शनिवार, 11 सितंबर 2010

कौन कहाँ से कहाँ ? (समापन)

पूर्वकथा : आशु एक डी एम का बेटा, अपनी पहली पोस्टिंग में ही सौतेले भाई से मिला और दूसरी जगह पर सौतेली बहन से, माँ के निधन के बाद वह नाना नानी के पास रहा। किन्तु हालात ने उसे फिर से उनसे मिलाया जो न उसे जानते थे और वह तो जान गया। उसने पहले नितिन के लिए पढ़ाई और फिर नौकरी कि व्यवस्था की और फिर बहन को उस नरक से निकलने का प्रयास किया। पापा कि जायदाद के लिए भागदौड़ पापा के मकान से उनके सालों को निकल कर बाहर करना और फिर उसे पापा कि धरोहर कि तरह सहेज कर तैयार करवाना। बहन से दौलत के लालच में शादी करने वाले इंसान से उसको मुक्ति दिलाने के फैसले को उसने कानूनी जामा पहना कर अंजाम दिया।

गतांक से आगे:

किसी भी चीज का आरम्भ और अंत क्या अपने सोचने से होता है शायद नहीं मैं भी तो भटक रहा हूँ कि किसी तरह से शामली के बारे में फैसला ले सकूं लेकिन क्या ये मेरे वश में है ? मैंने दीदी को यहाँ आने के लिए कहा क्योंकि मैं खुद को इस मामले में सामने नहीं लाना चाहता था दीदी ने अगले हफ्ते आने की बात कही थी तब तक मैंने महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग कि नजर में शामली बारे में जानकारी लिखित तौर पर भेज दी थी क्योंकि सिर्फ अपने ऊपर ये काम लेना शायद ठीक नहीं होगा उसको अगर इन लोगों से सहयोग मिलेगा तो उसको अपने थोपे हुए वैवाहिक जीवन से भी मुक्ति मिल सकेगी
दीदी के आने तक मैंने पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी और उसके आते ही मैंने नितिन को शामली के गाँव भेजने का प्रबंध कर दिया पहले दीदी ने वहाँ जाकर गाँव में उस घर और परिवार के बारे में सारी जानकारी ले ली थी घर उनका आज भी बाहर से ताला लगा था और उनके इस रहस्यमय व्यवहार से गाँव वालों को भी हैरानी थी इस विषय में खुसपुस होती रहती थी शामली को आजतक किसी ने बाहर नहीं देखा था वह जिन्दा है या मर गयी इसके बारे में भी कोई बता नहीं पाया
महिला पुलिस , आयोग के कुछ सदस्य दीदी और नितिन के साथ ही शामली के घर पर छापा मारा गया पिछले दरवाजे से घुस कर ही उनके घर में जाया जा सका लेकिन वहाँ से अन्दर आने पर ये पता नहीं चल सकता था कि इसमें कोई इंसान भी रहते हैं क्योंकि उस जगह से सिर्फ जानवरों की आवाजाही ही हो सकती थी उनके रिहायशी घर के लिए सिर्फ एक खिड़की थी जिसके रास्ते अन्दर प्रवेश किया गया सबसे पहले सामना शामली के ससुर से ही हुआ इतने सारे लोगों को देख कर वह एकदम घबरा गए और उन्होंने अन्दर जाने के रास्ते को बंद कर दिया फिर वह अन्दर से अपने बेटे की बन्दूक उठा लाये बगैर ये सोचे समझे की ये लोग कौन हैं?
"
आप लोग कौन हैं?"
"
हम लोग महिला आयोग से आये हैं और अपने साथ ये पुलिस भी लेकर आये हैं इनको आप जानते होंगे ये आपकी बहू के भाई हैं"
"
इससे क्या मतलब? मेरे घर में घुस आने का आपका उद्देश्य क्या है? "
"
हमें सूचना मिली है की आपने अपनी बहू को जबरन घर में रखा है और उसके पति को उससे कोई भी मतलब नहीं है साथ ही उसकी पहली पत्नी भी है इस लिए हम आपकी बहू से कुछ पूछना चाहते हैं"
"
ये सब गलत है, हमारी बहू हमारे साथ रहती है और लड़का हमारा शहर में धंधा करता है"
"
क्या धंधा करता है?
"
ठेकेदारी का"
"
