शुक्रवार, 14 मई 2010

सुबह का भूला जाए कहाँ?

             सुरभि के सिर से आज पिता का साया भी उठा गया, वह शून्य में निहार रही थी अब क्या होगा? जीवन के इतने वर्ष तो माँ और पापा के निर्देशन में ही गुजरे थे. बड़े भैया तेरहवीं के बाद अपनी नौकरी पर चले गए. निधि भी कल चली गयी , श्रुति को भी हॉस्टल जल्दी जाना था पढ़ाई का समय चल रहा है तो वह भी चली गयी. किसी ने ये नहीं पूछा की सुरभि अब तुम कैसे रहोगी इस घर में अकेले? इतना बड़ा घर उसे खाने को दौड़ता था उसने सिर्फ किचेन और ड्राइंग रूम ही खोल रखा है, बाकी सारा घर बंद कर दिया. 
                        कालेज से आकर खुद ही घर खोलना और खाना बनाकर खाना उसे अब बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था. अब उसके लिए कौन है? नौकरानी भी १ महीने के लिए गौंव चली गयी. कालेज में भी सभी पीछे बातें करते हैं कि  अब ये क्या करेगी? उसके कानों में सब पड़ जाता है और फिर वह ये निर्णय नहीं कर पाती है कि  उसके इस हाल के लिए दोषी कौन है? वह खुद , सुमित , माँ पापा या उसका भाग्य. पता नहीं क्यों, अब उसे इस बात का अहसास हो रहा है, अब तक तो सोचने का वक्त ही कहाँ मिला, पहले श्रुति छोटी रही, फिर माँ की बीमारी में व्यस्त रही और अब दो साल से पापा की बीमारी में. कभी लगा ही नहीं कि वह अकेली है या समय कैसे निकल जाता है. जैसे उसने माँ पापा के बेटे को उनसे कर्तव्यों से मुक्त  कर दिया था, कभी कभी आ जाते देखने के लिए और एक दो दिन रहकर चले जाते. जब तक पापा रहे तो उनका ढेर सा काम होता था, उन्हें समय से दवा देना, खाना-पिलाना और भी ढेर से देखभाल होती थी. अब लगता है कि  कुछ शेष ही नहीं बचा है - सब कुछ खाली खाली सा, उसका कोई अपना होता तो उसे दिलासा देता कि  तुम अकेली नहीं हो- मैं हूँ  न तुम्हारे साथ. पर ये जीवन में हुआ ही कब है और अब होने का तो सवाल ही ख़त्म  हो चुका है. 
                          सुमित उस दिन आया था और हवन के बाद चुपचाप उठ कर चला गया. उसने यह भी नहीं पूछा कि सुरभि अब तुम कहाँ रहोगी? जरूरत भी क्या थी? उसने कहाँ त्यागा था? त्यागा तो सुरभि ने ही था. उस घर की देहलीज लांघ बीस वर्ष पहले वह ही तो चली आई थी. कितना समझाया था सुमित ने कि अपने घर चलो लेकिन तब उसको अपना निजत्व दिखलाई दे रहा था.  एक स्वतन्त्र घर की कामना थी , जहाँ किसी बंधन से न बंधी हो, कोई दूसरा न हो, बस वह दोनों हों. ऐसे ही जीवन की कल्पना कर रखी थी . वह गलत थी और जब उसे इस बात का अहसास हुआ तब तक बहुत देर होचुकी  थी. वह खुद साहस नहीं जुटा पायी उस घर  में वापस जाने का, या प्रारब्ध कहो कि रचना ही ऐसी थी की सुहागन होकर भी उसने परित्यक्ता होकर जीवन व्यतीत किया.
                         जीवन में कभी तो ऐसा दिन आता  ही है कि इंसान को अपनी ही समीक्षा करनी पड़ती है. खासतौर पर तब जब की वह जीवन में कुछ गलत कर रहा हो. आज वही बीस साल पहले की धुंधली यादें सुरभि के मन मष्तिष्क में घूमने लगी.
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                         सुमित ने जब उसको देख कर उसे पसंद कर लिया तो उसे अपने भाग्य से ईर्ष्या होने लगी - कहाँ वह सांवली सी साधारण दिखनेवाली लड़की और कहाँ सुमित खूबसूरत सा नौजवान? क्या देखा होगा उसने मुझमें जो उसने "हाँ" कर दी. इसी को कहते हैंकि भाग्य किसका कहाँ जुड़ा हो? इस पर किसी का जोर नहीं चलता. घर में बहन , भाई , माँ पापा सभी बहुत खुश थे, बड़ी बेटी का रिश्ता इतना अच्छा मिला. सुमित भी एक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर था. सुरभि एक कॉलेज में प्रवक्ता थी. 
