सोमवार, 14 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ?

                 तकलीफ के बाद भी तरुणा यहाँ पर बहुत सुखी थी. न माँ बाप की चख चख  , न भाइयों की असभ्यता भरी बातें और न ही ताने. हाँ वही ताने जिनके बारे में वह बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं थी. फिर भी दोषी तो उसी को बताया जाता, उसके भाग्य को बताया जाता . इन बातों को सुन सुनकर वह तंग आ चुकी थी. पर क्या करे भाग्य के खेल में वह खिलौना बनी थी और नाच रही थी.  वह चाहती है कि बस अब यही इसी बैड  पर पड़ी रहे , पास वाले बैड पर जो बच्चा है उसकी माँ अक्सर उसके पास आ कर बैठ जाती है और फिर ऑफिस से लौटते समय विनीत भी जरूर आता है. 
            ऐसा नहीं कि विनीत को उसके बारे में कुछ भी मालूम न हो, लेकिन एक अधिकारी पद पर कार्य करते हुए उनके पिता ने अपने परिवार को लोकाचार भी नहीं सिखलाया था. सभी कि भाषा एक दूसरे के प्रति असभ्यता कि द्योतक थी - अपशब्दों से भरी हुई , श्लील  और अश्लील का उनको जैसे ज्ञान ही नहीं था. घर से चीखने चिल्लाने की आवाजें पड़ोस में भी जाती थीं और शायद इसी लिए पड़ोसी भी अधिक सम्बन्ध नहीं रखना पसंद करते थे. 
            तरुणा अपने बड़े भाई से छोटी थी और माँ बाप ने उसके मामा के अनुसार बताये हुए लड़के से उसकी शादी , बगैर ये पता किये कि लड़का क्या है?  कर दी. बड़े अरमान से उसने नए घर में कदम रखे थे. बड़ा ही जोशहीन स्वागत हुआ नयी बहू का. उसके कुछ समझ नहीं आया फिर भी उसने सोचा कि चलो मेरे घर से तो अच्छा ही होगा. 
                        परन्तु फिर पता चला कि लड़का पहले से ही शादीशुदा है और उसके मामा ने भी सिर्फ उसकी माँ के जल्दी शादी जल्दी शादी की बात  में लड़का बता दिया.  इसमें उसने न माँ को और न मामा को किसी को भी दोषी नहीं माना था. जब उसको ये बात पता चली तो उसने ऐसे व्यक्ति से समझौता कराने से इनकार कर दिया और वापस आ गयी. उसका वापस आना भी एक मुसीबत ही तो था.  यह बात भाइयों और बहन को नागवार गुजरी.  
रोज रोज  ऐसे ताने सुनने को मिलते रहते -
"इतना रूपया खर्च किया फिर भी वापस आ गयी."
"तुझे तो वही रहना चाहिए था, वही तेरा घर है."
"ऐसी खोटी किस्मत वालों को कहीं भी जगह नहीं मिलती."
"तेरे आने तो अब लड़की वाले भी मेरे  लड़कों से शादी करने में सोचेंगे कि सारी जिन्दगी एक ननद छाती पर मूंग डालेगी."
                       तरुणा नौकरानी की तरह से घर का पूरा काम करती . छोटी बहन तो बाहर नौकरी करती थी और माँ बीमार रहा करती थी. भाई दोनों  नाकारा थे, बाप की पेंशन से गुजारा चलता था और बेटे ऐश करते हुए गुंडागर्दी में लगे हुए थे. तरुणा ने एक स्कूल में नौकरी कर ली , वह घर और नौकरी दोनों काम बखूबी संभाल लेती थी. स्कूल में वह अपने स्वभाव के कारण बच्चों और सहकर्मियों में लोकप्रिय थी. बस एक घर ही था जहाँ उसे कुछ भी नहीं मिला. 