चार सौ बीसी का भी तो करता है किस अपराध में वह जेल में बंद है?"
"
मुझे कुछ नहीं मालूम है, वह शहर में रहकर काम करता है"
"
अच्छा फिर आप अपनी बहू को बुला दें , हम कुछ उससे पूछना चाहते हैं"
"
हमारी बहू किसी बाहर वाले के सामने नहीं निकलती है."
"
लेकिन हमारे सामने तो उसको लाना ही पड़ेगा, क्योंकि हमें उसके बारे में मिली सूचना की तहकीकात करनी है"
"
अगर मैं बुलाऊँ तो?"
"
फिर तो हमें जबरन अन्दर जाकर उससे बात करनी होगी और आपको हमारे काम में दखल देने के आरोप में अन्दर भी किया जा सकता है"
इतना सब सुनकर दबंग बेटे के दबंग बाप के पैरों तले जमीन खिसक गयी वह अन्दर गया और शामली को बुलाकर ले आया शामली के रूप को देख कर नितिन का भी सर चकरा गया क्योंकि जब उसने देखा था तो शामली ठीक थी अब तो वह एकदम काली सी, आँखें गड्ढे में घुसी हुई और बीमार सी लग रही थी उन्हें शायद इतना मौका नहीं मिला कि वे उसको कुछ सिखा पाते इतने सारे लोगों को देख कर वह घबरा सा गए थे शामली भी इतने सारे लोगों के साथ नितिन को देख कर घबरा गयी पता नहीं उसके मन में क्या विचार आया हो? वह पत्ते के तरह से काँप रही थी फिर दीदी ने आगे बढ़ कर उसके कंधे पर हाथ रखा और बोली -
"
घबराओ नहीं , हम सब तुम्हें यहाँ से लेने आये हैं अगर तुम चलना चाहो तो चल सकती हो?"
एक घर के अन्दर दबी हुई लड़की कल लिए ये आसान था कि वह ये सब सुनकर शांत रहती , वह रोने लगी और तब नितिन ने उसको आगे बढ़ कर समझाया - दीदी , हम लोग तुम्हें इस घर से ले जाने आये हैं और इसी लिए हम सारे कानूनी कागज भी लाये हैं ताकि यहाँ से आपको निकल सकें'
"
फिर हम कहाँ जायेंगे? वह वहाँ तो नहीं पहुँच जायेंगे? " भय उसके चेहरे पर पूरी तरह से परिलक्षित हो रहा था यहाँ से बाहर निकलने के लिए सोचना उसके लिए सपना था सिर्फ एक बार निकली थी जब कि उसको वैरिफिकेशन के लिए ले जाया गया था उसके बाद फिर उसी कैद में बंद नौकरों की तरह से काम करते रहो और रोटी खाते रहो कोई बोलने वाला सुख दुःख को पूछने वाला जब से संदीप जेल चला गया तब से उसको और अधिक प्रताड़ित किया जाने लगा था उसकी दशा इस बात को खुद ही जाहिर कर रही थी
"
नहीं ऐसा कुछ भी नहीं होगा, तुम्हें हम अपने साथ रखेंगे , कहीं अकेले नहीं रहना है" महिला आयोग कि सदस्य ने उसको आश्वासन दिया ताकि वह साथ जाने के लिए तैयार हो सके बाहर पुलिस ने गाँव के कुछ और लोगों को बुलाकर गवाह बनाया और शामली के बयान करवा कर उन सब से दस्तखत लेकर एक प्रति उसके ससुर को देकर और खुद बाकी लेकर शामली को उसी हालात में लेकर चल दिए
रास्ते भर शामली नितिन से सट कर बैठी रही क्योंकि उसको ये विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस कैद में वह बरसों से बंद थी और उससे वह कभी आजाद भी हो सकती है उसको अभी महिला आयोग के अधीन ही रहना था और इसके लिए दीदी ने अपनी जिम्मेदारी लेते हुए उसको अपने साथ रखने कि पेशकश की कानूनी कार्यवाही के के बाद उसकोi दीदी को सौप दिया गया
अभी तो शामली को मुक्त करने होने ये पहले अभी तो उसको संदीप के साथ हुए विवाह से भी मुक्त कराना था उसकी तो अवैध वैसे भी था फिर भी वो रास्ते इतने सरल नहीं होते ,जो हिन्दू धर्म में अग्नि को साक्षी बनाकर सात फेरे के साथ बाँध दिए जाते हैं
* * * * * * *

