शुक्रवार, 18 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ ? ( समापन )

                आफिस में जाकर पता चला कि नौकरी या तो पत्नी को मिलेगी या फिर बेटे को. अगर पत्नी न कर सके तो जगह सुरक्षित रखी जाएगी और बेटे को मिल जायेगी. रहने का मकान भी सुरक्षित रहेगा. पेंशन पत्नी को मिलेगी.  देवर के सोचे हुए से तो उल्टा ही होने वाला था. अभी तो घर वालों ने ये सोचा था कि वहाँ कहाँ रहेगी? लड़के के साथ यहाँ ले आयेंगे और पेंशन भी देवर ले आएगा. फिर कौन देता है?
उसको बड़ी तसल्ली मिली. चलो बेटे को यहाँ रहकर पढ़ा तो लेगी और फिर वह यहीं आकर रहने लगी लेकिन वह घर उसको खाने को दौड़ता था सो उसने घर दूसरा किराये पर ले लिया. जब विनीत ने बी.ए. कर लिया तो नौकरी मिल गयी.
                         विनीत को जब भूख लगी तो किचेन में गया , ये क्या माँ तो अभी सब्जी ही काटे रखे थी? पता नहीं कहाँ खोयी थी? उसने पीछे से जाकर उसको बाँहों में भर लिया - ओ माँ मुझे बहुत जोर की भूख लगी है. माँ चौंक गयी - अरे हाँ अभी देती हूँ न. तुम जाओ बाहर चलो ले कर आती हूँ.
 *        *           *          *              *            *           *           *           *               *            *                   *
                              तरुणा को घर चलने के लिए घर वाले जोर दे रहे थे और वह घर बिल्कुल ही नहीं जाना चाहती थी. आज तो पिताजी और भाई दोनों ही इस पर बरस कर गए थे. पूरे वार्ड में तमाशा खड़ा कर दिया.
"क्या है ऐसा जो यहाँ से नहीं जाना चाहती है?"  पिताजी बार बार पूछ रहे थे.
"अरे मुझसे पूछो ये दूसरे ही गुल खिलाने वाली है, वो आता  हैं न लूला उससे साथ हंसी ठिल्ले होते हैं. वह तो करने को मिलेगा नहीं न.."
भाई की यही भाषा थी और वह वार्ड के लोगों के सामने शर्मिंदा हुई जा रही थी.
"देख आज तू निर्णय कर ले कि तुझे घर चलना ही कि नहीं. " पिता  ने आदेश दिया.
"चलेगी कैसे नहीं? इसको यहाँ से कल मैं ले जाऊँगा, नहीं करवानी कुछ एक्सरसाइज वगैरह ऐसी ही काम करेगी तो ठीक हो जायेगी. यहाँ लेटे लेटे खा रही हैं न तो मुटाई चढ़ गयी है. सब घर जाकर उतरेगी."  उसे कुछ नया नहीं लग रहा था ये तो उसके घर की संस्कृति है.
                  उसके पिता और भाई भनभनाते हुए चले गए और तरुणा को लग रहा था की ये धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए. क्या सोच रहे होंगे सब ये तमाशा देख कर . उसको ही दोषी मान रहे होंगे. असलियत को किसी को पता नहीं है और न उसमें बताने की हिम्मत है. वह चुपचाप तकिये में मुँह छिपा कर लेट गई. इससे किसी से नजरें तो नहीं चुरानी पड़ेंगी और किसी के सवालों का जबाव भी नहीं देना पड़ेगा.
                        विनीत कल से खुश था कि माँ तो राजी है अब उसको किसी की परवाह नहीं. आज तो वह तरुणा से कह ही देगा. अगर वह राजी होगी तो फिर कोई बात नहीं और न हुई तो फिर भी कोई बात नहीं. बचपन से ही तो वह घर में वही सब बातें सुनता चला आ रहा है अपने विकलांग होने की कमी को.  अगर तरुणा भी मना कर देगी तो उसको बुरा नहीं लगेगा. लेकिन एक बार वह पूछेगा जरूर.
