गुरुवार, 17 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ? (४)

                               ऐसा नहीं कि माँ विनीत में हो रहे वैचारिक परिवर्तन से वाकिफ न हो, लेकिन वह अपनी गरिमा के अनुसार ही जब विनीत उससे अपने ऑफिस या कोई अन्य मामले की चर्चा करता था तभी  वह उसको राय देती थी. कुछ शंका तो उसके मन में भी पल रही थी आखिर माँ जो थी. वह इस इन्तजार में थी कि जरूर विनीत उससे बताएगा कि उसकी इस गहन विचारशीलता का राज क्या है?
                               विनीत चुपचाप चाय पी रहा था माँ भी चुप ही बैठी थी.  विनीत को यह समझ नहीं आ रहा था की वह कैसे शुरू करे?  कहीं माँ को ये तो नहीं लगेगा की मैं अपने लक्ष्य से भटक रहा हूँ. जिस हालत में वह सबसे लड़कर मुझे लेकर यहाँ आई थी तो उनका सपना था कि वह कुछ बने. उसका भी यही सपना है कि वह कुछ बन कर ये दिखा दे कि अगर होंसले बुलंद हों तो ये अपंगता भी उसके आगे नत हो जाती है. उसने सोचा कि आज माँ से बात कर ही लेता हूँ.
"माँ, एक बात पूंछूं तो आप नाराज तो नहीं होंगी?" विनीत ने बड़े ही नम्र स्वर में माँ से कहा.
"अरे, ये कैसी बात कर रहे हो? मैंने कभी भी नाराज हुई हूँ तुझसे."  माँ ने विश्वास दिलाया
"माँ,  कैसे कहूं? कुछ समझ नहीं आता है?" विनीत हिचकिचा रहा था.
"बोलो तो सही, नहीं तो मैं कैसे जानूंगी की तुम क्या कहना चाहते हो?"
"माँ,  मैं तरुणा  को अपने घर लाना चाहता हूँ."  आखिर उसने साहस करके बता ही दिया.
"क्या?  ये तूने कैसे सोचा? उसके घर वाले और वो बहुत सारी बातें होती हैं." माँ ने दुनियांदारी की बात उसको समझाना चाहा .
"मैं सिर्फ आपकी राय मांग रहा हूँ, बाकी सब तो बाद में आयेंगे."
" क्या तरुणा  ने कुछ कहा ऐसा?"
"नहीं माँ, तरुणा क्या कहेगी? ये तो बाद की बात है, मैं तो आपसे पूछ रहा हूँ. अगर मैंने तरुणा से पूछा होता और वह हाँ कर देती और आप न फिर मैं क्या करता?" विनीत अपने प्रश्नों से खुद ही घिरा था और सोच रहा था कि  किससे पहले निपटा जाय.
"मैंने  न  कर  दूँगी , ऐसी बात तुम्हारी दिमाग में कैसे आई ?" माँ ने उससे ही प्रश्न किया था.
"वैसे ही, कभी ऐसी बात आई ही नहीं कि मैं कुछ समझ पाता  कि  आप क्या कहेंगी?"
"मान लो मैं हाँ कर देती हूँ, फिर तरुणा के घर वाले और तरुणा." माँ के आगे बहुत सारे प्रश्न थे. जो उससे नहीं दूसरों  से शुरू होते थे और फिर उन्हीं पर ख़त्म होने थे.
"वो तो दूसरी बात है, पहले अपने घर की छाँव खोजते हैं न, जहाँ शरण तो मिल सके. बाकी दुनियाँ से लड़ने की ताकत खुद ब खुद आ जाती है." विनीत दार्शनिक लहजे में बात कर रहा था.
"चल मैंने हाँ कह दिया अब?" माँ ने अपनी स्वीकृति दे दी.
"अब क्या? आगे सोचता हूँ कि क्या करना होगा? अभी तो कई पड़ाव पार करने पड़ेंगे." कुछ निश्चिन्त स्वर में विनीत बोला.
"अरे हाँ माँ , ये तो बताओ की चाचा, बाबा और मामा का क्या होगा?" अभी कई प्रश्न उसके पाले में ही मुँह बाए खड़े थे.
"उनकी बाद में देखेंगे, अब मैं तो जाती हूँ खाना बनाने तू भी आराम कर." माँ के सामने चाचा, बाबा के नाम आने से और भी कई घाव उभरने लगे थे, जिन्हें वह विनीत के सामने नहीं खोलना चाहती थी.
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                            उसे वह दिन भूला नहीं है, जब विनीत को अचानक तेज बुखार हुआ. तब वह ससुराल में गाँव में रहा करती थी. उसके पिता यही नौकरी करते थे. वह दवा के लिए सबसे कहती रही लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था. जब कि सब के सब उसके पिता की कमाई पर ही ऐश कर रहे थे. खुद थोड़े में काम चला कर सब घर में दे आते थे.  रात में और बुखार बढ़ा वह तवे की तरह तप रहा था. घबरा कर उसने अपनी सास को जगाया कि बच्चे को बहुत तेज बुखार हो रहा है. सास ने नींद में ही कह दिया अब रात में क्या होगा? पानी का कपड़ा  रख सुबह देखा जाएगा. और जब सुबह हुई तो अचेत विनीत को डॉक्टर के यहाँ लेकर गए उस समय उसका बायाँ हाथ पोलिओ के असर से झूलने लगा था. उसकी समझ में कुछ नहीं आया था. लेकिन ये जान गयी कि उसके लाडले को अगर समय से डॉक्टर को दिखाया होता तो ये न होता. लेकिन कह नहीं सकती थी.
