बुधवार, 23 जून 2010

एक ऐसा सपना भी ! (समापन )

                            वह चली गयी और अपने कामों को पूरा करने में लग गयी. मैं भी अपने कामों में व्यस्त हो गयी. फिर एक दिन मेरी मित्र मेरे पास आई और मुझसे  बोली - 'तुम ही उसको समझाओ  न, यहाँ भी अच्छी नौकरी है, फिर उसकी शादी भी तो करनी है. हमारे लिए अभी दो लड़कियाँ और भी हैं. लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि लड़की कमाने भी लगी और शादी का नाम ही नहीं ले रहे हैं ये लोग."
                  मुझे उसकी दकियानूसी बातों और ये समाज या लोगों की दुहाई बहुत बुरी लगी. लेकिन मेरी पुरानी सहेली है और हर सुख और दुःख बांटा था हमने एक दूसरे के साथ. इस लिए उसको सही राय देना मेरा फर्ज था.

"देखो, ये लोग और समाज उनपर कटाक्ष करते हैं जो सुनते हैं. कल जब ये लड़कियाँ १८ घंटे तक पढ़ाई कर रहीं थी और वह भी एक लैम्प में - इमरजेंसी भी नहीं थी. तीनों बहनों ने मेज के बीच में लैम्प रख कर पढ़ा है , तब किसी समाज और लोगों ने पूछा था कि कैसे पढ़ रहीं है. कोई सामने आया था कि मैं इसकी व्यवस्था कर देता हूँ. नहीं न? फिर क्यों और किस लिए सुनती हो इन लोगों की बातें . फिर भी एक बार उसको समझा देती हूँ."
                     मैंने उन्हें नहीं बताया कि मैंने किस तरह से उसको सपोर्ट किया है. और फिर उसदिन वह चली गयी और हमारी हफ्तों मुलाकात नहीं हुई. फिर एक दिन उसकी बेटी आई और बोली - "मासी आप अपना चैक लगा सकती हैं."
"तुम्हारा काम हो गया?" मैंने उससे माँ के कहे हुए पर बात करने के लिए भी इच्छुक थी.
"हाँ, उतना तो हो गया सारे पेपर भी सबमिट हो गए. अभी मेरी फाइल जायेगी फिर पता चलेगा." 
"अच्छा एक बात बताओ यहाँ भी तो एक से एक अच्छी कंपनी हैं और उनके पॅकेज भी बहुत बढ़िया होते हैं फिर तुम बाहर क्यों जाना चाहती हो? " मैंने उसके विचारों को जानना चाहती थी.
"मासी , ये सब है लेकिन मैं कुछ और ही सोच रही हूँ." वह कहने में कुछ हिचकिचा रही थी.
"हाँ बताओ न , तुमने क्या सोच रखा है?"
"मासी आप जानती हैं न कि मम्मी और पापा कितने लोगों के कहने को महत्व देते हैं. उन्हें इस समाज में रहना जो है. एक दिन मुझसे कह रही थी कि कोई बेटा तो बैठा नहीं है कि कमा कर खिलायेगा." इतना कह कर वह चुप हो गयी.
"फिर, तुमने क्या कहा?"
"मैं खूब चिल्लाई थी कि क्या बेटा बेटा लगा रखा है. बेटे कौन से सोने के सिक्के कमा कर लायेंगे. लेकिन उनकी बात और मेरी बात दोनों अपनी अपनी जगह सही हैं."
"कैसे?"
"मैंने सोचा है कि मैं यहाँ से कनाडा चली जाऊँगी, वहाँ मेरे कुछ सीनियर हैं वो मुझे सपोर्ट कर रहे हैं. मुझे वहाँ जॉब मिल जायेगी. कुछ साल के बाद में छोटी को वहाँ बुला लूंगी. मम्मी पापा के पास कोई सरकारी नौकरी नहीं है और न ही कोई बड़ी सी जायदाद है कि वे बैठ कर गुजर कर लेंगे." माँ बाप के प्रति चिंता उसके शब्दों में ही झलक रही थी
"तुमने कुछ सोचा है क्या इस बारे में?" मैंने तह तक जाना चाह रही थी कि एक लड़की की सोच कितनी गहरी हो सकती है?
"हाँ अगर मैं यहाँ रहती हूँ, तो आज नहीं कल ये शादी के वबाल खड़ा कर देंगे और मुझे करनी भी पड़ेगी नहीं तो रिश्तेदारों की क्या कहूं? कल एक ने बताया कि लड़का इलेक्ट्रोनिक्स की दूकान करता है. कोई बता देता है कि कहीं क्लर्क है और कोई खेती बाड़ी बढ़िया है शहर में मकान भी है और लड़की भी तो कमा रही है." वह निःश्वास लेकर चुप हो गयी. मैंने उसके इतने कहने से ही सारा कुछ समझ लिया था. जब माँ बाप के पास पैसा नहीं होता है तो रिश्तेदार  लड़कियों के लिए ऐसे ही प्रस्ताव लाते हैं. 
"लोग कहते हैं कि देने को तो तुम्हारे पास कुछ है नहीं , कलक्टर कहाँ से मिलेगा? मौसी मैं इसी लिए यहाँ से जाना चाहती हूँ कि न मैं सामने रहूंगी और न ही ये लोग परेशान करेंगे."
"क्या शादी नहीं करोगी?"
"करूंगी न, लेकिन उससे जो न लालची हो और मेरे मानसिक स्तर का हो. पैसे वाला न हो लेकिन अच्छी सोच वाला तो हो. जब मैं चली जाऊँगी तो इन लोगों को भी वही बुला लूंगी. वहाँ पर मासी सीनियर सिटिज़न होने के बाद माँ बाप को भी बुलाने की सुविधा है और फिर उनको वहाँ की सरकार पेंशन देती है. मैं जानती हूँ कि मम्मी पापा कितने खुद्दार हैं. बेटी की कमाई शादी के बाद तो बिल्कुल ही लेना पसंद नहीं करेंगे. अगर यहाँ शादी करती हूँ तो मैं जानती हूँ कि कितना भी सही मैं अपने मम्मी पापा को उतना नहीं देख पाऊँगी जितना कि चाहती हूँ. मैं ससुराल के लोगों के विरुद्ध भी नहीं जाना चाहूंगी और पता नहीं ससुराल और घर वाले कैसे मिलें? इसी लिए वहाँ पर रहूंगी तो इन लोगों का भविष्य मेरी ओर से पूरी तरह से सुरक्षित रहेगा. उनको पेंशन मिलेगी और मेरा पूरा सहारा रहेगा. बहनों को भी वहीं बुलाकर देखती रहूंगी. "
"तुम्हारी तो लम्बी प्लानिंग है." 
"हाँ मासी, मुझे अब ये भी सोचना है कि अब इनकी आराम की उम्र  आ रही है फिर ये कहाँ तक काम करते रहेंगे? वहाँ मुझे कोई चिंता नहीं रहेगी. मैं गलत तो नहीं हूँ न?" उसने मुझसे ही प्रश्न कर दिया था.
"नहीं बेटा , तुम कहीं भी गलत नहीं हो? बहुत सही सोच है तुम्हारी. मुझे ऐसी बेटियों पर गर्व होता है." 
"मासी अगर मेरा कोई भाई होता तो वह भी ऐसे ही सोचता न, कब तक ये लोग खटते रहेंगे."
"हाँ  , बेटा वो तो करता ही ऐसा, पर तुम किस बेटे से कम हो." मेरे मुँह से निकल ही गया. 
"अब चलूँ  मुझे अभी कोचिंग भी जाना है ." कह कर वह चली गयी. 
                          उसने अपनी उम्र से अधिक सोच लिया था. सारी प्लानिंग इतने सुघड़ ढंग से की , सोचती हूँ कि कभी कोई बेटा भी ऐसा ही सोचता होगा. जरूर सोचता होगा लेकिन ऐसी बेटियां भी कितनी होती हैं कि अपने माँ बाप के भविष्य के लिए इतनो  चिंतित हों . माँ बाप बच्चों के सुखद भविष्य की कामना  करते हैं और ये अपने माँ बाप के लिए क्या क्या नहीं कर रही है. मेरा मन उस लड़की के प्रति श्रद्धा से भर उठा कि धन्य है वो माँ बाप जिन्होंने ऐसे संस्कार और सोच दी. उनके  जीवन का संघर्ष मुझे इसी क्षण सफल होता लगा कि अपने तन और मन से जुट कर उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया और इसमें कितने अपमान और कटाक्ष भी सहे किन्तु अब सब सफल हो चुके हैं. कहते हैं न की भगवान के घर देर है अंधेर नहीं.

