सफेद रंग और बड़ी बड़ी आँखें उसकी सुन्दरता की सबसे बड़ी विशेषता थी. नाना नानी बड़े खुश थे, इतना अमीर परिवार उसकी नातिन के लिए प्रस्ताव लेकर आया था. उनकी हैसियत तो न थी कि वे ऐसे घर में बेटी ब्याह पाते. लड़का भी बहुत सुंदर था. सोने पे सुहागा जैसी स्थिति थी. कनु अपनी स्थिति से वाकिफ थी इस लिए उसने घर वालों की इच्छा देखते हुए हाँ कर दी. बस लड़के में एक कमी थी - वह मूक और बधिर था. उसके लिए कोई दूसरा विकल्प न था क्योंकि मामा की लड़कियाँ भी शादी के लिए तैयार हो रही थी फिर उसके लिए कौन इन्तजार करेगा?
                   कनु के घर वालों को कुछ भी नहीं करना पडा . बड़े होटल में 'रिंग- सेरेमनी' हुई. कनु के मामा - मामी और नाना - नानी सिर्फ कनु और एक रिंग लेकर पहुँच गए थे. सारा कुछ समर के परिवार वालों ने ही इंतजाम किया था. सगाई यहीं से हुई थी तो मैं भी उसमें शामिल हुई थी और सच कहूं मुझे भी रश्क हुआ कि कितने बड़े घर में गयी है. उसका बचपन तो अभावों में गुजरा है अब सब कुछ अच्छा है तो उसे सब सुख मिलेगा.
                                  वहाँ पर मैं भी लोगों की प्रतिक्रिया सुन रही थी और सही भी था.
'कुछ भी जो लड़की है किस्मतवाली.'
'लड़के वालों का दिल तो देखो सिर्फ लड़की मांगी है.'
'अभी दुनियाँ में ऐसे देवता जैसे लोगों का भी अस्तित्व खत्म नहीं हुआ है.'
'लाडो अब तो जमीं पर पैर ही न रखोगी. घर में कालीन पर चलना और बाहर गाड़ियों में घूमना.' मामियां भी उसको छेड़ रही थी. वह फिर भी शांत थी, एक समझौता था - सुन्दरता और अमीरी के बीच. वह चुप थी क्योंकि वह जानती थी की आज नहीं कल किसी विसंगति से ही उसको दो चार होना है फिर क्यों न इस तरह से सही, जिसमें लड़के का मानसिक स्तर तो उसके बराबर का है और फिर घर वाले भी सुलझे हुए हैं नहीं तो क्या पता कि कल दहेज़ के मारे ही उसको तिरस्कृत कर दें. 
                                शादी उन्होंने वहीं अहमदाबाद में बुलाकर करने को कहा था. कोई चिंता की बात नहीं थी, सारा कुछ उनका इंतजाम था और इनको बस लड़की लेकर जाना था. वहीं शादी हो गयी. अनु ने भी अपनी पढ़ाई पूरी करके दिल्ली में ही जॉब के अनुकूल माहौल देखा और वहीं जॉब करने लगी. कनु अपने घर में मस्त होगी , यही सोचकर सब अपने जीवन में व्यस्त हो गए.
                               एक साल बाद पता चला की कनु को बेटा हुआ है. उनके घर वालों को न जाने की कोई चाहत थी और न कोई गया. कभी उससे घर वालों से मुलाकात हो जाती तो पूछ लेती थी की कनु कैसी है तो सब कह देते बहुत अच्छे से है. यही सोच कर सब खुश थे. 
                            मैं कभी कभी छुट्टी लेकर अनु के पास चली आती थी. अनु और कनु में बात होती रहती होगी लेकिन मुझे अनु ने कभी कुछ नहीं बतलाया और फिर समय के साथ सब कुछ अलग लीक पर चल रहा पता भी तो नहीं चलता है. अनु अपने हॉस्पिटल गयी थी और मैं घर में अकेली थी की काल बेल बजी - खोला तो कनु खड़ी थी. एकदम दुबली सी आँखों के नीचे काले घेरे एक ही अटैची थी उसके हाथ में. उसका बेटा भी नहीं था. मेरे मन में हजारों प्रश्न उमड़े उसकी ये स्थिति देख कर . लगता है कि वह सीधे अनु के पास ही आई थी. अटैची उसने वही जमीन पर रखी और 'आंटी ' कहकर मेरे गले से लग गयी और फिर जोर जोर से रोने लगी . मैंने सोचा कि इतने दिन बाद मिली है तो जी भर आया होगा .  मैंने उसको वहीं दीवान पर बिठाना चाहा तो वह और कसकर पकड़ चिपक गयी. मैंने उसे बिठा कर खुद बैठी , वह अब मेरे गोद में सिर रख कर रोये जा रही थी. मैंने सोचा कि रो लेने से जी हल्का  हो जाता है इसलिए इसको रो ही लेने दो. 
                                                                                                                               (क्रमशः )

शुक्रवार, 18 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ ? ( समापन )

                आफिस में जाकर पता चला कि नौकरी या तो पत्नी को मिलेगी या फिर बेटे को. अगर पत्नी न कर सके तो जगह सुरक्षित रखी जाएगी और बेटे को मिल जायेगी. रहने का मकान भी सुरक्षित रहेगा. पेंशन पत्नी को मिलेगी.  देवर के सोचे हुए से तो उल्टा ही होने वाला था. अभी तो घर वालों ने ये सोचा था कि वहाँ कहाँ रहेगी? लड़के के साथ यहाँ ले आयेंगे और पेंशन भी देवर ले आएगा. फिर कौन देता है?
उसको बड़ी तसल्ली मिली. चलो बेटे को यहाँ रहकर पढ़ा तो लेगी और फिर वह यहीं आकर रहने लगी लेकिन वह घर उसको खाने को दौड़ता था सो उसने घर दूसरा किराये पर ले लिया. जब विनीत ने बी.ए. कर लिया तो नौकरी मिल गयी.
                         विनीत को जब भूख लगी तो किचेन में गया , ये क्या माँ तो अभी सब्जी ही काटे रखे थी? पता नहीं कहाँ खोयी थी? उसने पीछे से जाकर उसको बाँहों में भर लिया - ओ माँ मुझे बहुत जोर की भूख लगी है. माँ चौंक गयी - अरे हाँ अभी देती हूँ न. तुम जाओ बाहर चलो ले कर आती हूँ.
 *        *           *          *              *            *           *           *           *               *            *                   *
                              तरुणा को घर चलने के लिए घर वाले जोर दे रहे थे और वह घर बिल्कुल ही नहीं जाना चाहती थी. आज तो पिताजी और भाई दोनों ही इस पर बरस कर गए थे. पूरे वार्ड में तमाशा खड़ा कर दिया.
"क्या है ऐसा जो यहाँ से नहीं जाना चाहती है?"  पिताजी बार बार पूछ रहे थे.
"अरे मुझसे पूछो ये दूसरे ही गुल खिलाने वाली है, वो आता  हैं न लूला उससे साथ हंसी ठिल्ले होते हैं. वह तो करने को मिलेगा नहीं न.."
