बुधवार, 16 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ? (3)

                          कितना अच्छा होता कि वह इस हादसे में मर ही जाती, कम से कम फिर से वही तो न देखना और सुनना पड़ता. क्या भविष्य है उसका? बस अपने खर्च के लिए नौकरी करते रहो और घर वालों की बातें सुनते हुए उनकी सेवा करते रहो . इतने पर भी घर में चैन होता तो संतोष कर लेती . इस पलंग पर पड़े रहना अधिक सुख देता है, भले पैर पर प्लास्टर चढ़ा है फिर भी. कम से कम विनीत से तो रोज मिलना होता है - कितना अच्छा लड़का है नहीं तो क्या पड़ी है कि कोई उसके लिए रोज रोज यहाँ आये. कहीं ऐसा तो नहीं कि उसको उसकी बेचारगी पर तरस आ रहा हो. अगर ऐसा है तो वह बेचारी तो बिल्कुल भी नहीं है. हाँ अभागी भले ही कहा जा सकता है लेकिन वह अपने आप में सक्षम है और जीवन संघर्ष में अकेले ही लड़ने का दम रखती है. नहीं नहीं ऐसे तो नहीं ही सोचता होगा. वह जानता है कि मेरे घर का माहौल  कैसा है? इसी लिए वह देखने आ जाता होगा.
                        फिर भी कुछ तो है विनीत कि आँखों में कि तरुणा को वह बहुत अच्छा लगता था और रोज शाम को उसका इन्तजार करती थी. वह इस बात कि आदी हो चुकी थी. 
                       तभी कुछ आहट हुई तरुणा ने सोचा कि विनीत आया होगा लेकिन ये क्या? सामने उसके पापा खड़े थे. 
"मैं डॉक्टर से पूछने जा रहा हूँ कि वह कब प्लास्टर काटेंगे और कब तुझे छुट्टी देंगे." पिता ने अपना फैसला सुना दिया.
                      जाइये , जाइये यह भी कर लीजिये , बहुत दिन हो गए सेवा से वंचित हुए. लेकिन मैं नहीं जाना चाहती तो फिर ये क्यों पीछे पड़े हैं. मैं तो बस इसी कमरे और इसी बिस्तर से जुड़ी रहना चाहती हूँ. और सभी बैड के मरीज ठीक होकर चले गए लेकिन वह ही है जो कि अभी तक रुकी हुई है और फिलहाल जाना भी नहीं है. 
डॉक्टर से पूछ कर लौटे पिता ने आकर उसको बताया  - 
"वो डॉक्टर तो कह रहा है कि अगर प्लास्टर काट भी देगा तो रोज यहाँ एक्सरसाइज के लिए आना पड़ेगा." पिताजी कुछ नाराज दिखाई दे रहे थे.
"फिर मेरे यहाँ से जाने का फायदा क्या है? जब मैं पूरी तरह से ठीक हो जाऊं तभी घर जाऊं. मुझे यहाँ कौन रोज रोज लेकर आएगा?" तरुणा को सुनकर बड़ा संतोष मिला. कम से कम एक आधार तो है यहाँ रुकने का. उसे घर से दूर और विनीत का साथ सुकून देने लगा था. 
         लेकिन पिता को ये कैसे गवारा होता? उन्हें खाना लेकर आना पड़ता था और कभी कभी बेटों को भी आना पड़ता था. इसी लिए वह छुट्टी दिला कर घर ले जाना चाहते थे. रोज की भाग दौड़ से तो पैसा भी बहुत खर्च होता है. वहाँ रहेगी तो कुछ न कुछ तो करती ही रहेगी. माँ बीमार रहती है, लड़कों को करना नहीं आता है. खाने वाली का भी पैसा देना पड़ रहा है. तरुणा की बात सुनकर और आग बबूला हो गए - "तू तो चाहती है कि यहीं पड़ी रहे, पर ऊपर से भाग दौड़ किसको करना पड़ती है? कितना पैसा लग रहा है? इसका हिसाब है तेरे पास. रोज ऑटो लेकर आना पड़ता है. स्कूटर ख़राब पड़ा है फिर दोनों टाइम आना एक बड़ा काम होता है. "
                      तरुणा इसके तैयार नहीं थी, उसे लगा जैसे कि ये उसका पिता नहीं बल्कि कोई किराये का आदमी बोल रहा हो. वह एकदम से खीज गयी - "आप लोगों को मेरे लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है, न ही खाना लाने की और न ही देखने आने की. जब मैं चलने लायक हो जाऊँगी अपने आप खुद ही आ जाऊँगी. " 