      जब उसने अपनी सहेलियों को बताया तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि आजकल खूबसूरत लड़कियों को तो अच्छे लड़के मिलते नहीं है और इस एवरेज को इतना बढ़िया लड़का कैसे मिल गया? 
'अरी बन्नो ए तो बताओ कि तुम उसको कहाँ छुपा कर रखोगी?' सहेलियां उसकी चुटकी लेतीं.
'क्यों? मेरे पास जगह की कमी है क्या? ऐसे रखूंगी कि किसी कि नजर भी न पड़े." वह भी बहुत खुश थी. इनमें से कितनी लड़कियाँ कई बार रिजेक्ट हो चुकी थी. जब कि सब नौकरी कर रही थी. 
वाकई वह भाग्यशाली है जो इतना सुन्दर और अच्छी नौकरी वाला वर उसको मिल गया. 
                           शादी के बाद सब बातें स्पष्ट हुईं कि  सुमित पर अपनी ३ बहनों और विधवा माँ की जिम्मेदारी थी.  वह बहुत ही सुलझे हुए विचारों वाला युवक था, उसने सोचा कि सिर्फ सुन्दरता हो और उसमें समझदारी न हो तो मेरे लिए बेकार है, एक पढ़ी लिखी और नौकरी करती हुई लड़की अधिक समझदार और  सहयोगी साबित होगी. सुमित पर परिवार का बहुत बोझ था, परिवार में सबके प्रति उसका रवैया बहुत ही संतुलित और समझदारी भरा था. उसके निर्णय भी सार्थक ही होते थे. बात चाहे माँ के प्रति हो या बहनों के प्रति - पत्नी की भी वही जगह थी.  एक मुखिया के रूप में बहुत ही सहज भूमिका निभा रहा था. दिखावट से वह खुद भी कोसों दूर रहता था, उसके लिए बहुत सारे रिश्ते आये लेकिन उसको सुन्दरता और पैसे से अधिक एक समझदार और  सुलझे हुए विचारों के साथी की तलाश थी और अपनी ओर से उसने जो भी निर्णय लिया था बहुत ठीक था. 

                         शादी से बहुत बहुत खुश था, उसको घुमाने के लिए कुल्लू मनाली ले गया था . पता ही नहीं चला कि दिन कहाँ गुजर गए? और फिर वापस आकर वही जिन्दगी शुरू हो गयी.  सुमित ने उसको एकांत प्रवास के दौरान इस बात को अच्छी तरह से समझ दिया था कि मैं तन, मन और धन से तुम्हारे पास हूँ, लेकिन कभी माँ और बहनों को इस बात का अहसास नहीं होना चाहिए कि वे उन पर बोझ बन रही हैं. 
                        वह स्वतन्त्र जीवन जीनेकी आदी थी , उसे बहू बनाकर जीना नहीं बल्कि मालकिन बना कर जीने की लालसा थी. सबसे बड़े बेटे की बहू माँ के लिए आँखों का तारा थी और लड़कियाँ भी भाभी पर जान छिड़का  करती थी. जब वह और सुमित कालेज के लिए निकलते तो ननदें उसे घर के गेट तक छोड़ने आती थी. घर में पहुँचते ही मेज पर शाम की चाय और नाश्ता तैयार मिलता था. रात के खाने में भी उसको कम ही लगने दिया जाता. भाभी थक कर आई होगी हम ही बना देते हैं. लेकिन यह सब उसको रास नहीं आ रहा था. वह सुमित  और सिर्फ सुमित के साथ रहना चाहती थी. जहाँ कोई और न हो, कभी खाना बाहर खाकर आते और जब  मन चाहता पिक्चर देखने चले जाते. लेकिन यहाँ तो सुमित बहनों को भी साथ ले कर चल देता. प्राइवेसी जैसे कोई चीज ही कहाँ रह जाती? दम घुटने लगा था उसका उस माहौल में. वह वहाँ से भागने का मौका देख रही थी और कोई ऐसा मौका ही नहीं मिलता कि वह कुछ भी कह पाती. 
                       आखिर एक दिन उसको वह मौका मिल ही गया. शादी के दो महीने बाद ही वह शॉपिंग करके घर लौटी तो उसके हाथ में ढेर सारे पैकेट थे. ये देख कर ननदें झूम उठी कि भाभी पहली बार शॉपिंग करके लायी है जरूर सबके लिए कुछ न कुछ होगा. लेकिन यह क्या उसमें उनके लिए कुछ भी नहीं था. छोटी ननद ने पूछ लिया - 'भाभी हमारे लिए क्या लायीं हैं?'