भाई की यही भाषा थी और वह वार्ड के लोगों के सामने शर्मिंदा हुई जा रही थी.
"देख आज तू निर्णय कर ले कि तुझे घर चलना ही कि नहीं. " पिता  ने आदेश दिया.
"चलेगी कैसे नहीं? इसको यहाँ से कल मैं ले जाऊँगा, नहीं करवानी कुछ एक्सरसाइज वगैरह ऐसी ही काम करेगी तो ठीक हो जायेगी. यहाँ लेटे लेटे खा रही हैं न तो मुटाई चढ़ गयी है. सब घर जाकर उतरेगी."  उसे कुछ नया नहीं लग रहा था ये तो उसके घर की संस्कृति है.
                  उसके पिता और भाई भनभनाते हुए चले गए और तरुणा को लग रहा था की ये धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए. क्या सोच रहे होंगे सब ये तमाशा देख कर . उसको ही दोषी मान रहे होंगे. असलियत को किसी को पता नहीं है और न उसमें बताने की हिम्मत है. वह चुपचाप तकिये में मुँह छिपा कर लेट गई. इससे किसी से नजरें तो नहीं चुरानी पड़ेंगी और किसी के सवालों का जबाव भी नहीं देना पड़ेगा.
                        विनीत कल से खुश था कि माँ तो राजी है अब उसको किसी की परवाह नहीं. आज तो वह तरुणा से कह ही देगा. अगर वह राजी होगी तो फिर कोई बात नहीं और न हुई तो फिर भी कोई बात नहीं. बचपन से ही तो वह घर में वही सब बातें सुनता चला आ रहा है अपने विकलांग होने की कमी को.  अगर तरुणा भी मना कर देगी तो उसको बुरा नहीं लगेगा. लेकिन एक बार वह पूछेगा जरूर.
                         विनीत जैसे ही वार्ड में घुसा और लोगों की नजरें उसकी तरफ उठ गयीं. खुसफुस   की आवाजें उसे सुनाई पड़ने लगीं.
'अरे यही तो नहीं है.'
'हाँ यही है, रोज आता है.'
'तभी बाप भाई कहे.'
'तनकों इन्हें बाप भाई की इज्जत का ख्याल नहीं रहत. '
              तरुणा मुँह छिपाए लेती थी. विनीत वही खड़ा रहा फिर उसने धीरे से बैड का सिरहाने पर थपथपाया तो तरुणा ने सिर उठा कर देखा. उसकी आँखें लाल हो रही थी कोई भी कह सकता है की वह रो रही थी. विनीत को बैठने का इशारा भर किया और खुद उठ कर बैठ गयी.
"क्या हुआ?" विनीत जानना चाहता था.
"कुछ नहीं , वही कि घर चलो और वह वापस नहीं जाना चाहती क्योंकि मुझे  यहाँ के अकेलेपन और शांति से प्यार हो गया है. वापस उस नरक में नहीं जाना चाहती."
"फिर क्या सोचा है?" विनीत ने भी प्रश्न ही किया.
"अभी तो वह लोग जो आग उगल कर गए हैं उसकी ज्वाला में झुलसी जा रही हूँ." तरुणा ने कह ही दिया.
"क्या चाहते हैं? "
"यही कि तुम न आओ, और मैं घर में जाकर कैद हो जाऊं और उनके काम करूँ."
लेकिन ये कैसे होगा? अभी तो तुम चल ही नहीं पा रही हो फिर काम कैसे करोगी? "
"मैं कुछ नहीं जानती वे यही चाह रहे हैं." तरुणा रो ही पड़ी.
"तरुणा अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें अपने घर ले चलूँ." विनीत ने जो मन में सोचा था वह उसके जुबान पर आ ही गया.
"क्या अपने घर , तुम्हारा दिमाग तो ठीक है." तरुणा आश्चर्य से बोली.
"हाँ क्यों नहीं?" विनीत के स्वर में दृढ़ता थी.
"लेकिन किस हक़ से ? क्या जबाव है तुम्हारे पास लोगों के सवालों का. कुछ सोचा भी है तुमने कहने से पहले." तरुणा को पता था कि कितना मुश्किल होने वाला है उसका आगे का जीवन.
"तरुणा सवालों और जबावों से मैं डरता नहीं, फिर पूर्ण विराम के बारे में माँ से पूछ चुका हूँ. मैं तुम्हें मंदिर में शादी करके ले जाऊँगा." विनीत ने तरुणा के प्रश्नों पर पूर्ण विराम लगा दिया था.
"विनीत , इतना बड़ा निर्णय वह भी बगैर मुझसे पूछे तुमने लिया कैसे? " तरुणा विस्फारित होकर उसे देख रही थी.
"मैंने तुम्हें बहुत अच्छी तरह से पढ़ने और जानने के बाद ही ये निर्णय लिया है. हाँ अगर तुम्हें मंजूर  न हो तो बात अलग है. तुम इस बात के लिए मजबूर नहीं हो." विनीत ने दृढ स्वर में अपनी बात स्पष्ट कर दी थी क्योंकि वह तो माँ से कह ही चुका था कि ये उसका निर्णय है और इसी लिए उससे अनुमति मांग रहा है. तरुणा क्या चाहती है? ये अभी पूछा नहीं है.
"नहीं विनीत, मैं खुद अकेले चलते चलते थक गयी हूँ - मुझे एक घर चाहिए और वह तुम्हारा ही घर हो सकता है." तरुणा के मुँह पर उसके मन की बात आ चुकी थी.
"तब लाओ अपना हाथ ." विनीत ने तरुणा का हाथ अपने हाथों में थाम लिया और तरुणा ने एक सुखद भविष्य की कल्पना में उसके हाथों पर अपना  सिर टिका दिया.   
                                                                ( इति )

गुरुवार, 17 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ? (४)

                               ऐसा नहीं कि माँ विनीत में हो रहे वैचारिक परिवर्तन से वाकिफ न हो, लेकिन वह अपनी गरिमा के अनुसार ही जब विनीत उससे अपने ऑफिस या कोई अन्य मामले की चर्चा करता था तभी  वह उसको राय देती थी. कुछ शंका तो उसके मन में भी पल रही थी आखिर माँ जो थी. वह इस इन्तजार में थी कि जरूर विनीत उससे बताएगा कि उसकी इस गहन विचारशीलता का राज क्या है?
                               विनीत चुपचाप चाय पी रहा था माँ भी चुप ही बैठी थी.  विनीत को यह समझ नहीं आ रहा था की वह कैसे शुरू करे?  कहीं माँ को ये तो नहीं लगेगा की मैं अपने लक्ष्य से भटक रहा हूँ. जिस हालत में वह सबसे लड़कर मुझे लेकर यहाँ आई थी तो उनका सपना था कि वह कुछ बने. उसका भी यही सपना है कि वह कुछ बन कर ये दिखा दे कि अगर होंसले बुलंद हों तो ये अपंगता भी उसके आगे नत हो जाती है. उसने सोचा कि आज माँ से बात कर ही लेता हूँ.
"माँ, एक बात पूंछूं तो आप नाराज तो नहीं होंगी?" विनीत ने बड़े ही नम्र स्वर में माँ से कहा.