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                                विनीत का एक हाथ पोलिओग्रस्त था , पर उसे अपने पापा के स्थान पर नौकरी मिल गयी थी और अपने और माँ के खर्चे के लिए उसने उसे कर लिया था. किन्तु वह अपनी नौकरी से संतुष्ट न था और वह नौकरी के साथ साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी भी कर रहा था. वह अपने आस पड़ोस से बेखबर रहता था. नौकरी से सीधा घर और अपनी पढ़ाई से ही मतलब रखता था. इधर उधर घूमने या गपशप करने में उसकी कोई  रूचि न थी. ये भी हो सकता है कि वह अपने एक हाथ के पोलिओग्रस्त होने से कुछ हीनता का अनुभव करता हो. लेकिन अपने लक्ष्य के प्रति सजग और प्रतिबद्ध था. उसकी माँ भी अचानक पिता कि मृत्यु के कारण अंतर्मुखी हो गयी थी और वे सिर्फ मंदिर और बाजार ही जाती थी. कहीं पड़ोस में बैठ कर गपशप करने कि उनकी आदत न थी. हाँ पढ़ने कि शौक़ीन थी तो वे अपने को उसमें ही व्यस्त रखती थी. 
                             उस रात तरुणा के गिरने के बाद, जब विनीत और उसकी माँ ने घर वालों के विचार सुने तो उन्हें बड़ा अजीब सा लगा. उसके अपने बाप, भाई , बहन ऐसी बातें कर रहे थे. जैसे कि उसकी जिन्दगी से किसी को कोई प्यार ही न हो, तभी विनीत को लगा कि तरुणा सहानुभूति का पात्र है . वह फिर कभी कभी अपनी माँ से इस बारे में बात कर लेता कि कैसे है इसके घर के लोग? क्या ऐसे भी लोग होते हैं? 
                 और यही सब बातें उसको तरुणा के ओर खींच रही थी. उसे उसकी इसी सोच ने ऑफिस के बाद सीधे अस्पताल में जाकर तोड़ी देर तरुणा के साथ बिताना अच्छा लगता था. उसका भी कोई अपना साथी न था कि जिसके साथ वह बैठे सिवा किताबों के. लेकिन वह ये नहीं सोच पा रहा था कि इसके लिए वह क्या करे कि तरुणा को संबल मिल सके. 
                        तरुणा के आपरेशन के दूसरे दिन ही विनीत उसको देखने के लिए गया था तो तरुणा की माँ ने उसका परिचय कराया - "तरुणा ये विनीत है , अपने बराबर वाले घर में यही लोग रहते हैं. उस दिन इसी ने तो तुम्हें गिरते हुआ देखा था , तब इसकी माँ ने आकर हम सब को जगाया , नहीं तो पता नहीं तू कब तक ऐसे ही पड़ी रहती." 
                        विनीत वही चुपचाप बैठ गया था, उसको ये नहीं समझ आ रहा था कि कैसे वह बातचीत शुरू करे. फिर उसने सोचा कि हाल चल लेने आया था तो वही से शुरू किया जाय.  
"कहिये अब आप कैसी हैं?" 
"ठीक हूँ."
"अब कब तक आपको यहाँ रहना पाएगा?"
"अभी तो कुछ बताया नहीं है, वैसे यहाँ अच्छा है. अरे मैं आपको धन्यवाद देना तो भूली ही जा रही हूँ, मुझे बचाने वाले तो आप ही हैं,  अगर आप न बताते तो पता नहीं मैं सारी रात ही ऐसे ही पड़ी रहती और किसी को खबर ही नहीं होती . "
"ऐसे  मत कहिये, मैं तो रात को ही पढता हूँ और मैं पढ़ रहा था कि मैंने कुछ गिरने कि आवाज सुनी और जब खिड़की से झांक कर देखा तो वहाँ आपकि कराह सुनी तभी मैंने  माँ को जगाया था. " 
"अच्छा कुछ चाय वगैरह लेंगे." तरुणा ने उससे पूछा.
"नहीं, अभी मैं ऑफिस से पीकर ही आ रहा हूँ. फिर कभी. अब मैं चलूँगा."