वह तो पहले से ही बहाना खोज रही थी एक दम से बिफर पड़ी - 'तुम लोगों कि हवस कभी ख़त्म होगी  कि नहीं , भैया तो सब कुछ तुम्हारे लिए लाते ही हैं और हमारे ऊपर भी तुम्हारी निगाहें गडी रहती हैं.' 
                  भैया की दुलारी रोती हुई माँ के पास पहुची. माँ ने उसे समझाया कि जरूरी तो नहीं है कि दोनों ही कुछ न कुछ उसके लिए जरूर लायें.  माँ ने बेटे को कुछ भी नहीं बताया क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उनका हँसता हुआ परिवार किसी प्रकार के विवाद में पड़े. 
                   सुरभि तो इतना कहाँ सहन था ? सुमित के आते ही बिफर पड़ी - ' अपनी बहनों को समझा दीजिये कि मेरी चीजों में हाथ लगाने का साहस न करें, मैं अपने व्यक्तिगत सामानों में किसी कि दखलंदाजी बर्दास्त नहीं करूंगी.' 
            सुमित ने बहुत समझाने की कोशिश की थी कि घर में ऐसी बातें नहीं सोची जाती हैं. यह परिवार है और जहाँ सबको अपना समझ कर रहना पड़ता है. घर दीवारों से नहीं घर वालों से बनता है. मैं तुम्हारी हर बात सुनूंगा लेकिन इस तरह कि बात आइन्दा मेरे से मत करना. ये बात मैंने अपनी बहनों और माँ से भी कह रखी है कि घर में कोई कलह क्लेश मुझे सहन नहीं होगा. 
                       फिर एक दिन वह कालेज से वापस घर नहीं आई, सीधे अपने मायके चली गयी. जब सुमित घर आया तो माँ और बहाने परेशान घर के बाहर खड़ी थी. उन्होंने बताया कि सुरभि तो घर वापस नहीं आई है. सुमित ने अपना स्कूटर अपनी ससुराल कि ओर घुमा दिया. रास्ते में उसके मन में बुरे बुरे ख्याल आ रहे थे , कहीं कुछ हो न गया हो, आज उसको देर से आना था तो उसने सुरभि कह दिया था कि वह घर निकल जाए और वह बाद में आ जायेगा. अगर कहीं चली गयी थी तो फ़ोन से सूचित तो कर ही देना था. घर में न करती मेरे को तो ऑफिस में बता ही सकती थी. फिर क्या कारण होसकता है? उसकी कुछ समझ नहीं आ रहा था , वह सोचता हुआ चला जा रहा था कि सामने से आ रही एक गाड़ी ने जोर जोर से हार्न बजाना शुरू कर दिया तो उसे समझ आया कि वह गलत दिशा में गाड़ी चला रहा था. सिर्फ एक बात आदमी को कितना परेशान कर देती हैं? उसे अपने तन-मन का होश तो रहता ही नहीं है, क्या दिशा भी भटक जाता है? सोचते सोचते वह ससुराल के घर पहुँच गया.

                   अन्दर जाकर देखा तो सुरभि अपने माँ-पापा के साथ बैठी चाय पी रही थी. सुमित का खून खौल उठा कि घर में माँ बहनें परेशान है और ये यहाँ चैन से बैठी चाय पी रही हैं. घर में किसी ने चाय बना कर पी भी नहीं होगी. 
"सुरभि, घर न पहुँचने का कारण क्या है? बगैर सूचित किये तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था. अगर आना था तो सुबह ही बता देती सब क्यों परेशान होते?" सुमित अपने गुस्से और तनाव को छिपा नहीं सका.
            " सुरभि का हमने व्याह किया है, बेचा नहीं है. वहा जब भी चाहेगी आएगी जायेगी." सुरभि के पिता तैश में आकर बोले . 
"मैंने इन्हें कहीं आने जाने से रोका नहीं है, सूचना न होने से सभी को चिंता लगने लगती है - यह भी तो सोचना चाहिए." सुमित ने उनकी बात का जबाव उसी लहजे में दिया.
"अगर नहीं बताया तो कौन सा तूफान आ गया, मैं अगर समझूँगी तो बताऊंगी और नहीं समझूँगी तो नहीं ."  अब सुरभि बोली थी.