"अरे, ये कैसी बात कर रहे हो? मैंने कभी भी नाराज हुई हूँ तुझसे."  माँ ने विश्वास दिलाया
"माँ,  कैसे कहूं? कुछ समझ नहीं आता है?" विनीत हिचकिचा रहा था.
"बोलो तो सही, नहीं तो मैं कैसे जानूंगी की तुम क्या कहना चाहते हो?"
"माँ,  मैं तरुणा  को अपने घर लाना चाहता हूँ."  आखिर उसने साहस करके बता ही दिया.
"क्या?  ये तूने कैसे सोचा? उसके घर वाले और वो बहुत सारी बातें होती हैं." माँ ने दुनियांदारी की बात उसको समझाना चाहा .
"मैं सिर्फ आपकी राय मांग रहा हूँ, बाकी सब तो बाद में आयेंगे."
" क्या तरुणा  ने कुछ कहा ऐसा?"
"नहीं माँ, तरुणा क्या कहेगी? ये तो बाद की बात है, मैं तो आपसे पूछ रहा हूँ. अगर मैंने तरुणा से पूछा होता और वह हाँ कर देती और आप न फिर मैं क्या करता?" विनीत अपने प्रश्नों से खुद ही घिरा था और सोच रहा था कि  किससे पहले निपटा जाय.
"मैंने  न  कर  दूँगी , ऐसी बात तुम्हारी दिमाग में कैसे आई ?" माँ ने उससे ही प्रश्न किया था.
"वैसे ही, कभी ऐसी बात आई ही नहीं कि मैं कुछ समझ पाता  कि  आप क्या कहेंगी?"
"मान लो मैं हाँ कर देती हूँ, फिर तरुणा के घर वाले और तरुणा." माँ के आगे बहुत सारे प्रश्न थे. जो उससे नहीं दूसरों  से शुरू होते थे और फिर उन्हीं पर ख़त्म होने थे.
"वो तो दूसरी बात है, पहले अपने घर की छाँव खोजते हैं न, जहाँ शरण तो मिल सके. बाकी दुनियाँ से लड़ने की ताकत खुद ब खुद आ जाती है." विनीत दार्शनिक लहजे में बात कर रहा था.
"चल मैंने हाँ कह दिया अब?" माँ ने अपनी स्वीकृति दे दी.
"अब क्या? आगे सोचता हूँ कि क्या करना होगा? अभी तो कई पड़ाव पार करने पड़ेंगे." कुछ निश्चिन्त स्वर में विनीत बोला.
"अरे हाँ माँ , ये तो बताओ की चाचा, बाबा और मामा का क्या होगा?" अभी कई प्रश्न उसके पाले में ही मुँह बाए खड़े थे.
"उनकी बाद में देखेंगे, अब मैं तो जाती हूँ खाना बनाने तू भी आराम कर." माँ के सामने चाचा, बाबा के नाम आने से और भी कई घाव उभरने लगे थे, जिन्हें वह विनीत के सामने नहीं खोलना चाहती थी.
        *             *             *               *            *             *               *                *                *               *
                            उसे वह दिन भूला नहीं है, जब विनीत को अचानक तेज बुखार हुआ. तब वह ससुराल में गाँव में रहा करती थी. उसके पिता यही नौकरी करते थे. वह दवा के लिए सबसे कहती रही लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था. जब कि सब के सब उसके पिता की कमाई पर ही ऐश कर रहे थे. खुद थोड़े में काम चला कर सब घर में दे आते थे.  रात में और बुखार बढ़ा वह तवे की तरह तप रहा था. घबरा कर उसने अपनी सास को जगाया कि बच्चे को बहुत तेज बुखार हो रहा है. सास ने नींद में ही कह दिया अब रात में क्या होगा? पानी का कपड़ा  रख सुबह देखा जाएगा. और जब सुबह हुई तो अचेत विनीत को डॉक्टर के यहाँ लेकर गए उस समय उसका बायाँ हाथ पोलिओ के असर से झूलने लगा था. उसकी समझ में कुछ नहीं आया था. लेकिन ये जान गयी कि उसके लाडले को अगर समय से डॉक्टर को दिखाया होता तो ये न होता. लेकिन कह नहीं सकती थी.
                          उसके पिता को खबर तक न दी गयी, कह दिया कि खबर कर दी. वह तो महीने में एक बार ही आ पाते थे. जब आये  तो विनीत को देख कर बहुत गुस्सा हुए कि मुझे खबर नहीं कर सकती थी. वह क्या कहती? अगर कह देती कि इन लोगों ने कहा था कि कर दी है तो गृहकलह के अलावा कुछ न होता और जो दो दिन के लिए आये थे. वह भी ऐसे ही निकल जाते. लेकिन उसके पिता ने ये निर्णय लिया कि वह विनीत को और उसको अपने साथ ले जा रहे हैं. वही पर विनीत को डॉक्टर को दिखायेगा और इलाज कराएगा. घर में कुहराम मच गया था. इसने ही लगाया होगा नहीं तो मेरा बेटा ऐसा नहीं था. देवर जरूर इन्हीं ने कान भरे होंगे नहीं तो भैया कभी ऐसा बोले  ही नहीं.
                        शहर में आकर कई डॉक्टर को दिखाया , बहुत इलाज हुआ लेकिन उसके हाथ में सुधार तो हुआ पर पूरी तरह से ठीक  नहीं हुआ. ईश्वर का दंड समझ कर स्वीकार कर लिया. विनीत वहीं पढ़ने भी लगा. घर में पैसे भेजना अब कम हो गया क्योंकि अब तो परिवार यहाँ आ गया था.  इस मामले में वह ही सबको विलेन दिखाई दे रही थी. फिर एक बार विनीत की छुट्टी में वह घर गयी कुछ दिन रहने के लिए ताकि सबको ये न लगे की घर ही छोड़ दिया है. लेकिन ये क्या? यहाँ तो सब कुछ बदल चुका था.
"सोचती हैं कि इस लूले को डॉक्टर बनाएगी." देवर के स्वर का कटाक्ष उसके कान में पड़ा तो कलेजा चीर के रख दिया. ये दिन ईश्वर ने दिया है तो सुनना भी पड़ेगा.
"अरे यही गाँव में रखे खेती बड़ी देखेगा तो कोई ब्याह भी जाएगा नहीं तो ऐसे ही फिरेगा." अब की बार बारी उसके ससुर की थी.
                  छुट्टी के दो महीने उसने वही गुजारे लेकिन फिर न गुजारने का फैसला करके वह घर से चली. अपने बेटे के लिए कुछ भी करेगी उसको कमाने लायक शहर में ही बनाएगी.
                  पर अपना सोचा होता कहाँ है? जब १४ साल का था विनीत तो उसके पिता एक एक्सीडेंट में चल बसे. घर से तो पहले कट चुके थे. फिर भी उसको सब घर ले गए. शायद लोगों को बदला लेने का अवसर मिल गया था. जितनी भी भड़ास थी सब निकाली गयी. पर उसके तो हाथ और पैर दोनों ही कट चुके थे. उसको अब अपने बेटे का भविष्य भी अँधेरे में डूबता नजर आ रहा था. लोगों को कटाक्ष करने का अवसर ईश्वर ने ही दे दिया था.
