शुक्रवार, 11 जून 2010

जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

                 अस्पताल के बैड पर बैठी तरुणा  , खिड़की से बाहर देख रही थी शायद कोई आ रहा होगा, मगर कौन? घर से - घर के नाम से उसे वितृष्णा होने लगी है. लोग कहते हैं कि अपने होते हैं तो बड़े से बड़ा कष्ट भी सहन किया जा सकता है लेकिन उसके  कष्टों में बढ़ोत्तरी कराने वाले तो उसके घर वाले ही हैं. काश ! उस दुर्घटना में वह सदा के लिए सो जाती तो कितना अच्छा होता , कम से कम उसके अपने बाप के ये शब्द उसके कानों में लावा बन कर तो न भर गए होते - "ले जाओ और अस्पताल में डाल दो, मरना होगा तो मर जायेगी और अगर बच जाए तो उठा  लाना."  इतने दिन हो गए अस्पताल में आये वह इस आवाज से अपना पीछा नहीं छुड़ा पा रही है. जब भी इन शब्दों का ख्याल आता है तो मन भर आता है. इस की वजह से ही चुपचाप आंसूं आँखों से लुढ़क कर गालों पर आ गए. वह आँखें बंद किये सोच रही थी  और आंसू ढरकते जा रहे थे. 
                              विनीत कब से उसके पीछे खड़ा ये देख रहा था इसका उसे अहसास न था. पीछे से विनीत ने हलके से आवाज की तो उसने आँखें खोली - "आओ विनीत तुम कब आये?"
"तुम क्या सोच रही थी ? तुम्हें पता ही नहीं चला कि मैं कब से यहाँ खड़ा हूँ."
"वाकई नहीं पता चला."
"नहीं  अकेले बैठे बैठे बोरे जो  हो जाती हूँ, इन किताबों और मैगजीनों के सहारे कितना समय गुजारा जा सकता है?"
"ये तो सही है, लेकिन जो गुजर जाए न उसे अतीत में ही दफन कर देना बेहतर होता है - कब तक उसे सोच कर इस तरह से घुलती रहोगी." विनीत अपने फिलोसफर वाले अंदाज में बोलने लगा.
               यही  तो तरुण को बहुत अच्छा लगता , ऐसे ही किसी इंसान की जिन्दगी में उसने कामना की थी लेकिन पता नहीं उसकी किस्मत कैसे रची गयी? कुछ भी तो नहीं मिला - न शांति , न सुख और न प्यार. घर के कलह से सोचा था कि जब शादी हो जायेगी तो शांति से रहेगी. कभी रुख नहीं करेगी इस घर का. लेकिन उसके लिए दूसरा घर बना ही कहाँ था? जीना भी यहीं और मरना भी यहीं. फिर उसे लगा कि विनीत क्या सोचेगा कि मैं कैसे चुप लगा गयी हूँ. उसने उससे बात बढ़ाने के लिए बोलना शुरू किया .
"तुम मुझे कितना जानते हो विनीत, मेरी कहानी भगवान् ने जिन पन्नों पर लिखी थी न, वे सारे हवा में फड़फड़ा  कर उड़ गए और उन्हें बटोर कर रखने में ही मेरा जीवन भी बिखर गया - कुछ पन्ने कहीं खो गए और कुछ तो रचे ही नहीं गए , तभी तो मेरी जिन्दगी सबसे अलग है." तरुणा  के स्वर में निराशा झलक रही थी और झलके भी क्यों नहीं - घर है लेकिन दीवारों वाला, उसमें रहने वाले उसके अपने होकर भी अपने नहीं है. सब अपने और सिर्फ अपने लिए ही जीते हैं. कौन कितने पैसे उससे नोच सकता है , इसकी होड़ लगी रहती है चाहे पिता हों, भाई हों या बहन. 
  "तुम ऐसा क्यों सोचती हो? जिन्दगी के सारे मोड़ एक जैसे तो नहीं होते है - हर रात के बाद सवेरा आएगा ये भी शाश्वत सत्य है." विनीत उसको इस निराशा से बाहर लाने के लिए जैसे प्रतिबद्ध हो चुका था.  उसके घर परिवार से अब तक वह बहुत वाकिफ हो चुका था. तभी बाहर स्कूटर रुकने की आवाज आई और विनीत तरंत ही यह कहते हुए - "तरुणा मैं फिर मिलूंगा." कमरे के बाहर निकल गया.
            कमरे में पिताजी ने प्रवेश किया , वह रात के लिए खाना लेकर आये थे. वह चुपचाप आँखें बंद करके लेट गयी, बोलना तो दूर उनका मुँह देखने की भी इच्छा नहीं होती थी.
"तेरा चैक आ गया है बरेली से, मैंने उसे बैंक में डलवा दिया है. " पिता ने उसको सूचित किया था.
"अच्छा" अनिच्छा से बोलना पड़ा था.
"मैं सोचता हूँ की डाक्टर तेरा प्लास्टर काट दें तो घर ले चलूँ, बार बार घर से आने जाने में बड़ा पैसा खर्च  होता है और तू तो जानती है की मेरी पेंशन से कुछ भी नहीं हो पाता है. " पिता ने दयनीयता से कहा जब कि उसको मालूम है कि उसके पिता बैंक के मैनेजर की पोस्ट से रिटायर हुए हैं.
"कहिये चैक काट कर दे दूं - आप परेशान न हों. मैं यहाँ ज्यादा  बेहतर हूँ, आप बेकार परेशान होते हैं. यहाँ रात में नर्स रहती ही है और दिन में भी आस पास वाले आकर बैठ जाते हैं. मेरे लिए अपना काम कौन छोड़ कर आ सकता है? " दिल की बात जुबान पर आ ही गयी थी और उसने कुछ ऐसे कड़वे लहजे में बोला कि उनको भागने को पड़ गयी.
"कुछ जरूरत हो तो बता दे, सुबह भेज दूंगा."
"नहीं मुझे कोई भी चीज नहीं चाहिए." वह भी चाह  रही थी कि ये कितनी जल्दी यहाँ से जाएँ.
                  उसके बाद पिता चले गए तो उसने राहत की सांस ली. कितने बेमाबी होते हैं ये खून के रिश्ते भी, खून सफेद हो जाता है ये तो बस कहते हुए सुना था और इस दुर्घटना के बाद उसने देख भी लिया और जी भी लिया. 
                    