"सुरभि , घर चलो, घर में सब परेशान हो रहे हैं, अब नहीं रुकना है." सुमित ने अपने को बहुत संयत कर लिया था.
                   उस दिन तो सुरभि सुमित के साथ चली आई थी लेकिन वह बहाने ढूढती रहती थी कि किस तरह से सास और ननदों से झगडा किया जाय. घर का माहौल बोझिल रहने लगा, इस बात का सबको अहसास हो गया था कि ये सुरभि अधिक दिन तक सबके साथ रहने वाली नहीं है. फिर भी वे अपनी तरफ से ये कोशिश करते कि कोई बात न होने पाए. खासतौर पर सुमित के सामने तो सभी बहुत खुश दिखाई देते थे. सुमित भी अनजान न था, कमरे में सुरभि की बातों से ये स्पष्ट होने लगा था कि वह अलग घर लेकर रहना चाहती है, जहाँ वे दोनों ही हों. खर्च वह घर वालों को दे दिया करे लेकिन उनके साथ नहीं रहना चाहती. सुमित ने सोचा कि समय के साथ साथ सब ठीक हो जाएगा. अभी नया नया मामला है. 
                    सुरभि का मन रखने के लिए वह छुट्टी वाले दिन उसको घुमाने ले जाता और कभी कभी बाहर ही खाकर और घर वालों के लिए पैक करवा कर ले आता. ताकि वह खुश रहे लेकिन वह खुश रहे कैसे?  सारे प्रयास के बाद भी जब सुमित को सुरभि में कोई परिवर्तन न दिखा तो वह तनावग्रस्त रहने लगा. हर समय चुटकुले और व्यंग्य छोड़ने वाला सुमित खामोश रहने लगा - उसे लगा कि नौकरी वाली लड़की से शादी का उसका निर्णय गलत था.
                      किसी तरह से तीन महीने गुजर गए और उसी समय सुरभि में माँ बनाने के लक्षण दिखलाई लेने लगे . जब माँ और बहनों ने सुना तो ख़ुशी से फूली न समाई. सब लोग घर के माहौल  को हंसी ख़ुशी पूर्ण बनाने का प्रयास करते लेकिन सुरभि अलग थलग रहने लगी थी. 

                             और वह दिन भी आ गया जब कि सुरभि ने घर छोड़ने का ऐलान कर दिया और जाकर अपने मायके में रहने लगी. जीवन  के ३ महीने ही उसने ससुराल में गुजारे थे. पलकों में रखता था सुमित उसको , लेकिन उसे उसके घरवाले पसंद नहीं थे. वह अलग घर लेकर सुमित के साथ रहना चाहती थी, सुमित इसके लिए तैयार नहीं था. जब कि उसकी माँ और बहनों ने कहा भी कि भाभी कि खातिर वह अलग घर ले ले, उनको बुरा नहीं लगेगा. सब ठीक हो जाएगा लेकिन उसने अपने जमीर से सौदा करना नहीं सीखा था. उसे पत्नी के लिए विधवा माँ और अविवाहित बहनों को छोड़ना उचित नहीं लगा और उसने एकाकी जीवन चुन लिया. घर में वह यथासंभव खुश रहने कि कोशिश करता  ताकि माँ और बहनें उसकी उदासी या तनाव को पढ़ न लें. 
                            इसके बावजूद वह सुरभि के पास जाता था, उसे समझने के लिए कि घर वापस चले, हर बार उसकी कोशिश नाकाम हुई. सुरभि ने एक बच्ची को जन्म दिया. माँ -बहनें सभी नर्सिंग होम उसको देखने के लिए पहुँचीं और सुरभि कि बहुत मिन्नतें की कि वह अपने घर वापस चले - वह उसी घर में ऊपर के हिस्से में अलग रहे पर अपने घर चले. उस समय उन सभी को अपने भाई के बच्चे के प्रति बहुत प्यार आया कि वह घर जाकर रहेगा तो घर में रौनक आ जाएगी . भैया भी कितने खुश होंगे? एक दम भैया पर पड़ी थी उनकी बेटी. 
                         सुरभि टस से मस न हुई , वह नर्सिंग होम से सीधे अपनी माँ के घर आ गयी. सुमित अपनी बेटी को देखने और उससे प्यार करने के लिए ससुराल आता था. बीच बीच में वह सुरभि को समझाता रहा कि  वह घर वापस चले.  एक दिन वह भी आया जबकि उसके ससुर ने कह दिया - 'यदि अपनी बेटी से इतना प्यार है तो यहीं आकर रहो, मेरे बाद इतना बड़ा मकान किसके लिए है? मधुर को तो यहाँ रहना नहीं है. इस बात का ख्याल दिन में भी न लाना कि अब सुरभि तुम्हारे उस घर में रहने जायेगी.'