"डॉक्टर बनाने चली थी. अब देखते हैं कि क्या करता है?  अरे खेत जोतेगा."
"अब तो इस को कोई अपनी लंगड़ी लूली बिटिया भी ब्याह दे तो बहुत है."
"जा देख , अब उसकी नौकरी तुझे मिल जायेगी, तू जाकर कर नौकरी." ससुर देवर को सलाह देते.
                    वह अकेले में फूट फूटकर रो लेती और फिर काम करने लगती. पर ईश्वर को उसपर दया आ गयी और पति के ऑफिस से खबर आई की पत्नी को बुलाया गया है. देवर लेकर चले तो रास्ते भर समझाया  -   "नौकरी की कहें तो मना कर देना कौन सा  बहुत पढ़ी कि कलक्टरी मिल जायेगी. पेंशन हम ले आया करेंगे और नौकरी भी हमारी ही लग जाएगी . मैं तो चपरासी कि नौकरी भी कर लूँगा कोई कुछ न कहेगा . तू नौकरी करेगी  तो नाक न कट   जायेगी खानदान की .
                                                                                                                                    (क्रमशः)
 

बुधवार, 16 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ? (3)

                          कितना अच्छा होता कि वह इस हादसे में मर ही जाती, कम से कम फिर से वही तो न देखना और सुनना पड़ता. क्या भविष्य है उसका? बस अपने खर्च के लिए नौकरी करते रहो और घर वालों की बातें सुनते हुए उनकी सेवा करते रहो . इतने पर भी घर में चैन होता तो संतोष कर लेती . इस पलंग पर पड़े रहना अधिक सुख देता है, भले पैर पर प्लास्टर चढ़ा है फिर भी. कम से कम विनीत से तो रोज मिलना होता है - कितना अच्छा लड़का है नहीं तो क्या पड़ी है कि कोई उसके लिए रोज रोज यहाँ आये. कहीं ऐसा तो नहीं कि उसको उसकी बेचारगी पर तरस आ रहा हो. अगर ऐसा है तो वह बेचारी तो बिल्कुल भी नहीं है. हाँ अभागी भले ही कहा जा सकता है लेकिन वह अपने आप में सक्षम है और जीवन संघर्ष में अकेले ही लड़ने का दम रखती है. नहीं नहीं ऐसे तो नहीं ही सोचता होगा. वह जानता है कि मेरे घर का माहौल  कैसा है? इसी लिए वह देखने आ जाता होगा.
                        फिर भी कुछ तो है विनीत कि आँखों में कि तरुणा को वह बहुत अच्छा लगता था और रोज शाम को उसका इन्तजार करती थी. वह इस बात कि आदी हो चुकी थी. 
                       तभी कुछ आहट हुई तरुणा ने सोचा कि विनीत आया होगा लेकिन ये क्या? सामने उसके पापा खड़े थे. 
"मैं डॉक्टर से पूछने जा रहा हूँ कि वह कब प्लास्टर काटेंगे और कब तुझे छुट्टी देंगे." पिता ने अपना फैसला सुना दिया.
                      जाइये , जाइये यह भी कर लीजिये , बहुत दिन हो गए सेवा से वंचित हुए. लेकिन मैं नहीं जाना चाहती तो फिर ये क्यों पीछे पड़े हैं. मैं तो बस इसी कमरे और इसी बिस्तर से जुड़ी रहना चाहती हूँ. और सभी बैड के मरीज ठीक होकर चले गए लेकिन वह ही है जो कि अभी तक रुकी हुई है और फिलहाल जाना भी नहीं है. 
डॉक्टर से पूछ कर लौटे पिता ने आकर उसको बताया  - 
"वो डॉक्टर तो कह रहा है कि अगर प्लास्टर काट भी देगा तो रोज यहाँ एक्सरसाइज के लिए आना पड़ेगा." पिताजी कुछ नाराज दिखाई दे रहे थे.
"फिर मेरे यहाँ से जाने का फायदा क्या है? जब मैं पूरी तरह से ठीक हो जाऊं तभी घर जाऊं. मुझे यहाँ कौन रोज रोज लेकर आएगा?" तरुणा को सुनकर बड़ा संतोष मिला. कम से कम एक आधार तो है यहाँ रुकने का. उसे घर से दूर और विनीत का साथ सुकून देने लगा था. 
         लेकिन पिता को ये कैसे गवारा होता? उन्हें खाना लेकर आना पड़ता था और कभी कभी बेटों को भी आना पड़ता था. इसी लिए वह छुट्टी दिला कर घर ले जाना चाहते थे. रोज की भाग दौड़ से तो पैसा भी बहुत खर्च होता है. वहाँ रहेगी तो कुछ न कुछ तो करती ही रहेगी. माँ बीमार रहती है, लड़कों को करना नहीं आता है. खाने वाली का भी पैसा देना पड़ रहा है. तरुणा की बात सुनकर और आग बबूला हो गए - "तू तो चाहती है कि यहीं पड़ी रहे, पर ऊपर से भाग दौड़ किसको करना पड़ती है? कितना पैसा लग रहा है? इसका हिसाब है तेरे पास. रोज ऑटो लेकर आना पड़ता है. स्कूटर ख़राब पड़ा है फिर दोनों टाइम आना एक बड़ा काम होता है. "
                      तरुणा इसके तैयार नहीं थी, उसे लगा जैसे कि ये उसका पिता नहीं बल्कि कोई किराये का आदमी बोल रहा हो. वह एकदम से खीज गयी - "आप लोगों को मेरे लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है, न ही खाना लाने की और न ही देखने आने की. जब मैं चलने लायक हो जाऊँगी अपने आप खुद ही आ जाऊँगी. " 
                   पिता गुस्से के मारे उठकर चले गए और तरुणा तकिये में मुँह छुपा कर रोने लगी. दिमाग तो अपना काम कर ही रहा था. मैंने कब चाहा था कि मुझे ऐसा घर दे , जिसमें अपनत्व जैसी कोई चीज ही नहीं है. कोई आशा की किरण जागती भी है तो फिर ऐसे हादसे अँधेरे में डुबो देते हैं. भगवान ने भी मेरी किस्मत फुरसत में लिखी होगी, जिसमें कभी कोई विराम या वर्तनी बदलने की सोची ही नहीं. वही बातें , वही ताने और वही असभ्य भाषा है. ये लगता ही नहीं है की कोई पिता अपनी बीमार बेटी से बात कर रहा है. लगता है की कोई खरीदी हुई नौकरानी है जिस पर ये लोग अहसान कर रहे हैं.
                  वह कितनी देर रोती रही और विनीत आकर खड़ा रहा , रोने से जी हल्का हो जाता है इसलिए उसने कोई भी आहट नहीं होने दी. वह दरवाजे के पास जाने लगा तो तरुणा को कुछ आहट मिली - उसने सीधे होकर देखा तो विनीत को देखकर उठकर बैठ गयी - " बैठिये न खड़े  क्यों हैं?   विनीत बैठ गया तो तरुण ने उसे बताया कि आज पापा ने डॉक्टर से ले जाने के बारे में बात की थी और डॉक्टर ने क्या कहा? 