                   विनीत उससे और उसकी माँ से मिलकर चला गया. लेकिन तरुण को लगा कि क्या ऐसे भी लोग होते हैं कि बगैर अहसान जताए भी इतने विनम्र होते हैं. ऐसे विनम्रता तो उसने अपने जीवन में देखी ही नहीं थी. या ये कहो कि उसके घर का ऐसा माहौल था कि जिसमें इज्जत, विनम्रता और प्यार जैसी चीज का समावेश ही नहीं होता है. तभी तो उसके चाचा बुआ सभी हैं लेकिन उसके घर कोई भी नहीं आता, कितने सारे चचेरे भाई बहन भी हैं लेकिन किसी से कोई  मतलब नहीं है. अरे अपने भाई बहनों में तो प्रेम नहीं फिर चचेरे और ममेरे की बात कौन करे? जब वह स्कूल में अपनी किसी सहकर्मी को अपने परिवार के बारे में बात करते हुए सुनती है तो उसे लगता है कि क्या ऐसा भी होता है? घर के सभी लोग एक साथ बैठ कर खाना खाते हों, एक दूसरे के जन्मदिन पर उपहार देते हों, या फिर छुट्टियों में घूमने जाते हों. कभी पैतृक घर जाते तो बस अपने हिस्से में चले गए बहुत हुआ तो चाचा के घर में बाबा थे उनके पास चले गए. न पापा ने कोई मतलब रखा और न उनके बच्चों ने. माँ को दादी बाबा पसंद नहीं थे. क्योकि पापा ही तो सबसे अच्छी पोस्ट पर थे जिससे उनको लगता था कि सब उनके ओहदे के कारण सम्बन्ध रखना चाहते हैं सो उन्होंने सबको अपने से दूर ही रखा. पापा तो बगैर माँ की अनुमति के सांस भी नहीं ले सकते थे क्योंकि उसके नाना ने पापा  की नौकरी को देख कर ही शादी की थी. बाकी लोगों से कुछ लेना देना नहीं था. 
               सारे भाई बहन भी उसी तरह के हो गए. सिर्फ पैसा और पैसा , पापा ने भी वहाँ से ट्रान्सफर करवा लिया और यहाँ आ गए ताकि किसी से कोई रिश्ता रखने से घर में कलह न हो. घर उनके चलते ही पूरा युद्धक्षेत्र बन गया था. किसी न किसी बात पर कुछ न कुछ बहस होती रहती . जब से पापा रिटायर हो गए तब से और भी सोने पर सुहागा. 
                अपने बच्चों के भविष्य के बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था. कौन पढ़ रहा है? कौन आवारगी में लगा है? इसके बारे में न कभी सोचा और न पूछा कि कौन क्या पढ़ रहा है? सारी बातें बच्चे अपने मन से कर रहे थे. पैसे माँ के पास होते और वे सब को दे देती थी. ये उसका घर नहीं कुरुक्षेत्र था, जिसमें दुर्योधन जैसे लोग ही रहा सकते थे .  
                  जब वह एम ए में थी तो उसके लिए एक रिश्ता आया था और पिता ने मना कर दिया - अभी हमने सोचा नहीं है. सोचना तो उन्हें कभी ही नहीं था और फिर माँ ने मामा से कह कर उसे उस कुँए में धकेल दिया. जिससे निकली तो लेकिन एक कलंक लेकर. ये कलंक जो कभी नहीं छूटेगा  और वह कभी भी चैन से नहीं जी पायेगी. यही सब सोचते सोचते वह डिप्रेशन कि शिकार हो गयी. एक दिन रात में उठा कर दरवाजा खोल कर बाहर निकल गयी. सुबह वापस आई लेकिन उसे खुद नहीं पता कि कैसे ये हुआ? फिर उसको डॉक्टर को दिखाया तो उसने डिप्रेशन कि दवा देना शुरू कर दिया जिससे कि बहुत गहरी नींद आती थी.  उसी दवा के चलते वह इस हादसे का शिकार हो गयी.
                                                                                                                                    (क्रमशः)

5 टिप्‍पणियां:

  1. हम्म कुछ कुछ समझ में आ रहा है कि क्या होने वाला है ...पर जो हो अच्छा हो :)

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  2. रोचक चल रही है कहानी...जब लड़की को अपने माता-पिता के यहाँ ही बातें सुननी पड़ती हैं तो बहुत बुरा लगता है...पर सच्चाई यही है....
    अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार...

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.