                      वह आखिरी दिन था, जब वह सुरभि के पास गया था. उसके बाद उसने बंद कर दिया. सब कुछ वहीं खत्म हो गया. कितना आहत हुआ था उस दिन सुमित कि उसने दिल पर पत्थर रख कर जीना शुरू कर दिया. उसने अपने अंश को भी अपना समझना छोड़ दिया. 
                 ******                                              *****                                               ****
            श्रुति बड़ी होने लगी - माँ और नाना नानी को ही वह परिवार के नाम पर सब कुछ समझती थी. पिता , दादी , बुआ के नाम से उसका परिचय नहीं हुआ था. उसने सुने ही कहाँ थे ये नाम? जब वह स्कूल जाने लगी , उसके सामने और भी रिश्तों के मायने खुलने लगे. जब तक नहीं समझ आया कुछ नहीं बोली, लेकिन एक दिन जब वह फोर्थ क्लास में थी , उसके सवालों का सैलाब अपने धीरज के बाँध को तोड़ बैठा और उसने माँ , नाना, नानी के सामने पूछना शुरू किया - "माँ मेरे पापा कहाँ है?" 
"कहाँ रहते हैं मेरे पापा?"
"सबके पापा साथ रहते हैं - मेरे पापा क्यों नहीं?"
"माँ , पेरेंट्स मीटिंग में सबके पापा आते हैं, फिर मुझसे पूछते हैं ? मैं क्या कहूं?"
                    उसके सवालों पर नाना जी ने उसको डांट दिया - "तुम इन बेकार की बातों में अपना दिमाग क्यों लगती हो ?  तुम्हारे बाप को तुम्हारी चिंता होती तो आते नहीं, आगे से ये बेकार के सवाल पूछ कर माँ को दुखी मत किया करो.  समझ लो मर गया तुम्हारा बाप." 
                      उस मासूम के मन पर क्या छवि बनी  ये तो बाद में पता चला, वह भी अपने पिता कि तरह से खामोश हो गयी. उस बच्ची के सवालों का जबाव उसको मिल गया था. लेकिन इतनी गूढता से उसने सोचा होगा ये किसी को नहीं मालूम था. जैसे जैसे वह बड़ी होती गयी, उसके सवालों में गंभीरता आती गयी और उसने सवाल करने तो छोड़ दिए लेकिन अपने सवालों के जबाव पाने के लिए बेताब होती रही. उसने सुरभि सब पूछा कि पापा कहाँ है? क्या करते हैं?" सुरभि अब इस उम्र में उसके सवालों पर उसको डांट नहीं सकती थी. ये उसके अपने अस्तित्व का सवाल था, पता नहीं वह सही उत्तर न मिलने पर क्या सोचे? और क्या कदम उठा ले? किशोर बुद्धि ऐसी ही होती है, भावुकता में वह कहीं बेटी से भी हाथ न धो बैठे. उसके बाद उसके पास है ही क्या? न पति , न पति का घर ? इसी दहलीज से विदा होकर गयी थी और वापस इसी पर आकर रह रही है. ऐसा नहीं है कि उसने अपने कॉलेज में कम ताने और व्यंग्य सुने हैं लेकिन अब जो निर्णय वह ले चुकी उससे वापस नहीं जायेगी. क्या सुमित अपनी बेटी और पत्नी के लिए घर नहीं छोड़ सकता है? अगर नहीं तो मैं उसको भी सुखी नहीं रहने दूँगी. न उसकी बहनों कि शादी होने दूँगी और न ही उसको चैन लेने दूँगी. ये तो उसने उसी दिन से सोच रखा था जब से वह उस घर को छोड़ कर आई थी. 
एक दिन श्रुति ने आकर कहा - "माँ मुझे पापा का पता चाहिए."
                 सुरभि और उसके माँ पापा उसका मुंह देखते रह गए. अब श्रुति १७ साल कि हो चुकी थी. आखिर उसने बता दिया कि उसके पापा यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है. नाम तो उसको अपने स्कूल में लिखे होने से पता ही था. सुरभि को लग रहा था  कि पता नहीं अब क्या होने वाला है? श्रुति का यह रूप देख कर वह अन्दर तक कांप गयी थी. उस उम्र की उसकी तेजी को श्रुति ने अभी से पा लिया था. जिद में वह सुरभि से कम नहीं अधिक ही थी. वह अपने नाना से सिर्फ नाम भर के लिए ही बात करती थी. 