                                               (इति)

6 टिप्‍पणियां:

  1. आज कल बेटियों वाले ज्यादा भाग्यशाली कहलाते हैं।

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  2. बहुत अच्छी कहानी है ..काश सभी बेटियां इस तरह सोच पाती/ कर पातीं .

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  3. देर से पढने का एक फायदा हुआ की दोनों किश्त साथ पढने की मिली |हमारे समाज को प्रेरणा देने वाली अच्छी कहानी \कहानी क्या ? यही तो हमारे आसपास हो रहा है आज हिम्मत दिखाने की जरुरत है जो की आपकी नायिका ने कर दिखाया है |

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  4. बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी...लोगों ने लड़कियों का संघर्ष नहीं देखा...पर दो बातें सुनाने को हमेशा से तैयार...पैसे के अभाव में सुन्दर,सुघड़ लड़कियों के ऐसे बेमेल विवाह देखे हैं कि कलेजा मुहँ को आ जाता है..
    उस छोटी सी लड़की ने बहुत ही व्यावहारिक निर्णय लिया...ईश्वर ऐसी बेटियाँ और उनमे इतनी हिम्मत सबको दे.

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  5. रेखा जी,

    आपके ब्लॉग की समीझा मैंने हिन्दुस्तान अखबार के कॉलम ब्लॉग वार्ता में की है। कल छपी है। आप देखेंगी तो अच्छा लगेगा। आपका ब्लॉग पसंद आ रहा है।
    रवीश कुमार

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  6. आप बेहतरीन काम कर रहीं हैं | आपकी कहानी शुरू से आखिर तक बांधे रखती है और अंत जैसा सोचा था वैसा ही हुआ | कहानी के बीच में कुछ कुछ जगह ऐसी बातें बोल डी हैं जो बहुत ज़मीनी हैं जैसे की "जब माँ बाप के पास पैसा नहीं होता है तो रिश्तेदार लड़कियों के लिए ऐसे ही प्रस्ताव लाते हैं." | कहानी पानी की तरह बहती गयी और मैं पढता चला गया. आपको बहुत बहुत बधाई |

    --गौरव

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.