                   पिता गुस्से के मारे उठकर चले गए और तरुणा तकिये में मुँह छुपा कर रोने लगी. दिमाग तो अपना काम कर ही रहा था. मैंने कब चाहा था कि मुझे ऐसा घर दे , जिसमें अपनत्व जैसी कोई चीज ही नहीं है. कोई आशा की किरण जागती भी है तो फिर ऐसे हादसे अँधेरे में डुबो देते हैं. भगवान ने भी मेरी किस्मत फुरसत में लिखी होगी, जिसमें कभी कोई विराम या वर्तनी बदलने की सोची ही नहीं. वही बातें , वही ताने और वही असभ्य भाषा है. ये लगता ही नहीं है की कोई पिता अपनी बीमार बेटी से बात कर रहा है. लगता है की कोई खरीदी हुई नौकरानी है जिस पर ये लोग अहसान कर रहे हैं.
                  वह कितनी देर रोती रही और विनीत आकर खड़ा रहा , रोने से जी हल्का हो जाता है इसलिए उसने कोई भी आहट नहीं होने दी. वह दरवाजे के पास जाने लगा तो तरुणा को कुछ आहट मिली - उसने सीधे होकर देखा तो विनीत को देखकर उठकर बैठ गयी - " बैठिये न खड़े  क्यों हैं?   विनीत बैठ गया तो तरुण ने उसे बताया कि आज पापा ने डॉक्टर से ले जाने के बारे में बात की थी और डॉक्टर ने क्या कहा? 
" विनीत , मैं वापस घर नहीं जाना चाहती, एक महीने से इस बिस्तर और कमरे से बहुत प्यार होगया है. वापस उस नरक में अब नहीं जाना चाहती."  तरुणा अपनी बात कह गयी लेकिन फिर लगा कि पता नहीं विनीत क्या सोचे?  सोचने दो - मैं गलत कहाँ कह रही हूँ? विनीत को भी पता है कि मेरे घर और घर वाले कैसे हैं? उसने भी उस रात सारे डायलाग सुने थे न. 
                   विनीत भी कहाँ चाहता था कि तरुणा यहाँ से जाए, वह ऑफिस से निकल कर सीधे आ जाता था और कुछ समय उसके साथ बिता कर चला जाता था. नहीं तो घर में जाकर वही किताबों में सिर डाले बैठा रहता है. वह भी तरुणा से कहीं जुड़ गया था. - ऐसा नहीं कि तरुणा को इसका अहसास न हो किन्तु कोई किसी से बोला नहीं था. विनीत  को अपने विकलांग होने का अपराध बोध से ग्रस्त होकर उससे कुछ नहीं कह पाया और तरुणा तो तलाकशुदा होने के कलंक को उठाये ऐसा कुछ सोच ही नहीं सकती थी. पर ये सोचना क्या समाज  के बनाये इन कानूनों से बांधा जा सकता  है या फिर समाज उसके दिमाग को गिरवी रख चुका है. फिर क्यों नहीं वह कुछ कह पाती है? 
                        विनीत बैठा ही था कि तरुणा का भाई आ गया शायद उसे चैक पर साइन करवाना था. विनीत उसको देख कर उठ खड़ा हुआ और इजाजत लेकर चला गया. तरुणा भाई का चेहरा देख रही थी, उसके चेहरे पर कुछ क्रोध और झुंझलाहट के भाव तैरने लगे थे. ये तो उसको पता था कि ये कुछ न कुछ बवाल खड़ा जरूर करेगा. 
"ये लूला यहाँ क्या करने आया था?" भाई ने ठेठ भाषा में बात की. 
"मुझे देखने आया था, कोई परेशानी? तरुणा ने भी उसी भाषा में जवाब दिया. 
"हाँ , मैंने नहीं पसंद करता कि कोई मोहल्ले का यहाँ आये." 
"तुम्हारी पसंद का क्या मतलब? कोई मुझसे मिलने नहीं आ सकता."
"इसका रिश्ता क्या है?
"जीवनदाता का."
"क्या मतलब? बहुत लम्बी जबान हो गयी है तेरी. "
"उसने न बताया होता तो मैं सारी रात सड़क पर पड़ी रहती, और तुम सारे चैन की नींद  सो रहे होते. " तरुणा का आक्रोश भी सही था , लेकिन वह कभी इस बारे में बोली नहीं थी. 
"कोई भी होता वही ये करता , लेकिन इसका क्या मतलब कि यहाँ आकर रोज बैठता है ." 
"हाँ , ऑफिस लौटते रोज आता है." 
"तुम्हें शर्म नहीं आती, कौन  सा रिश्ता बनता है कि यहाँ रोज आता हैं."
"इंसानियत का" तरुणा सपाट स्वर में बोली.