पूरा एक साल लगा था उस प्रक्रिया से गुजर कर शामली को फिर से शामली बनने में वह दीदी के साथ ही रही दीदी ने तो उसको बहन बनाकर रखा लेकिन वह शायद इसको सपना माँ कर जी रही थी कभी नितिन से बात करती तो कहती कि नितिन ये दीदी बहुत अच्छी हैं बिल्कुल मम्मी जैसा प्यार करती हैं अपने साथ घुमाने ले जाती हैं मुझे तो बहुत सारे कपड़े और सामान भी दिलाये हैं वह जब बच्ची थी जब उसको पापा और माँ ने अकेले छोड़ कर दुनियाँaसे कूच कर लिया था प्यार जैसी चीज उसने अपने होश में तो देखी ही नहीं थी बीच बीच में उसको लखनऊ भी जाता उसकी पेशी और केस के लिए उसका आना जरूरी होता था आखिर वह दिन भी आया जब कि अदालत ने भी शामली माथुर को संदीप माथुर कि पत्नी होने के कलंक से मुक्त कर दिया संदीप को भी लाया गया था उसकी पहली पत्नी भी साथ आती थी उसे क्या पता था ? कि तो संपत्ति मिलेगी और कलंक के साथ जेल अलग जाना पड़ेगा मैं इस दृश्य के दौरान कहीं भी सामने नहीं आया था
उसके एक महीने के अन्दर ही मैंने नितिन और शामली को पापा के घर में रहने के लिए सोची क्योंकि अब कभी तो उसको वहाँ रहने के लिए तैयार होना ही पड़ेगा मुझे इसके लिए एक प्रायवेट सिक्योरिटी भी भी व्यवस्था करनी पड़ी
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ये सारी व्यवस्था मुझे ही करनी थी मैंने घर को साफ करवा कर उसमें पूजा करके उन दोनों को वहाँ रखने की सोची थी इसके लिए मैंने नाना और नानी को भी बोला कि मैं पापा के घर को खाली करवा कर उसे नई माँ के बच्चों को सौपने जा रहा हूँ वे दोनों भड़क गए कि तू भी तो उसमें हक़दार है और मेरा कदम उन्हें पसंद नहीं आया और ये तो स्वाभाविक था क्योंकि उनकी बेटी के बच्चे भटके रहे और मकान कोई और ले लेकिन ये उनकी सोच थी जो ममता से भरी थी और गलत भी नहीं थी मैं उनके भावों को समझ सकता था लेकिन मेरे लिए पापा के सपनों और उनके बच्चोंके प्रति जो भी फर्ज बनता था उसको पूरा करना ही था
पूजा में मैं दीदी नितिन और शामली ही थे और साक्षी थे पापा और नई माँ के चित्रजब मैंने हवनपूरा किया तो उठा कर पापा के चित्र के आगे सर नवाया कि पापा जो मेरी समझ आया वो मैंने किया है और शेष जोबचा है वह मैं आगे भी करूंगाआप चिंता करें अब तो जंग जीत ही ली हैशायद नितिन और शामली को ये समझनहीं रहा था कि मैं उनके पापा के आगे क्यों सर झुका रहा हूँ? नितिन ने भी पापा के फोटो के पैर छुए और फिर मेरे , दीदी और शामली केशामली भी मेरे पैरों कि तरफ झुकी तो मैंने उसको बीच में ही थाम लिया - 'बेटियाँ पैर नहीं छूती।'
'साब आपने मेरे और नितिन के लिए इतना किया , तो मैं पैर क्यों नहीं छू सकती ?'
'मैंने नितिन और शामली को अपने दोनों हाथों से थाम कर सीने से लगा लिया और कहा - 'क्योंकि मैं तुम्हारा बड़ाभाई हूँ।' दोनों बच्चे चेहरा ऊपर उठा कर मुझे देखने लगे कि मैं क्या कह रहा हूँ और फिर कस के चिपट कर फफकफफक कर रो दिएउस समय शायद पापा की आँखों में भी आंसूं गए होंगेमैं और दीदी सबकी आँखों से आंसूं हीबह रहे थेइस जगह मैं सिर्फ एक बड़ा भाई रह गया था


4 टिप्‍पणियां:

  1. एक बहुत ही खूबसूरत ,मर्मस्पर्शी कहानी का सुन्दर अंत .बहुत शुक्रिया इतनी सुन्दर कहानी हमारे साथ बांटने का.

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  2. नायक द्वारा जिम्मेदारियों का बहुत बढ़िया ढंग से वहां किया गया है.. शामली को नया जीवन मिला... हैप्पी एंडिंग... कहानी का प्रवाह अच्छा था... चरित्र चित्रण भी अच्छे से हुआ है.. भाषा भी सहज रही है... एक लम्बी कहानी को आपने अंत तक जोड़े रखा है... आज ही पूरी कहानी पढ़ गया सो अच्छा लगा.. वरना आपने अपने पुराने पाठकों को बहुत इन्तजार करवाया...

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  3. लम्बे समय अन्तराल में सुन्दर कहानी का रसास्वादन मिला . अद्भुत कथानक और सुन्दर शिल्प . आभार .

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  4. आद. रेखा जी,
    कहानी की बुनावट और भाव दोनों ही बहुत अच्छे लगे !
    भविष्य में भी आपकी सुन्दर,मर्मस्पर्शी कहानियां पढ़ने को मिलती रहें इन्हीं शुभकामनाओं के साथ !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.