                 श्रुति एक दिन अपने स्कूल से सीधे पापा के पास पहुँची. सुमित ने उसको देखा ही कहाँ था? कुछ ही महीनों की थी जब उसने वहाँ जाना छोड़ दिया था. वह अपने पापा के रूम में पहुँच गयी. उसने कुछ नहीं कहा बस इस तरह से परिचय दिया.
"आप मुझे नहीं पहचानते हैं, मैं सुरभि और सुमित कि बेटी श्रुति हूँ."
सुमित यह सुनकर अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया. अपने कानों पर उसे विश्वास नहीं हुआ कि ये उसकी बेटी इतनी बड़ी हो गयी. कब इतने साल गुजर गए? अभी कल ही कि तो बात है कि वह उसे छोटा सा देख कर आया था. 
"श्रुति" , यही नाम है तुम्हारा.
"जी"
"बोलो क्या चाहती हो?" सुमित ने बड़े सहज स्वर में उससे पूछा .
"आप माँ के पास क्यों नहीं रहते?"
"क्या आपको कभी मेरी याद नहीं आई?"
                   सुमित अपनी मन कि व्यथा उससे कैसे कहता? कितने बार वह अकेले में रोया भी है लेकिन फिर अपनी नियति को स्वीकार कर लिया. 
"आती तो क्या मैं तुमसे मिल पता?"
"क्यों?" श्रुति सब से बेखर जो थी, उसको कौन बताता कि इतिहास क्या है? गलती किसकी है? नाना से मिल रहे जबावों से तो वह आजिज आ चुकी थी. उसके सामने हमेशा यही पेश करने की कोशिश की गयी कि गलती सुमित की ही थी.
                 सुमित बेटी को गले लगाना चाह कर भी नहीं लगा सकता था. वह कैंटीन में बैठ कर श्रुति से कई घंटे बात करता रहा और उसने बेटी को वह सब बता दिया जो घटित हुआ था - जहाँ से वे मिले और शादी हुई और फिर उनके रास्ते अलग हो गया.
"आप मुझे अपने साथ ले चलिए, माँ अपने आप आ जाएगी." श्रुति ने कहा था.
"नहीं, अभी तुम अपने घर जाओ, जब आना हो तो वही से सबको बता कर आना." सुमित ने उससे कहा.
                       वह पापा से मिल कर जा रही थी और जाते जाते पापा के सामने रो पड़ी. फिर धीरे धीरे संयत होकर चली गयी. 
                       श्रुति ने घर आकर माँ को बताया कि वह अपने पापा से मिलकर आई है. उसके पापा कितने अच्छे हैं?
सुरभि को लगा कहीं मेरी  बेटी हाथ से न निकल जाए, उसने श्रुति के नाना नानी को सब बता दिया और फिर नाना ने श्रुति को डांट लगायी कि क्या जरूरत थी उसके पास जाने की, जिसके पास तुमसे मिलने का समय नहीं हो.
            श्रुति ने अब सब को तौल लिया था. अब वह जब भी मन होता पापा के पास चली जाती. उनसे बातें किया करती और फिर उसने तय किया कि वह मम्मी पापा को फिर से मिलाएगी. पहले उसने अपने पापा से बात करके पूछा कि क्या अब भी मम्मी वापस आना चाहे तो वो आने देंगे.'
"वह कभी भी आ सकती है, लेकिन अब मेरी जिन्दगी में उसकी कोई जगह नहीं रह गयी है. अगर तुम आती हो तो मैं उसको घर में रहने दूंगा."
              श्रुति ने मम्मी से भी पूछा तो मम्मी राजी हो गयी लेकिन उससे पहले दोनों लोगों को आपस में मिलने के लिए उसने समय तय किया कि मम्मी और पापा उसके सामने ही बात करेंगे. वह उनके बीच के मतभेदों को  सुलझाएगी.  इसके लिए उसने पापा और माँ से एक दिन का समय माँगा और उनको कहीं दूर ले जाकर बात करवाने वाली थी. 
उसके तय करने के बाद ही सुरभि को एक कांफ्रेंस में जाने के लिए ऑफर आ गया. वह इस बारे में माँ से बात कर रही थी और उसके नाना सुन रहे थे . वह श्रुति पर एक दम से चिल्ला पड़े, "तुमने ये क्या तमाशा फैला रखा है, जो इतने  साल में नहीं समझा अब क्या समझेगा? सुरभि को इतनी इम्पोर्टेंट कांफ्रेंस में जाना है , यदि उसका मूड ख़राब हो गया तो वह तैयारी नहीं कर पाएगी . यह उसके कैरियर का सवाल है. समझाना है तो जा अपने बाप को समझा." 