" विनीत , मैं वापस घर नहीं जाना चाहती, एक महीने से इस बिस्तर और कमरे से बहुत प्यार होगया है. वापस उस नरक में अब नहीं जाना चाहती."  तरुणा अपनी बात कह गयी लेकिन फिर लगा कि पता नहीं विनीत क्या सोचे?  सोचने दो - मैं गलत कहाँ कह रही हूँ? विनीत को भी पता है कि मेरे घर और घर वाले कैसे हैं? उसने भी उस रात सारे डायलाग सुने थे न. 
                   विनीत भी कहाँ चाहता था कि तरुणा यहाँ से जाए, वह ऑफिस से निकल कर सीधे आ जाता था और कुछ समय उसके साथ बिता कर चला जाता था. नहीं तो घर में जाकर वही किताबों में सिर डाले बैठा रहता है. वह भी तरुणा से कहीं जुड़ गया था. - ऐसा नहीं कि तरुणा को इसका अहसास न हो किन्तु कोई किसी से बोला नहीं था. विनीत  को अपने विकलांग होने का अपराध बोध से ग्रस्त होकर उससे कुछ नहीं कह पाया और तरुणा तो तलाकशुदा होने के कलंक को उठाये ऐसा कुछ सोच ही नहीं सकती थी. पर ये सोचना क्या समाज  के बनाये इन कानूनों से बांधा जा सकता  है या फिर समाज उसके दिमाग को गिरवी रख चुका है. फिर क्यों नहीं वह कुछ कह पाती है? 
                        विनीत बैठा ही था कि तरुणा का भाई आ गया शायद उसे चैक पर साइन करवाना था. विनीत उसको देख कर उठ खड़ा हुआ और इजाजत लेकर चला गया. तरुणा भाई का चेहरा देख रही थी, उसके चेहरे पर कुछ क्रोध और झुंझलाहट के भाव तैरने लगे थे. ये तो उसको पता था कि ये कुछ न कुछ बवाल खड़ा जरूर करेगा. 
"ये लूला यहाँ क्या करने आया था?" भाई ने ठेठ भाषा में बात की. 
"मुझे देखने आया था, कोई परेशानी? तरुणा ने भी उसी भाषा में जवाब दिया. 
"हाँ , मैंने नहीं पसंद करता कि कोई मोहल्ले का यहाँ आये." 
"तुम्हारी पसंद का क्या मतलब? कोई मुझसे मिलने नहीं आ सकता."
"इसका रिश्ता क्या है?
"जीवनदाता का."
"क्या मतलब? बहुत लम्बी जबान हो गयी है तेरी. "
"उसने न बताया होता तो मैं सारी रात सड़क पर पड़ी रहती, और तुम सारे चैन की नींद  सो रहे होते. " तरुणा का आक्रोश भी सही था , लेकिन वह कभी इस बारे में बोली नहीं थी. 
"कोई भी होता वही ये करता , लेकिन इसका क्या मतलब कि यहाँ आकर रोज बैठता है ." 
"हाँ , ऑफिस लौटते रोज आता है." 
"तुम्हें शर्म नहीं आती, कौन  सा रिश्ता बनता है कि यहाँ रोज आता हैं."
"इंसानियत का" तरुणा सपाट स्वर में बोली.
"मुझे इंसानियत मत सिखा, अपनी औकात में रह. और हाँ इससे कह देना कि ये अब न दिखाई दे." औरंगजेबी फरमान जारी करके वह चला गया. 
             वार्ड के और बैड पर पड़े हुए मरीज इस बात को सुन रहे थे. लेकिन उसको बुरा नहीं लगा क्योंकि ये तमाशा तो घर में मोहल्ले वाले सुनते हैं और यहाँ पर साथ वाले. कभी पिता , कभी भाई ऐसे ही बोलते हैं. यही लहजा और यही भाषा बोली जाती है उसके घर में. 
पर वह विनीत से क्या कहेगी? फिर यहाँ रहने का कोई मतलब ही नहीं है. वह यहाँ रहना ही चाहती है कि विनीत रोज मिलता रहे. कोई तो ऐसा है जिससे उसे सभ्य भाषा सुनने को मिलती है, नहीं तो घर की बानगी सबने देख ही ली. है. 
       *          *           *              *             *           *             *             *                  *                 *
                  विनीत वहाँ से तो चला आया लेकिन फिर उसे लगा कि उसको आना नहीं चाहिए था. उससे भाई के सामने भी बैठे रहना था. 
-कोई चोरी तो कर नहीं रहा था फिर क्यों? 
-क्या तरुणा से सुने उन लोगों के स्वभाव से डर कर वह भागा?  
-क्या वह बुजदिल है? 
लेकिन फिर ये भी बताये कि वह तरुणा के बारे में इतना क्यों सोचने लगा है? 
                   शायद इसलिए कि उसको उससे सहानुभूति है या फिर उसके प्रति कोई लगाव उसके मन में पैदा हो चुका है. लेकिन खुद को तो कोई झुठला नहीं सकता , अगर ये सिर्फ वही सोचा रहा होगा तो ? उसने कभी तरुणा से तो पूछा नहीं और न ही तरुणा ने कभी उसको इस बारे में संकेत दिया. फिर इसका मतलब क्या है? क्या अब उसका लक्ष्य कुछ और बनने लगा है? उसने माँ से भी तो कुछ नहीं पूछा है. फिर ये कैसा संशय है? क्या चाहता है वह ? आज वह इस बात का निर्णय लेकर रहेगा कि उसका ध्येय क्या है? अच्छी खासी जिन्दगी में ये कैसा झंझावात आ गया ? पता नहीं क्या क्या सोचे जा रहा था, तभी मान ने चाय लाकर रख दी. उसके विचारों का क्रम टूट गया और वह वर्त्तमान में आकर चाय पीने लगा.
                                                                                    (क्रमशः) 

सोमवार, 14 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ?

                 तकलीफ के बाद भी तरुणा यहाँ पर बहुत सुखी थी. न माँ बाप की चख चख  , न भाइयों की असभ्यता भरी बातें और न ही ताने. हाँ वही ताने जिनके बारे में वह बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं थी. फिर भी दोषी तो उसी को बताया जाता, उसके भाग्य को बताया जाता . इन बातों को सुन सुनकर वह तंग आ चुकी थी. पर क्या करे भाग्य के खेल में वह खिलौना बनी थी और नाच रही थी.  वह चाहती है कि बस अब यही इसी बैड  पर पड़ी रहे , पास वाले बैड पर जो बच्चा है उसकी माँ अक्सर उसके पास आ कर बैठ जाती है और फिर ऑफिस से लौटते समय विनीत भी जरूर आता है. 