                         विनीत जैसे ही वार्ड में घुसा और लोगों की नजरें उसकी तरफ उठ गयीं. खुसफुस   की आवाजें उसे सुनाई पड़ने लगीं.
'अरे यही तो नहीं है.'
'हाँ यही है, रोज आता है.'
'तभी बाप भाई कहे.'
'तनकों इन्हें बाप भाई की इज्जत का ख्याल नहीं रहत. '
              तरुणा मुँह छिपाए लेती थी. विनीत वही खड़ा रहा फिर उसने धीरे से बैड का सिरहाने पर थपथपाया तो तरुणा ने सिर उठा कर देखा. उसकी आँखें लाल हो रही थी कोई भी कह सकता है की वह रो रही थी. विनीत को बैठने का इशारा भर किया और खुद उठ कर बैठ गयी.
"क्या हुआ?" विनीत जानना चाहता था.
"कुछ नहीं , वही कि घर चलो और वह वापस नहीं जाना चाहती क्योंकि मुझे  यहाँ के अकेलेपन और शांति से प्यार हो गया है. वापस उस नरक में नहीं जाना चाहती."
"फिर क्या सोचा है?" विनीत ने भी प्रश्न ही किया.
"अभी तो वह लोग जो आग उगल कर गए हैं उसकी ज्वाला में झुलसी जा रही हूँ." तरुणा ने कह ही दिया.
"क्या चाहते हैं? "
"यही कि तुम न आओ, और मैं घर में जाकर कैद हो जाऊं और उनके काम करूँ."
लेकिन ये कैसे होगा? अभी तो तुम चल ही नहीं पा रही हो फिर काम कैसे करोगी? "
"मैं कुछ नहीं जानती वे यही चाह रहे हैं." तरुणा रो ही पड़ी.
"तरुणा अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें अपने घर ले चलूँ." विनीत ने जो मन में सोचा था वह उसके जुबान पर आ ही गया.
"क्या अपने घर , तुम्हारा दिमाग तो ठीक है." तरुणा आश्चर्य से बोली.
"हाँ क्यों नहीं?" विनीत के स्वर में दृढ़ता थी.
"लेकिन किस हक़ से ? क्या जबाव है तुम्हारे पास लोगों के सवालों का. कुछ सोचा भी है तुमने कहने से पहले." तरुणा को पता था कि कितना मुश्किल होने वाला है उसका आगे का जीवन.
"तरुणा सवालों और जबावों से मैं डरता नहीं, फिर पूर्ण विराम के बारे में माँ से पूछ चुका हूँ. मैं तुम्हें मंदिर में शादी करके ले जाऊँगा." विनीत ने तरुणा के प्रश्नों पर पूर्ण विराम लगा दिया था.
"विनीत , इतना बड़ा निर्णय वह भी बगैर मुझसे पूछे तुमने लिया कैसे? " तरुणा विस्फारित होकर उसे देख रही थी.
"मैंने तुम्हें बहुत अच्छी तरह से पढ़ने और जानने के बाद ही ये निर्णय लिया है. हाँ अगर तुम्हें मंजूर  न हो तो बात अलग है. तुम इस बात के लिए मजबूर नहीं हो." विनीत ने दृढ स्वर में अपनी बात स्पष्ट कर दी थी क्योंकि वह तो माँ से कह ही चुका था कि ये उसका निर्णय है और इसी लिए उससे अनुमति मांग रहा है. तरुणा क्या चाहती है? ये अभी पूछा नहीं है.
"नहीं विनीत, मैं खुद अकेले चलते चलते थक गयी हूँ - मुझे एक घर चाहिए और वह तुम्हारा ही घर हो सकता है." तरुणा के मुँह पर उसके मन की बात आ चुकी थी.
"तब लाओ अपना हाथ ." विनीत ने तरुणा का हाथ अपने हाथों में थाम लिया और तरुणा ने एक सुखद भविष्य की कल्पना में उसके हाथों पर अपना  सिर टिका दिया.   
                                                                ( इति )