                        श्रुति अवाक  रह गयी, यह उसके नाना बोल रहे हैं, जिन्हें बेटी का कैरियर उसके परिवार के आगे नगण्य लग रहा है. वह दाँत पीसकर रह गयी.
                           उसके बाद उसने घर छोड़ दिया और वह हॉस्टल में रहने का निर्णय ले बैठी . अब वह इतनी समझदार हो चुकी थी कि सही और गलत के निर्णय को पहचान सके. उसकी समझ आ गया कि माँ के परिवार छोड़ने के पीछे नाना का ही हाथ है. वह नाना से नफरत करने लगी. छुट्टी में वह पापा के पास जाती और माँ उससे हॉस्टल में मिल जाती.  बस इसी तरह से वर्षों गुजर गए. श्रुति अब भी हॉस्टल में ही रह कर पढ़ाई कर रही है.

                 दीवार घड़ी के घंटे बजे तो सुरभि वर्तमान में लौट आई. कुल मिलाकर उसे क्या मिला? एक बेटी थी वह भी हॉस्टल में रहने लगी. और जब आती है तो अपने पापा के पास. वह तो जिन्दगी का इतना लम्बा सफर अकेले तय कर चुकी है. अपने गलत होने का अहसास उसको अब हो रहा है. किस मुंह से कहे कि वह गलत नहीं है, जवानी के जोश और माँ-बाप की शह में उसने जो भी किया वह उस समय तो उसे बहुत सही लगा था और अब तक उसको गलत नहीं लगा , जब श्रुति अपने पापा के बराबर खड़ी हो गयी तो लगा कि कुछ गलत नहीं बहुत गलत वह कर बैठी है.  उस गुजरे हुए समय को वापस तो नहीं लाया जा सकता है कि उसे सुधार लिया जाय. अब माँ पापा भी चले गए और श्रुति भी शेष क्या है? उसके हाथ तो वह भी नहीं है. इन खाली हाथों में - जिनमें न वर्तमान है और न भविष्य सिवा पाश्चाताप के.


                   अकेला घर खाने को दौड़े या फिर खा ही जाय , रहना तो उसे उसी में है.  महीनों गुजर गए सब झील के ठहरे हुए पानी के तरह से थम गया था. घर से कॉलेज और कालेज से घर. उसे कॉलेज में भी सुनाई देने लगा था कि 'अब ये क्या करेगी अकेली?'
'बेटी भी तो अब नहीं रहना चाहती है?'
'इसकी बेटी से कौन शादी करेगा?'
'अरे , वह बहुत समझदार साबित होगी, उसने देखा है कि किसी भी बात का घमंड हो एक दिन टूटता जरूर है.'
                    ये सब उसकी जूनियर थीं, हमेशा दर्प से दमकता चेहरा अब मुरझाने लगा था. हर समय कुछ न कुछ चलता रहता था. किसी अपने के छूट जाने के दर्द को वह सह रही थी. ये अपने माँ पापा नहीं बल्कि श्रुति थी. क्या उस समय सुमित ने भी यही झेला होगा , जब उसके पापा ने उसको कहा था. उसके साथ तो उसकी माँ और बहनें भी थीं पर मेरे पास तो कोई भी नहीं  है. मैं कैसे रहूँ? 
'क्यों क्या तुम्हारा वह अकेले रहने का सपना अब पूरा हो चुका  है?' अंतर से आवाज आई.
'पर मैं क्या कर सकती थी? मैं उस दड़बे में नहीं रह सकती थी?' उसको मन को कुछ तो उत्तर देना ही था. 
'फिर अब अफसोस किस बात का है?  अकेले रहने का असली सुख तो अब मिलेगा, न कोई आगे और न पीछे. शोरगुल भी तुम्हें पसंद नहीं था. अब सब शांत हो गया है.  तुम जीत गयीं न. बधाई हो. ' उसके मन ने उसको बहुत लज्जित किया था. वह उससे तो वह मुंह नहीं चुरा सकती  थी. 
                    फिर एक दिन सुमित आया उसको सिर्फ ये सूचना देने के लिए कि " श्रुति ने अपना जीवनसाथी खोज लिया है लेकिन वह शादी नहीं करेगी."
"क्यों शादी क्यों नहीं करेगी? क्या इसी तरह से रहेगी?"  सुरभि तेजी से बोली.
