सोमवार, 21 जून 2010

बड़े घर की कीमत !

वह मेरी गोद में सिर रख कर वह फूट फूट कर रो रही थी और मेरे हाथ उसके बालों को सहला रहे थे. मैं समझ नहीं पा रही थी की उससे क्या पूछूं और  क्या कहूं? कुछ भी तो मुझे पता नहीं था. मैं तो शादी के बाद आज उसको देख रही थी . कभी अनु से पूछा की कनु कैसी है? तो कह दिया ठीक ही है, पर कभी कुछ बताया नहीं हो सकता है कि उसको भी कुछ पता न हो. कनु शादी के बाद लौट कर आई ही कहाँ थी?
हम तो सोचते थे कि इतने अच्छे लोग मिले हैं तो खुश ही होगी. कभी मामी से नानी से मुलाकात हुई तो पता चला की बहुत सुखी है.
                     कनु मेरी बेटी की सहेली है. शुरू से ही साथ पढ़ी हैं और एक ही सेक्शन में तो उनकी दोस्ती उतनी गाढ़ी होती गयी जितने कि साल बढ़ रहे थे. बिना माँ की थी, नाना नानी के घर में पली थी. पिता तो दूसरी शादीके बाद ही पराये हो गए. नाना नानी की बात और थी , अपनी बेटी की बेटी उन्हें जान से ज्यादा प्यारी थी. मामियों के लिए उनके अपने बच्चे थे , कनु  बड़ी बहन की जिम्मेदारी निभा रही थी. फिर भी उसे पराया सा लगता लेकिन रहना वहीं था. परिस्थितियों से जूझ कर वह बहुत समझदार  हो गयी थी. वह अक्सर अनु के साथ मेरे घर आ जाती. कोचिंग पढ़ने आती तो मेरे घर से पास थी . बीच में टाइम मिलता तो दोनों आ  जाती और फिर लंच लेकर चली जाती थी. कभी तो दोनों साथ साथ पढ़ा करती थी. कभी कभी तो  सारे दिन यही पढ़ती रहती . घर में बता देती की अनु के साथ  पढ़ रही हूँ. हमारे परिवार बच्चों के साथ होने से एक दूसरे से परिचित हो गए थे तो उन्हें भी चिंता न रहती.
                      कनु ने एम सी ए किया और अनु डॉक्टर बनी. जब कनु पढ़ाई पूरी कर चुकी तो उसने नौकरी के लिए आवेदन देना शुरू कर दिया कि तभी एक शादी में गयी और वहाँ आने वाले मेहमानों ने कनु को शादी के लिए पसंद कर लिया. वह थी भी बहुत खूबसूरत. सफेद रंग और बड़ी बड़ी आँखें उसकी सुन्दरता की सबसे बड़ी विशेषता थी. नाना नानी बड़े खुश थे, इतना अमीर परिवार उसकी नातिन के लिए प्रस्ताव लेकर आया था. उनकी हैसियत तो न थी कि वे ऐसे घर में बेटी ब्याह पाते. लड़का भी बहुत सुंदर था. सोने पे सुहागा जैसी स्थिति थी. कनु अपनी स्थिति से वाकिफ थी इस लिए उसने घर वालों की इच्छा देखते हुए हाँ कर दी. बस लड़के में एक कमी थी - वह मूक और बधिर था. उसके लिए कोई दूसरा विकल्प न था क्योंकि मामा की लड़कियाँ भी शादी के लिए तैयार हो रही थी फिर उसके लिए कौन इन्तजार करेगा?
                   कनु के घर वालों को कुछ भी नहीं करना पडा . बड़े होटल में 'रिंग- सेरेमनी' हुई. कनु के मामा - मामी और नाना - नानी सिर्फ कनु और एक रिंग लेकर पहुँच गए थे. सारा कुछ समर के परिवार वालों ने ही इंतजाम किया था. सगाई यहीं से हुई थी तो मैं भी उसमें शामिल हुई थी और सच कहूं मुझे भी रश्क हुआ कि कितने बड़े घर में गयी है. उसका बचपन तो अभावों में गुजरा है अब सब कुछ अच्छा है तो उसे सब सुख मिलेगा.