            ऐसा नहीं कि विनीत को उसके बारे में कुछ भी मालूम न हो, लेकिन एक अधिकारी पद पर कार्य करते हुए उनके पिता ने अपने परिवार को लोकाचार भी नहीं सिखलाया था. सभी कि भाषा एक दूसरे के प्रति असभ्यता कि द्योतक थी - अपशब्दों से भरी हुई , श्लील  और अश्लील का उनको जैसे ज्ञान ही नहीं था. घर से चीखने चिल्लाने की आवाजें पड़ोस में भी जाती थीं और शायद इसी लिए पड़ोसी भी अधिक सम्बन्ध नहीं रखना पसंद करते थे. 
            तरुणा अपने बड़े भाई से छोटी थी और माँ बाप ने उसके मामा के अनुसार बताये हुए लड़के से उसकी शादी , बगैर ये पता किये कि लड़का क्या है?  कर दी. बड़े अरमान से उसने नए घर में कदम रखे थे. बड़ा ही जोशहीन स्वागत हुआ नयी बहू का. उसके कुछ समझ नहीं आया फिर भी उसने सोचा कि चलो मेरे घर से तो अच्छा ही होगा. 
                        परन्तु फिर पता चला कि लड़का पहले से ही शादीशुदा है और उसके मामा ने भी सिर्फ उसकी माँ के जल्दी शादी जल्दी शादी की बात  में लड़का बता दिया.  इसमें उसने न माँ को और न मामा को किसी को भी दोषी नहीं माना था. जब उसको ये बात पता चली तो उसने ऐसे व्यक्ति से समझौता कराने से इनकार कर दिया और वापस आ गयी. उसका वापस आना भी एक मुसीबत ही तो था.  यह बात भाइयों और बहन को नागवार गुजरी.  
रोज रोज  ऐसे ताने सुनने को मिलते रहते -
"इतना रूपया खर्च किया फिर भी वापस आ गयी."
"तुझे तो वही रहना चाहिए था, वही तेरा घर है."
"ऐसी खोटी किस्मत वालों को कहीं भी जगह नहीं मिलती."
"तेरे आने तो अब लड़की वाले भी मेरे  लड़कों से शादी करने में सोचेंगे कि सारी जिन्दगी एक ननद छाती पर मूंग डालेगी."
                       तरुणा नौकरानी की तरह से घर का पूरा काम करती . छोटी बहन तो बाहर नौकरी करती थी और माँ बीमार रहा करती थी. भाई दोनों  नाकारा थे, बाप की पेंशन से गुजारा चलता था और बेटे ऐश करते हुए गुंडागर्दी में लगे हुए थे. तरुणा ने एक स्कूल में नौकरी कर ली , वह घर और नौकरी दोनों काम बखूबी संभाल लेती थी. स्कूल में वह अपने स्वभाव के कारण बच्चों और सहकर्मियों में लोकप्रिय थी. बस एक घर ही था जहाँ उसे कुछ भी नहीं मिला. 


          *            *           *            *               *             *               *                      *                *


                                विनीत का एक हाथ पोलिओग्रस्त था , पर उसे अपने पापा के स्थान पर नौकरी मिल गयी थी और अपने और माँ के खर्चे के लिए उसने उसे कर लिया था. किन्तु वह अपनी नौकरी से संतुष्ट न था और वह नौकरी के साथ साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी भी कर रहा था. वह अपने आस पड़ोस से बेखबर रहता था. नौकरी से सीधा घर और अपनी पढ़ाई से ही मतलब रखता था. इधर उधर घूमने या गपशप करने में उसकी कोई  रूचि न थी. ये भी हो सकता है कि वह अपने एक हाथ के पोलिओग्रस्त होने से कुछ हीनता का अनुभव करता हो. लेकिन अपने लक्ष्य के प्रति सजग और प्रतिबद्ध था. उसकी माँ भी अचानक पिता कि मृत्यु के कारण अंतर्मुखी हो गयी थी और वे सिर्फ मंदिर और बाजार ही जाती थी. कहीं पड़ोस में बैठ कर गपशप करने कि उनकी आदत न थी. हाँ पढ़ने कि शौक़ीन थी तो वे अपने को उसमें ही व्यस्त रखती थी. 
                             उस रात तरुणा के गिरने के बाद, जब विनीत और उसकी माँ ने घर वालों के विचार सुने तो उन्हें बड़ा अजीब सा लगा. उसके अपने बाप, भाई , बहन ऐसी बातें कर रहे थे. जैसे कि उसकी जिन्दगी से किसी को कोई प्यार ही न हो, तभी विनीत को लगा कि तरुणा सहानुभूति का पात्र है . वह फिर कभी कभी अपनी माँ से इस बारे में बात कर लेता कि कैसे है इसके घर के लोग? क्या ऐसे भी लोग होते हैं? 
                 और यही सब बातें उसको तरुणा के ओर खींच रही थी. उसे उसकी इसी सोच ने ऑफिस के बाद सीधे अस्पताल में जाकर तोड़ी देर तरुणा के साथ बिताना अच्छा लगता था. उसका भी कोई अपना साथी न था कि जिसके साथ वह बैठे सिवा किताबों के. लेकिन वह ये नहीं सोच पा रहा था कि इसके लिए वह क्या करे कि तरुणा को संबल मिल सके. 
                        तरुणा के आपरेशन के दूसरे दिन ही विनीत उसको देखने के लिए गया था तो तरुणा की माँ ने उसका परिचय कराया - "तरुणा ये विनीत है , अपने बराबर वाले घर में यही लोग रहते हैं. उस दिन इसी ने तो तुम्हें गिरते हुआ देखा था , तब इसकी माँ ने आकर हम सब को जगाया , नहीं तो पता नहीं तू कब तक ऐसे ही पड़ी रहती." 
                        विनीत वही चुपचाप बैठ गया था, उसको ये नहीं समझ आ रहा था कि कैसे वह बातचीत शुरू करे. फिर उसने सोचा कि हाल चल लेने आया था तो वही से शुरू किया जाय.  
"कहिये अब आप कैसी हैं?" 
"ठीक हूँ."
"अब कब तक आपको यहाँ रहना पाएगा?"
"अभी तो कुछ बताया नहीं है, वैसे यहाँ अच्छा है. अरे मैं आपको धन्यवाद देना तो भूली ही जा रही हूँ, मुझे बचाने वाले तो आप ही हैं,  अगर आप न बताते तो पता नहीं मैं सारी रात ही ऐसे ही पड़ी रहती और किसी को खबर ही नहीं होती . "
"ऐसे  मत कहिये, मैं तो रात को ही पढता हूँ और मैं पढ़ रहा था कि मैंने कुछ गिरने कि आवाज सुनी और जब खिड़की से झांक कर देखा तो वहाँ आपकि कराह सुनी तभी मैंने  माँ को जगाया था. " 
"अच्छा कुछ चाय वगैरह लेंगे." तरुणा ने उससे पूछा.
"नहीं, अभी मैं ऑफिस से पीकर ही आ रहा हूँ. फिर कभी. अब मैं चलूँगा."