"हाँ, उसका कहना है कि शादी करके अलग रहने से अच्छा है कि शादी की ही न जाय. या फिर पहले से ही अलग रहा जाय."
"ये कैसे हो सकता है." सुरभि बहुत गुस्से में आ गयी.
"हो क्यों नहीं सकता , जब हम अलग रह सकते हैं, तो वह भी रह सकती है." सुमित का स्वर बेहद संयत था.
"सुमित, प्लीज बस करो, मुझे ताने मत मारो, मैं खुद भी इस बात को महसूस कर रही हूँ कि मैं उस समय जीवन और परिवार के अर्थ नहीं समझ पायी, पर अब मैं विवश हूँ."
"कौन सी विवशता, अब माँ नहीं हैं, और मेरी बहनें भी नहीं है, हाँ मैं अवश्य हूँ, और वह भी अपना घर नहीं छोड़ सकता, तुम्हें भी नहीं कहूँगा कि तुम अपना घर छोडो." यह कहते हुए सुमित बाहर निकल गया.
                  सुरभि फूट-फूट कर रोने लगी - अब शेष क्या रहा? मेरे माँ पापा चले गए, श्रुति बहुत दूर हो गयी. सुमित तो वर्षों पहले ही दूर चला गया था. पर अब मैं कहाँ जाऊं? सुमित के पास जाने का साहस कहाँ रहा? सब कुछ कल पर छोड़ कर उसने एक साथ २ नींद की गोली निगल ली और चुपचाप लेट गयी. 
                 सुबह उठकर उसने एक ही निर्णय लिया कि वह इस घर को छोड़ देगी. और वह एक बैग लेकर ताला डाल कर बाहर निकल गयी.................


4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढ़िया कहानी है..महिलाओं को भी सहिष्णु होने का सन्देश देती हुई....कितने भी विलक्षण गुणों से परिपूर्ण हों पर अगर सहिष्णुता नहीं होती तो सारे गुण बेकार हैं...सुरभि को अपनी गलती का अहसास हुआ पर इतने स्वर्णिम दिन गंवाने के बाद...और ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं.
    "जीवन में कभी तो ऐसा दिन आता ही है कि इंसान को अपनी ही समीक्षा करनी पड़ती है. खासतौर पर तब जब की वह जीवन में कुछ गलत कर रहा हो"

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  2. रेखा जी बहुत ही सुन्दर कहानी है ..एक साथ कई चित्र उभर आये हैं दिमाग में समझ नहीं आ रहा क्या कहूँ...हाँ कितना अच्छा हो कि वक़्त के निकल जाने के बाद पछताने से अच्छा हम कोई भी फैसला करने से पहले थोडा भविष्य के बारे में भी सोच लें.

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  3. आत्मकेंद्रित व्यक्ति अपना तो अहित करता ही है,कईयों का जीवन नरक कर देता है...उसपर भी ऐसा व्यक्ति यदि अहंकारी भी हो...तब तो फिर कहना ही क्या...

    आपकी इस कथा ने मन मोह लिया....अपने आस पास ऐसे चरित्रों और घटनाक्रमों की बाढ़ सी देखी है मैंने...
    कहते हैं कि पढने लिखने से व्यक्ति की सोच समझ बड़ी होती है,पर मेरा अनुभव यही रहा है कि आज की शिक्षित लड़कियां जहाँ अपने अधिकारों ,स्वार्थ और सुख सुविधाओं के प्रति आवश्यकता से अधिक सजग जागरूक रहने लगी हैं,उतना ही कर्तब्यों के प्रति उदासीन भी...
    और उसपर से यह नया फैशन " लिविंग टूगेदर वाला" .....समाज कहाँ जा रहा है,कुछ समझ नहीं पड़ता...अब बताइए न...लिविंग टूगेदर, अपने दायित्वों से भागने का ही तो प्रयास है न...

    आपकी यह कहानी वर्तमान समस्या को सार्थक ढंग से उकेरती अति सार्थक कथा है....काश कि लोग समय रहते चेतें....

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  4. बहुत अच्छी कहानी...केवल स्वयं के बारे में सोचना कभी कभी कितना अकेला कर देता है....

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कथानक इसी धरती पर हम इंसानों के जीवन से ही निकले होते हैं और अगर खोजा जाय तो उनमें कभी खुद कभी कोई परिचित चरित्रों में मिल ही जाता है. कितना न्याय हुआ है ये आपको निर्णय करना है क्योंकि आपकी राय ही मुझे सही दिशा निर्देश ले सकती है.