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उस  रात भी वह डिप्रेशन की दवा लेकर सोयी थी और उसके बाद गहरी नींद  ही आती थी. उस दिन भी वह ऊपर छत  पर ही सोयी थी. रेलिंग बहुत ही छोटी थी, बराबर वाले घरों से सिर्फ २ फुट की दीवार  बीच में थी. इधर उधर आ जा सकते थे और खड़े होकर बातें भी कर सकते थे. इसी तरह से सामने सड़क की ओर भी २ फुट की ही रेलिंग बननी थी. 
                   रात में वह शायद पानी पीने के लिए उठी होगी और दवा के असर में वह पूरी तरह से सजग न हो पाई और वह तीसरी मंजिल से सड़क की तरफ आकर गिरी.  रात के दो बजे थे, सब लोग गहरी नींद  में सोये थे. निस्तब्धता में उसके गिरने की आवाज ने विनीत को चौंका दिया था - वह उस समय पढ़ रहा था , उसने खिड़की से झांक कर देखा तो उसने माँ माँ करके कराहते  हुए नीचे किसी को पड़े देखा. अपनी माँ को जगाया और कहा कि माँ बगल वाले घर की लड़की छत से नीचे गिरी पड़ी है और उसके घर वालों को पता नहीं है , आप उन्हें ऊपर जाकर जगाइए. माँ ऊपर छत पर चढ़ कर गयी और उन लोगों को आवाज देकर जगाया  तब सब लोग  नीचे आये. माँ बाप दो भाई और बहन सब का हुजूम लग गया. विनीत भी अपनी माँ के साथ पहुँच गया था. 
                   उसके घर वाले पता नहीं किस मिट्टी के बने थे. उसको उठने की किसी को चिंता नहीं थी बल्कि अपनी अपनी राय के जुमले उछल रहे थे.
"लगता है कि इसकी रीढ़ की हड्डी चली गयी है."
"तब तो इसकी जिन्दगी ही बरबाद है, कैसी किस्मत पायी है?"
"मेरे को तो इसका बचना ही मुश्किल लगता है."
"इतनी ऊँचाई से गिरना कोई मामूली बात है."
                  किसी में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि उसको उठाने का प्रयास करते - सब अपनी अपनी राय व्यक्त किये जा रहे थे.  आखिर विनीत की माँ से नहीं रहा गया और उन्होंने नीचे बैठकर कंधे से सहारा देकर उसे बिठाया और पूछा  - 'बेटा बैठने में कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है.' 
"नहीं आंटी , बस इस पैर और एक हाथ में बहुत दर्द है." तरुणा बहुत धीमे धीमे बोल पा रही थी. दर्द से उसका बुरा हाल था लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं थी.  
        "देखिये बहनजी, इसकी रीढ़ की हड्डी एकदम सही है, आप परेशान न हों और इसे डॉक्टर के पास ले जाने की व्यवस्था करें." विनीत की माँ से नहीं रहा गया तो उन्होंने तरुणा की माँ से कहा.
              तरुणा सब कुछ सुन रही थी , वह बेहोश नहीं थी. अपने भाइयों के व्यंग्य , पिताजी के वेदवाक्य. बस माँ थी कि जो रोये जा रही थी - 'हाय मेरी छोरी को क्या हो गया? कैसे ये हो गया? मैंने तो इसके पास ही सोयी थी मुझे भी पता नहीं चला."
                किसी तरह से पड़ोसियों की मदद से उसे जीप में डालकर नर्सिंग होम ले गए लेकिन वहाँ के चार्ज सुनकर जीप को सिविल अस्पताल की ओर मोड़ दिया गया. वही एक जनरल वार्ड में उसको भर्ती करा दिया गया. उसके एक हाथ और पैर दोनों की हड्डियाँ टूटी हुई थी. शुक्र ये था की उसकी रीढ़ की हड्डी बच गयी थी. वह छत से सीधे नहीं बल्कि बीच में डिस्क के तार से उलझती हुई नीचे गिरी थी. जिससे ऊपर से नीचे आने वाली तेजी में कुछ कमी आ गयी थी.                                                                                                                   (क्रमशः )                                    

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.