"मुझे इंसानियत मत सिखा, अपनी औकात में रह. और हाँ इससे कह देना कि ये अब न दिखाई दे." औरंगजेबी फरमान जारी करके वह चला गया. 
             वार्ड के और बैड पर पड़े हुए मरीज इस बात को सुन रहे थे. लेकिन उसको बुरा नहीं लगा क्योंकि ये तमाशा तो घर में मोहल्ले वाले सुनते हैं और यहाँ पर साथ वाले. कभी पिता , कभी भाई ऐसे ही बोलते हैं. यही लहजा और यही भाषा बोली जाती है उसके घर में. 
पर वह विनीत से क्या कहेगी? फिर यहाँ रहने का कोई मतलब ही नहीं है. वह यहाँ रहना ही चाहती है कि विनीत रोज मिलता रहे. कोई तो ऐसा है जिससे उसे सभ्य भाषा सुनने को मिलती है, नहीं तो घर की बानगी सबने देख ही ली. है. 
       *          *           *              *             *           *             *             *                  *                 *
                  विनीत वहाँ से तो चला आया लेकिन फिर उसे लगा कि उसको आना नहीं चाहिए था. उससे भाई के सामने भी बैठे रहना था. 
-कोई चोरी तो कर नहीं रहा था फिर क्यों? 
-क्या तरुणा से सुने उन लोगों के स्वभाव से डर कर वह भागा?  
-क्या वह बुजदिल है? 
लेकिन फिर ये भी बताये कि वह तरुणा के बारे में इतना क्यों सोचने लगा है? 
                   शायद इसलिए कि उसको उससे सहानुभूति है या फिर उसके प्रति कोई लगाव उसके मन में पैदा हो चुका है. लेकिन खुद को तो कोई झुठला नहीं सकता , अगर ये सिर्फ वही सोचा रहा होगा तो ? उसने कभी तरुणा से तो पूछा नहीं और न ही तरुणा ने कभी उसको इस बारे में संकेत दिया. फिर इसका मतलब क्या है? क्या अब उसका लक्ष्य कुछ और बनने लगा है? उसने माँ से भी तो कुछ नहीं पूछा है. फिर ये कैसा संशय है? क्या चाहता है वह ? आज वह इस बात का निर्णय लेकर रहेगा कि उसका ध्येय क्या है? अच्छी खासी जिन्दगी में ये कैसा झंझावात आ गया ? पता नहीं क्या क्या सोचे जा रहा था, तभी मान ने चाय लाकर रख दी. उसके विचारों का क्रम टूट गया और वह वर्त्तमान में आकर चाय पीने लगा.
                                                                                    (क्रमशः) 

7 टिप्‍पणियां:

  1. Nice story ! I am curious to know the remaining part.

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  2. एक साँस में पढ़ गई सारी कहानी ..जल्दी दूसरी कड़ी डालिए.

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  3. तो स्नेह का अंकुर प्रस्फुटित होने लगा है....:)..देखें, प्रतिकूल परिस्थितियों में यह, कैसे एक पौधे और फिर वृक्ष का रूप धारण करता है...अगली कड़ी का इंतज़ार

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  4. अच्छी कहानी पर शायद कुछ लम्बी हो गई। कोई बात नहीं फिर भी आनंददायक।
    http://udbhavna.blogspot.com/

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  5. bahut achha lg raha hai pdhna .
    bahut salo phle mrdula garg ki ak khani pdhi thi usme beti naoukri karti thi beta rojgar ki talash me tha par maa bete ke sath bada hi sotela sluk krti thi .kuch isi tarh ka abhas ho rha hai .jaldi kijiyega agli kadi ke liye .

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  6. आज ही पिछले अंक भी पढे. रोचक और कसी हुई कहानी है. कहीं-कहीं टायपिंग की अशुद्धियां हैं, जो कथा के प्रवाह में व्यवधान पैदा करतीं हैं.

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.