28 टिप्‍पणियां:

  1. क्या कहानी है और इसका अ6त सच में सुखद है बहुत बडःइया.ल

    उत्तर देंहटाएं
  2. "ACHCHHA HONA JAB HOTA HAI
    ACHCHHA AVSAR MIL JATA HAI .
    SOOJH-BOOJH ACHCHHI HOTI HAI
    ACHCHHA PATH BHI MIL JATA HAI".

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह ऐसे ही अंत का इंतज़ार था मुझे ...बहुत अच्छी लगी कहानी .

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्दर समापन...ऐसे ही सुखद अंत की अपेक्षा थी..प्रार्थना कर रही थी कि विनीत में मन की बात कहने की हिम्मत आ जाए और तरुणा में भी अपने परिवार का सामना करने का साहस..कहीं वो समाज का डर ना उस पर हावी हो जाए...पर आपके नायक नायिका हैं ना..:)...बहुत ही अच्छी रही कहानी...अकेली लड़की की परेशानियों को अच्छा उभारा है...उनके अपने भी अपने नहीं रह जाते.

    उत्तर देंहटाएं
  5. अति सुन्दर समापन.आज पहली बार आ रहे हैं इसलिए पुरानी पोस्टों को भी पढ़ लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  6. nice post, i think u must try this website to increase traffic. have a nice day !!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. आज ही सारे अंक पढे .. बहुत ही अच्‍छी कहानी .. सुखद अंत अच्‍छा लगता है .. पर कहानी का अंक 2 नहीं दिखा .. वैसे इसके बावजूद कहानी अधूरी नहीं लगी !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. कहानी का सुखांत पसन्द आया और ताना बाना भी।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  9. एक नए आगाज के साथ कहानी का सुखान्त हुआ. अच्छी कहानी.

    उत्तर देंहटाएं
  10. काश! कहानी जैसा अंत, वास्तविक जीवन में भी होने लगे।

    उत्तर देंहटाएं
  11. पता नही हम लोग हमेशा कहानी का सुखद अन्त क्यों चाहते हैं ।जब कि असल जिन्दगी मे अक्सर अन्त दुखद ही रहता है मै भी जब कभी दुखद अन्त की कहानी लिखती हूँ तो उदास रहती हूँ जब तक उसे सुखद अन्त मे ना बदल दूँ इस लिये मुझे भी आपकी ये कहानी बहुत अच्छा लगी। दोनो का निर्नय बहुत अच्छा था। धन्यवाद और शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत अच्छी कहानी लगी। बधाई स्वीकारें।

    हम सभी स्वभावत: सुख ही चाहते हैं...इसी लिए सुखद अंत करना चाहते हैं....लेकिन यह भी जरूरी नही कि हरेक कहानी का अंत दुखद ही होता है.कहानी बहुत सुन्दर लगी। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  13. सामाजिक यथार्थ के साथ एक सुखांत कहानी अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं
  14. सबसे पहले आप सबको बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने कहानी को स्वीकारा. हाँ हम सुखांत इस लिए चाहते हैं कि जीवन में दुःख के अलावा क्या देखने को मिलता है. हम दूसरों के दुःख से विचलित हो जाते हैं तो फिर उसके लिए एक सुख की कामना करते हैं. उनका फिर जो भी हो हम तो सुख ही चाहते हैं.
    वैसे एक बात मैं बता दूं, मेरा अपना अनुभव कि एक बार मैंने एक कहानी लिखी सच पर आधारित थी और मैंने जो उसमें दृश्य दिखाया वह तब घटित नहीं हुआ था और फिर जैसे मैंने लिखा था ठीक उसी तरह से ५ साल बाद घटित हुआ . ऐसा दो बार हुआ तब से मैंने कुछ भी बुरा न सोचने कि कसम खाई थी.

    उत्तर देंहटाएं
  15. सही अंत किया कथा का.....बहुत बढ़िया रही कहानी.

    उत्तर देंहटाएं
  16. हिंदी कहानियों का सुखांत अंत... इन्हीं मे छुपा है हमारी संस्कृति की सहनशीलता का राज़ ... संघर्षों से लड़ते हुए हमेशा एक दिन सुखद भविष्य की आशाएं ही हमें टूटने से बचाती है...

    सुंदर ....

    उत्तर देंहटाएं
  17. आज ही पूरी कहानी पढ़ी. बहुत बहुत अच्छी कहानी और अंत बहुत ही बढ़िया लगा. सारे किरदार आँखो मे जेसे घूम रहे थे.

    उत्तर देंहटाएं
  18. आज ही पूरी कहानी पढी………………सुखद अंत से राहत हुयी और ऐसा ही होना भी चाहिये था।

    उत्तर देंहटाएं
  19. Vineet was a real man !

    Unfortunately most of the physically normal people are mentally challenged.

    Today in society most of the men are blessed with sick mentality like Taruna's brother and father.

    We need more people like Vineet.

    Nice story....A perfect end !

    उत्तर देंहटाएं
  20. रेखाजी
    एक हफ्ते से गाँव चली गई थी |आज ही कहानी की सम्पन किस्त पढ़ पाई |कहानी का सुखद अंत सुख दे गया |असलो जीवन में भी ऐसे ही तरुणा और विनीत का संयोग हो तो कितनो के जीवन सवार जाय |
    बहुत अच्छी कहानी |

    उत्तर देंहटाएं
  21. It's really a nice story.Thank you Rekha Ji for this lovely story.

    उत्तर देंहटाएं
  22. Aapko kai Taruna ko jeevan dena hai. Such a nice story. badhai & Shubhkamna.

    उत्तर देंहटाएं

कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.