                          उसके पिता को खबर तक न दी गयी, कह दिया कि खबर कर दी. वह तो महीने में एक बार ही आ पाते थे. जब आये  तो विनीत को देख कर बहुत गुस्सा हुए कि मुझे खबर नहीं कर सकती थी. वह क्या कहती? अगर कह देती कि इन लोगों ने कहा था कि कर दी है तो गृहकलह के अलावा कुछ न होता और जो दो दिन के लिए आये थे. वह भी ऐसे ही निकल जाते. लेकिन उसके पिता ने ये निर्णय लिया कि वह विनीत को और उसको अपने साथ ले जा रहे हैं. वही पर विनीत को डॉक्टर को दिखायेगा और इलाज कराएगा. घर में कुहराम मच गया था. इसने ही लगाया होगा नहीं तो मेरा बेटा ऐसा नहीं था. देवर जरूर इन्हीं ने कान भरे होंगे नहीं तो भैया कभी ऐसा बोले  ही नहीं.
                        शहर में आकर कई डॉक्टर को दिखाया , बहुत इलाज हुआ लेकिन उसके हाथ में सुधार तो हुआ पर पूरी तरह से ठीक  नहीं हुआ. ईश्वर का दंड समझ कर स्वीकार कर लिया. विनीत वहीं पढ़ने भी लगा. घर में पैसे भेजना अब कम हो गया क्योंकि अब तो परिवार यहाँ आ गया था.  इस मामले में वह ही सबको विलेन दिखाई दे रही थी. फिर एक बार विनीत की छुट्टी में वह घर गयी कुछ दिन रहने के लिए ताकि सबको ये न लगे की घर ही छोड़ दिया है. लेकिन ये क्या? यहाँ तो सब कुछ बदल चुका था.
"सोचती हैं कि इस लूले को डॉक्टर बनाएगी." देवर के स्वर का कटाक्ष उसके कान में पड़ा तो कलेजा चीर के रख दिया. ये दिन ईश्वर ने दिया है तो सुनना भी पड़ेगा.
"अरे यही गाँव में रखे खेती बड़ी देखेगा तो कोई ब्याह भी जाएगा नहीं तो ऐसे ही फिरेगा." अब की बार बारी उसके ससुर की थी.
                  छुट्टी के दो महीने उसने वही गुजारे लेकिन फिर न गुजारने का फैसला करके वह घर से चली. अपने बेटे के लिए कुछ भी करेगी उसको कमाने लायक शहर में ही बनाएगी.
                  पर अपना सोचा होता कहाँ है? जब १४ साल का था विनीत तो उसके पिता एक एक्सीडेंट में चल बसे. घर से तो पहले कट चुके थे. फिर भी उसको सब घर ले गए. शायद लोगों को बदला लेने का अवसर मिल गया था. जितनी भी भड़ास थी सब निकाली गयी. पर उसके तो हाथ और पैर दोनों ही कट चुके थे. उसको अब अपने बेटे का भविष्य भी अँधेरे में डूबता नजर आ रहा था. लोगों को कटाक्ष करने का अवसर ईश्वर ने ही दे दिया था.
"डॉक्टर बनाने चली थी. अब देखते हैं कि क्या करता है?  अरे खेत जोतेगा."
"अब तो इस को कोई अपनी लंगड़ी लूली बिटिया भी ब्याह दे तो बहुत है."
"जा देख , अब उसकी नौकरी तुझे मिल जायेगी, तू जाकर कर नौकरी." ससुर देवर को सलाह देते.
                    वह अकेले में फूट फूटकर रो लेती और फिर काम करने लगती. पर ईश्वर को उसपर दया आ गयी और पति के ऑफिस से खबर आई की पत्नी को बुलाया गया है. देवर लेकर चले तो रास्ते भर समझाया  -   "नौकरी की कहें तो मना कर देना कौन सा  बहुत पढ़ी कि कलक्टरी मिल जायेगी. पेंशन हम ले आया करेंगे और नौकरी भी हमारी ही लग जाएगी . मैं तो चपरासी कि नौकरी भी कर लूँगा कोई कुछ न कहेगा . तू नौकरी करेगी  तो नाक न कट   जायेगी खानदान की .
                                                                                                                                    (क्रमशः)
 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी ही मार्मिक होती जा रही है कहानी |लगता है अपने आसपास ही घट रहा है ये सब |
    हा ये भी सही है कठिनाइयों से भरे जीवन जीने वालो की कभी हार नहीं होती |

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  2. ये किश्त माँ के नाम रही संघर्ष को सटीक शब्द दिए हैं आपने .

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  3. कहानी, बहुत ही दर्द भरी होती जा रही है...पर सच्चाई भी यही है..कैसे झुठला सकते हैं...कितने ही जीवन का दर्द समेटे है ये कथा...सुखान्त करियेगा...असल ज़िन्दगी में ना सही...कहानी तो सुखान्त हुआ करे (जैसा लोग मुझसे डिमांड करते हैं...मैने भी कर दिया :))

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. aaj ki kahni achhi thi kaphi samajasdari bhara tha
    thanking you

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.