                                  वहाँ पर मैं भी लोगों की प्रतिक्रिया सुन रही थी और सही भी था.
'कुछ भी जो लड़की है किस्मतवाली.'
'लड़के वालों का दिल तो देखो सिर्फ लड़की मांगी है.'
'अभी दुनियाँ में ऐसे देवता जैसे लोगों का भी अस्तित्व खत्म नहीं हुआ है.'
'लाडो अब तो जमीं पर पैर ही न रखोगी. घर में कालीन पर चलना और बाहर गाड़ियों में घूमना.' मामियां भी उसको छेड़ रही थी. वह फिर भी शांत थी, एक समझौता था - सुन्दरता और अमीरी के बीच. वह चुप थी क्योंकि वह जानती थी की आज नहीं कल किसी विसंगति से ही उसको दो चार होना है फिर क्यों न इस तरह से सही, जिसमें लड़के का मानसिक स्तर तो उसके बराबर का है और फिर घर वाले भी सुलझे हुए हैं नहीं तो क्या पता कि कल दहेज़ के मारे ही उसको तिरस्कृत कर दें. 
                                शादी उन्होंने वहीं अहमदाबाद में बुलाकर करने को कहा था. कोई चिंता की बात नहीं थी, सारा कुछ उनका इंतजाम था और इनको बस लड़की लेकर जाना था. वहीं शादी हो गयी. अनु ने भी अपनी पढ़ाई पूरी करके दिल्ली में ही जॉब के अनुकूल माहौल देखा और वहीं जॉब करने लगी. कनु अपने घर में मस्त होगी , यही सोचकर सब अपने जीवन में व्यस्त हो गए.
                               एक साल बाद पता चला की कनु को बेटा हुआ है. उनके घर वालों को न जाने की कोई चाहत थी और न कोई गया. कभी उससे घर वालों से मुलाकात हो जाती तो पूछ लेती थी की कनु कैसी है तो सब कह देते बहुत अच्छे से है. यही सोच कर सब खुश थे. 
                            मैं कभी कभी छुट्टी लेकर अनु के पास चली आती थी. अनु और कनु में बात होती रहती होगी लेकिन मुझे अनु ने कभी कुछ नहीं बतलाया और फिर समय के साथ सब कुछ अलग लीक पर चल रहा पता भी तो नहीं चलता है. अनु अपने हॉस्पिटल गयी थी और मैं घर में अकेली थी की काल बेल बजी - खोला तो कनु खड़ी थी. एकदम दुबली सी आँखों के नीचे काले घेरे एक ही अटैची थी उसके हाथ में. उसका बेटा भी नहीं था. मेरे मन में हजारों प्रश्न उमड़े उसकी ये स्थिति देख कर . लगता है कि वह सीधे अनु के पास ही आई थी. अटैची उसने वही जमीन पर रखी और 'आंटी ' कहकर मेरे गले से लग गयी और फिर जोर जोर से रोने लगी . मैंने सोचा कि इतने दिन बाद मिली है तो जी भर आया होगा .  मैंने उसको वहीं दीवान पर बिठाना चाहा तो वह और कसकर पकड़ चिपक गयी. मैंने उसे बिठा कर खुद बैठी , वह अब मेरे गोद में सिर रख कर रोये जा रही थी. मैंने सोचा कि रो लेने से जी हल्का  हो जाता है इसलिए इसको रो ही लेने दो. 
                                                                                                                               (क्रमशः )

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही मार्मिक कहानी है....एक पढ़ी लिखी ख़ूबसूरत लड़की की ऐसी स्थिति देख मन दुखी हो गया...आगे जानने की उत्कंठा और बलवती हो गयी है.
    बहुत ही प्रवाह में है कहानी...बांधे रखती है

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.