                   विनीत उससे और उसकी माँ से मिलकर चला गया. लेकिन तरुण को लगा कि क्या ऐसे भी लोग होते हैं कि बगैर अहसान जताए भी इतने विनम्र होते हैं. ऐसे विनम्रता तो उसने अपने जीवन में देखी ही नहीं थी. या ये कहो कि उसके घर का ऐसा माहौल था कि जिसमें इज्जत, विनम्रता और प्यार जैसी चीज का समावेश ही नहीं होता है. तभी तो उसके चाचा बुआ सभी हैं लेकिन उसके घर कोई भी नहीं आता, कितने सारे चचेरे भाई बहन भी हैं लेकिन किसी से कोई  मतलब नहीं है. अरे अपने भाई बहनों में तो प्रेम नहीं फिर चचेरे और ममेरे की बात कौन करे? जब वह स्कूल में अपनी किसी सहकर्मी को अपने परिवार के बारे में बात करते हुए सुनती है तो उसे लगता है कि क्या ऐसा भी होता है? घर के सभी लोग एक साथ बैठ कर खाना खाते हों, एक दूसरे के जन्मदिन पर उपहार देते हों, या फिर छुट्टियों में घूमने जाते हों. कभी पैतृक घर जाते तो बस अपने हिस्से में चले गए बहुत हुआ तो चाचा के घर में बाबा थे उनके पास चले गए. न पापा ने कोई मतलब रखा और न उनके बच्चों ने. माँ को दादी बाबा पसंद नहीं थे. क्योकि पापा ही तो सबसे अच्छी पोस्ट पर थे जिससे उनको लगता था कि सब उनके ओहदे के कारण सम्बन्ध रखना चाहते हैं सो उन्होंने सबको अपने से दूर ही रखा. पापा तो बगैर माँ की अनुमति के सांस भी नहीं ले सकते थे क्योंकि उसके नाना ने पापा  की नौकरी को देख कर ही शादी की थी. बाकी लोगों से कुछ लेना देना नहीं था. 
               सारे भाई बहन भी उसी तरह के हो गए. सिर्फ पैसा और पैसा , पापा ने भी वहाँ से ट्रान्सफर करवा लिया और यहाँ आ गए ताकि किसी से कोई रिश्ता रखने से घर में कलह न हो. घर उनके चलते ही पूरा युद्धक्षेत्र बन गया था. किसी न किसी बात पर कुछ न कुछ बहस होती रहती . जब से पापा रिटायर हो गए तब से और भी सोने पर सुहागा. 
                अपने बच्चों के भविष्य के बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था. कौन पढ़ रहा है? कौन आवारगी में लगा है? इसके बारे में न कभी सोचा और न पूछा कि कौन क्या पढ़ रहा है? सारी बातें बच्चे अपने मन से कर रहे थे. पैसे माँ के पास होते और वे सब को दे देती थी. ये उसका घर नहीं कुरुक्षेत्र था, जिसमें दुर्योधन जैसे लोग ही रहा सकते थे .  
                  जब वह एम ए में थी तो उसके लिए एक रिश्ता आया था और पिता ने मना कर दिया - अभी हमने सोचा नहीं है. सोचना तो उन्हें कभी ही नहीं था और फिर माँ ने मामा से कह कर उसे उस कुँए में धकेल दिया. जिससे निकली तो लेकिन एक कलंक लेकर. ये कलंक जो कभी नहीं छूटेगा  और वह कभी भी चैन से नहीं जी पायेगी. यही सब सोचते सोचते वह डिप्रेशन कि शिकार हो गयी. एक दिन रात में उठा कर दरवाजा खोल कर बाहर निकल गयी. सुबह वापस आई लेकिन उसे खुद नहीं पता कि कैसे ये हुआ? फिर उसको डॉक्टर को दिखाया तो उसने डिप्रेशन कि दवा देना शुरू कर दिया जिससे कि बहुत गहरी नींद आती थी.  उसी दवा के चलते वह इस हादसे का शिकार हो गयी.
                                                                                                                                    (क्रमशः)

शुक्रवार, 11 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

                 अस्पताल के बैड पर बैठी तरुणा  , खिड़की से बाहर देख रही थी शायद कोई आ रहा होगा, मगर कौन? घर से - घर के नाम से उसे वितृष्णा होने लगी है. लोग कहते हैं कि अपने होते हैं तो बड़े से बड़ा कष्ट भी सहन किया जा सकता है लेकिन उसके  कष्टों में बढ़ोत्तरी कराने वाले तो उसके घर वाले ही हैं. काश ! उस दुर्घटना में वह सदा के लिए सो जाती तो कितना अच्छा होता , कम से कम उसके अपने बाप के ये शब्द उसके कानों में लावा बन कर तो न भर गए होते - "ले जाओ और अस्पताल में डाल दो, मरना होगा तो मर जायेगी और अगर बच जाए तो उठा  लाना."  इतने दिन हो गए अस्पताल में आये वह इस आवाज से अपना पीछा नहीं छुड़ा पा रही है. जब भी इन शब्दों का ख्याल आता है तो मन भर आता है. इस की वजह से ही चुपचाप आंसूं आँखों से लुढ़क कर गालों पर आ गए. वह आँखें बंद किये सोच रही थी  और आंसू ढरकते जा रहे थे. 
                              विनीत कब से उसके पीछे खड़ा ये देख रहा था इसका उसे अहसास न था. पीछे से विनीत ने हलके से आवाज की तो उसने आँखें खोली - "आओ विनीत तुम कब आये?"
"तुम क्या सोच रही थी ? तुम्हें पता ही नहीं चला कि मैं कब से यहाँ खड़ा हूँ."
"वाकई नहीं पता चला."
"नहीं  अकेले बैठे बैठे बोरे जो  हो जाती हूँ, इन किताबों और मैगजीनों के सहारे कितना समय गुजारा जा सकता है?"
"ये तो सही है, लेकिन जो गुजर जाए न उसे अतीत में ही दफन कर देना बेहतर होता है - कब तक उसे सोच कर इस तरह से घुलती रहोगी." विनीत अपने फिलोसफर वाले अंदाज में बोलने लगा.
               यही  तो तरुण को बहुत अच्छा लगता , ऐसे ही किसी इंसान की जिन्दगी में उसने कामना की थी लेकिन पता नहीं उसकी किस्मत कैसे रची गयी? कुछ भी तो नहीं मिला - न शांति , न सुख और न प्यार. घर के कलह से सोचा था कि जब शादी हो जायेगी तो शांति से रहेगी. कभी रुख नहीं करेगी इस घर का. लेकिन उसके लिए दूसरा घर बना ही कहाँ था? जीना भी यहीं और मरना भी यहीं. फिर उसे लगा कि विनीत क्या सोचेगा कि मैं कैसे चुप लगा गयी हूँ. उसने उससे बात बढ़ाने के लिए बोलना शुरू किया .
"तुम मुझे कितना जानते हो विनीत, मेरी कहानी भगवान् ने जिन पन्नों पर लिखी थी न, वे सारे हवा में फड़फड़ा  कर उड़ गए और उन्हें बटोर कर रखने में ही मेरा जीवन भी बिखर गया - कुछ पन्ने कहीं खो गए और कुछ तो रचे ही नहीं गए , तभी तो मेरी जिन्दगी सबसे अलग है." तरुणा  के स्वर में निराशा झलक रही थी और झलके भी क्यों नहीं - घर है लेकिन दीवारों वाला, उसमें रहने वाले उसके अपने होकर भी अपने नहीं है. सब अपने और सिर्फ अपने लिए ही जीते हैं. कौन कितने पैसे उससे नोच सकता है , इसकी होड़ लगी रहती है चाहे पिता हों, भाई हों या बहन. 
  "तुम ऐसा क्यों सोचती हो? जिन्दगी के सारे मोड़ एक जैसे तो नहीं होते है - हर रात के बाद सवेरा आएगा ये भी शाश्वत सत्य है." विनीत उसको इस निराशा से बाहर लाने के लिए जैसे प्रतिबद्ध हो चुका था.  उसके घर परिवार से अब तक वह बहुत वाकिफ हो चुका था. तभी बाहर स्कूटर रुकने की आवाज आई और विनीत तरंत ही यह कहते हुए - "तरुणा मैं फिर मिलूंगा." कमरे के बाहर निकल गया.
            कमरे में पिताजी ने प्रवेश किया , वह रात के लिए खाना लेकर आये थे. वह चुपचाप आँखें बंद करके लेट गयी, बोलना तो दूर उनका मुँह देखने की भी इच्छा नहीं होती थी.
"तेरा चैक आ गया है बरेली से, मैंने उसे बैंक में डलवा दिया है. " पिता ने उसको सूचित किया था.
"अच्छा" अनिच्छा से बोलना पड़ा था.
"मैं सोचता हूँ की डाक्टर तेरा प्लास्टर काट दें तो घर ले चलूँ, बार बार घर से आने जाने में बड़ा पैसा खर्च  होता है और तू तो जानती है की मेरी पेंशन से कुछ भी नहीं हो पाता है. " पिता ने दयनीयता से कहा जब कि उसको मालूम है कि उसके पिता बैंक के मैनेजर की पोस्ट से रिटायर हुए हैं.
"कहिये चैक काट कर दे दूं - आप परेशान न हों. मैं यहाँ ज्यादा  बेहतर हूँ, आप बेकार परेशान होते हैं. यहाँ रात में नर्स रहती ही है और दिन में भी आस पास वाले आकर बैठ जाते हैं. मेरे लिए अपना काम कौन छोड़ कर आ सकता है? " दिल की बात जुबान पर आ ही गयी थी और उसने कुछ ऐसे कड़वे लहजे में बोला कि उनको भागने को पड़ गयी.
"कुछ जरूरत हो तो बता दे, सुबह भेज दूंगा."
"नहीं मुझे कोई भी चीज नहीं चाहिए." वह भी चाह  रही थी कि ये कितनी जल्दी यहाँ से जाएँ.
                  उसके बाद पिता चले गए तो उसने राहत की सांस ली. कितने बेमाबी होते हैं ये खून के रिश्ते भी, खून सफेद हो जाता है ये तो बस कहते हुए सुना था और इस दुर्घटना के बाद उसने देख भी लिया और जी भी लिया. 
                    
                          *               *                   *                         *                   *                    *


उस  रात भी वह डिप्रेशन की दवा लेकर सोयी थी और उसके बाद गहरी नींद  ही आती थी. उस दिन भी वह ऊपर छत  पर ही सोयी थी. रेलिंग बहुत ही छोटी थी, बराबर वाले घरों से सिर्फ २ फुट की दीवार  बीच में थी. इधर उधर आ जा सकते थे और खड़े होकर बातें भी कर सकते थे. इसी तरह से सामने सड़क की ओर भी २ फुट की ही रेलिंग बननी थी. 
                   रात में वह शायद पानी पीने के लिए उठी होगी और दवा के असर में वह पूरी तरह से सजग न हो पाई और वह तीसरी मंजिल से सड़क की तरफ आकर गिरी.  रात के दो बजे थे, सब लोग गहरी नींद  में सोये थे. निस्तब्धता में उसके गिरने की आवाज ने विनीत को चौंका दिया था - वह उस समय पढ़ रहा था , उसने खिड़की से झांक कर देखा तो उसने माँ माँ करके कराहते  हुए नीचे किसी को पड़े देखा. अपनी माँ को जगाया और कहा कि माँ बगल वाले घर की लड़की छत से नीचे गिरी पड़ी है और उसके घर वालों को पता नहीं है , आप उन्हें ऊपर जाकर जगाइए. माँ ऊपर छत पर चढ़ कर गयी और उन लोगों को आवाज देकर जगाया  तब सब लोग  नीचे आये. माँ बाप दो भाई और बहन सब का हुजूम लग गया. विनीत भी अपनी माँ के साथ पहुँच गया था. 
                   उसके घर वाले पता नहीं किस मिट्टी के बने थे. उसको उठने की किसी को चिंता नहीं थी बल्कि अपनी अपनी राय के जुमले उछल रहे थे.
"लगता है कि इसकी रीढ़ की हड्डी चली गयी है."
"तब तो इसकी जिन्दगी ही बरबाद है, कैसी किस्मत पायी है?"
"मेरे को तो इसका बचना ही मुश्किल लगता है."
"इतनी ऊँचाई से गिरना कोई मामूली बात है."
                  किसी में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि उसको उठाने का प्रयास करते - सब अपनी अपनी राय व्यक्त किये जा रहे थे.  आखिर विनीत की माँ से नहीं रहा गया और उन्होंने नीचे बैठकर कंधे से सहारा देकर उसे बिठाया और पूछा  - 'बेटा बैठने में कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है.' 
"नहीं आंटी , बस इस पैर और एक हाथ में बहुत दर्द है." तरुणा बहुत धीमे धीमे बोल पा रही थी. दर्द से उसका बुरा हाल था लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं थी.  
        "देखिये बहनजी, इसकी रीढ़ की हड्डी एकदम सही है, आप परेशान न हों और इसे डॉक्टर के पास ले जाने की व्यवस्था करें." विनीत की माँ से नहीं रहा गया तो उन्होंने तरुणा की माँ से कहा.
              तरुणा सब कुछ सुन रही थी , वह बेहोश नहीं थी. अपने भाइयों के व्यंग्य , पिताजी के वेदवाक्य. बस माँ थी कि जो रोये जा रही थी - 'हाय मेरी छोरी को क्या हो गया? कैसे ये हो गया? मैंने तो इसके पास ही सोयी थी मुझे भी पता नहीं चला."
                किसी तरह से पड़ोसियों की मदद से उसे जीप में डालकर नर्सिंग होम ले गए लेकिन वहाँ के चार्ज सुनकर जीप को सिविल अस्पताल की ओर मोड़ दिया गया. वही एक जनरल वार्ड में उसको भर्ती करा दिया गया. उसके एक हाथ और पैर दोनों की हड्डियाँ टूटी हुई थी. शुक्र ये था की उसकी रीढ़ की हड्डी बच गयी थी. वह छत से सीधे नहीं बल्कि बीच में डिस्क के तार से उलझती हुई नीचे गिरी थी. जिससे ऊपर से नीचे आने वाली तेजी में कुछ कमी आ गयी थी.                                                                                                                   (क्रमशः )